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Articles by सिंडी हेस कैस्पर

सोचीसमझी दयालुता

अपने बच्चों के साथ अकेले विमान में सवार होकर, एक युवा माँ अपने तीन साल की बेटी को शांत करने की कोशिश करने में लगी थी जो परेशान कर रही थी और रो रही थी l फिर उसका चार महीने का बेटा जो भूखा था ऊंची आवाज़ में रोने लगा l

उसके बगल में बैठे एक यात्री ने जल्दी से छोटे बच्चे को पकड़ने की पेशकश की, जबकि जेसिका ने अपनी बेटी को संभाला l तब यात्री ने अपने खुद के दिनों को एक युवा पिता के रूप में याद करते हुए – उस तीन साल की बेटी के साथ रंग भरना शुरू कर दिया, जबकि जेसिका ने अपने शिशु को दूध पिलाया l और अगली कनेक्टिंग फ्लाइट पर, उसी व्यक्ति ने ज़रूरत पड़ने पर फिर से सहायता करने की पेशकश की l

जेसिका ने याद किया, “मैं इस घटना में परमेश्वर की दया से चकित रह गयी l हमें किसी भी व्यक्ति के बगल में सीट दी जा सकती थी, लेकिन हमें एक सबसे अच्छे पुरुष के बगल में सीट मिली जिनसे मैं कभी मिली हो l”

2 शमूएल 9 में, हम एक और उदाहरण के बारे में पढ़ते हैं जिसे मैं सोचीसमझी दयालुता कहती हूँ l राजा शाऊल और उसके बेटे योनातान के मारे जाने के बाद, कुछ लोगों ने आशा की कि दाऊद सिंहासन के अपने दावे में किसी भी प्रतिद्वंदिता को कुचल देगा l इसके बजाय, उसने पूछा, “क्या शाऊल के घराने में से कोई अब तक बचा है, जिसको मैं परमेश्वर  की सी प्रीति दिखाऊँ?” (पद.3) l तब योनातान के पुत्र मपिबोशेत को दाऊद के पास लाया गया जिसने उसकी विरासत को बहाल किया और उसके बाद गर्मजोशी से उसे अपने खाने की मेज को साझा करने दिया – मानो वह उसका अपना पुत्र हो (पद.11) l

परमेश्वर की असीम दयालुता के लाभार्थियों के रूप में, हम दूसरों के प्रति जानबूझकर दया दिखाने के अवसरों की तलाश कर सकते हैं (गलातियों 6:10) l

आसानी से उलझ जाना

कई साल पहले एक तपने वाले  जंगल में लड़ रहे सैनिकों को एक निराशाजनक समस्या का सामना करना पड़ा l चेतावनी के बिना, एक विकट कांटेदार बेल खुद को सैनिकों के शरीर और साज़-समान से लिपट जाती थी, जिससे वे फंस जाते थे l जैसे-जैसे वे उससे छूटने के लिए संघर्ष करते थे, पौधे के लता-तंतु उनको और अधिक उलझा देते थे l सैनिकों ने उस घासपात को “वेट-ए-मिनट(एक मिनट रुको)” बेल नाम दिया, क्योंकि एक बार जब वे फंस जाते थे और आगे बढ़ने में असमर्थ हो जाते थे, तो उन्हें अपने समूह के अन्य सदस्यों को चिल्लाना पड़ता था, “अरे, एक मिनट रुको, मैं अटक गया हूँ!”

इसी तरह, जब हम पाप में फंसते हैं, तो यीशु के अनुयायियों के लिए आगे बढ़ना कठिन होता है l इब्रानियों 12:1 हमसे कहता है “हर एक रोकनेवाली वस्तु और उलझानेवाले पाप को दूर करके, वह दौड़ जिसमें हमें दौड़ना है धीरज से दौड़ें l” लेकिन हम किस प्रकार हमको दबाने वाले पाप को फेंक सकते हैं?

