परदेशियों का स्वागत
जैसे ही हजारों यूक्रेनी महिलाएं और बच्चे युद्ध से भागकर बर्लिन के रेलवे स्टेशन पर पहुंचे उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि जर्मन परिवार अपने घरों में शरणार्थियों को शरण देने के लिये अपने हाथों से बने विज्ञापन लेकर खड़े थे । एक में लिखा था “दो लोगों को रख सकते हैं।” दूसरे में था “एक बड़ा कमरा उपलब्ध है।” एक महिला से यह पूछे जाने पर कि उसने अजनबियों को ऐसा अतिथि सत्कार (मेहमानदारी) क्यों दिया, उस महिला ने कहा कि उसकी माँ को नाज़ियों से भागते समय शरण की आवश्यकता पड़ी थी और अब वह भी ऐसी ज़रूरत में पड़े दूसरों लोगों की मदद करना चाहती थी।
व्यवस्थाविवरण की पुस्तक में परमेश्वर इस्राएलियों को अपने देश से दूर रहने वालों की देखभाल करने के लिए कहता है। क्यों? क्योंकि वह अनाथों, विधवाओं, और परदेशियों का रक्षक है (10:18), और क्योंकि इस्राएली जानते थे कि इस तरह के असुरक्षित और खतरनाक हालातों में होने से क्या महसूस होता है:“क्योंकि तुम भी मिस्र में परदेशी थे” (पद 19)। सहानुभूति उनकी देखभाल को प्रेरित करने के लिए थी।
लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। जब सारपत की विधवा ने परदेशी एलिय्याह का अपने घर में स्वागत किया तो वह आशीषित हुई (1 राजा 17:9–24), ठीक वैसे ही जैसे इब्राहीम को तीन परदेशी आगंतुकों ने आशीष दी थी (उत्पत्ति 18:1–15)। परमेश्वर अक्सर मेहमानदारी का उपयोग मेजबान को आशीर्वाद देने के लिए करते हैं, केवल मेहमान को नहीं।
अपने घर में अजनबियों का स्वागत करना कठिन है, पर हो सकता है कि वे जर्मन परिवार वास्तविक लाभार्थी हैं। जब हम भी परमेश्वर की सहानुभूति के साथ कमजोरों के प्रति सहानुभूति दिखाते हैं तो हम उन उपहारों से चकित हो सकते हैं जो वह हमें उनके द्वारा देता है।

चुपचाप रह
जब मैं उस चैम्बर (कमरे) में शांति से बैठ गया, तो मेरा शरीर पानी के ऊपर आराम से तैरने लगा, और कमरे में अंधेरा हो गया और बैकग्राउंड (पृष्ठभूमि) में चल रहा हल्का हल्का संगीत शांत हो गया। मैंने पढ़ा था कि आइसोलेशन टैंक तनाव और चिंता से राहत देने की चिकित्सा करने वाले टैंक होते हैं। परन्तु मैंने ऐसा कुछ पहले कभी अनुभव नहीं किया था । ऐसा लगा कि मानो संसार का शोरगुल और गड़बड़ी रुक गई हो, और मैं अपने अंदरूनी विचारों को स्पष्ट रूप से सुन सकता था। मैंने यह स्मरण करते हुए कि शांति में शक्ति होती है, उस अनुभव को संतुलित और फिर से नया करके छोड़ दिया।
हम परमेश्वर की उपस्थिति की खामोशी में बड़ी शांति से विश्राम कर सकते हैं, जो हमारी सामर्थ्य को फिर से नया करता है और हमें उन चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक ज्ञान प्रदान करता है जिनका हम हर दिन सामना करते हैं। जब हम शोर को शांत करते हुए और हमारे जीवन के ध्यान भटकाने वाली चीजों को दूर करते हुए खामोश रहते हैं, तो परमेश्वर हमें मजबूत करता है ताकि हम उसकी कोमल आवाज को अधिक स्पष्टता से सुन सकें (भजन संहिता 37:7)।
जबकि सैन्सरी डैपरीवेशन चैम्बर (संवेदी वंचना कक्ष) निश्चित रूप से खामोशी का ही एक रूप है, तो परमेश्वर हमें उसके साथ निर्बाध समय बिताने का एक सरल तरीका प्रदान करता है। वह कहता है कि “जब तू प्रार्थना करे, तो अपनी कोठरी में जा; और द्वार बन्द कर के अपने पिता से... प्रार्थना कर” (मत्ती 6:6)। जब हम परमेश्वर की शानदार उपस्थिति की खामोशी में जीवन की चुनौतियों का उत्तर खोजते हैं तो वह हमारे कदमों का मार्गदर्शन करेगा और उसकी धार्मिकता को हमारे माध्यम से चमकाएगा (भजन संहिता 37:5-6)।

कौन सा ज्ञान?
