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स्वतंत्रता का परमेश्वर

राष्ट्रपति अब्राहन लिंकन ने गुलामी में रखे गए लोगों को ढाई वर्ष पहले मुक्त कराया था और विपक्ष ने आत्मसमर्पण कर दिया था, फिर भी टेक्सास राज्य ने अभी भी गुलाम लोगों की स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं किया था l हालाँकि, 19 जून, 1865 को, गार्डन ग्रेज़र नामक सेना के एक सेनापति ने टेक्सास के एक शहर में प्रवेश किया और मांग की कि सभी गुलाम व्यक्तियों को रिहा कर दिया जाए l उस आश्चर्य और ख़ुशी की कल्पना कीजिए जब बेड़ियाँ टूट गयीं और बंधन में पड़े लोगों ने आजादी की घोषणा सुनी l 

परमेश्वर उत्पीड़ितों को देखता है, और अंततः वह अन्याय के बोझ तले दबे लोगों के लिए आज़ादी की घोषणा करेगा l यह अब भी उतना ही सच है जितना मूसा के दिनों में सच था l परमेश्वर ने एक जलती हुयी झाड़ी से उसे एक जरुरी सन्देश के साथ दर्शन दिए : “मैंने अपने प्रजा के लोग जो मिस्र में हैं, उनके दुःख को निश्चय देखा है” (निर्गमन 3:7) l उसने न केवल इस्राएल के विरुद्ध मिस्र की क्रूरता देखी—बल्कि उसने इसके बारे में कुछ करने की योजना भी बनायी l परमेश्वर ने घोषणा की, “अब मैं उतर आया हूँ कि उन्हें . . . एक अच्छे और बड़े देश में . . . पहुंचाऊं” (पद.8) l उसका मकसद इस्राएल को आजादी की घोषणा करने का था, और मूसा उसका मुखपत्र/प्रवक्ता होगा l “मैं तुझे फिरौन के पास भेजता हूँ कि तू मेरी इस्राएली प्रजा को मिस्र से निकाल ले आए” (पद.10) l 

हालाँकि परमेश्वर का समय उतनी जल्दी नहीं आएगा जितनी हम आशा करते हैं, एक दिन वह हमें सभी बन्धनों और अन्याय से मुक्त करेगा l वह उन सभी को आशा और मुक्ति देता है जो उत्पीड़ित हैं l 

 

अकेले/अनाथों का मित्र

जब हौली कुक नौकरी के लिए लन्दन गयीं तो उनका एक भी मित्र नहीं था l उसे सप्ताहांत(weekend) दुखदायी लगता था l वैश्विक सर्वेक्षण के अनुसार, निराश महसूस करने के मामले में यह शहर अपने आप में सबसे ऊपर है—जबकि पड़ोसी लिस्बन, पुर्तगाल, में केवल 10 फ़ीसदी निवासियों की तुलना में 55 फ़ीसदी लन्दनवासियों का कहना है कि वे अकेले हैं l 

सम्बन्ध/लगाव/वास्ता के लिए, हौली ने अपने डर को खारिज कर दिया और द लन्दन लोनली गर्ल्स क्लब(The London Lonely Girls Club) नामक एक सोशल मीडिया समूह बनाया और इसमें लगभाग पैतीस हजार लोग शामिल हुए l हर कुछ सप्ताहों में छोटे समूह की बैठकें पार्क पिकनिक, कला पाठ, आभूषण कार्यशालाएं, रात्रिभोज और यहाँ तक कि पिल्लों(puppies) के साथ आउटडोर व्यायाम सत्र की पेशकश करती हैं l 

