
परमेश्वर आपको नहीं भूलेगा
बचपन में मैंने डाक टिकटें एकत्र किया। जब मेरे दादाजी ने मेरे शौक के बारे में सुना, उन्होंने प्रतिदिन अपने कार्यालय के मेल से टिकटें सहेजना शुरू कर दिया। जब भी मैं अपने दादा-दादी से मिलने जाता, तो वे मुझे विभिन्न प्रकार के सुंदर टिकटों से भरा एक लिफाफा देते। उन्होंने मुझसे एक बार कहा, "भले ही मैं हमेशा व्यस्त रहता हूँ, मैं तुम्हें नहीं भूलूंगा।"
दादाजी खुले तौर पर स्नेह प्रदर्शित नहीं करते थे, लेकिन मैंने उनके प्रेम को गहराई से महसूस किया। एक असीम गहरे तरीके से, परमेश्वर ने इस्राएल के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित किया जब उसने घोषणा की, “मैं तुझे नहीं भूल सकता” (यशायाह 49:15) । पिछले दिनों मूर्तिपूजा और अवज्ञा के कारण बेबीलोन में पीड़ा सहते हुए, उसके लोगों ने विलाप किया, "प्रभु मुझे भूल गया है।" (पद.14) । परन्तु अपने लोगों के प्रति परमेश्वर का प्रेम नहीं बदला था। उसने उनसे क्षमा और पुनर्स्थापना का वादा किया (पद. 8-13) ।
परमेश्वर ने इस्राएल से कहा, “मैंने तेरा चित्र अपनी हथेलियों पर खोदकर बनाया है” जैसा कि वह आज हमसे भी कहता है (पद.16)। जब मैं उसके आश्वासन के शब्दों पर विचार करता हूं, यह मुझे गहराई से यीशु के कीलों से दागे हाथों की याद दिलाता है—जो हमारे लिए और हमारे उद्धार के लिए प्रेम में फैला हुआ था (यूहन्ना 20:24-27)। यह मुझे यीशु के कीलों से जख्मी हाथों का बहुत गहराई से याद दिलाता है- जो हमारे लिए और हमारे उद्धार के लिए प्रेम में फैला हुआ है (यूहन्ना 20:24-27)। मेरे दादाजी के टिकटों और उनके स्नेहपूर्ण शब्दों के तरह, परमेश्वर अपने प्रेम के शाश्वत प्रतीक के रूप में अपना क्षमाशील हाथ बढ़ाता है। आइए हम उसके प्रेम—एक अपरिवर्तनीय प्रेम के लिए उन्हें धन्यवाद दें। वह हमें कभी नहीं भूलेगा।

कलीसिया हो
कोविड-19 महामारी के दौरान, डेव और कार्ला ने एक घरेलू कलीसिया की तलाश में महीनों बिताए। स्वास्थ्य दिशा निर्देशों का पालन करना, जो विभिन्न व्यक्तिगत मिलन को सीमित कर, इसे और भी कठिन बना दिया। वे यीशु में विश्वासियों के एक समूह से जुड़ने की लालसा रखते थे। कार्ला ने मुझे ई-मेल किया, "कलीसिया ढूंढने का कठिन समय है।" मेरे अंदर अपनी कलीसिया परिवार के साथ फिर से जुड़ने की मेरी अपनी लालसा ने एक अहसास जाग दिया। मैंने उत्तर दिया, "कलीसिया होना कठिन है।" उस समय, हमारी कलीसिया ने आसपास के इलाकों में भोजन की पेशकश करने, ऑनलाइन सेवाएं सृजन करना और प्रत्येक सदस्य को समर्थन और प्रार्थना के साथ फोन करने पर जोर दिया गया । मेरा पति और मैं इसमें भाग लेने के बाद भी सोच रहे थे कि हमारे बदली हुई दुनिया में "कलीसिया बनने" के लिए और क्या कर सकते हैं।
इब्रानियों 10:25 में, लेखक पाठकों से “एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें” और ज्यों-ज्यों उस दिन को निकट आते देखो, त्यों-त्यों और भी अधिक यह किया करो” की उपेक्षा न करने का आग्रह करता है । संभवतः उत्पीड़न के कारण (पद. 32-34) या शायद केवल थके होने का परिणाम (12:3), संघर्षरत प्रारंभिक विश्वासियों को कलीसिया बने रहने के लिए एक प्रोत्साहन की आवश्यकता थी।
और आज, मुझे भी एक प्रोत्साहन की आवश्यकता है। क्या आपको चाहिए? जब परिस्थितियाँ बदल जाती हैं तो हम कलीसिया का अनुभव कैसे करते हैं, क्या हम कलीसिया बने रहेंगे? जैसे परमेश्वर हमारा मार्गदर्शन करता है आइए रचनात्मक रूप से एक दूसरे को प्रोत्साहित करें और एक-दूसरे का निर्माण करें। अपने संसाधनों को साझा करें। समर्थन का संदेश भेजें। इकट्ठा हों जिस तरह हम सक्षम हैं। एक दूसरे के लिए प्रार्थना करें। आइए कलीसिया बने रहें ।