सन् 2018 के ईस्टर से ठीक पहले, एक आतंकवादी एक बाजार में घुस गया, और उसने दो लोगों को मार डाला और एक तीसरी स्त्री को बंधक बना लिया। जब उस स्त्री को स्वतंत्र करवाने के प्रयास विफल रहे, तो एक पुलिसकर्मी ने आतंकवादी को एक प्रस्ताव दिया कि वह उस स्त्री को छोड़ कर उसे पकड़ ले।
यह प्रस्ताव चौंकाने वाला इसलिए था क्योंकि यह लोकप्रिय ज्ञान के विरुद्ध था। आप हमेशा किसी संस्कृति के ज्ञान को उसके द्वारा मनाए जाने वाले कथनों से बता सकते हैं, जैसे सोशल मीडिया पर पोस्ट किए जाने वाले सेलिब्रिटी उद्धरण। एक लोकप्रिय उद्धरण में लिखा है, "सबसे बड़ा साहसिक कार्य जो आप कर सकते हैं वह है अपने सपनों का जीवन जीना।" दूसरे का कहना है, ''पहले खुद से प्यार करें और बाकी सब चीजें आपके अनुरूप हो जाएंगी।'' तीसरा, ''तुम्हें अपने लिए जो करना है वही करो।'' यदि पुलिस अधिकारी ने ऐसी सलाह का पालन किया होता, तो वह स्वयं को पहले स्थान पर रखता और भाग जाता।
याकूब प्रेरित कहता है कि इस संसार में दो प्रकार की बुद्धि है: एक “सांसारिक” है, और दूसरी “स्वर्गीय” है। पहले वाली को स्वार्थी महत्वाकांक्षा और गड़बड़ी (विकार) द्वारा चिन्हित किया गया है (याकूब 3:14-16); तो दूसरी को नम्रता, अधीनता और मेल-मिलाप के द्वारा चिन्हित किया गया है (पद 13, 17-18)। सांसारिक ज्ञान स्वयं को सबसे पहले रखता है। स्वर्गीय ज्ञान दूसरों का पक्ष लेता है, जो विनम्र कर्मों के जीवन की ओर अगुवाई करता है (पद 13)।
उस आतंकवादी ने पुलिस अधिकारी के उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया, और उस बंधक को स्वतंत्र करके पुलिसकर्मी को गोली मार दी, और उस ईस्टर पर संसार ने एक निर्दोष व्यक्ति को किसी दूसरे के लिए मरते हुए देखा। स्वर्गीय ज्ञान विनम्र कार्यों की ओर अगुवाई इसलिए करता है क्योंकि यह परमेश्वर को स्वयं से ऊपर रखता है (नीतिवचन 9:10)। आज आप किस ज्ञान का अनुसरण कर रहे हैं?

