श्रेणी  |  odb

काम पर करुणा

मेरी दोस्त अनीता एक लेखा फर्म के लिए कुल वेतन भुगतान(payroll) की गणना करती है l यह एक सीधी नौकरी की तरह लग सकता है, लेकिन ऐसे समय होते हैं जब नियोक्ता अनुरोध के बाद देर से अपनी जानकारी जमा करते हैं l अनीता अक्सर इसकी पूर्ति के लिए लम्बे समय तक काम करती हैं ताकि कर्मचारी समय से अपना पैसा प्राप्त कर सकें l वह उन परिवारों के कारण विचार करती है जो किराने का सामान खरीदने, दवा खरीदने और आवास के लिए भुगतान करने के लिए उन आय श्रोतों(fund) पर निर्भर हैं l

अनीता का अपनी नौकरी के प्रति दयालु रवैया मुझे यीशु की ओर इशारा करता है l संसार में, उसने कभी-कभी लोगों की सेवा की जब वह उसके लिए असुविधाजनक था l उदाहरण के लिए, यूहन्ना बप्तिस्मा दाता के मारे जाने के बारे में सुनने के बाद मसीह कुछ समय अकेले रहना चाहता था, इसलिए वह एक अलग जगह की तलाश में एक नाव पर सवार हो गए (मत्ती 14:13) l शायद वह अपने रिश्तेदार के लिए शोक मनाना चाहता था और दुःख में होकर प्रार्थना करना चाहता था l

सिर्फ एक ही समस्या थी l उसके पीछे लोगों की भीड़ लगी l इस समूह की विभिन्न भौतिक ज़रूरतें थीं l लोगों को भेजना बहुत आसान होता, लेकिन “उसने निकलकर एक बड़ी भीड़ देखी और उन पर तरस खाया, और उनके बीमारों को चंगा किया” (पद.14) l

हालाँकि यह लोगों को सिखाने और उनकी बीमारियों को ठीक करने के लिए यीशु की बुलाहट का हिस्सा था, उसकी सहानुभूति ने उसके काम करने के तरीके को प्रभावित किया जिसमें उसने अपनी जिम्मेदारियों को पूरा किया l परमेश्वर हमें अपने जीवन में उसकी करुणा को पहचानने में मदद करें और हमें उसे दूसरों तक पहुंचाने की शक्ति दें l

गुडबाई और हेलो

जब मेरे भाई की अचानक हृदयाघात से मृत्यु हो गयी, जीवन के प्रति मेरा परिपेक्ष नाटकीय रूप से बदल गया l डेव सात बच्चों में चौथा था, लेकिन हममें से सबसे पहले गुज़र गया – और उसके गुजरने का अनापेक्षित स्वभाव ने मुझे बहुत अधिक विचार करने को मजबूर किया l यह स्पष्ट हो गया कि जैसे जैसे हमलोगों की आयु बढ़ने लगी हमारे परिवार का भविष्य लाभ से अधिक हानि से चिन्हित होने जा रहा था l यह हेलो के बराबर गुडबाई से चरितार्थ होने जा रहा था l

इनमें से कोई भी बौद्धिक रूप से चकित करनेवाला नहीं था – जीवन ऐसे ही कार्य करता है l लेकिन यह एहसास मस्तिष्क पर एक भावनात्मक वज्रपात की तरह था l इसने हर पल को एक तरोताजा, नया महत्व दिया जो जीवन हमें देता है और हर एक अवसर जो समय अनुमति देता है l और इसने एक ऐसे भविष्य के पुनर्मिलन की वास्तविकता को एक बड़ा नया मूल्य दिया,  जहां कभी भी किसी गुडबाई की ज़रूरत नहीं होगी l

प्रकाशितवाक्य 21:3-4 में जो हमें मिलता है, उसके केंद्र में यह परम वास्तविकता है : “परमेश्वर आप उनके साथ रहेगा और उनका परमेश्वर होगा l वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं l”

हालाँकि आज हम खुद को लम्बे समय तक अलविदा कहने का अनुभव कर सकते हैं, लेकिन मसीह की मृत्यु और पुनरुत्थान में हमारा विश्वास अनंत काल तक हेलो का वादा करता है l

मित्रवत मीनपक्ष(Friendly Fin)

