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यीशु में बढ़ना

बचपन में, मैं बड़ों को बुद्धिमान और असफल होने में असमर्थ मानता था l मुझे लगता था कि वे हमेशा जानते हैं कि क्या करना है l एक दिन, बड़ा होने पर, मुझे भी हमेशा पता रहेगा कि मुझे क्या करना है l खैर, कई वर्ष पहले “एक दिन” आया, और इसने मुझे बस इतना सिखाया है कि, कई बार, मैं अभी भी नहीं जानता कि क्या करना है l चाहे परिवार में बीमारी, काम में समस्याएँ, या किसी रिश्ते में संघर्ष हो, ऐसे समय ने व्यक्तिगत नियंत्रण और ताकत के सभी भ्रमों को दूर कर दिया है, बस एक ही विकल्प बचता है—अपनी आँखें बंद करके फुसफुसाने का, “परमेश्वर, मदद कीजिए l मुझे नहीं पता क्या करना है l” 

प्रेरित पौलुस ने बेबसी को समझा l उसके जीवन में “काँटा,” संभवतः एक शारीरिक बिमारी, ने उसे बहुत निराशा और पीड़ा पहुंचाई l हलाकि, इसका कारण कांटा ही था, कि पौलुस ने परमेश्वर के प्रेम, प्रतिज्ञाओं और आशीषों को अनुभव किया जो उसके लिए अपनी कठिनाइयों को सहने और काबू पाने के लिए पर्याप्त था (2 कुरिन्थियों 12:9) l उसने सीखा कि व्यक्तिगत कमजोरी और लाचारी हार नहीं है l जब ये विश्वास संग ईश्वर को समर्पित किया जाता है, तो वे इन परिस्थितियों में और उनके द्वारा काम करने के लिए उसके लिए उपकरण बन जाते हैं (पद.9-10) l 

हमारा बड़ा होना यह नहीं है कि हम सर्वज्ञ हैं l वास्तव में, हम उम्र के साथ समझदार होते जाते हैं, लेकिन अंततः हमारी कमजोरियां अक्सर हमारी वास्तविक शक्तिहीनता दर्शाती हैं l  हमारी सच्ची शक्ति मसीह में हैं : “क्योंकि जब मैं निर्बल होता हूँ, तभी बलवंत होता हूँ” (पद.10) l वास्तव में “बड़े होने” का अर्थ उस शक्ति को जानना, भरोसा करना और उसका पालन करना है जो तब आती है जब हमें एहसास होता है कि हमें ईश्वर की सहायता की ज़रूरत है l 

यीशु के समान प्रेम करना

सभी उससे प्यार करते थे—ये शब्द कैस्निगो(Casnigo), इटली के डॉन जिसेपी बेरार्डेली(Don Guiseppe Berardelli) का वर्णन करने के लिए उपयोग किये गए थे l डॉन एक प्रिय व्यक्ति था जो एक पुरानी मोटरसाइकिल पर शहर में घूमकर हमेशा इस अभिवादन के साथ आगे बढ़ता था : “शांति और भलाई l” उसने दूसरों की अथक भलाई की l लेकिन जीवन के अंतिम वर्षों में, उनकी स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ कोरोनोवायरस के संक्रमण से और भी बदतर हो गयीं; जवाब में, उनके समुदाय ने उनके लिए एक श्वासयंत्र(respirator) खरीदा l लेकिन उनकी हालत गंभीर होने पर, उन्होंने श्वास उपकरण लेने के बजाय इसे एक जरूरतमंद युवा रोगी के लिए उपलब्ध कराने का फैसला किया l इससे किसी को भी आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि यह केवल उनके चरित्र में एक ऐसे व्यक्ति के लिए था जिसे दूसरों से प्यार करने के लिए प्यार किया जाता था और उनकी प्रशंसा की जाती थी l

प्रेम करने के कारण प्यार किया जाना, यही वह सन्देश है जो प्रेरित यूहन्ना अपने पूरे सुसमाचार में सुनाता रहता है l प्यार किया जाना और दूसरों से प्यार करना प्रार्थनालय की घंटी की तरह है जो मौसम की परवाह किए बिना रात-दिन बजती रहती है l और यूहन्ना 15 में, वे कुछ हद तक चरम सीमा तक पहुँचते हैं, क्योंकि यूहन्ना स्पष्ट करता है कि सभी के द्वारा प्रेम किया जाना नहीं लेकिन सबसे प्रेम करना ही सबसे बड़ा प्रेम है : “अपने मित्रों के लिए अपना प्राण देना” (पद.13) l 

त्यागमय प्रेम के मानवीय उदाहरण हमें सदैव प्रेरित करते हैं l फिर भी वे परमेश्वर के महान प्रेम की तुलना में फीके हैं l लेकिन उस चुनौती से न चूकें जो वह लाती है, क्योंकि यीशु आज्ञा देता है : “जैसा मैं में तुम से प्रेम रखा, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो” (पद.12) l हाँ, सबसे प्यार करो l 