यीशु ही एकमात्र ऐसा है जो हमें हमारे जीवन में फैलनेवाले पाप से मुक्त कर सकता है l काश हम हमारे उद्धारकर्ता की ओर अपनी आँखें गड़ाना सीखें (12:2) l क्योंकि परमेश्वर का पुत्र “सब बातों में अपने भाइयों के समान [बन गया],” वह जानता है कि परीक्षा में पड़ना क्या होता है - और फिर भी पाप न करना (2:17-18; 4:15) l अकेले, हम अपने पाप में हताश होकर फंस सकते हैं, लेकिन परमेश्वर चाहता है कि हम परीक्षा पर विजयी हों l यह हमारी अपनी शक्ति से नहीं, लेकिन उसकी सामर्थ्य से हम उलझानेवाले पाप को “फेंककर” उसकी धार्मिकता के पीछे दौड़ सकते हैं (1 कुरिन्थियों 10:13) l

खाएँ और दोहराएँ

जब केरी और पॉल का विवाह हुआ, दोनों में से कोई भी भोजन पकाना नहीं जानता था l परन्तु एक रात केरी ने स्पगेटी बनाने कोशिश की – इतनी अधिक मात्रा में बना दी कि उस जोड़े ने अगले दिन फिर उसे रात के भोजन में उसे खाया l तीसरे दिन, पॉल ने भोजन बनाने की पेशकश की, और आशा करते हुए कि पास्ता और सॉस सप्ताहांत तक चलेगा दूना मात्र में बना डाला l हालाँकि, जब वे दोनों उस रात को भोजन करने बैठे, केरी ने स्वीकार किया, “स्पेगेटी से मेरा जी ऊब गया है l”

इस्राएलियों की तरह एक ही भोजन खाने की कल्पना करें – चालीस वर्षों तक l प्रत्येक सुबह  वे लोग मीठा “सुपर भोजन” बटोरते थे परमेश्वर जिसका प्रबंध करता था और उसे पकाता भी था (कुछ भी बचता नहीं था यदि अगला दिन सबत नहीं है, निर्गमन 16:23-26) l ओह, अवश्य, वे रचनात्मक हो गए – उसे सेंक लेते और उबाल लेते थे (पद.23) l परन्तु, ओह, उन्होंने मिस्र में जिन भोजन वस्तुओं का आनंद लिया था उसकी कमी महसूस कर रहे थे (पद.3; गिनती 11:1-9), यद्यपि क्रूरता और दासत्व की ऊँची कीमत पर वह पोषण उन्हें मिलता था!

हम भी कभी-कभी कुढ़ते हैं कि अब जीवन वैसा नहीं है जैसा कभी हुआ करता था l या शायद जीवन की वह “एकरूपता” हमारे असंतुष्ट होने का कारण है l परन्तु निर्गमन 16 इस्राएलियों के प्रति परमेश्वर का विश्वासयोग्य प्रबंध बताते हुए उनको हर दिन उसपर भरोसा करने और उसकी देखभाल पर निर्भर रहना सिखाता है l

परमेश्वर हमारी सभी ज़रूरतें पूरी करने की प्रतिज्ञा करता है l वह हमारी इच्छाएँ पूरी करता है और “उत्तम पदार्थों” से हमारी आत्मा को भर देता है (भजन 107:9) l

पड़ोस के परे

2017 की गर्मियों में, हरिकेन हार्वे (बड़ी भारी आंधी) ने अमेरीका के खाड़ी तट के पास  जीवन और सम्पति को विनाशकारी नुक्सान पहूंचाया l अनेक लोगों ने तात्कालिक आवश्यकतामन्द लोगों के लिए भोजन, जल, वस्त्र, और आश्रय का प्रबंध किया l

मेरिलैंड में एक पियानो स्टोर के मालिक नकुछ अधिक करने को प्रेरित हुआ l उसने सोचा कि किस तरह संगीत उन लोगों में जिन्होनें सबकुछ खो दिया था एक विशेष प्रकार की चंगाई और सामान्य अवस्था ला सकता था l तब वह और उसके कर्मचारी ऐसे पियानों को जो पूर्व में किसी के थे नया करने में लग गए और पता लगाने लगे कि आवश्यकता सबसे अधिक कहाँ थी l उस बसंत के समय, डीन क्रेमर और उसकी पत्नी, लोईस, एक ट्रक में मुफ्त पियानों लाद कर उजड़े हुए क्षेत्र के कृतज्ञ परिवारों, कलीसियाओं, और स्कूलों में बांटने के लिए टेक्सास, के हयूस्टन की लम्बी यात्रा पर निकल पड़े l