अकेलेपन की चुनौती नयी नहीं है, न ही अलगाव की हमारी भावनाओं को चंगा करनेवाला l दाऊद ने लिखा, हमारा अनंत परमेश्वर, “परमेश्वर अनाथों का घर बसाता है; और बंदियों को छुड़ाकर संपन्न करता है” (भजन 68:6) l परमेश्वर से मसीह-समान मित्रों के लिए रास्ता बताना हमारे लिए एक पवित्र विशेषाधिकार है और, इस प्रकार, एक अनुरोध जिसे हम स्वतंत्र रूप से उसके पास ले जा सकते हैं l दाऊद ने आगे कहा, “परमेश्वर अपने पवित्र धाम में, अनाथों का पिता और विधवाओं का न्यायी है” (पद.5) l “धन्य है प्रभु, जो प्रतिदिन हमारा बोझ उठता है” (पद.9) l 

यीशु क्या ही प्यारा मित्र है! वह हमें हमेशा के मित्र देता है, जिसका आरम्भ हर पल उसकी गौरवशाली उपस्थिति से होती है l जैसा कि हौली कहती है, “मित्र का समय आत्मा के लिए अच्छा होता है l”

 

उदार विश्वास

कुछ साल पहले, हमारे चर्च को राजनितिक नेतृत्व में उथल-पुथल भरे बदलाव के बाद अपने देश से भाग रहे शरणार्थियों के अतिथि-सत्कार के लिए आमंत्रित किया गया था l कई परिवार केवल उतना ही लेकर आए जितना वे एक छोटे बैग में रख सकते थे l हमारे कई चर्च परिवारों ने उनके लिए अपने घर दिए, जिनमें कुछ ऐसे भी थे जिनके पास बहुत कम जगह थी l 

जब वे प्रतिज्ञात देश में प्रवेश किये तो उनका दयालु आतिथ्य इस्राएलियों को दिए गए परमेश्वर के तिगुना आदेश को दर्शाता है (व्यवस्थाविवरण 24:19-21) l एक कृषक समाज के रूप में, वे फसल का महत्व समझते थे l अगले वर्ष तक के लिए फसलें प्राप्त करना आवश्यक था l यह परमेश्वर की आज्ञा को “परदेशी, अनाथ, और विधवा” के लिए [कुछ] छोड़ने” (पद.19) को उस पर भरोसा करने का एक अनुरोध भी बनाता है l इस्राएलियों को उदारता का अभ्यास न केवल तब देना था जब वे जानते थे कि उनके पास पर्याप्त है, बल्कि ऐसे हृदय से देना जो परमेश्वर के प्रबंध पर भरोसा करता हो l ऐसा आतिथ्य एक अनुस्मारक भी था “कि [वे] मिस्र में दास थे” (पद.18,22) l वे एक समय उत्पीडित और निराश्रित थे l उनकी उदारता उन्हें बंधन से मुक्त करने में परमेश्वर की दयालुता की याद दिलाती थी l 

यीशु में विश्वास करने वालों से भी इसी तरह उदार होने का आग्रह किया जाता है l पौलुस हमें याद दिलाता है, “वह [मसीह]धनी होकर भी तुम्हारे लिए कंगाल बन गया, ताकि उसके कंगाल हो जाने से तुम धनी हो जाओ” (2 कुरिन्थियों 8:9) l हम देते हैं क्योंकि उसने हमें दिया है l 

 

चंगाई की आशा

रीढ़ की हड्डी की चोट से लकवाग्रस्त लोगों के लिए आशा का एक नया कारण सामने आया है l जर्मन शोधकर्ताओं ने मांसपेशियों और मस्तिष्क के बीच तंत्रिका मार्गों(neural pathways) को फिर से जोड़ने के लिए तंत्रिका विकास को प्रोत्साहित करने का एक तरीका खोजा है l पुनर्विकास ने लकवाग्रस्त चूहों को फिर से चलने में सक्षम बना दिया है, और यह निर्धारित करने के लिए परीक्षण जारी रहेगा कि यह चिकित्सा मनुष्यों के लिए सुरक्षित और प्रभावी है या नहीं l 

