इस सब के लिए तुच्छ जाना गया
सुज़ानाह सिब्बर अठारहवीं शताब्दी में अपनी गायन प्रतिभा के लिए मशहूर थी। हालांकि, अपने दाम्पत्य जीवन में निन्दात्मक समस्याओं के कारण वह उतनी ही बदनाम थी। इसलिए जब अप्रैल 1742 में, डबलिन में हेन्डल रचित मसीहा नाटक पहली बार किया गया, तो कई दर्शकों ने एकल गायिका के रूप में उसकी भूमिका को नहीं स्वीकारा।
नाटक के दौरान, सिब्बर मसीहा के विषय में गा रही थी: "वह तुच्छ जाना गया ...;"(यशायाह 53:3 केजेवी)। इन शब्दों से प्रभावित होकर रेव. पैट्रिक डेलेनी तुरन्त खड़े होकर कहने लगे, "हे नारी, इस कारण तेरे सभी पाप क्षमा कर दिए गए हैं!"
सुज़ानाह सिब्बर और हेन्डल रचित मसीहा के प्रसंग के बीच का संबंध स्पष्ट है "वह दुखी पुरूष”-यीशु मसीह-पाप के कारण "तुच्छ जाना जाता” और “मनुष्यों का त्यागा” हुआ था। भविष्यवक्ता यशायाह ने कहा, "मेरा धर्मी दास...।"(पद 11)।
मसीहा और हमारा संबंध कम स्पष्ट नहीं है। चाहे हम आलोचनात्मक दर्शकों के साथ, सुज़ानाह सिब्बर के साथ, या कहीं मध्य में खड़े हों, हम सभी को पश्चाताप करने और परमेश्वर की क्षमा प्राप्त करने की आवश्यकता है। यीशु ने अपने जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान के द्वारा परमेश्वर, हमारे पिता के साथ हमारा संबंध पुनः स्थापित कर दिया है।
इसके लिए-उस सब को जोयीशु ने पूरा किया-हमारे सभी पाप क्षमा हों।
घर के लिए पत्र
युद्ध के प्रशिक्षण पर घर से दूर गए अमेरिकी रंगरूटों ने चुनौतियों का सामना करने के लिए मजाक और पत्र लिखने का रास्ता अपनाया। एक पत्र में किसी युवक ने टीके लगने की प्रक्रिया को हास्यप्रद अंदाज़ में लिखा “दो डाक्टर भाला लेकर हमारे पीछे दौड़े। उन्होंने हमें घर दबोचा और एक-एक करके उसे हमारी बाँह में उसे घोंप दिया”।
एक सैनिक को जब बाइबिल मिली तो उसने लिखा, “मैं इसे बहुत पसंद करता हूँ। मैं हर रात इसे पढ़ता हूं। मैं नहीं जानता था कि सीखने के लिए इसमें कितनी बातें हैं।“
कई वर्ष बंधक रहने के बाद जब निर्वासित यहूदी बाबुल से घर लौटे तो अपनी समस्याएं भी साथ लाए। यरूशलेम की दीवारों के पुनर्निर्माण के संघर्ष के साथ ही, उनका सामना आकाल, शत्रुओं के विरोध, और अपने पापों से था। इस बीच वे परमेश्वर के वचन की ओर फिरे। याजक के व्यवस्था की पुस्तक से पढने पर लोग रोने लगे (नहेमायाह 8:9)। इन शब्दों ने उन्हें, “उदास मत रहो...”। (पद 10)
परमेश्वर से सुनने के लिए हमें समस्याओं की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। उनकी क्षमा, आश्वासन, और व्यक्तित्व के बारे में हम बाइबिल से जान सकते हैं। इसे पढ़ने पर जो परमेश्वर की आत्मा हमें दिखाएगी उसे देखकर हम आश्चर्यचकित हो
सही जगह में फलना
"एक जंगली पौधा वहां बढ़ता है जहां आप नहीं चाहते," । लोग पौधे तो नहीं है-हमारे अपने मनोभाव और प्रभु से मिली स्वेच्छा होती है। कभी-कभी हम वहां फलवंत होना चाहते हैं जहां परमेश्वर की इच्छा नहीं होती है।
राजा शाऊल का पुत्र, योद्धा राजकुमार योनातन, राजा बनने की आशा कर सकता था। परंतु उसने परमेश्वर की आशीषों को दाऊद पर देखा और शाऊल की ईर्ष्या और अभिमान को समझ लिया (1 शमूएल 18:12–15)। सिंहासन का लोभ करने की बजाए वह दाऊद का मित्र बना और उनके जीवन को भी बचाया। (19:1–6; 20:1–4)
कुछ लोग कहेंगे कि योनातन ने बहुत कुछ खोया। परंतु हम कैसे याद किए जाना चाहेंगे? शाउल के समान जो अपने राज्य से चिपका रहा और अंत में उसे गवा बैठा? या योनातन के समान जिन्होंने ऐसे व्यक्ति के जीवन को बचाया जो यीशु के सम्मानित पूर्वज बनेंगे?
