
बहत सुन्दर
जब हाईलैंड पार्क, मिशिगन की सड़कों की लाइटें हटा दी गयीं, तो लोगों की तीव्र इच्छा के कारण एक अन्य प्रकाश श्रोत को वहाँ जगह मिल गयी अर्थात् सूर्य l संघर्ष कर रहे शहर के पास जनोपयोगी(utility) सेवा कंपनी को भुगतान करने के लिए धन की कमी थी l बिजली कंपनी ने सड़क की लाइटें बन्द कर दीं और 1,400 बिजली के खम्बों से लाइटबल्ब हटा दिए l इससे निवासी असुरक्षित और अँधेरे में रह गए l एक निवासी ने समाचार समूह को बताया, “अभी कुछ बच्चे स्कूल जा रहे हैं l कोई रोशनी नहीं है l उन्हें केवल सड़क पर चलने का खतरा मोल लेना है l”
यह तब बदल गया जब कस्बे में सौर ऊर्जा से चलने वाली स्ट्रीट लाइटें लगाने के लिए एक गैर-लाभकारी(non-profit) समूह का गठन हुआ l एक साथ काम करते हुए, मानवतावादी संगठन(humanitarian organization) ने एक प्रकाश श्रोत को सुरक्षित करते हुए ऊर्जा बिलों पर शहर का पैसा बचाया, जिससे निवासियों की ज़रूरतों को पूरा करने में मदद मिली l
मसीह में हमारे जीवन में, हमारा भरोसेमंद प्रकाश श्रोत स्वयं यीशु, परमेश्वर का पुत्र है l जैसा कि प्रेरित यूहन्ना ने लिखा, “परमेश्वर ज्योति है और उसमें कुछ भी अंधकार नहीं”(1 यूहन्ना 1:5) l यूहन्ना ने कहा, “यदि जैसा वह ज्योति में है, वैसे ही हम भी ज्योति में चलें, तो एक दूसरे से सहभागिता रखते हैं, और उसके पुत्र यीशु का लहू हमें सब पापों से शुद्ध करता है”(पद.7) l
यीशु ने स्वयं घोषणा की, “जगत की ज्योति मैं हूँ; जो मेरे पीछे हो लेगा वह अंधकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा”(यूहन्ना 8:12) l हमारे हर पग पर परमेश्वर के पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के साथ, हम कभी भी अन्धकार में नहीं चलेंगे l उसका प्रकाश हमेशा तेज़ चमकता रहता है l

आशीषित पश्चाताप
जब मेरी दोस्त(और उसके पति) को संतान नहीं हो रहा था, तो डॉक्टरों ने उसे चिकित्सीय प्रक्रिया की सलाह दी l लेकिन मेरी दोस्त हिचकिचा रही थी l “क्या प्रार्थना हमारी समस्या को ठीक करने के लिए पर्याप्त नहीं होनी चाहिए?” उसने कहा l “क्या मुझे वास्तव में यह प्रक्रिया करने की ज़रूरत है?” मेरी दोस्त यह जानने का प्रयास कर रही थी कि परमेश्वर को कार्य करते देखने में मानवीय क्रिया की क्या भूमिका है l
यीशु द्वारा भीड़ को खाना खिलाने की कहानी यहाँ हमारी सहायता कर सकती है(मरकुस 6:35-44) l हम जान सकते हैं कि कहानी कैसे समाप्त होती है——हजारों लोगों को आश्चर्यजनक ढंग से बस थोड़ी सी रोटी और कुछ मछली से खाना खिलाया जाता है(पद.42) l लेकिन ध्यान दें कि भीड़ को खाना खिलाने वाला कौन हैं? शिष्य(पद.37) l और भोजन कौन उपलब्ध कराता है? वे ऐसा करते हैं(पद.38) l भोजन कौन वितरित करता है और बाद में सफाई कौन करता है? शिष्य(पद.39-43) l यीशु ने कहा, “तुम ही उन्हें खाने को दो”(पद.37) l यीशु ने चमत्कार किया, लेकिन यह शिष्यों के आचरण के अनुसार हुआ l
एक अच्छी फसल परमेश्वर की ओर से उपहार है(भजन सहिंता 65:9-10), लेकिन फिर भी एक किसान को भूमि पर काम करना पड़ता है l यीशु ने पतरस से प्रतिज्ञा की कि तुम “मछली” पकड़ोगे लेकिन मछुए को फिर भी अपना जाल डालना पड़ा(लूका 5:4-6) l परमेश्वर पृथ्वी की देखभाल कर सकता है और हमारे बिना आश्चर्य कर सकता है लेकिन आम तौर पर ईश्वर और मानव की भागीदारी में काम करता है l
मेरी दोस्त इस प्रक्रिया से गुज़री और बाद में सफलतापूर्वक गर्भवती हो गयी l हालाँकि यह किसी आश्चर्यकर्म का फार्मूला नहीं है, यह मेरी दोस्त और मेरे लिए एक सबक था l परमेश्वर अक्सर अपना आश्चर्यकर्म उन तरीकों के द्वारा करता है जो उसने हमारे हाथों में सौंपे हैं l

