अपने प्रचार का अभ्यास
पासवान और संपादक इयूजीन पीटरसन को स्विट्ज़रलैंड के चिकित्सक और उच्च आदर प्राप्त पास्त्रीय परामर्शदाता पॉल टोर्नियर का व्याख्यान सुनने का अवसर मिला l पीटरसन ने डॉक्टर के कार्यों को पढ़ा था, और चंगाई के प्रति उनके दृष्टिकोण की प्रशंसा की थी l व्याख्यान ने पीटरसन पर एक गहरी छाप छोड़ी l जब वे सुन रहे थे, उनको महसूस हुआ कि टोर्नियर के कथनी और करनी में अंतर नहीं था l पीटरसन ने अपने अनुभव का वर्णन करने के लिए इस शब्द का चुनाव किया : “अनुरूपता l यह सबसे अच्छा शब्द है जो मैं ढूढ़ सकता हूँ l”
अनुरूपता (Congruence) – इसको कुछ लोग ”अपने प्रचार का अभ्यास करना” या “अपनी कथनी को करनी में बदलना” संबोधित करते हैं l प्रेरित यूहन्ना बल देते हैं कि यदि हममें से कोई “यह कहता है कि मैं ज्योति में हूँ और अपने भाई से बैर रखता” है तो वह अब तक “अन्धकार ही में है” (1 यूहन्ना 2:9) l निष्कर्ष यह है, हमारे जीवन और हमारे कार्य बस मेल नहीं खाते हैं l यूहन्ना आगे कहता हैं कि ऐसे लोग “नहीं [जानते] कि कहाँ [जाते] हैं” (पद.11) l यह शब्द जिसका उन्होंने यह बताने के लिए चुनाव किया कि परस्पर-विरोधी हमें किस प्रकार छोड़ जाता है? दृष्टिहीन l
वचन के प्रकाश को हमारे मार्गों को आलोकित करने की अनुमति देने के द्वारा परमेश्वर के साथ निकटता से पंक्तिबद्ध रहकर जीवन जीना हमें दृष्टिहीन होने से बचाता है l परिणाम एक धर्मी दृष्टिकोण होता है जो हमारे दिनों को स्पष्टता देता है और उन्हें केन्द्रित करता है – हमारी कथनी और करनी अनुरूप होते हैं l जब दूसरे यह देखते हैं, प्रभाव आवश्यक रूप से किसी ऐसे व्यक्ति का नहीं है जिसे सभी स्थान की जानकारी है जहाँ वह जा रहा है, परन्तु ऐसे व्यक्ति का है जो स्पष्टता से जानता है वह किसका अनुगामी है l
अवसर को जाने न दें
“अपने बच्चों को चाँद दिखाने का मौका कभी न चूकें!” उन्होंने कहा l इससे पूर्व कि सप्ताह के मध्य होनेवाली प्रार्थना सभा आरंभ हो, हमलोगों का एक समूह पिछली रात के शरद पूर्णिमा के विषय बातचीत कर रहे थे l पूर्णिमा अत्यधिक आकर्षक था, जब वह क्षितिज पर बैठा हुआ प्रतीत हो रहा था l श्रीमति वेब, परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ सृष्टि से प्रेम करनेवाली एक बुज़ुर्ग महिला, हमारी बातचीत में बुज़ुर्ग आवाज़ थी, l वह मेरी पत्नी को जानती थी और उस समय हमारे पास दो बच्चे थे, और वह हमारे बच्चों की उचित परवरिश में मेरी सहायता करना चाहती थी l “अपने बच्चों को चाँद दिखाने का मौका कभी न चूकना!”