पूर्वधारणा और परमेश्वर का प्रेम
“तुम वह नहीं हो जिसकी मैंने उम्मीद की थी । मैंने सोचा था कि मैं तुमसे नफरत करूंगा, लेकिन मैं नहीं करता।" युवक के शब्द कठोर लग रहे थे, लेकिन वे वास्तव में दयालु होने का एक प्रयास था। मैं विदेश में उनके देश में पढ़ रहा था, एक ऐसा देश जिसका दशकों पहले मेरे देश के साथ युद्ध हुआ था। हम कक्षा में एक सामूहिक चर्चा में एक साथ भाग ले रहे थे, और मैंने देखा कि वह बहुत पृथक लग रहा था। जब मैंने पूछा कि क्या मैंने उसे किसी तरह नाराज किया है, तो उसने जवाब दिया, "बिल्कुल नहीं। और यही बात है। उस युद्ध में मेरे दादाजी मारे गये थे इसलिए मुझे आपके लोगों और आपके देश से नफरत करता था। लेकिन अब मैं देखता हूं कि हमारे बीच कितनी समानताएं हैं, और यह मुझे आश्चर्यचकित करता है। मैं यह नहीं देख सकता कि हम दोस्त क्यों नहीं बन सकते।"
पूर्वधारणा मानव जाति जैसा ही पुराना है । दो हज़ार साल पहले, जब नतनएल ने पहली बार यीशु के नासरत में रहने के बारे में सुना, तो उसकी पूर्वधारणा स्पष्ट हो गयी : उसने पूछा, “क्या कोई अच्छी वस्तु भी नासरत से निकल सकती है?” (यूहन्ना 1:46) । नतनएल यीशु की तरह गलील के क्षेत्र में रहता था। संभवतः उसने सोचा था कि परमेश्वर का मसीहा किसी अन्य स्थान से आएगा; यहाँ तक कि अन्य गलीली लोगों ने भी नासरत को नीची दृष्टि से देखा क्योंकि यह एक साधारण छोटा सा गाँव लग रहा था।
इतना तो स्पष्ट है, नतनएल के प्रतिक्रिया ने यीशु को उससे प्रेम करने से नहीं रोका, और जब वह यीशु का शिष्य बना, वह बदल गया। नतनएल ने बाद में घोषणा किया “तू परमेश्वर का पुत्र हे;” (पद.49)। ऐसा कोई पूर्वधारणा नहीं है जो परमेश्वर के परिवर्तनकारी प्रेम के विरुद्ध खड़ा हो सके।

मसीह की तरह देना
जब अमेरिकी लेखक ओ हेनरी ने 1905 की अपनी प्रिय क्रिसमस कहानी "द गिफ्ट ऑफ द मजाई(The Gift of the Magi)" लिखी, वह व्यक्तिगत परेशानियों से उबरने के लिए संघर्ष कर रहा था। फिर भी, उन्होंने एक प्रेरक कहानी लिखी जो एक सुंदर, मसीह-समान चरित्र विशेषता—बलिदान को उजागर करता है। कहानी में, एक गरीब पत्नी क्रिसमस के पूर्व संध्या पर अपने पति के लिए सोने की पॉकेट घड़ी का चेन खरीदने के लिए अपना सुंदर लंबा बाल बेच देती है। जैसा उसे बाद में पता चलता है कि, उसके पति ने उसके खूबसूरत बालों के लिए कंघी का एक सेट खरीदने के लिए अपनी जेब घड़ी बेच दिया था।
एक दूसरे को उनका सबसे बड़ा उपहार? बलिदान। प्रत्येक की ओर से, भाव प्रदर्शन में बहुत प्रेम झलक रहा था।
उसी प्रकार, यह कहानी उन प्रेमपूर्ण उपहारों को प्रकट करता है जो ज्योतिषियों ने शिशु मसीह को उनके पवित्र जन्म के बाद दिया। (देखें मत्ती 2:1,11)। तथापि, उन उपहारों से भी अधिक बालक यीशु बड़े होते और एक दिन पूरे विश्व के लिए अपना जीवन बलिदान देते।
हमारे दैनिक जीवन में, मसीह में विश्वासी हमारे समय का बलिदान, ख़जाना और एक ऐसा स्वभाव जो सब बात प्रेम का करता है दूसरों को देकर उनके महान उपहार को उजागर कर सकते हैं। जैसा कि प्रेरित पौलुस ने लिखा, “इसलिए हे भाइयों, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिलाकर विनती करता हूँ, कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ” (रोमियों 12:1) l यीशु के प्रेम के द्वारा दूसरों के लिए बलिदान देने से बेहतर कोई उपहार नहीं है।
