ठन्डे मौसम की बर्फ
सर्दियों में, मैंने अक्सर संसार को प्रातःकाल के बर्फ में लिपटा हुआ और शांत पाकर उसकी खूबसूरती से चकित हूँ l बसंत की आंधी की तरह बड़ी आवाज़ के साथ नहीं जो रात में अपनी उपस्थिति दर्शाती है, किन्तु बर्फ शांति से गिरती है l
“सर्दियों के बर्फ गीत में” (Winter Snow Song), में ऑड्रे एस्साद गाते हैं कि यीशु आंधी की तरह शक्ति के साथ पृथ्वी पर आ सकता था, किन्तु इसके बदले वह सर्दियों के बर्फ की तरह शांत और धीरे से मेरी खिड़की के बाहर आया l
यीशु का आना बहुतों को आश्चर्यचकित कर दिया l एक महल में जन्म लेने के बदले, वह एक विपरीत स्थान में जन्म लिया, बैतलहम के बाहर एक दीन निवास l और वह एक चरनी में सोया, केवल वही उसके लिए था (लूका 2:7) l उच्च अधिकारी और सरकारी अधिकारी उससे मिलने नहीं आए, साधारण चरवाहों ने उसका स्वागत किया (पद.15-16) l धन की कमी के कारण, यीशु के माता-पिता दो पक्षियों के सस्ते बलिदान भी चढ़ाने में असमर्थ थे जब उन्होंने उसको मंदिर में प्रस्तुत किया (पद.24) l
यीशु का संसार में प्रवेश करने वाला सरल तरीका नबी यशायाह का पूर्वाभास है, जिसने आनेवाले उद्धारकर्ता की नबूवत की थी कि “न वह चिल्लाएगा (यशायाह 42:2) न ही वह सामर्थ्य में आकर एक नरकट को तोड़ेगा या एक टिमटिमाती बत्ती को बुझाएगा (पद.3) l इसके बदले परमेश्वर की शांति की पेशकश के साथ वह हमें कोमलता से अपनी ओर खींचेगा l ऐसी शांति जो चरनी में जन्मे उद्धारकर्ता की अनपेक्षित कहानी पर विश्वास करनेवाले के लिए अभी भी उपलब्ध है l
सुन्दरता की पच्चीकारी(Mosaic)
इस्राएल के, इन करेम में चर्च ऑफ़ द विज़ीटेशन के आँगन में बैठे हुए, मैं सड़सठ पच्चीकारियों की सुन्दरता देखकर अभिभूत हो गयी, जिनपर लूका 1:46-47 के शब्द अनेक भाषा में अंकित थे l पारंपरिक रूप से इसे मरियम का भजन (Magnificat) कहा जाता है जिसका लतिनी में अर्थ है “महिमा करना l” यह उस घोषणा के प्रति मरियम का आनंददायी प्रतिउत्तर है कि वह उद्धारकर्ता की माँ होगी l
हर एक फलक(plaque) में मरियम के शब्द हैं : मेरा प्राण प्रभु की बड़ाई करता है और मेरी आत्मा मेरे उद्धार करनेवाले परमेश्वर से आनंदित हई . . . . क्योंकि उस शक्तिमान ने मेरे लिए बड़े-बड़े काम किए हैं” (पद.46-49) l टाइल्स पर उकेरा गया बाइबल का गीत प्रशंसा का गीत है जब मरियम खुद के लिए और इस्राएल राष्ट्र के लिए परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को याद करती है l
परमेश्वर के अनुग्रह का कृतज्ञ प्राप्तकर्ता l मरियम अपने उद्धार में आनंदित होती है (पद.47) l वह मानती है कि परमेश्वर की करुणा इस्राएल के प्रति पीढ़ी से पीढ़ी तक रही है (पद.50) l इस्राएल के लिए परमेश्वर की देखभाल को स्मरण करके, मरियम अपने लिए और परमेश्वर के लोगों के लिए परमेश्वर के शक्तिशाली कार्यों की प्रशंसा करती है (पद.51) l वह परमेश्वर को उसके दैनिक प्रावधान के लिए भी धन्यवाद देती है (पद.53) l
