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परमेश्वर के लिए भूखा

यीशु में एक नया विश्वासी बाइबल पढ़ने के लिए बेताब था l यद्यपि, उसने एक विस्फोट में अपनी दृष्टि और दोनों हाथों को खो दिया था l जब उसने एक महिला के बारे में सुना, जिसने अपने होंठों से ब्रेल लिपि को पढ़ती थी, तो उसने ऐसा ही करने की कोशिश की – लेकिन जाना कि उसके होंठों की तंत्रिकाओं के शिरे भी नष्ट हो गए थे l बाद में, वह ख़ुशी से भर गया जब उसे पता चला की वह ब्रेल अक्षरों को अपनी जीभ से महसूस कर सकता है! उसने पवित्रशास्त्र को पढ़ने और आनंद लेने का एक तरीका खोज लिया था l 

आनंद और प्रसन्नता की भावनाएं थीं जो नबी यिर्मयाह ने परमेश्वर के शब्दों को प्राप्त करके अनुभव किया l “जब तेरे वचन मेरे पास पहुंचे, तब मैं ने उन्हें मानो खा लिया,” उसने कहा, “और तेरे वचन मेरे मन के हर्ष और आनंद का कारण हुए” (यिर्मयाह 15:16) l यहूदा के लोगों के विपरीत जिन्होंने उसके शब्दों का तिरस्कार किया (8:9), यिर्मयाह आज्ञाकारी था और उनमें आनंदित था l उसकी आज्ञाकारिता, हालाँकि, नबी को अपने ही लोगों द्वारा अस्वीकार कर दिया और गलत तरीके से सताया (15:17) l 

हममें से कुछ ने कुछ इसी तरह का अनुभव किया होगा l हमने एक बार ख़ुशी के सस्थ बाइबल पढ़ी, लेकिन परमेश्वर की आज्ञा मानने से दूसरों को दुःख और अस्वीकृति हुयी l यिर्मयाह की तरह हम अपने बरम को परमेश्वर तक पहुंचा सकते हैं l उसने यिर्मयाह को उस वाडे को दोहराते हुए जवाब दिया जो उसने उसे दिया था जब उसने पहली बार उसे नबी कहा था (पद. 19-21; देखें 1:18-19) l परमेश्वर ने उसे याद दिलाया की उसने अपने लोगों को अभी निराश नहीं होने दिया l हमारा भी यही भरोसा हो सकता है l वह वफादार है और हमें कबी नहीं छोड़ेगा l 

दया-भाव से स्तुति तक

बच्चों के लिए कपड़े की दूकान पर, उत्साहित बच्चों ने कृतज्ञतापूर्वक अपने पसंदीदा रंगों और उचित साइज़ के कपड़े ढूँढने लगे l उन्होंने आत्म-सम्मान प्राप्त किया, आयोजक ने कहा, नए कपड़ों के साथ जिससे उनके मित्रों द्वारा उनकी स्वीकृति बढ़ रही थी,: उन्होंने  ठन्डे मौसम में गर्मी प्रदान की l 

प्रेरित पौलुस को भी एक बागा(cloak) की ज़रूरत थी, जब उसने तीमुथियुस को लिखा, “जो बागा मैं त्रोआस में करपुस के यहाँ छोड़ आया हूँ, जब तू आए तो उसे . . . लेते आना” ((2 तीमुथियुस 4:13) l एक ठन्डे रोमी जेल में, पौलुस को गर्मी की ज़रूरत थी, लेकिन साथ ही साथ संगति भी l “किसी ने भी मेरा साथ नहीं दिया, वरन् सब ने मुझे छोड़ दिया था” उसने शोक प्रगट किया, जब उसने एक रोमी न्यायी का सामना किया (पद.16) l हमारे हृदय इस महान मिशनरी के सच्चे दर्द से छिद गये l 

फिरभी पौलुस के आखिरी लिखी पत्री के इन अंतिम शब्दों में – एक आश्चर्जनक सेवा के बाद उसके विचार – वह दया से प्रशंसा की ओर बढ़ता है l परन्तु प्रभु मेरा सहायक रहा,” वह जोड़ता है, और उसके शब्द हमारे दिलों को समेट देते हैं l जिस प्रकार पौलुस ने घोषणा की, “[परमेश्वर ने] मुझे सामर्थ्य दी, ताकि मेरे द्वारा पूरा पूरा प्रचार हो और सब अन्यजातीय सुन लें l मैं सिंह के मुँह से बचाया गया” (पद.17) l 

यदि आप संकट का सामना कर रहे हैं, गर्माहट के लिए सही कपड़ों की कमी या करीबी दोस्तों की मदद की कमी महसूस कर रहे हैं, तो परमेश्वर को स्मरण करें l वह फिर से सजीव करने, प्रबंध करने और छुड़ाने में विश्वासयोग्य है l क्यों? उसकी महिमा के लिए और उसके राज्य में हमारे उद्देश्य के लिए l 