हमारी अपनी योजना से परमेश्वर की योजना उत्तम होती है। हम उसके विरुद्ध लड़ सकते हैं और ऐसे पौधे के समान बन सकते हैं जो एक गलत जगह पर फल और फूल रहा है, या हम उनके निर्देशों का पालन करके उनके बगीचे में बलवंत और उपयोगी और फल लाने वाले पौधे बन सकते हैं। ऐसा करने का विकल्प वह हमारे हाथ में छोड़ देते हैं।
कच्ची दरारें
हमारे समुदाय में शरणार्थियों की संख्या बढ़ने के परिणामस्वरूप क्षेत्रीय कलीसियाओं में वृद्धि हुई है। ऐसी वृद्धि चुनौतियां लेकर आती हैं। कलीसिया के सदस्यों को सीखना चाहिए कि नए लोगों का कैसे स्वागत करें, जिससे वे अलग संस्कृति, भाषा और आराधना की भिन्न शैली से समायोजित हो सकें। यदि हम अपने बीच के अंतर को एक स्वस्थ तरीके से नहीं संभालते तो यह गंभीर और कठोर हो कर मनमुटावों में बदल जाते हैं।
यरूशलेम में प्रारंभिक कलीसिया में एक टकराव उठ कर खड़ा हुआ जिसकी जड़ सांस्कृतिक मतभेद पर थी। खिलाने पिलाने की सेवा में यूनानी विज्ञान शास्त्रियों की विधवाओं की सुधि नहीं ली जा रही थी (प्रेरितों के काम 6:1)। प्रेरितों ने कहा, “अपने में से सात सुनाम पुरूषों को जो पवित्र आत्मा और बुद्धि से परिपूर्ण हों, चुन लो” (पद 3)। चुने गए सदस्य यूनानी थे (पद 5), उस समूह के सदस्य जिनकी सुधि नहीं ली जा रही थी। समस्या की समझ उन्हें बेहतर थी। प्रेरितों ने प्रार्थना करके उन पर हाथ रखे और कलीसिया फैलता गया (पद 6–7)।
विकास में चुनौतियों आती हैं, क्योंकि इससे परस्पर संपर्क बढ़ता है। परंतु जब हम पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन पर निर्भर करेंगे तो उनके रचनात्मक समाधान से ऐसी समस्याएं विकास के अवसरों में बदली जाएंगी।
विशेषज्ञों का कहना क्या है?
बोस्टन ग्लोब पत्रिका में जैफ जैकोबी “विशेषज्ञों द्वारा बातों का निराशाजनक, रूप से गलत अनुमान लगाने की विलक्षण क्षमता” के उपर व्यंग लिखते हैं। हाल के इतिहास से स्पष्ट है कि वे सही कहते हैं। विशेषज्ञों की अनगिनत भविष्यवाणियाँ बुरी तरह चूक गईं हैं। स्पष्ट है प्रतिभाशाली व्यक्ति की भी सीमा होती है।
केवल एक ही हैं जो पूरी तरह से विश्वास योग्य है, और कुछ तथाकथित विशेषज्ञों के लिए उनके पास कठोर शब्द थे, उस समय के धार्मिक अगुवे जो दावा करते थे कि उन्हें सत्य की पहचान थी। इन विद्वानों और धर्मशास्त्रियों की धारणा थी कि वे जानते हैं कि जब उद्धारकर्ता मसीहा आएगा तो वो कैसा होगा।
यीशु ने उन्हें चेताया कि किस तरह वे लोग विषय की तह तक नहीं पहुँच पा रहे थे, “तुम पवित्र शास्त्र में ढूंढ़ते हो...यह पवित्र शास्त्र वही है, जो मेरी गवाही देता है”। (यूहन्ना 5:39-40)
नए वर्ष से पहले, हमें भयभीत से लेकर बेहद आशावादी बनाने वाली सभी प्रकार की भविष्यवाणियां सुनने को मिल जाएंगीं। उनमें से बहुत सी बड़े विश्वास और अधिकार से कही जाएंगी। चिंतित मत होना। हमारा विश्वास एक में ही रहता है जो बाइबिल का मुख्य आधार है। हम सभी पर और हमारे भविष्य पर उसकी एक मज़बूत पकड़ है।
कौन सा काम?