हम कभी-कभी ऐसा मान लेते हैं कि शब्द पड़ोसी का अर्थ है कोई जो निकट रहता है या कम से कम जिसे हम जानते हैं l किन्तु लूका 10 में यीशु ने नेक सामरी का दृष्टान्त यह सिखाने के लिए दिया कि हमारे पड़ोसियों के लिए हमारे प्रेम की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए l सामरिया के उस मनुष्य ने एक घायल अजनबी को मुफ्त में दिया, यद्यपि वह मनुष्य एक यहूदी था, ऐसे लोगों के समूह के भाग को जो सामरियों से एकमत नहीं थे (पद.25-37) l

जब डीन क्रेमर से पूछा गया क्यों उसने वे सारे पियानों को मुफ्त में दे दिया, उसने सरलता से समझाया : “हमें अपने पड़ोसियों से प्रेम करने की आज्ञा मिली है l” और वह यीशु ही था जिसने कहा, परमेश्वर और अपने पड़ोसी से प्रेम करने में “इससे बड़ी और कोई आज्ञा नहीं” (मरकुस 12:31) l

आवाज़ों से बचना

अनेक वर्ष पूर्व एक महाविद्यालय के सभापति ने एक सलाह दी कि सभी विद्यार्थी उनके साथ एक शाम के लिए बिजली बचाने में शामिल हों। यद्यपि विद्यार्थी सहमत हो गए, बहुत हिचकिचाहट के साथ उन्होंने अपने सेलफोन एक ओर रख दिए और चैपल(प्रार्थनाघर) में चले गए। अगले एक घण्टे तक वे संगीत और प्रार्थना की सभा में ख़ामोशी के साथ बैठे रहे। उसके बाद एक सहभागी ने “शान्त हो जाने के एक अद्भुत सुअवसर. . .एक ऐसा मौका जहाँ आप समस्त अनचाही आवाज़ों से अलग हो सकते हैं” के अनुभव के बारे में बताया। 

कई बार अनचाही आवाज़ों से बचना बहुत ही कठिन होता है। हमारे बाह्य और आन्तरिक संसारों, दोनों का कोलाहल बहरा कर देने वाला हो सकता है। परन्तु जब हम शान्त रहना सीख जाते हैं, तो हम भजनकार के शान्त रहने के याद दिलाने की आवश्यकता को समझना आरम्भ कर देते हैं, ताकि हम परमेश्वर को जान सकें (भजन संहिता 46:10) । 1 राजा 19 में, हम यह भी पाते हैं कि नबी एल्लियाह ने प्रभु की खोज की तो उसने उन्हें प्रचण्ड आँधी में, भूकम्प में, या अग्नि में नहीं पाया (पद 9-13) । परन्तु एल्लियाह ने परमेश्वर के दबे हुए धीमे स्वर को सुना (पद 12) । 

त्योहारों के दौरान अतिरिक्त आवाजों का होना निश्चित है। जब परिवार और मित्र एकत्र होते हैं, तो बातचीत, अतिरिक्त भोजन, हंसी के ठाहकों और प्रेम की मधुर अभिव्यक्ति का एक समय अवश्य होता है। परन्तु जब हम ख़ामोशी के साथ अपने हृदयों को खोलते हैं, तो परमेश्वर के साथ वाले उस समय को हम और भी मधुर पाते हैं। एल्लियाह के समान उस शान्ति में हमारी परमेश्वर के साथ भेंट होना अधिक सम्भव होता है। और अनेक बार, यदि हम सुनें, तो हम भी उस धीमे स्वर को सुन पाएँगे।  

