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Articles by डेविड रोपर

चंगाई के लिए प्रकट किया

मैंने अपने पिता को अछूते खेतों की जुताई करते देखा है। हल का फल पहले चक्कर में बड़े पत्थरों की ढुलाई करता। मिट्टी तोड़ने के लिए वह खेत पर बार-बार हल चलाते, और हर चक्कर में हल अन्य छोटे पत्थरों को निकाल लाता जिन्हें वह अलग फेंक देते।  यह प्रक्रिया चलती रहती जिसमे खेत के कई चक्कर लग जाते थे।

अनुग्रह का बढ़ना इसी प्रक्रिया के समान है। जब हम पहली बार विश्वास करते हैं, तो कुछ "बड़े" पाप खुलते हैं जिनका अंगीकार करके हम परमेश्वर की क्षमा स्वीकार करते हैं। परंतु जब परमेश्वर का वचन धीरे-धीरे हमारे भीतरी अस्तित्व में गढ़ता है, पवित्र आत्मा अन्य पापों से पर्दा उठाती है। कभी छोटी भूल रहीं-महत्वहीन गलतियां-बदसूरत विनाशकारी और रूखे काम लगने लगते हैं। पाप जैसे अभिमान, आत्मदया, कुडकुडाना, तुच्छपन, पूर्वाग्रह, बैर और आत्म-सेवा।

परमेश्वर हमारे पापों को प्रकट करते हैं, इन्हें हम से दूर करने के लिए। जिससे वह हमें चंगाई दे सकें। जब हमारी दबी घातक मानसिकता प्रकट होती है तो भजनकार दाऊद के समान हम प्रार्थना कर सकते हैं, “हे यहोवा अपने नाम के निमित्त...(भजन संहिता 25:11)। विनम्र अनावरण भले ही पीड़ादायक हों, पर आत्मा के लिए अच्छे होते हैं। यह “पापियों की अगुवाई अपने मार्गो पर” करने का उनका तरीका है। वह पापियों को अपना मार्ग...(भजन 25:8-9)।

अधिग्रहण या अनुग्रह

छुट्टियों मनाकर घर लौटकर मेरे मित्र आर्ची ने देखा कि उसके पड़ोसी ने एक बाड़ लगाई थी जो उसकी जमीन की सीमा के पांच फुट अंदर थी। उसने हफ्तों कोशिश की, बाड़ हटवाने में मदद करने और लागत बांट लेने की भी पेशकश की, परंतु, पड़ोसी नहीं माना। आर्ची नागरिक प्राधिकारी से अपील कर सकता था। परंतु अपने पड़ोसी को परमेश्वर की कृपा दिखाने के लिए उसने ऐसा न करने का निर्णय किया।

“आर्ची डरपोक है”! आप कहेंगे। नहीं। वह ताकतवर व्यक्ति है। परन्तु उसने अधिग्रहण के उपर अनुग्रह को चुना।

पशु बढ़ जाने के कारण अब्राहम और लूत के बीच झगड़ा हो गया था। तब अब्राहम और लूत...(उत्पत्ति 13:7)। लूत ने उत्तम तराई को चुना और अंत में सब कुछ गवा दिया। अब्राहम ने बचे खुचे को चुना और वायदे का देश पाया (12-17)।

हमारे अधिकार होते हैं और हम उनकी मांग कर सकते हैं। विशेषकर जब दूसरों के अधिकार की बात हो। कभी-कभी हमें उन पर ज़ोर भी देना चाहिए। महायाजक के व्यवस्था के विरूद्ध जाने पर पौलुस ने भी यही किया (प्रेरितों के काम 23:1-3)। परंतु संसार को एक बेहतर तरीका दिखाने के लिए हम अधिकारों को छोड़ने का चुनाव कर सकते हैं। इसे बाइबिल दुर्बलता  नहीं “विनम्रता” कहती है जो परमेश्वर के नियंत्रण की ताकत है।

उनकी आवाज को सुनना

मैं ऊंचा सुनता हूं-"एक कान से बहरा और दूसरे से नहीं सुन सकता" जैसा मेरे पिता कहा करते थे। इसलिए मैं कान में हिअरिंग एड पहनता हूं। लेकिन आस-पास बहुत शोर हो,  तो  यह हर ध्वनी पकड़ लेता है और मैं अपने सामने वाले व्यक्ति को नहीं सुन पाता।

हमारी संस्कृति के साथ भी ऐसा है: ध्वनियों की कर्कशता में परमेश्वर का धीमा शब्द डूब सकता है।