अपना मोबाइल फोन समुद्र तट पर खोने के बाद एंड्रू शिएटेल को लगा जैसे उसने हमेशा के लिए उसे खो दिया l हालाँकि, लगभग एक सप्ताह के बाद, मछुआरा, ग्लेन करले उसे पुकारकर उसका फ़ोन वापस कर दिया, जो सूखने के बाद ठीक काम कर रहा था l यह मोबाइल फोन एक 25 पौंड रेहू मछली के पेट से निकला था l
जीवन अनेक अजीब कहानियों से भरा पड़ा है, और हमें बाइबिल में अनेक कहानियाँ मिलती हैं l एक बार कर अधिकारी पतरस से मांग करने लगे, “क्या तुम्हारा गुरु मंदिर का कर नहीं देता?”(मत्ती 17:24) l यीशु ने सिखाने के लिए उस पल का उपयोग किया l वह चाहता था कि पतरस राजा के रूप में उसकी भूमिका को समझ ले l कर राजा के पुत्रों से नहीं वसूले जाते थे, और प्रभु ने स्पष्ट कर दिया कि न वह और न ही उसकी संतान कर देने के लिए बाध्य थे (पद.25-26) l
फिर भी यीशु किसी को “ठोकर (नहीं)” देना चाहता था(पद.27), इसलिए उसने पतरस को मछली पकड़ने भेजा l (यह कहानी का विचित्र हिस्सा है l) पकड़ी गयी पहली मछली के पेट में पतरस को एक सिक्का मिला l
यीशु यहाँ पर क्या करना चाहता है? एक बेहतर प्रश्न होगा, “यीशु परमेश्वर के राज्य में क्या करना चाहता है?” वह अधिकृत राजा है-उस समय भी जब अनेक उसे राजा के रूप में नहीं पहचान रहे हैं l जब हम अपने जीवन में उसे प्रभु स्वीकारते हैं, हम उसकी संतान बन जाते हैं l
जीवन हमसे बहुत कुछ मांगेगा, किन्तु यीशु हमारी ज़रूरतों को पूरा करेगा l जैसे कि भूतपूर्व पास्टर डेविड पोम्पो कहते हैं, “जब हम अपने पिता के लिए मछली पकड़ते हैं, हम अपनी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए उस पर भरोसा कर सकते हैं l”
क्रिसमस
एक साल क्रिसमस के दिनों में मुझे एक ऐसे जगह पर काम करने जाना पड़ा जहां मेरे मित्र मुझे ढूंढ न सके l कार्य-स्थल से अपने कमरे पर लौटते समय, मैंने काला सागर की सर्द हवा का सामना किया l
अपने कमरे में पहुँचकर, मैं बहुत चकित हुआ l मेरे कला प्रेमी मित्र ने अपने नए प्रोजेक्ट, उन्नीस इंच लम्बी मिट्टी की क्रिसमस ट्री को बना लिया था l उसमें लगी रंगीन बत्तियों से हमारा अँधेरा कमरा जगमगा रहा था l उसे देखकर मैंने महसूस किया, काश आज मैं घर में होता!
अपने भाई एसाव से भागकर याकूब भी अपने को एक अपरिचित और अकेला स्थान में पाया l कठोर भूमि पर सोते हुए, सपने में उसकी मुलाकात परमेश्वर से हुई l और परमेश्वर ने उसे एक घर देने की प्रतिज्ञा देते हुए कहा, “जिस भूमि पर तू लेटा है, उसे मैं तुझ को और तेरे वंश को दूँगा . . . तेरे और तेरे वंश के द्वारा पृथ्वी के सारे कुल आशीष पाएँगे”(उत्प.28:13-14)l
निःसंदेह, याकूब से ही प्रतिज्ञात मुक्तिदाता आने वाला था, जो हमें अपने निकट लाने के लिए अपने घर को छोड़ा l यीशु ने अपने चेलों से कहा, ”मैं . . . फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहां मैं रहूँ वहां तुम भी रहो” (यूहन्ना 14:3) l
मैं दिसम्बर की उस रात के अँधेरे में अपने कमरे में बैठकर उस क्रिसमस ट्री को देख रहा था l शायद निःसंदेह ही मैंने उस ज्योति के विषय सोचा जो हमें घर का मार्ग दिखाने के लिए पृथ्वी पर आयी थी l
सामर्थी शिशु
मैंने पहली बार उसे देखा, और रो दिया l वह पालने में सो रहा एक नवजात शिशु ही दिखाई दे रहा था l किन्तु हम जानते थे कि वह कभी नहीं जागेगा l जब तक कि वह यीशु की बाहों में न हो l
वह बहुत महीनों तक जीवित रहा l तब उसकी माँ ने हृदय को अत्यंत कष्ट पहूंचानेवाली ई-मेल भेजी l उसने “उस अत्यंत दुःख के विषय लिखा जो किसी के अन्दर शोक उत्पन्न करता है l” तब वह बोली, “परमेश्वर ने उस छोटे जीवन द्वारा अपने प्रेम के कार्य को कितनी गहराई से हमारे हृदयों में डाला था!” वह कितना सामर्थी जीवन था l”
सामर्थी? वह ऐसा कैसे कह सकती थी?