एक समुद्रीय जीवविज्ञानी तैर रही थी, जब 50,000 पौंड की व्हेल अचानक दिखाई दी और उसे अपने मीनपक्ष(fin) में छिपा लिया l महिला को लगा कि उसकी ज़िन्दगी ख़त्म हो गयी है l लेकिन हलकों(circle) में धीरे-धीरे तैरने के बाद, व्हेल ने उसे जाने दिया l यह तब जब जीवविज्ञानी ने एक शार्क को वह क्षेत्र छोड़ते देखा l महिला का मानना है कि व्हेल उसकी रक्षा कर रही थी – उसे खतरे से बचाकर l

खतरे के संसार में, हमें दूसरों की देखभाल करने के लिए बुलाया जाता है l लेकिन आप अपने आप से पूछ सकते हैं, क्या मुझे वास्तव में किसी और के लिए जिम्मेदार होने की उम्मीद करनी चाहिये? या कैन के शब्दों में : “क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ?” (उत्पत्ति 4:9) l पुराने नियम का बाकी हिस्सा गरजनेवाली प्रतिक्रिया के साथ गूंज उठता है : हाँ! जैसे आदम को बगीचे की देखभाल करनी थी, वैसे ही कैन को हाबिल की देखभाल करनी थी l इस्राएल को कमज़ोर लोगों और ज़रुरतमंदों की देखभाल करनी थी l फिर भी उन्होंने विपरीत काम किया – लोगों का शोषण किया, गरीबों पर अत्याचार किया, और अपने पड़ोसियों से अपने समान प्रेम करने के आह्वान को त्याग दिया (यशायाह 3:14-15) l

फिर भी, कैन और हाबिल की कहानी में, परमेश्वर कैन को दूर भेज दिये जाने के बाद भी उस पर नज़र रखना जारी रखा (उत्पत्ति 4:15-16) l परमेश्वर ने कैन के लिए जो किया वह कैन को हाबिल के लिए करना चाहिये था l यह यीशु में परमेश्वर का एक सुन्दर पूर्वाभास है जो वह हमारे लिए करने वाला था l यीशु हमें अपने देखभाल में रखता है, और वह हमें जाकर दूसरों के लिए उसी तरह करने में समर्थ बनाता है l

प्रोत्साहन का दिन

आपदा के समय अग्रणी पंक्ति में रहकर सबसे पहले प्रत्युत्तर देने वाले हर दिन समर्पण और साहस प्रगट करते हैं l 2001 में न्यू यॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आक्रमण में जब हज़ारों लोग मारे गए या घायल हुए, चार सौ से अधिक आपातकालीन कार्यकर्ता भी अपनी जान से हाथ धो बैठे थे l सबसे पहले प्रत्युत्तर देनेवालों के सम्मान में, अमेरिकी सरकार ने सितम्बर 12 को राष्ट्रीय प्रोत्साहन दिवस नामित किया l

जबकि यह अनूठा महसूस हो सकता है कि कोई सरकार राष्ट्रीय प्रोत्साहन दिवस घोषित करेगी, प्रेरित पौलुस ने अवश्य ही सोचा कि यह एक कलीसिया की उन्नति के लिए अनिवार्य था l उसने थिस्स्लुनिके की युवा कलीसिया की सराहना की, “कायरों को ढाढ़स दो, निर्बलों को सम्भालो, सब की ओर सहनशीलता दिखाओ”(1 थिस्सलुनीकियों 5:14) l यद्यपि वे सताव सह  रहे थे, पौलुस ने विश्वासियों को “सदा भलाई करने पर तत्पर [रहने], आपस में और सब से भी भलाई ही की चेष्टा [करने] के लिए उत्साहित किया (पद.15) l वह जानता था कि मनुष्य के रूप में, वे निराशा, स्वार्थ और संघर्ष के लिए ग्रस्त होंगे l लेकिन वह यह भी जानता था कि वे परमेश्वर की मदद और ताकत के बिना एक दूसरे का उन्नति नहीं कर पाएंगे l

आज चीजें अलग नहीं हैं l हम सभी को उन्नति करने की ज़रूरत है, और हमें अपने आसपास के लोगों के लिए भी ऐसा करने की आवश्यकता है l फिर भी हम इसे अपने बल पर नहीं कर सकते l यही कारण है कि पौलुस का प्रोत्साहन है कि “तुम्हारा बुलानेवाला सच्चा है, और वह ऐसा ही करेगा”(पद.24) कितनी निश्चयता देनेवाला है l उसकी मदद से, हम हर दिन एक दूसरे को प्रोत्साहित कर सकते हैं l