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आनंद की गति

आनंद की गति से चलो l यह वाक्यांश मेरे दिमाग में आया जब एक सुबह मैंने प्रार्थनापूर्वक आने वाले वर्ष पर विचार किया, और यह उपयुक्त लगा l मुझ में अत्यधिक काम करने का झुकाव था, जिससे अक्सर मेरा आनंद ख़त्म हो जाता था l इसलिए, इस मार्गदर्शन का पालन करते हुए, मैंने खुद को आने वाले वर्ष में आनंददायक गति से काम करने, मित्रों और आनंददायक गतिविधियों के लिए जगह बनाने के लिए प्रतिबद्ध किया l 

यह योजना काम कर गयी . . . मार्च तक! फिर मैंने खुद के द्वारा विकसित किये जा रहे पाठ्यक्रम के परीक्षण की देखरेख के लिए एक विश्वविद्यालय के साथ साझेदारी की l विद्यार्थियों के नामांकन और अध्यापन के साथ-साथ, मैं जल्द ही लम्बे समय तक काम करने लगा l अब मैं आनंद की गति से कैसे जा सकता था?

यीशु उन लोगों को ख़ुशी का वादा करता है जो उस पर विश्वास करते हैं, वह हमें बताता है कि यह उसके प्रेम में बने रहने(यूहन्ना 15:9) और प्रार्थनापूर्वक अपनी ज़रूरतों को उसके पास लाने से आता है(16:24) l वह कहता है, “मैं ने ये बातें तुम से इसलिए कही हैं, कि मेरा आनंद तुम में बना रहे, और तुम्हारा आनंद पूरा हो जाए”(15:11) l यह ख़ुशी उसकी आत्मा के द्वारा एक उपहार के रूप में आती है, जिसके साथ हमें कदम से कदम मिलाकर चलना है(गलातियों 5:22-25) l मैंने पाया कि मैं अपने व्यस्त समय के दौरान केवल तभी आनंद बनाए रख सकता था जब मैं हर रात आराम से, भरोसेमंद प्रार्थना में समय बिताता था l 

चूँकि आनंद बहुत विशेष है, इसलिए इसे अपने समय-सारणी में प्राथमिकता देना उचित है l लेकिन चूँकि जीवन कभी भी पूरी तरह से हमारे नियंत्रण में नहीं होता है, मुझे ख़ुशी है कि ख़ुशी का एक और श्रोत—आत्मा—हमारे लिए उपलब्ध है l मेरे लिए, आनंद की गति से जाने का अर्थ अब प्रार्थना की गति से जाना है—आनंद देने वाले से प्राप्त करने के लिए समय निकालना l 

परमेश्वर में अनुशासित जीवन

यह जून 2016 था, महारानी एलिजाबेथ का नब्बेवाँ जन्मदिन l अपनी गाड़ी से, सम्राट ने, लाल कोट पहने सैनिकों की लम्बी कतारों के सामने से गुजरते हुए, जो बिलकुल सावधान खड़े थे, भीड़ की ओर हाथ हिलाया l यह इंग्लैंड में एक गर्म दिन था, और गार्ड अपने पारंपरिक गहरे ऊनी पैन्ट, ठुड्डी तक बटन वाले ऊनी जैकेट और भालू के रोएँ(bear-fur) की बड़ी टोपियाँ पहने हुए थे l जब सैनिक धूप में दृढ़ पंक्तियों में खड़े हुए थे, एक गार्ड बेहोश होने लगा l उल्लेखनीय रूप से, उसने अपना सख्त नियंत्रण बनाए रखा और बस आगे की ओर गिरा, लेकिन उसका शरीर एक तख्ते की तरह सीधा रह गया जब उसने अपना चेहरा रेतीले बजरी में रहने दिया l वह वहीँ लेटा रहा—किसी तरह अभी भी सावधान मुद्रा में l 

इस गार्ड को इस तरह का आत्म-नियंत्रण सीखने में, बेहोश होने पर भी अपने शरीर को अपनी जगह पर रखने के लिए वर्षों के अभ्यास और अनुशासन की ज़रूरत पड़ी l प्रेरित पौलुस ने इस तरह के प्रशिक्षण का वर्णन किया है : “मैं अपनी देह को मारता कूटता और वश में रखता हूँ”(1 कुरिन्थियों 9:27) l पौलुस ने माना कि “हर एक पहलवान सब प्रकार का संयम करता है”(पद.25) l 