श्रीमति वेब एक अच्छी भजनकार हो सकती थी l उनके प्रकार का आकर्षण दाऊद के खगोलीय पिंडों के वर्णन में प्रतिबिंबित है जिनकी “न तो कोई बोली है . . . [फिर भी] उनका स्वर सारी पृथ्वी पर गूंज गया है, और उनके वचन जगत की छोर तक पहुँच गए हैं” (भजन 19:3-4) l न भजनकार और न ही श्रीमति वेब चाँद अथवा तारों की उपासना करने का इरादा रखते थे, किन्तु इसके बदले उनके पीछे रचनात्मक हाथों की l कायनात और अन्तरिक्ष पूरी तौर से परमेश्वर की महिमा प्रगट करते हैं (पद.1) l
हम भी अपने चारोंओर के लोगों – छोटे बच्चों और किशोर से लेकर पति-पत्नियों और पड़ोसियों - तक को हमारे चारोंओर परमेश्वर की महिमा की घोषणाओं और प्रकाशनों को ठहरकर, देखने, और सुनने के लिए उत्साहित कर सकते हैं l उसके हाथों के कार्यों की ओर आकर्षण हमें समस्त प्रभाव के पीछे उस अद्भुत परमेश्वर की उपासना करने की ओर नेतृत्व करता है l कभी भी अवसर को जाने न दें l
दया का एक जीवित स्मारक
मेरी परवरिश परम्पराओं से पूर्ण कलीसिया में हुयी l किसी प्रिय परिवार के सदस्य या मित्र की मृत्यु हो जाने की स्थिति में ही कोई भूमिका निभाता हुआ दिखाई देता था l अक्सर चर्च के एक बेंच पर या संभवतः हॉल में जल्द ही एक ताम्र प्लेट पर एक तस्वीर इन शब्दों के साथ लगी हुयी दिखाई देती थी :…
आशा पुनःस्थापित
क्या सूर्य पूरब में उदय होता है? क्या आकाश नीला है? क्या समुद्र नमकीन है? क्या कोबाल्ट(धातु) का एटॉमिक वजन 58.9 है? वाकई, उस अंतिम प्रश्न का उत्तर आप तभी जानेंगे यदि आप विज्ञान में दिलचस्पी लेते हैं या ऊपरी तौर से विवरण में दिलचस्पी लेते हैं, किन्तु उन दूसरे प्रश्नों के उत्तर स्वाभाविक हैं : वाकई l वास्तव में, इस प्रकार के प्रश्नों में आमतौर पर कटाक्ष की झलक मिली होती है l
यदि हम सावधान नहीं हैं, हमारे आधुनिक – कभी-कभी कलांत – कान उस अशक्त व्यक्ति के प्रति यीशु के प्रश्न में कटाक्ष का अंश सुन सकते हैं : “क्या तू चंगा होना चाहता है?” (यूहन्ना 5:6) l स्वाभाविक उत्तर प्रतीत हो सकता है, “क्या आप मेरे साथ मज़ाक कर रहे हैं?! मैं अड़तीस वर्षों से सहायता का इंतज़ार कर रहा हूँ!” किन्तु यहाँ पर कटाक्ष उपस्थित नहीं है, यह सच्चाई से सबसे दूर की बात है l यीशु के शब्द सदैव करुणा से भरे होते हैं, और उसके प्रश्न हमेशा हमारी भलाई के लिए होते हैं l
यीशु जानता था कि वह व्यक्ति चंगा होना चाहता था l उसे यह भी ज्ञात था कि संभवत: एक लम्बा अरसा बीतने के बाद भी किसी ने देखभाल की पेशकश नहीं की थी l दिव्य आश्चर्यक्रम के पहले, यीशु की इच्छा उसमें आशा को पुनःस्थापित करनी थी जो ठण्डी हो चुकी थी l उसने ऐसा अपेक्षाकृत प्रश्न पूछने के द्वारा किया, और उसके बाद उसे प्रतिउत्तर देने के तरीके बताकर : “उठ, अपनी खाट उठा, और चल फिर” (पद.8) l हम उस अशक्त व्यक्ति की तरह हैं, हममे से हर एक अपने जीवनों में ऐसे स्थानों पर हैं जहां आशा मुर्झा चुकी है l वह हमें देखता है और करुणा के साथ उस आशा में पुनः विश्वास करने और उसमें विश्वास करने के लिए नेवता देता है l