प्रतिज्ञा पूरी हुई
जब मैं बच्चा था तो प्रत्येक गर्मियों में, मैं अपने दादा-दादी के साथ एक सप्ताह की छुट्टियाँ मनाने के लिए दो सौ मील की यात्रा किया करता था। मुझे बाद में जाकर यह पता चला कि मैंने उन दोनों से जिन्हें मैं प्रेम करता था कितना ज्ञान प्राप्त किया था। उनके जीवन के अनुभव और परमेश्वर के साथ उनके करीबी सम्बन्ध ने उन्हें ऐसे-ऐसे दृष्टिकोण प्रदान किए थे जिनकी अभी तक भी मेरा युवा मन कल्पना नहीं कर सकता था। परमेश्वर की विश्वासयोग्यता के बारे में उनके साथ हुई बातचीत ने मुझे इस बात के लिए आश्वस्त किया कि परमेश्वर भरोसेमंद है और अपने द्वारा की गई हर प्रतिज्ञा को पूरा करता है।
जब एक स्वर्गदूत यीशु की माता, मरियम से मिलने आया तो उस समय पर वह एक किशोरी थी। जिब्राईल के द्वारा लाया गया वह अविश्वसनीय समाचार अभिभूत करने वाला रहा होगा, फिर भी उसने अनुग्रह के साथ उस कार्य को स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया (लूका 1:38)। लेकिन शायद उनकी बुजुर्ग रिश्तेदार इलीशिबा से मुलाकात - जो एक चमत्कारी गर्भावस्था के बीच में थी (कुछ विद्वानों का मानना है कि वह साठ साल की रही होगी) - उन्हें आराम मिला क्योंकि इलीशिबा ने जिब्राईल के शब्दों की उत्साहपूर्वक पुष्टि की कि वह प्रतिज्ञा किए गए बच्चे मसीहा की मां थीं। (पद 39-45)।
जैसे-जैसे हम मसीह में बढ़ते और परिपक्व होते जाते हैं, जैसे मेरे दादा-दादी करते थे, वैसे-वैसे हम सीखते जाते हैं कि वह अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है। उसने इलीशिबा और उसके पति जकर्याह के लिए एक संतान की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा किया (पद 57-58)। और वह पुत्र, अर्थात् यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला, उस प्रतिज्ञा का अग्रदूत (संदेशवाहक) बना जो सैकड़ों वर्ष पहले की गई थी, अर्थात् वह प्रतिज्ञा जो मनुष्यजाति के भविष्य की दिशा को बदल देगी। प्रतिज्ञा किया हुआ मसीहा, अर्थात् संसार का उद्धारकर्ता, आ रहा है! (मत्ती 1:21–23)

निर्देश स्वीकारना
जब हम खलिहान में खड़े थे जहाँ मेरी मित्र मिशेल मेरी बेटी को घोड़े की सवारी करना सिखा रही थी, तो वहाँ हवा से चमड़े और घास की गंध आ रही थी। जब मिशेल ने यह दिखाया कि लगाम को घोड़े के दांतों के पीछे कैसे रखा जाता है तो उस समय पर मिशेल के सफेद टट्टू (छोटा घोड़ा) ने अपना मुँह खोल दिया। जैसे ही मेरी बेटी ने उसके कानों पर लगी लगाम खींची, तो मिशेल ने उसे समझाया कि लगाम इसलिए महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इससे सवार को घोड़े को धीमा करने और उसे बाईं या दाईं ओर चलाने का अधिकार मिलता है।
घोड़े की लगाम, मनुष्य की जीभ की तरह ही, छोटी परन्तु महत्वपूर्ण होती है। दोनों ही का किसी बड़ी और शक्तिशाली वस्तु पर बहुत अधिक प्रभाव होता है— और लगाम के मामले में, यह घोड़ा होता है। जीभ के मामले में, यह हमारे शब्द होते हैं (याकूब 3:3, 5)।
हमारे शब्द अलग-अलग दिशाओं में दौड़ सकते हैं। “इसी से हम प्रभु और पिता की स्तुति करते हैं, और इसी से मनुष्यों को...श्राप देते हैं” (पद 9)। दुर्भाग्य से, बाइबल इस बात की चेतावनी देती है कि हमारी बोली (बात-चीत) को नियंत्रित करना बहुत कठिन है क्योंकि शब्द हमारे हृदयों से निकलते हैं (लूका 6:45)। इस बात के लिए धन्यवाद हो कि प्रत्येक विश्वासी में वास करने वालापरमेश्वर का आत्मा, हमें धीरज, भलाई और संयम में उन्नति करने में सहायता करता है (गलातियों 5:22-23)। जब हम आत्मा के साथ सहयोग करते हैं, तो हमारे हृदय बदल जाते हैं और हमारे शब्द भी बदल जाते हैं। गाली-गलौज प्रशंसा करने में बदल जाता है। झूठ सच में बदल जाता है । आलोचना प्रोत्साहन में बदल जाती है।
जीभ को वश में करने का अर्थ केवल स्वयं को सही बातें कहने के लिए प्रशिक्षित करना नहीं होता है। यह पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन को स्वीकार करना है ताकि हमारे शब्द उस करुणा और प्रोत्साहन को उत्पन्न करें जिसकी संसार को आवश्यकता है।