चंगाई देने वाले शब्द

हाल ही के एक अध्ययन से पता चला है कि स्वास्थ्य देखभाल प्रदाता के शब्द रोगियों को उनकी बीमारियों से जल्दी स्वाश्य होने में मदद करती हैं l एक साधारण प्रयोग के रूप में स्वयंसेवक अध्ययन भागीदारों को स्किन एलर्जी से पीड़ित व्यक्ति(skin allergen) से खुजलाने को कहा गया और उसके बाद अपने चिकित्सक से आश्वासन प्राप्त करनेवालों से उन लोगों की प्रतिक्रियाओं की तुलना की गयी जिन्होंने आश्वासन प्राप्त नहीं किये थे l अपने चिकित्सक से प्रोत्साहन प्राप्त करनेवाले रोगियों को उनके प्रतिरूप(counterpart) से कम कष्ट और खुजलाहट हुयी l 

नीतिवचन के लेखक को पता था कि उत्साहजनक शब्द कितने महत्वपूर्ण हैं l “मनभावने वचन . . .  हड्डियों को हरी-भरी करते हैं” (नीतिवचन 16:24) l शब्दों का सकारात्मक प्रभाव हमारे स्वास्थ्य तक सिमित नहीं है : जब हम शिक्षा की बुद्धिमत्ता पर मन लगाते हैं, तो हम अपने प्रयासों में समृद्ध होने की अधिक सम्भावना रखते हैं (पद.20) l इसलिए बहुत अधिक प्रोत्साहन हमें उन चुनौतियों के लिए प्रोत्साहित करता है, जिनका सामना हम अभी करते हैं और भविष्य में सामना कर सकते हैं l 

हम अभी तक पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं कि क्यों और कैसे ज्ञान और प्रोत्साहन हमारे दैनिक जीवन में शक्ति और उपचार लाते हैं l फिर भी हमारे माता-पिता, कोच, और सहकर्मी का प्रोत्सहन और मार्गदर्शन हमें कठिनाई में स्थिर रहने और हमें सफलता की ओर अग्रसर होने में मदद करता है l इसी तरह, बाइबल हमें प्रोत्साहित करता है जब हम परीक्षाओं का सामना करते हैं, जिससे हम सबसे अकल्पनीय परिस्थितियों का सामना करने के लिए सज्जित होते हैं l परमेश्वर, आप अपनी बुद्धि से हमें मजबूत करें और बदले में, हम उन लोगों को “अनुग्रहपूर्ण शब्दों” की चंगाई और आशा प्रदान करें जिन्हें आपने हमारे जीवन में रखा है l 

परमेश्वर को ढूँढ़ना

जबकि यह ईमानदारी से कुछ सांसारिक मूल्य की तलाश करने के लिए अच्छा हो सअपने सपनों का पीछा करने में लोगों के जुनून और समर्पण को देखना प्रेरणादायक है l एक युवा महिला ने जिसे मैं जानता हूँ हाल ही में अपनी पी.एच.डी. एक वर्ष में पूरी कर ली – एक कार्य जिसने सम्पूर्ण समर्पण ले लिया l एक मित्र एक विशेष कार चाहता था, तो उसने अपने लक्ष्य तक पहुँचने तक केक बेक करके उन्हें बेचने का काम किया l एक और व्यक्ति जो बिक्री(sales) के व्यवसाय में है प्रति सप्ताह सौ नए लोगों से मिलने की इच्छा रखता है l 

कता है, वहाँ एक और अधिक महत्वपूर्ण प्रकार की तलाश है जिसे हमें विचार करना चाहिए l 

हताशा में, मरुभूमि में संघर्ष करते हुए, राजा दाऊद ने लिखा, “हे परमेश्वर, तू मेरा परमेश्वर है, मैं तुझे यत्न से ढूँढूँगा” (भजन 63:1) l जब दाऊद ने उसे पुकारा, परमेश्वर उस थके हुए राजा के निकट आया l परमेश्वर के लिए दाऊद की गहरी आत्मिक प्यास उसकी उपस्थिति में ही संतुष्ट हो सकती थी l राजा ने परमेश्वर से उसके “पवित्रस्थान” में मुलाकात को याद किया (पद.2), उसके सम्पूर्ण विजय देनेवाले प्रेम का अनुभव किया (पद.3), और दिन-प्रतिदिन उसकी प्रशंसा करना – उसी में सच्ची संतुष्टि पाना जो एक पूर्ण और संतोषजनक भोजन का आनंद लेने के विपरीत नहीं है (पद.4-5) l रात में भी उसने परमेश्वर की महानता पर विचार किया, उसकी सहायता और सुरक्षा को पहचाना (पद.6-7) l 

आज पवित्र आत्मा हमें परमेश्वर को ईमानदारी से खोजने के लिए विवश करता है l जब हम उससे लिपटे रहते हैं, परमेश्वर सामर्थ्य और प्रेम में अपने शक्तिशाली दाहिने हाथ से हमें ऊपर थामे रहता है l आत्मा की अगुवाई द्वारा, हम सभी अच्छी चीजों के निर्माता के करीब आएँ l