मरियम हमें यह दिखाती है कि हमारे लिए परमेश्वर के महान कार्य प्रशंसा करने और आनंदित होने के लिए है l इस क्रिसमस के मौसम में, पूरे वर्ष की परमेश्वर की भलाइयों को याद करें l ऐसा करके, आप भी अपनी प्रशंसा के शब्दों द्वारा एक खूबसूरत स्मारिका बना सकते हैं l
परमेश्वर यहाँ है
हमारे घर में एक स्मृति-पट्टिका पर "पुकारे या न पुकारे, परमेश्वर उपस्थित है," अंकित है l उसका आधुनिक संस्करण कुछ इस प्रकार हो सकता है, "स्वीकारें या न स्वीकारें, परमेश्वर यहाँ है l"
ई.पु. आठवीं शताब्दी के आखरी भाग(755-715) में रहनेवाला पुराना नियम का नबी होशे ने, इब्री राष्ट्र को समरूप शब्दों में संबोधित किया l वह इस्राएलियों से परमेश्वर को स्वीकारने हेतु "यत्न"(होशे 6:3) करने को उत्साहित करता है क्योंकि वे उसे भूल गए थे (4:1) l जैसे-जैसे लोग परमेश्वर की उपस्थिति भूल गए, वे उससे दूर होते गए (पद.12) और जल्द ही उनके विचारों में परमेश्वर नहीं रह गया (देखें भजन 10:4) l
परमेश्वर को स्वीकारने के लिए होशे की सरल लेकिन गहन अंतर्दृष्टि हमें याद दिलाती है कि वह आनंद और संघर्ष दोनों में, हमारे जीवन में निकट है और काम करता है l
परमेश्वर को स्वीकार करने का अर्थ हो सकता है कि जब हम काम में पदोन्नति प्राप्त करते हैं, तो हम मानते हैं कि परमेश्वर ने हमें समय पर और बजट के भीतर अपना काम पूरा करने की अंतर्दृष्टि दी l अगर हमारा आवास आवेदन ख़ारिज हो जाता है, तो परमेश्वर को स्वीकारने से हमें सहायता मिलती है जब हम उसे हमारी भलाई के लिए काम करने के लिए भरोसा करते हैं l
यदि हमें हमारे मन का कॉलेज नहीं मिलता है, हम परमेश्वर को स्वीकार करें वह हमारे साथ है और अपनी निराशा में भी उसकी उपस्थिति में सुख प्राप्त करें l रात्रि भोजन खाते समय, परमेश्वर को स्वीकारना उसके द्वारा भोजन की सामग्रियों का प्रबंधन और भोजन तैयार करने के लिए रसोई की याद दिलाता है l
जब हम परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, हम अपने जीवनों में बड़ी या छोटी सफलता और उदासी दोनों में ही उसकी उपस्थिति को याद करते हैं l
स्पर्श करने की ताकत
भारत में बीसवीं सदी के अग्रणी चिकित्सा मिशनरी डॉ. पॉल ब्रैंड ने कुष्ठ रोग से जुड़े कलंक को देखा l एक मुलाकात के दौरान, उन्होंने मरीज को आश्वास्त करने के लिए छूआ कि इलाज संभव था l उस व्यक्ति के आँसू बहने लगे l एक परिचर ने यह कहते हुए डॉ. ब्रैंड को उस मरीज का आँसू समझाया, "आपने उसे छूआ और वर्षों से उसे किसी ने नहीं छूआ है l ये ख़ुशी के आँसू हैं l"