मेरे हियरिंग एड में एक ऐसी सेटिंग है जो आस पास की ध्वनियों को काटकर मुझे केवल वह आवाज सुनाती है जिसे मैं सुनना चाहता हूं। अपने चारों ओर शोर होते हुए भी यदि हम मन शांत करें और सुनें,  तो परमेश्वर का “दबा हुआ धीमा शब्द” सुन सकेंगे (1 राजा 19:11–12)।

वह प्रतिदिन हमें पास बुला कर हमसे बात करते हैं, हमारी व्याकुलताओं और लालसाओं में, हमारे गहन दुःख में और हमारे अधूरेपन में और हमारे सबसे बड़े आनंद व असंतोष में।

मुख्य रुप से परमेश्वर हमसे अपने वचन द्वारा बात करते हैं। बाइबिल पड़ कर आप उनके शब्द को सुन सकेंगे। वह आपसे प्रेम करते हैं, जितना आप समझ पाएं उससे भी अधिक, और उनकी इच्छा यही है कि आप वह सुने जो वे आपसे कहना चाहते हैं।

ठीक अपने पिता के समान

मैंने अपने पिता के पुराने जूतों को जिन्हें वे घुडसवारी के समय पहनते थे, अपने अध्ययन कक्ष के फर्श पर रखा है, जो मुझे ऱोज याद दिलाते हैं कि वे कैसे व्यक्ति थे।

अन्य कामों के साथ, वह घोड़ों को पालते और उन्हें प्रशिक्षित करते थे। उन्हें काम करते देख मुझे अच्छा लगता और आश्चर्य होता था कि वह कैसे इतना कुछ कर लेते थे। बचपन में, मैं उन्हीं के समान बनना चाहता था। अब मैं अस्सी वर्ष से ऊपर हूँ, और उनके जूते भरने के लिए मेरे पाँव आज भी बहुत छोटे हैं।

अब मेरे पिता स्वर्ग में हैं, परन्तु मुझे एक और पिता का अनुसरण करना है। उनकी भलाई और प्रेम की सुगन्ध से भर कर मैं उनके समान बनना चाहता हूँ। परन्तु भरे जाने के लिए उनके जूते मेरे लिए बहुत बड़े हैं।

प्रेरित पतरस ने यह कहा: “अब परमेश्वर...आप ही तुम्हें सिद्ध और स्थिर और बलवन्त करेगा।” (1 पतरस 5:10)।

हमारी कमियां, हमें हमारे स्वर्गीय पिता के समान बनने से रोकती हैं। इस जीवन में तो हम उनके स्वरूप को इतनी अच्छी तरह से नहीं दिखा पाते, परन्तु स्वर्ग में हमारे पाप और दुःख नहीं रहेंगे और तब हम उनके तेजस्वी रूप को पूर्णतः प्रकट कर सकेंगे! “परमेश्वर का सच्चा अनुग्रह” यही है। (पद 12)

नम्रता

जीवन की परेशानियाँ हमें चिड़चिड़ा और तुनक मिजाज बना देती है, किन्तु हमें ऐसे बुरे आचरण से बार-बार होनेवाले प्रभाव से बचना चाहिए, क्योंकि ये हमारे प्रेमियों के हृदयों के उत्साह को कम करके हमारे चारों ओर दुःख फैलाते हैं l अगर हम दूसरों के प्रति मनोहर नहीं हैं हमनें अपना कर्तव्य पूरा नहीं किया l

नया नियम उस सद्गुण के लिए नम्रता  शब्द उपयोग करता है जो हमारे मनमुटाव को ठीक कर सकता है, अर्थात् जो एक दयालू और अनुग्रहकारी हृदय को दर्शाता है l इफिसियों 4:2 हमें याद दिलाता है , “सारी दीनता और नम्रता सहित, ... एक दूसरे की सह लो l”

नम्रता  दूसरों के प्रति क्रोध प्रगट किये बगैर अपनी सीमाओं और पीड़ाओं को स्वीकार करने की इच्छा है l यह सबसे छोटी सेवा के लिए धन्यवादित होना है, और जिन्होंने हमारी अच्छी तरह सेवा नहीं की उनको सहन करना है l यह तंग करनेवालों को विशेषकर शोर मचानेवालों, उपद्रवी बच्चों को सहन करने की शक्ति देती है; क्योंकि बच्चों के प्रति दयालुता दिखाना भले और नम्र लोगों के जीवनों का उत्तम चिन्ह है l यह उत्तेजना का सामना नम्रता से करता है l यह शांत भी रह सकता है l  शांति के लिए, कठोर शब्दों का उत्तर अचल शांति से देना सर्वोत्तम है l