श्रेय देना

1960 में कुछ असामान्य तस्वीरें, जिसमें उदास बड़ी आँखों वाला व्यक्ति या एक जानवर होता था, बहुत प्रसिद्ध हो गई थीं। कुछ लोगों ने इस कार्य को “भावुक” – (या घटिया) समझा, - परन्तु कुछ को इसमें प्रसन्नता प्राप्त हुई। जब उस कलाकार के पति ने अपनी पत्नी की रचनाओं को प्रोन्नत करना आरम्भ किया, तो यह दम्पति काफ़ी समृद्ध हो गया। परन्तु उस कलाकार के हस्ताक्षर-मार्गरेट केन-उसके कार्य पर कभी दिखाई नहीं दिए। इसके स्थान पर मार्गरेट के पति ने अपनी पत्नी के कार्य को अपना कार्य करके प्रस्तुत किया। भय के कारण मार्गरेट बीस वर्षों तक इस धोखेबाज़ी के बारे में चुप रही, जब तक उनका तलाक नहीं हो गया। उन दोनों में एक कोर्ट में हुए पेंटिंग की प्रतिस्पर्धा ने वास्तविक कलाकार की पहचान को प्रमाणित किया।

उस व्यक्ति की धोखेबाज़ी स्पष्ट रूप से गलत थी, परन्तु यीशु के अनुगामियों के रूप में हमारे लिए अपने गुणों या दूसरों के लिए की गई भलाई का श्रेय ले लेना बहुत आसान होता है। परन्तु वे विशेषताएँ मात्र परमेश्वर के अनुग्रह के कारण ही होती हैं। यिर्मयाह 9 में हम पाते हैं कि वह नबी दीनता की कमी और लोगों के अपश्चातापी हृदयों के कारण विलाप कर रहा है। उसने लिखा कि हमें अपनी बुद्धि, अपनी ताकत या अपनी धन-सम्पत्ति पर घमण्ड नहीं करना चाहिए, अपितु यह कि हम यह समझ और जान सकें कि वह ही प्रभु है “जो पृथ्वी पर करुणा, न्याय और धर्म के काम करता है” (पद 24) ।

हमारे हृदय आभार से भर जाते हैं जब हम वास्तविक कलाकार की पहचान को समझ लेते हैं। “हर एक अच्छा वरदान और हर एक उतम दान...पिता की ओर से मिलता है” (याकूब 1:17) । समस्त श्रेय और सम्पूर्ण स्तुति अच्छे वरदान देने वाले की ही है।

हमारा सुरक्षित स्थान

मेरी पहली नौकरी एक फास्टफूड रेस्टोरेंट में थी l शनिवार की शाम को, एक व्यक्ति मेरे लिए इंतज़ार करते हुए मुझसे पूछता था कि मैं काम से कब छुट्टी पाऊँगी l इससे मैं असहज महसूस करती थी l विलम्ब होने पर वह चिप्स आर्डर करता था, फिर कोई पेय, ताकि होटल का प्रबंधक उस से बाहर जाने को न कह दे l यद्यपि मेरा घर निकट ही था, फिर भी मैं कुछ पार्किंग स्थलों से और एक रेतीले मैदान से होकर निकलने से डरती थी l आख़िरकार, मध्यरात्रि में, मैंने ऑफिस के अन्दर जाकर फ़ोन किया l

और जिस व्यक्ति ने फोन का उत्तर दिया वह थे मेरे पिता, जिन्होंने बिना दोबारा सोचे अपने गरम बिस्तर से उठकर पांच मिनट के अंतराल में मुझे घर ले जाने आ गए l

उस रात मेरे पिता का आकर मेरी मदद करने की निश्चयता मुझे भजन 91 में वर्णित आश्वासन की याद दिलाता है l हमारे भ्रमित, भयभीत अथवा ज़रूरत में होने पर हमारे स्वर्गिक पिता हमेशा हमारे साथ रहते हैं l वे कहते हैं : “जब वह मुझ को पुकारेंगे, तब मैं उनकी सुनूँगा” (भजन 91:15) l वह केवल एक स्थान  नहीं है जहाँ हम सुरक्षा के लिए जाते हैं l वह हमारा आश्रय है (पद.1) l वह हमारा गढ़ है जिस पर हम भरोसा कर सकते हैं (पद.2) l

भय, खतरा, अथवा अनिश्चितता में, हम परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर भरोसा कर सकते हैं कि जब हम उसे पुकारेंगे, वह हमारी सुनकर हमारी परेशानियों में हमारे साथ रहेगा (पद.14-15) l परमेश्वर हमारा सुरक्षित स्थान है l