स्थितिपरक अभिज्ञता
हमारा परिवार, हम सब पांच लोग, क्रिसमस की छुट्टियों में रोम घूमने गए l मुझे याद नहीं कब मैंने कभी भी इससे अधिक लोगों को एक स्थान पर ठसाठस देखा है l जब हम भीड़ के बीच से मार्ग बनाते हुए निकलकर वैटिकन और कोलिज़ीयम जैसे दर्शनीय स्थलों को देखने गए, मैंने बार-बार अपने बच्चों से “स्थितिपरक अभिज्ञता”-ध्यान दें आप कहाँ हैं, कौन आपके आसपास है, और क्या हो रहा है-के अभ्यास पर बल दिया l हम ऐसे संसार में रहते हैं, देश और विदेश, जो सुरक्षित स्थान नहीं है l और मोबाइल फ़ोन और इअर बड्स(हेड फोन) का उपयोग करते हुए, बच्चे (और बड़े इस सम्बन्ध में) हमेशा अपने आसपड़ोस की जानकारी का अभ्यास नहीं करते हैं l
स्थितिपरक अभिज्ञता l फिलिप्पियों 1:9-11 में वर्णित फिलिप्पी के विश्वासियों के लिए यह पौलुस की प्रार्थना का एक पहलु है l उनकी परिस्थितियों के विषय कौन/क्या/कहाँ से सम्बंधित उसकी इच्छा उनके लिए सर्वदा-बढ़ता हुआ विवेक था l किन्तु व्यक्तिगत सुरक्षा के कुछ लक्ष्य की अपेक्षा, पौलुस एक श्रेष्ठ उद्देश्य के साथ प्रार्थना किया कि परमेश्वर के पवित्र लोग मसीह के प्रेम के अच्छे भंडारी बन सकें जो उन्होंने प्राप्त किया है, “सर्वोत्तम” को पहचाने, “पवित्र एवं निर्दोष” जीवन जीएँ, और भले गुणों से भर जाएँ जो केवल यीशु उत्पन्न कर सकता है l इस प्रकार का जीवन इस जागरूकता से निकलता है कि हमारे जीवनों में परमेश्वर ही वो है, और उसपर हमारा बढ़ता हुआ भरोसा ही है जिससे उसे प्रसन्नता मिलती है l और प्रत्येक और सभी परिस्थितियाँ ही हैं जहां हम उसके महान प्रेम की अधिकता में से साझा कर सकते हैं l
ठीक वहीं हमारे साथ
उसका पूरा ध्यान सबसे ऊपर वाली शेल्फ पर था, जहाँ स्पैगेटी की चटनी का शीशे का जार रखा हुआ था। मैं भी परचून की उस पंक्ति में उसी शेल्फ को देखते हुए उसके साथ ही खड़ा हुआ निर्णय लेने का प्रयास कर रहा था। परन्तु मेरी उपस्थिति से बेखबर, वह अपनी दशा में खोई हुई थी। मुझे उस ऊंची शेल्फ से कोई समस्या नहीं थी क्योंकि मैं बहुत लम्बा व्यक्ति हूँ। परन्तु दूसरी ओर वह लम्बी नहीं थी, बिल्कुल भी नहीं। मैं बोल पड़ा और सहायता करने के लिए कहा। चौंकते हुए उसने कहा, मैंने तो आपको वहाँ खड़े हुए बिलकुल भी नहीं देखा। हाँ, कृपया मेरी सहायता कर दीजिए।”
शिष्यों की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी-भूखी भीड़, बियाबान स्थान और समय हाथों से फिसला जा रहा था-तो उसके चेलों ने उसके पास आकर कहा, “यह सुनसान जगह है और देर हो रही है; लोगों को विदा किया जाए कि वे बस्तियों में जाकर अपने लिये भोजन मोल लें।” (मत्ती 14:15) । जब यीशु के द्वारा उन्हें लोगों का ध्यान रखने की चुनौती दी गई, तो उन्होंने उत्तर दिया, “यहाँ हमारे पास... ” (पद.17) l उनका पूरा ध्यान तो बस अपनी घटी की ओर था। परन्तु ठीक वहीं उनके साथ यीशु खड़ा था, न केवल रोटी को बढ़ाने वाला, बल्कि स्वयं जीवन की रोटी।