जो लोग पक्षाघात से पीड़ित हैं उनके लिए विज्ञान जो हासिल करना चाहता है, यीशु ने चमत्कारों के द्वारा किया l जब वह बैतहसदा के कुण्ड पर गया, एक ऐसा स्थान जहाँ बहुत से बीमार लोग चंगाई की आशा में ठहरे रहते थे, तो यीशु ने उनमें से एक ऐसे व्यक्ति को देखा  “अड़तीस वर्ष से बीमारी में पड़ा था” (यूहन्ना 5:5) l यह पुष्टि करने के बाद कि वह मनुष्य वास्तव में ठीक होना चाहता था, मसीह ने उसे खड़े होने और चलने की आज्ञा दी l “वह मनुष्य तुरंत चंगा हो, और अपनी खाट उठाकर चलने फिरने लगा” (पद.9) l 

हमसे यह प्रतिज्ञा नहीं की गयी है कि हमारी सभी शारीरिक बीमारियाँ ठीक कर दी जाएंगी—कुण्ड में अन्य लोग भी थे जिन्हें उस दिन यीशु द्वारा ठीक नहीं किया गया था l लेकिन जो लोग उस पर भरोसा करते हैं, वे उसके द्वारा दी गयी चंगाई का अनुभव कर सकते हैं—निराशा से आशा तक, कड़वाहट से अनुग्रह तक, घृणा से प्रेम तक, आरोप से क्षमा करने की इच्छा तक l कोई भी वैज्ञानिक खोज (या पानी का कुण्ड) हमें ऐसी चंगाई नहीं दे सकती; यह केवल विश्वास से संभव है l 

 

सेवा का हृदय

जब मेरे “चाचा” एमरी का निधन हुआ, तो श्रद्धांजलियां अनेक और विविध थीं l फिर भी उन सभी सम्मानों का एक अनुकूल विषय था—एमरी ने दूसरों की सेवा करके परमेश्वर के प्रति अपना प्यार दिखाया था l इसका उदाहरण उनकी द्वितीय विश्व युद्ध की सैन्य सेवा के दौरान प्रकट था, जहाँ उन्होंने एक कॉर्प्समैन(corpsman) के रूप में कार्य किया था—एक चिकित्सक जो बिना हथियार के युद्ध में गया था l उनकी बहादुरी के लिए उन्हें उच्च सैन्य सम्मान मिला, लेकिन एमरी को युद्ध के दौरान और उसके बाद उनकी दयालु सेवा के लिए सबसे अधिक याद किया गया l 

एमरी की निस्वार्थता गलातियों के प्रति पौलुस की चुनौती के अनुरूप थी l उसने लिखा, “हे भाइयों (और बहनों), तुम स्वतंत्र होने के लिए बुलाए गए हो; परन्तु ऐसा न हो कि यह स्वतंत्रता शारीरिक कामों के लिए अवसर बने, वरन् प्रेम से एक दूसरे के दास बनो” (गलातियों 5:13) l आखिर कैसे? हमारे टूटेपन में, हम दूसरों के बजाय स्वयं को पहले रखने के लिए दृढ़ हैं तो यह अप्राकृतिक निस्वार्थता कहाँ से आती है?

फिलिप्पियों 2:5 में, पौलुस यह प्रोत्साहन देता है : “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो l” पौलुस हमारे प्रति अपने महान प्रेम के कारण क्रूस पर मृत्यु का अनुभव करने की मसीह की इच्छा का वर्णन करता है l जैसे ही उसकी आत्मा हमें मसीह के मन को उत्पन्न करती है, तभी हम अलग होते हैं और दूसरों के लिए बलिदान देने में सक्षम होते हैं—यीशु द्वारा किए गए अंतिम बलिदान को दर्शाते हुए जब उसने हमारे लिए खुद को दे दिया l क्या हम अपने भीतर आत्मा के कार्य के प्रति समर्पण कर सकते हैं l