दीनता का लाभ

कई शिक्षकों की तरह, कैरी अपनी आजीविका के लिए अनगिनत घंटे देती है, अक्सर पेपरों की ग्रेडिंग/श्रेणीकरण करती है और देर शाम तक छात्रों और अभिभावकों से बातचीत करती है l प्रयास जारी रखने के लिए, वह सौहार्द और व्यवहारिक मदद के लिए अपने सहकर्मियों के समुदाय पर निर्भर रहती है; सहयोग द्वारा उसका चुनौतीपूर्ण काम आसान हो जाता है l शिक्षकों के एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि सहयोग का लाभ सहकर्मियों के विनम्रता प्रदर्शित करने से बढ़ जाता हैं l जब सहकर्मी अपनी कमजोरियाँ स्वीकार करने को तैयार होते हैं, तो अन्य लोग एक-दूसरे के साथ अपना ज्ञान साझा करने में सुरक्षित महसूस करते हैं, जिससे समूह में सभी को प्रभावी ढंग से सहायता मिलती है l 

बाइबल नम्रता का महत्व सिखाती है—बढ़े हुए सहयोग से कहीं अधिक के लिए l “यहोवा का भय [मानना]”—परमेश्वर की सुन्दरता, शक्ति और महिमा की तुलना में हम कौन हैं, इसकी सही समझ रखने से—“धन, महिमा और जीवन” प्राप्त होता है (नीतिवचन 22:4) l विनम्रता हमें समुदाय में इस तरह से रहने की ओर ले जाती है जो न केवल संसार की बल्कि ईश्वर की अर्थव्यवस्था में भी फलदायी है, क्योंकि हम अपने साथी छवि धारकों को लाभ पहुंचाना चाहते हैंl 

हम अपने लिए “धन, महिमा और जीवन” पाने के लिए ईश्वर से नहीं डरते—यह बिलकुल भी सच्ची विनम्रता नहीं होगी l इसके बजाय, हम यीशु का अनुकरण करते हैं, जिसने “अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया” (फिलिप्पियों 2:7) ताकि हम एक ऐसे शरीर का भाग बन सकें जो विनम्रतापूर्वक एक साथ मिलकर उसका काम करे, उसे सम्मान दे, और अपने चारों ओर के संसार में जीवन का एक सन्देश ले जाए l  

प्रेम द्वारा प्रेरित

जिम और लेनिडा कॉलेज के दिनों से एक दूसरे से प्रेम करते थे l उनका विवाह हो चुका था और कई वर्षों तक जीवन सुखमय रहा l फिर लेनिडा ने अजीब व्यवहार करना आरम्भ कर दी, खोयी हुए लगने लगी और नियत कार्य भूलने लगी l सैंतालिस वर्ष की उम्र में ही पता चला कि उसे अल्जाइमर/Alzheimer disease(मानसिक बिमारी) हो गया है l एक दशक तक उसकी प्राथमिक देखभाल के बाद, जिम यह कह सका, “अल्जाइमर ने मुझे अपनी पत्नी को उन तरीकों से प्यार करने और सेवा करने का अवसर दिया है जो अकल्पनीय थे जब मैंने कहा, “मैं करता हूँ l’ ”

पवित्र आत्मा के वरदानों की व्याख्या करते हुए, प्रेरित पौलुस ने प्रेम के गुण पर विस्तार से लिखा (1 कुरिन्थियों 13) l उसने सेवा के रटे-रटाए कार्यों की तुलना प्रेमपूर्ण हृदय से उमड़ने वाले कार्यों से की l प्रभावशाली बोलना अच्छा है, पौलुस ने लिखा, लेकिन प्रेम के यह अर्थहीन शोर की तरह है (पद.1) l “यदि मैं . . . अपनी देह जलाने के लिए दे दूँ, और प्रेम न रखूँ, तो मुझे कुछ भी लाभ नहीं” (पद.3) l पौलुस ने अंततः लिखा, “सबसे बड़ा(उपहार) प्रेम है”(पद.13) l 

अपनी पत्नी की देखभाल करने के कारण जिम की प्रेम और सेवा के विषय समझ गहरी हो गयी l केवल गहरा और स्थायी प्यार ही उसे प्रतिदिन उसका समर्थन करने की शक्ति दे सकता था l अंततः, एकमात्र स्थान जहाँ हम इस बलिदानी प्रेम को पूरी तरह से प्रतिरूपित देखते हैं, वह हमारे लिए परमेश्वर का प्रेम है, जिसके कारण उसने यीशु को हमारे पापों के लिए मरने के लिए भेजा (यूहन्ना 3:16) l प्रेम से प्रेरित, बलिदान के उस कार्य ने हमारे संसार को हमेशा के लिए बदल दिया है l