जब हम अपनी चुनौतियों में फंस जाते और अपने सीमित दृष्टिकोण के द्वारा उनका समाधान निकालने का प्रयास कर रहे होते हैं, तो हम पुनर्जीवित मसीह की स्थायी उपस्थिति को भूल जाते हैं। बियाबान पहाड़ियों से परचून स्टोर की पंक्तियों तक और हर किसी स्थान पर, वह इम्मानुएल है-परमेश्वर ठीक वहीँ हमारे साथ, कठिनाई में सर्वदा उपस्थित सहायता।
इसे एक पत्र में भेज दें
अधिकतर चार साल के बच्चों के समान रूबी को दौड़ना, गाना, और खेलना पसन्द था। परन्तु उसने घुटने में दर्द की शिकायत करना शुरू कर दिया। रूबी के माता-पिता उसे जाँच के लिए ले गए। जाँच के परिणाम आश्चर्यचकित कर देने वाले थे, उसे 4 स्तर का न्युरोब्लास्टोमा का कैंसर बताया गया था। रूबी कठिनाई में थी। उसे शीघ्र ही अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया।
अस्पताल में रूबी का रुकना लम्बा होता गया, यह क्रिसमस के समय तक पहुँच गया, वह समय जब घर से दूर रहना बहुत ही कठिन होता है। रूबी की नर्सों में से एक को रूबी के कमरे के बाहर एक लेटर बॉक्स रखने का विचार आया ताकि उसका परिवार उसके लिए प्रार्थनाओं और प्रोत्साहन से भर पत्र उसके लिए भेज सके। उसके बाद एक विनती का संदेश फेसबुक पर भी चला गया, तो मित्रों और पूरी तरह से अजनबियों से आने वाले पत्रों की संख्या ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया, और सबसे अधिक रूबी को। उसे मिले हुए प्रत्येक पत्र (कुल मिलाकर 100,000 से भी अधिक) से रूबी प्रोत्साहित होती गई और अंततः वह घर जा पाई।
कुलुस्से के लिए पौलुस का पत्र-एक पत्र भी ऐसा ही था। पृष्ठ पर पेन से लिखे गए शब्द जो निरन्तर फलदायी होने और पहचान और सामर्थ और धीरज और सहनशीलता की आशाएँ ले कर आए (पद 10-11) । क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि ऐसे शब्द कुलुस्से के वफ़ादार लोगों के लिए एक कितनी अच्छी औषधि की खुराक जैसे रहे होंगे? बस इतना जानना, कि कोई उनके लिए बिना रुके प्रार्थना कर रहा था, यीशु में उनके विशवास में स्थिर रहने के लिए सशक्त बने रहने के लिए काफ़ी था।
प्रोत्साहन के हमारे शब्द जरुरतमंदों की नाटकीय रूप से सहायता कर सकते हैं।
कान सुनने के लिए बने थे
अभिनेत्री डायने क्रूगर को एक भूमिका निभाने का प्रस्ताव दिया गया जो उन्हें एक घर-परिवार वाली अभिनेत्री का नाम प्रदान कर देगा। परन्तु इसमें उन्हें एक युवा पत्नी और एक माता की भूमिका अदा करनी होगी जो अपने पति और बच्चे की मृत्यु का सामना कर रही है, और उसने अब तक कभी इतना कठोर दुःख व्यक्तिगत रूप से अनुभव नहीं किया है। उन्हें नहीं पता था कि वह इस भूमिका में खरी उतर पाएँगी। परन्तु उन्होंने इसे स्वीकार कर लिया और तैयारी के लिए उन्होंने उन लोगों की सहयोग सभाओं में जाना आरम्भ कर दिया, जो चरम दुःख की घाटी से हो कर गुजर रहे थे।