एक साल में बाइबल

उम्र में बढ़ते समय मैं अपनी दो बहनों के साथ देवदार की लकड़ी से बनी एक बक्से पर जो मेरी माँ की थी बैठना पसंद करती थी l मेरी माँ ऊन से बने हमारे स्वेटरों को उसमें रखती थी और हाथ के बने काम जो मेरी दादी ने कढ़ाई अथवा क्रोशिया से बनाए थे l उसके लिए वह बक्सा महत्वपूर्ण था l वह देवदार लकड़ी पर भरोसा करती थी जिसकी तेज़ महक अन्दर के सामान को कीट आदि से बचा सकती थी l

संसार की अधिकतर वस्तुएं आसानी से कीट अथवा मोर्चे से खराब हो सकते हैं अथवा उनके चोरी होने का डर होता है l मत्ती 6 हमें सीमित जीवन-अवधि वाली वस्तुओं पर नहीं किन्तु अनंत  मूल्य वाले वस्तुओं पर विशेष ध्यान देने को प्रोत्साहित करता है l जब 57 वर्ष की उम्र में मेरी माँ की मृत्यु हुयी, उन्होंने अधिक सांसारिक वस्तुएं इकठ्ठा नहीं किया था, किन्तु मैं उस धन के विषय विचार करना चाहती हूँ जो उन्होंने स्वर्ग में इकट्ठा किया था (पद.19-20) l

मैं याद करती हूँ कि वह परमेश्वर को कितना अधिक प्यार करती थी और शांत तरीकों से उसकी सेवा करती थी : विश्वासयोग्यता से अपने परिवार की देखभाल, सन्डे स्कूल में बच्चों को पढ़ाना, पति द्वारा त्यागी गयी स्त्री से मित्रता निभाना, एक युवा माँ से सहानुभूति रखना जिसके बच्चे की मृत्यु हो चुकी थी l और वह प्रार्थना  भी करती थी . . . . अपनी दृष्टि खोने के बाद भी और व्हील चेयर तक सीमित होने पर भी,  वह दूसरों को प्यार और उनके लिए प्रार्थना करती रही l

जो हम इकठ्ठा करते हैं वह हमारे वास्तविक धन का माप नहीं है किन्तु हम क्या और किसमें अपना समय और मनोभाव निवेश करते हैं l हम सेवा और यीशु का अनुसरण करने के द्वारा कौन सा “धन” स्वर्ग में इकठ्ठा कर रहे हैं?

अभी के लिए अलविदा

विदा लेते समय मेरी पोती और मेरा नियम है, हम गले मिलकर 20 सेकिंड के लिए दहाड़ मार कर रोते हैं और अलग होने पर कहते हैं “फिर मिलेंगे” और लौट जाते हैं। हम सदा यह आशा करते हैं कि हम एक दूसरे से फिर मिलेंगे-जल्द ही।

परंतु कभी-कभी अपने प्यारों से बिछुड़ना कठिन होता है। पौलुस के इफिसुस के प्राचीनों से विदा लेने पर वे उसके गले लिपट कर उसे चूमने लगे...वे उस बात का शोक करते थे, जो उस ने कही थी, कि तुम मेरा मुंह फिर न देखोगे (प्रेरितों के काम 20:37–38)।

तथापि गहरा दुःख तब होता है जब हम मौत से अलग हो जाते हैं और इस जीवन में आखिरी बार अलविदा कहते हैं। यह कल्पना से भी बाहर है। हम शोक मनाते और रोते हैं। उन्हें दोबारा गले न लगा पाने के दिल तोड़ने वाले दुःख को हम झेलेंगे?

फिर भी...हम उन लोगों के समान शोक नहीं करते हैं जिनके पास कोई आशा नहीं है। पौलुस उनके लिए भविष्य में पुनर्मिलन के बारे में लिखते है जो "विश्वास करते हैं कि यीशु मरा और फिर जी भी उठा..और इस रीति से हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे। (1 थिस्सलुनीकियों 4:13-18)। क्या पुनर्मिलन है! और हम सर्वदा यीशु के साथ रहेगें-यह एक शाश्वत आशा है।