उस परिवार के इस छोटे प्रिय बच्चे ने उनको और हमको दर्शा दिया था कि हमें सब कुछ के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहना है l विशेषकर जब स्थिति अत्यंत ही ख़राब हो! कठिन किन्तु तसल्ली देनेवाला सच यह है कि परमेश्वर हमारे दुःख में हमसे मुलाकात करता है l एक बेटे के खोने का दर्द उसे मालूम है l
हमारे गहरे दुःख में, हम दाऊद के गीतों की ओर ध्यान देते हैं क्योंकि वह अपने दुःख में लिखता है l “मैं कब तक अपने मन ही मन में युक्तियाँ करता रहूँ, और दिन भर अपने हृदय में दुखित रहा करूँ?” उसने पूछा (भजन 13:2) l “मेरी आँखों में ज्योति आने दे, नहीं तो मुझे मृत्यु की नींद आ जाएगी” (पद.3) l फिर भी दाऊद अपने बड़े प्रश्नों को परमेश्वर को सौंप सकता था l “परन्तु मैंने तो तेरी करुणा पर भरोसा रखा है; मेरा हृदय तेरे उद्धार से मगन होगा” (पद.5) l
केवल परमेश्वर ही हमारे सबसे दुखद समयों को सर्वश्रेष्ठ महत्त्व दे सकता है l
भाई- भाई में
मेरा भाई और मैं जिनमें एक वर्ष से भी कम अंतर है, उम्र में बढ़ते हुए बहुत “प्रतियोगी” रहे (अनुवाद : हम लड़ते थे! ) l पिता समझ गए l उनके पास भाई थे l माँ? थोड़ा समझ पायी l
हमारी कहानी उत्पत्ति की पुस्तक में ठीक बैठ सकती थी, जिसे एक अच्छा नाम दिया जा सकता था भाईयों के आपसी झगड़े का संक्षिप्त इतिहास l कैन और हाबिल (उत्प.4); इसहाक और इश्माएल (21:8-10); बिन्यामिन को छोड़कर, यूसुफ और बाकी सब (अध्याय 37) l किन्तु भाईयों की दुश्मनी में याकूब और एसाव अव्वल हैं l
एसाव अपने जुड़वाँ भाई याकूब से दो बार धोखा खाने पर उसकी हत्या करना चाहा (27:41) l दशकों बाद याकूब और एसाव मेल करनेवाले थे (अध्याय 33) l किन्तु उनके वंशज एदोम और इस्राएल राष्ट्र में शत्रुता चलती रही l इस्राएलियों के प्रतिज्ञात देश में प्रवेश करते समय, एदोम धमकी और सेना के साथ उनसे मिला (गिनती 20:14-21) l बहुत बाद में, जब आक्रमणकारियों से यरूशलेम वासी भागने लगे, एदोम ने शरणार्थियों को मारा (ओबद्याह 1: 10-14) l
हमारे लिए सुखकर है कि बाइबिल केवल हमारे टूटेपन की नहीं किन्तु परमेश्वर के छुटकारे की कहानी भी बताती है l यीशु ने सब कुछ बदल दिया और अपने शिष्यों से कहा, “मैं तुम्हें एक नयी आज्ञा देता हूँ कि एक दूसरे से प्रेम रखो” (यूहन्ना 13:34) l तब वह हमारे लिए मर कर उसका अर्थ बता दिया l
बड़े होकर हम दोनों भाई निकट आ गए l परमेश्वर के साथ भी ऐसा है l जब हम उसके द्वारा प्रदत्त क्षमा का उत्तर देते हैं, वह भाई-बहनों के बीच विरोध को भाईचारे के प्रेम में बदल देता है l