जबकि परमेश्वर का अनुग्रह (हमारे प्रयास नहीं) हमारे सभी कार्यों को सहायता करता है, हमारा आध्यात्मिक जीवन कठोर अनुशासन का हकदार है l जैसे ही परमेश्वर हमारे मन, हृदय और शरीर को अनुशासित करने में हमारी मदद करता है, हम आजमाइशों या दिशा भ्रमित होने के बीच भी अपना ध्यान उस पर केन्द्रित रखना सीखते हैं l 

दयालुता के साधारण कार्य

जब मेरी माँ वृद्धों के अस्पताल(hospice) में और पृथ्वी पर अपने जीवन के आखिरी दिनों में थीं, तो एक नर्सिंग होम देखभाल कर्मी की वास्तविक दयालुता ने मुझे छू लिया l मेरी कमजोर माँ को धीरे से कुर्सी से उठाकर बिस्तर पर लिटाने के बाद, नर्सिंग सहायक ने माँ के सर को सहलाते हुए उन पर झुकते हुए बोली, “आप बहुत प्यारी हैं l” फिर उसने पुछा कि मैं कैसी हूँ l उसकी दयालुता ने मुझे तब भी रुलाया था और आज भी रुलाता है l 

उसकी दयालुता का एक साधारण कार्य था, लेकिन यह वही था जिसकी मुझे उस पल आवश्यकता थी l इससे मुझे इससे सामना करने में मदद मिली, यह जानकार कि इस महिला की नज़र में मेरी माँ सिर्फ एक मरीज़ नहीं थी l वह उसकी देखभाल करती थी और उसे एक बहुत ही मूल्यवान व्यक्ति के रूप में देखती थी l 

जब नाओमी और रूत अपने पतियों को खोने के बाद बेघर हो गयीं, तो बोअज़ ने रूत को कटाई करने वालों के पीछे बचा हुआ अनाज बीनने की अनुमति देकर उस पर दया दिखायी l यहाँ तक कि उसने कटाई करने वालों को उसे अकेला छोड़ देने की भी आज्ञा दी(रूत 2:8-9) l उसकी दयालुता नाओमी के लिए रूत की देखभाल से प्रेरित थी : “जो कुछ तू ने . . . अपनी सास से किया है . . . सब मुझे विस्तार के साथ बताया गया है”(पद.11) l उसने उसे एक विदेशी या विधवा के रूप में नहीं बल्कि एक आवश्यकतामंद महिला के रूप में देखा l 

परमेश्वर चाहता है कि हम “करुणा, दया, नम्रता, और सहनशीलता धारण करें”(कुलुस्सियों 3:12) l जब परमेश्वर हमारी मदद करता है, दयालुता के हमारे साधारण कार्य दिलों को खुश कर सकते हैं, आशा  ला सकते हैं और दूसरों में दयालुता को प्रेरित कर सकते हैं l 

मिलकर पर्वतों पर विजय

आपने इस कहावत का कुछ रूप देखा या सुना होगा : “यदि आप तेजी से जाना चाहते हैं, तो अकेले जाएं l लेकिन यदि आप दूर जाना चाहते हैं, तो साथ जाएं l” यह एक नेक विचार है, है न? लेकिन क्या हमें निश्चित करने के लिए कोई ठोस शोध है कि ये शब्द न सिर्फ नेक हैं, बल्कि सच भी हैं?

हाँ! वास्तव में, ब्रिटिश और अमेरिकी शोधकर्ताओं द्वारा किये गए ऐसे एक अध्ययन से पता चला है कि अगर लोग अकेले खड़े होते हैं तो उन्हें किसी और के साथ खड़े होने पर पहाड़ों का आकार काफी छोटा लगता है l दूसरे शब्दों में, “सामजिक समर्थन” मायने रखता है—इतना कि यह हमारे दिमाग में पहाड़ों के आकार को भी छोटा कर देता है l 

दाऊद को योनातान के साथ अपनी मित्रता में उस तरह का प्रोत्साहन प्यारा और सच्चा दोनों लगा l राजा शाऊल का ईर्ष्यालु क्रोध दाऊद की कहानी में एक दुर्गम पहाड़ की तरह था, जिससे उसे अपने जीवन के लिए डर सता रहा था(देखें 1 शमूएल 19:9-18) l किसी तरह के समर्शन के बिना—इस मामले में उसका सबसे निकट का मित्र—यह कहानी काफी अलग हो सकती थी l लेकिन योनातान, अपने पिता के शर्मनाक व्यवहार से “बहुत खेदित था”(20:34), और पुछा, “वह क्यों मारा जाए?”(पद.20) l उनकी ईश्वर-निर्धारित(God ordained) मित्रता ने दाऊद को सहारा दिया, जिससे वह इस्राएल का राजा बन सका l