आरम्भ में तो उन्होंने अपने सुझाव और विचार प्रदान किए, जब उस समूह के लोगों ने आपबीती को बताया। हम में से अधिकत्तर लोगों के समान वह सहायता करना चाहती थी। परन्तु धीरे-धीरे उन्होंने बात करना बन्द कर दिया और चुपचाप सुनना आरम्भ कर दिया। यही समय था जब उन्होंने उनकी परिस्थिति को व्यक्तिगत रूप से समझा। और उन्हें यह पहचान अपने कानों के द्वारा आई।
लोगों के विरुद्ध यिर्मयाह का अभियोग यह था कि उन्होंने परमेश्वर के स्वर को सुनने के लिए अपने “कानों” का प्रयोग करने से इन्कार कर दिया था। नबी ने अपने शब्दों को हल्का नहीं किया और उन्हें “मूर्ख और निर्बुद्धि लोग” कहा (यिर्मयाह 5:21) । परमेश्वर निरन्तर हमारे जीवनों में कार्यरत है और प्रेम , निर्देश, प्रोत्साहन और चेतावनी के शब्द बोल रहा है। पिता कि इच्छा यह है कि आप और मैं सीखें और परिपक्व बनें और हम में से प्रत्येक को ऐसा करने के लिए औजार, जैसे कि कान, प्रदान किए गए हैं। तो फिर प्रश्न यह है कि क्या हम अपने पिता के दिल की बात को सुनने के लिए इसका प्रयोग करेंगे ?
यीशु ठीक आपके पीछे है
मेरी बेटी स्कूल जाने के लिए सामान्य से थोड़ी देर पहले ही तैयार हो गई थी, इसलिए उसने पूछा कि क्या हम मार्ग में कॉफी की दूकान पर रुक सकते हैंl जिसपर मैं सहमत हो गईl जब हम उस दूकान पर पहुँचे, तो मैंने कहा, “क्या आज सुबह तुम कुछ खुशी फैलाना चाहोगी?” उसने कहा, “बिलकुलl”
हम ने अपना आर्डर दिया और खिड़की को खोला तो बारिस्ता वाले ने हमें बताया कि हम ने कितना भुगतान करना हैl मैंने कहा, “हम हमारे पीछे वाली लड़की के लिए भी भुगतान करना चाहते हैंl” मेरी बेटी के चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट थीl
बड़ी-बड़ी चीज़ों में हो सकता है एक कप कॉफ़ी कोई बड़ी बात प्रतीत न होl या क्या यह हो सकती है? मुझे अचम्भा होगा कि क्या यह हमारे लिए उन लोगों की देखभाल करने के लिए यीशु की इच्छा को पूरा करना हो सकता है, जिन्हें उसने “छोटे से छोटा” कहा था? (मत्ती 25:40)l मेरा एक विचार है: लाइन में हमारे पीछे या साथ वाले व्यक्ति को एक उपयुक्त व्यक्ति समझने के बारे में क्या विचार है? और उसके बाद “जो सही लगे” वह करो—हो सकता है यह एक कप कॉफ़ी हो या इससे कुछ अधिक हो या इससे कुछ कम होl परन्तु जब यीशु ने कहा “तुम ने एक के साथ किया” (पद 40) यह हमें दूसरों की सेवा करने में उसकी सेवा करने की एक आज़ादी प्रदान करता हैl
जब हम वहाँ से निकले हम ने हमारे पीछे वाली महिला और बारिस्ता वाले के चेहरे को देखा जब उसने उस महिला के हाथ में वह कॉफी दीl दोनों के चेहरों पर एक बड़ी मुस्कुराहट थीl