यीशु की आरंभिक सेवा में, एक कुष्ठ रोगी उसके पास आया l कुष्ठ सभी प्रकार के संक्रामक त्वचा रोगों के लिए प्राचीन सूचक था l पुराना नियम की व्यवस्था अनुसार इस व्यक्ति को अपने रोग के कारण अपने समाज से बाहर रहना अनिवार्य था l इत्तेफाक से रोगी का स्वस्थ्य व्यक्तियों के निकट संपर्क में आने पर उसे ऊँची आवाज़ में, "अशुद्ध! अशुद्ध!" पुकारना होता था जिससे लोग उससे दूर चले जाएँ (लैव्यव्यावस्था 13:45-46) l परिणामस्वरूप, उक्त व्यक्ति मानव संपर्क से महीनों या वर्षों तक दूर हो सकता था l
तरस से भरकर, यीशु ने हाथ बढ़ाकर उस व्यक्ति को छूआ l यीशु अपनी सामर्थ्य और अधिकार से मात्र एक शब्द बोलकर लोगों को चंगा कर सकता था (मरकुस 2:11-12) l लेकिन जब यीशु एक व्यक्ति से जो खुद को अपने शारीरिक बीमारी के कारण अकेला और तिरस्कृत महसूस करता था मुलाकात की, उसके स्पर्श ने उस व्यक्ति को निश्चित किया कि वह अकेला नहीं किन्तु स्वीकृत है l
जब परमेश्वर हमें अवसर देता है, हम सम्मान और महत्त्व के कोमल स्पर्श द्वारा करुणा और तरस दिखा सकते हैं l मानव स्पर्श की सरल, उपचार शक्ति, दुखित लोगों को हमारी देखभाल और चिंता लम्बे समय तक याद दिलाती है l
यीशु की कहानियाँ
मुझे बचपन में स्थानीय छोटा पुस्तकालय जाना पसंद था l एक दिन, पुस्तकों के नवयुवक भाग को देखते हुए मैंने महसूस किया कि मैं लगभग सभी पुस्तक पढ़ सकती हूँ l अपनी उत्सुकता में मैं एक सच्चाई भूल गयी कि नयी पुस्तकें निरंतर पुस्तकालय में जुड़ती रहती थीं l मेरे साहस करने के बावजूद भी पुस्तकें बहुत अधिक थीं l
नयी पुस्तकें निरंतर पुस्तक की आलमारियाँ भर्ती रहती हैं l प्रेरित यूहन्ना नए नियम की अपनी पाँच पुस्तक- यूहन्ना का सुसमाचार; 1, 2, 3 यूहन्ना और प्रकाशितवाक्य जो हाथ से लिपटे हुए चर्म पत्रों पर लिखे गए गए थे को देखकर अवश्य ही वर्तमान में पुस्तकों की उपलब्धता से चकित हुआ होता l
यूहन्ना ने पवित्र आत्मा से विवश होकर यीशु का जीवन व सेवा का आखों देखा हाल मसीहियों को लिखा (1 यूहन्ना 1:1-4) l किन्तु यीशु के कार्य और शिक्षा का एक अंश मात्र ही यूहन्ना के लेखों में है l वास्तव में, यूहन्ना कहता है, यदि यीशु के समस्त कार्य लिखे जाते तो “वे संसार में भी न समातीं” (यूहन्ना 21:25) l
यूहन्ना का दावा वर्तमान में भी सच है l यीशु के विषय जितनी भी पुस्तकें लिखीं गयी हैं, के बाद भी, संसार के पुस्तकालय उसके प्रेम और अनुग्रह की कहानियाँ अपने में समा नहीं सकती हैं l हम इस बात का भी उत्सव मना सकते हैं कि हमारे पास भी बाँटने और आनन्दित होने के लिए व्यक्तिगत कहानियाँ हैं जो हम निरंतर बताते रहेंगे ! (भजन 89:1)
प्रोत्साहित करनेवालों की आशीष