स्थायी आशा
मैं एक साथी लेखिका को फॉलो कर रही हूँ और उसके लिए प्रार्थना कर रही हूँ जो अपनी कैंसर यात्रा के बारे में ऑनलाइन पोस्ट कर रही है l वह बारी-बारी से अपने शारीरिक दर्द और चुनौतियों के बारे में अपडेट साझा करती है और पवित्रशास्त्र और परमेश्वर की स्तुति के साथ प्रार्थना अनुरोध साझा करती है l उसकी साहसी मुस्कान देखना सुन्दर है चाहे वह अस्पताल में इलाज का इंतजार कर रही हो या घर पर बनडाना(bandana-चमकीला रंगीन कपड़े का रुमाल जो गले या सिर में पहना जाता है) पहनी हुए हो क्योंकि उसके बाल झड़ रहे हैं l प्रत्येक चुनौती के साथ, वह दूसरों को आजमाइशों के दौरान परमेश्वर पर भरोसा करने के लिए प्रोत्साहित करने से कभी नहीं चूकती l
जब हम कठिनाइयों से गुज़र रहे होते हैं, तो आभारी होने और परमेश्वर की स्तुति करने का कारण ढूढ़ना चुनौतीपूर्ण हो सकता है l हालाँकि, भजन सहिंता 100 हमें हमारी परिस्थितियों के बावजूद खुश होने और परमेश्वर की स्तुति करने का कारण देता है l भजनकार कहता है : “निश्चय जानो कि यहोवा ही परमेश्वर है ! उसी ने हम को बनाया, और हम उसी के हैं; हम उसकी प्रजा, और उसकी चराई की भेड़ें हैं”(पद.3) l वह आगे कहता है, “क्योंकि यहोवा भला है, उसकी करुणा सदा के लिए, और उसकी सच्चाई पीढ़ी पीढ़ी तक बनी रहती है”(पद.5) l
हमारी आजमाइश चाहे जो भी हो, हम यह जानकार आराम पा सकते हैं कि परमेश्वर हमारे टूटे हुए हृदयों के निकट है(34:18) l जितना अधिक समय हम परमेश्वर के साथ प्रार्थना और बाइबल पढ़ने में बिताएंगे, उतना ही अधिक हम “फाटकों से धन्यवाद, और उसके आँगनों में स्तुति करते हुए प्रवेश [कर सकेंगे]” और “उसका धन्यवाद [कर सकेंगे], और उसके नाम को धन्य [कह सकेंगे]”(100:4) l हम “यहोवा का जयजयकार” कर सकते हैं(पद.1) यहाँ तक कि और शायद विशेष रूप से तब जब हम किसी कठिन समय में हों क्योंकि हमारा परमेश्वर विश्वासयोग्य है l

चरित्र परिवर्तन
परिवार सत्रहवीं सदी के व्याकरणविद्(grammarian-व्याकरण जाननेवाला) डॉमिनिक बहॉर्स के बिस्तर के आसपास इकठ्ठा हुआ, जो मृत्यु शय्या पर था l जब उन्होंने अंतिम साँसें लीं, कहते हैं कि उन्होंने कहा, “मैं मरने वाला हूँ या मैं मरने जा रहा हूँ; कोई भी अभिव्यक्ति सही है l” अपनी मृत्यु शय्या पर व्याकरण की परवाह कौन करेगा? एक मात्र वही व्यक्ति जिसने जीवन भर व्याकरण की परवाह की l
जब तक हम बुढ़ापे तक पहुँचते हैं, हम काफी हद तक अपने तरीकों में तैयार को चुके होते हैं l हमारे पास अपने विकल्पों को उन आदतों में बदलने के लिए जीवन भर का समय रहा होगा जो अच्छे या बुरे चरित्र में बदल(calcify) जाती है l हम वही हैं जो बनने के लिए हमने चुना है l
जब हमारा चरित्र युवा और लचीला है तो ईश्वरीय आदतें विकसित करना आसान होता है l पतरस आग्रह करता है, “तुम सब प्रकार का यत्न करके अपने विश्वास पर सद्गुण, और सद्गुण पर समझ, और समझ पर संयम, और संयम पर धीरज, और धीरज पर भक्ति और भक्ति पर भाईचारे की प्रीति और भाईचारे की प्रीति पर प्रेम बढ़ाते जाओ”(2 पतरस 1:5-7) l इन गुणों का अभ्यास करें, और “तुम हमारे प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु मसीह के अनंत राज्य में बड़े आदर के साथ प्रवेश करने पाओगे”(पद.11) l
पतरस की सूची में कौन से गुण आपमें सबसे अधिक जीवित हैं? किन गुणों पर अभी भी काम रहने की ज़रूरत है? हम वास्तव में नहीं बदल सकते जो हम बन गए हैं, लेकिन यीशु बदल सकता है l उससे आपको बदलने और सशक्त बनाने के लिए कहें l यह एक धीमी, कठिन यात्रा हो सकती है, लेकिन यीशु हमें वही देने में माहिर है जिसकी हमें ज़रूरत है l उससे अपने चरित्र को बदलने के लिए कहें ताकि आप अधिक से अधिक उसके जैसे बन सकें l