2010 में बनी फिल्म द किंग्स स्पीच इंग्लैंड के राजा जॉर्ज षष्टम(King George VI) की कहानी है, जिसमें वह अपने भाई द्वारा सिंहासन त्याग देने के कारण अपेक्षा के विपरीत राजा बना l देश द्वितीय विश्व युद्ध के कगार पर खड़ा था, सरकारी अधिकारी रेडियो की प्रभावशाली भूमिका के कारण एक शिष्ट और युक्तिपूर्ण नेतृत्व चाहते थे l हालाँकि, राजा जॉर्ज षष्टम, हकलाने की समस्या से संघर्ष करते थे l
मैं फिल्म द्वारा जॉर्ज की पत्नी, एलिजाबेथ के चित्रण की ओर विशेष तौर से आकर्षित हुआ l जॉर्ज द्वारा भाषण की कठिनाई पर विजय पाने के लिए उसके सम्पूर्ण कठिन संघर्ष में, वह निरंतर उसके उत्साह का श्रोत बनी रही l उसकी पत्नी के दृढ़ समर्पण से उसे आवश्यक सहायता मिली जिससे युद्ध के दौरान चुनौती पर विजय प्राप्त करके वह अच्छी प्रकार शासन चला सका l
बाइबल प्रोत्साहित करनेवालों की कहानियों को चिन्हांकित करती है जिन्होंने चुनौतीपूर्ण समयों में जबरदस्त मदद की l इस्राएल के युद्ध के समय मूसा को हारून और हुर का समर्थन मिला (निर्गमन 17:8-16) l इलीशिबा ने अपनी गर्भवती रिश्तेदार, मरियम को प्रोत्साहित किया (लुका 1:42-45) l
अपने मन-परिवर्तन के बाद, पौलुस को बरनबास का समर्थन चाहिए था, जिसके नाम का शब्दश: अर्थ है “शांति का पुत्र l” जब शिष्य पौलुस से भयभीत थे, बरनबास ने, खुद की ख्याति की जोखिम उठाकर, उसकी जिम्मेदारी ली (प्रेरितों 9:27) l मसीही समुदाय द्वारा पौलुस को स्वीकारे जाने के लिए उसका समर्थन महत्वपूर्ण था l बाद में बरनबास पौलुस का सहचर और प्रचारक साथी बना (प्रेरितों 14) l खतरों के बावजूद, दोनों ने मिलकर सुसमाचार प्रचार किया l
यीशु के विश्वासियों को आज भी “एक दूसरे को शांति [देने] और एक दूसरे की उन्नति का कारण” बनने के लिए बुलाया गया है (1 थिस्स. 5:11) l काश हम भी दूसरों को प्रोत्साहित करने के लिए उत्सुक हों, विशेषकर उनके कठिन समयों में l
यात्रा के लिए सामर्थ्य
मसीही जीवन की एक उत्कृष्ट रूपक कथा, हाइंड्स फीट ऑन हाई प्लेसेस(Hinds Feet on High Places), हबक्कूक 3:19 पर आधारित है l कहानी का अत्यधिक-भयभीत नामक चरित्र चरवाहे के साथ यात्रा पर जाता है l किन्तु बहुत डरा हुआ होने के कारण अत्यधिक-भयभीत चरवाहे से उसे गोद में लेकर चलने का आग्रह करता है l
चरवाहा दयालुता से उसको उत्तर देता है, “बजाए इसके कि तुम खुद ही ऊँचे स्थानों पर चढ़ो मैं स्वयं तुम्हें गोद में उठाकर ले चल सकता था l किन्तु यदि मैंने ऐसा किया होता, तो तुम्हारे पिछले टांग विकसित नहीं होते, और ऐसी स्थिति में तुम मेरे साथ चल नहीं पाते l”
अत्यधिक-भयभीत पुराने नियम के नबी हबक्कूक के प्रश्न दोहराता है (और यदि मैं ईमानदार हूँ तो मेरे भी प्रश्न वही हैं) : “मैं क्यों दुःख सहूँ?” “मेरी यात्रा कठिन क्यों है?”
इस्राएल के निर्वासन में जाने से पहले, हबक्कूक, यहूदा में ई. पूर्व सातवीं शताब्दी के आधिरी भाग में था l नबी ऐसे समाज में खुद को उपस्थित पाया जो सामाजिक अन्याय को अनदेखा करता था और बेबीलोन के आसन्न आक्रमण से अभय था (हबक्कूक 1:2-11) l उसने प्रभु से हस्तक्षेप करके कष्ट को दूर करने को कहा (1:13) l परमेश्वर का उत्तर था कि वह न्याय करेगा किन्तु अपने समय में (2:3) l
विश्वास में, हबक्कूक ने प्रभु पर भरोसा करने का चुनाव किया l यदि कष्ट का अन्त नहीं भी होता है, नबी यह विश्वास करता था कि परमेश्वर निरंतर उसकी सामर्थ्य बना रहेगा l
हम भी सुखकर महसूस कर सकते हैं कि प्रभु हमारी सामर्थ्य है और दुःख सहने में हमारी सहायता करते हुए मसीह के साथ हमारी संगति को गहरा करने में हमारे जीवन की सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण यात्राओं का उपयोग करेगा l
स्वर्ग से सहायता
SOS मोर्सकोड सिग्नल 1905 में बना क्योंकि नाविकों को संकट का सिग्नल देने के लिए एक मार्ग की आवश्यकता थी। 1910 में स्टीमशिप केंटकी जहाज द्वारा छयालिस लोगों को बचाने के किए सिग्नल का प्रयोग किया गया।
SOS हाल ही का आविष्कार है, परन्तु मदद के लिए पुकारना उतना पुराना है जितनी मानवता। जब विजयी इस्राएली उस वायदे के देश में बस रहे थे जो परमेश्वर ने उन्हें दिया था, तब यहोशू ने चौदह वर्षों तक इस्राएलियों का (यहोशू 9:18) और चुनौतीपूर्ण भूभाग (3:15-17) विरोध का सामना किया। इस दौरान "परमेश्वर यहोशू के..." (6:27)।
यहोशू 10 में, जब इसराएली अपने सहयोगी गिबोनियों की सहायता के लिए जाते हैं जिनपर पांच राजाओं ने हमला किया था, तब यहोशू जानता था कि शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित करने के लिए परमेश्वर की मदद की ज़रूरत होगी (पद12)। परमेश्वर ने ओले भेजकर उत्तर दिया, यहां तक कि दुश्मनों को पराजित करने का समय देने के लिए सूर्य को थामे रखा। यहोशू 10:14 बताता है, "यहोवा तो इस्राएल...!"
यदि आपके सामने चुनौतियां हैं, तो आप परमेश्वर को SOS भेज सकते हैं। भले ही मिलने वाली मदद यहोशू से अलग हो, शायद एक अप्रत्याशित नौकरी, अच्छा डॉक्टर या दुख में शांति। हियाव बांधेंऍ वह आपकी पुकार का उत्तर दे रहे हैं, और आपके लिए लड़ रहे हैं।
चौकस देखभाल
स्कूल जाने से पूर्व मैंने अपने बेटे से पूछा कि क्या उसने दांत साफ़ किए है l दोबारा पूछते हुए, मैंने उसे सच बोलने का महत्त्व याद दिलाया l मेरे कोमल चेतावनी से बेखबर, उसने मुझसे गंभीर किन्तु मज़ाकीय तरीके से कहा कि मेरे लिए बाथरूम में सुरक्षा कैमरा लगाना ज़रूरी है l तब मैं खुद जांच पाऊंगा कि मैंने अपने दांत साफ़ किये कि नहीं और फिर झूठ बोलने की परीक्षा नहीं आएगी l
सुरक्षा कैमरा नियम पालन करने में हमारी मदद कर सकता है, लेकिन इसके बाद भी कई स्थान हैं जहां हम जा सकते हैं और कई तरीके हैं जहाँ हम लोगों की आँखों से छिप सकते हैं l यद्यपि हम सुरक्षा कैमरा से बच सकते हैं या उसको धोखा दे सकते हैं, हम यह सोचकर कि हम परमेश्वर की निगाहों से दूर हैं खुद को ही धोखा देंगे l
परमेश्वर पूछता है, “क्या कोई ऐसे गुप्त स्थानों में छिप सकता है, कि मैं उसे न देख सकूँ? (यिर्मयाह 23:24) l उसके प्रश्न में उत्साह और चेतावनी दोनों ही हैं l
चेतावनी यह है कि हम परमेश्वर से छिप नहीं सकते हैं l हम न उससे आगे निकल सकते हैं और न ही उसको धोखा दे सकते हैं l हमारे सारे कार्य उसके सामने हैं l
उत्साह यह है कि पृथ्वी पर अथवा स्वर्ग में ऐसा कोई स्थान नहीं है जहां हम हमारे स्वर्गिक पिता के चौकस देखभाल से बाहर हैं l हमारे अकेलेपन में भी परमेश्वर हमारे साथ है l चाहे हम कहीं भी जाएं, उस सच्चाई का ज्ञान हमें उसके वचन के प्रति आज्ञाकारी बनने को उत्साहित करें और हमारी देखभाल करनेवाले परमेश्वर की शांति हमें प्राप्त हो l