यीशु “नम्र और मन में दीन है” (मत्ती 11:29) l यदि हम उससे कहते हैं, वह ठीक समय में हमें अपने स्वरुप में बदल देगा l स्कॉटलैंड का लेखक जॉर्ज मैकडॉनल्ड कहता है, हमने दूसरों को परेशान किया, जिससे दूसरों को दुःख हुआ l परमेश्वर हमारे अन्दर की ऐसी आवाज़ नहीं सुनना चाहता है . . . यीशु ऐसे पापों से और सभी पापों से हमें छुड़ाने आया l”

हृदय का वास्तविक घर

हमारे पास कई वर्षों तक एक ख़ास जाति की शिकारी कुतिया थी l ये छोटे कुत्ते कठोर होते हैं, और बिज्जू के बिल में घुसकर “शत्रु” से लड़ते हैं l हमारी कुतिया अपनी मूल जाति से अनेक पीढ़ी अलग थी, किन्तु उसमें वह प्रवृति थी, जो अनेक बार प्रजनन करने का परिणाम था l एक बार वह हमारे पिछवाड़े में एक पत्थर के नीचे किसी ‘जंतु” के धुन में लगी रही l कुछ भी उसे रोक न सकता था l उसने चट्टान के नीचे खोद-खोद कर गहरा गड्ढा बना दिया l

अब इस प्रश्न पर ध्यान दें : क्यों हम मनुष्य पाने की कोशिश में लगे रहते हैं? हम उन पर्वतों पर जिस पर कोई चढ़ा न हो क्यों चढ़ते हैं, खड़ी ढाल पर क्यों फिसलना पसंद करते हैं? कठिन और खतरनाक तेज़ दौड़ क्यों दौड़ते हैं, प्रकृति की प्रभाव को चुनौती क्यों देते हैं? उसका एक भाग रोमांच और मौज-मस्ती की इच्छा है, किन्तु यह इससे कहीं अधिक है l यह परमेश्वर की ओर से सहज ज्ञान है जो हम मनुष्यों में है l हम परमेश्वर को खोजे बिना रह नहीं सकते l

जी हाँ, हम वह जानते नहीं हैं l हम केवल जानते हैं कि हम कुछ चाहते हैं l “मार्क ट्वेन ने कहा, “आप जानते नहीं कि आपको क्या चाहिए, किन्तु आप उसकी बेहद इच्छा रखते हैं चाहे इसके लिए जान भी चली जाए l”

हमारे हृदय का वास्तविक घर परमेश्वर है l जिस तरह फादर अगस्टीन एक प्रसिद्ध कथन में कहते हैं : “हे प्रभु, आप ने हमें अपने लिए रचा है, और आप में विश्राम पाने तक हमारे हृदय बेचैन रहेंगे l”

और हृदय क्या है? एक गहरा खालीपन जिसे केवल परमेश्वर ही भर सकता है l

धीरज धरें

हमारे पीछे के आँगन में मकोय(Cherry)का एक पुराना पेड़ है जिसने अच्छे दिन देखे थे और अब मर रहा था, इसलिए मैंने पेड़ों में नयी जान डालनेवाले विशेषज्ञ को बुलाया l उसने जांच करके बताया कि वह पेड़ “अत्यंत थकान” में है और उसे तुरंत देख-रेख चाहिए l “धीरज रखो,” मेरी पत्नी, करोलिन जाते हुए उस पेड़ से बुदबुदाई l वह एक कठिन सप्ताह था l

वास्तव में, हम सब के पास चिंता भरे सप्ताह होते हैं-जिसमें हम अपनी संस्कृति को उद्देश्य से दूर जाते हुए अथवा अपने बच्चों के विषय, हमारे विवाह, व्यवसाय, धन, व्यक्तिगत सेहत और सुख के विषय चिंतित होते हैं l फिर भी, यीशु ने हमें भरोसा दिया है कि अशांत करनेवाली परिस्थितियों के बावजूद हम शांति से रह सकते हैं l उसने कहा, “मैं ... अपनी शांति तुम्हें देता हूँ” (यूहन्ना 14:27) l

यीशु के दिन संकट और अव्यवस्था से भरे थे : उसके शत्रुओं ने उसे घेरा और उसके  परिवार और मित्रों ने उसे गलत समझा l अक्सर उसके पास सिर रखने को जगह न थी l इसके बावजूद उसके अंदाज में चिंता अथवा अप्रसन्नता के संकेत नहीं थे l उसके अन्दर आन्तरिक स्थिरता और शांति थी l अतीत, वर्तमान, और भविष्य के विषय-उसने हमें इसी प्रकार की शांति दी है  l उसने अपनी  शांति प्रगट की है l

किसी भी स्थिति में, चाहे वह कितनी भी खौफ़नाक अथवा मामूली हो, हम प्रार्थना में यीशु की ओर मुड़ सकते हैं l हम उसकी उपस्थिति में अपनी चिंता और भय उसको बता सकते हैं l और, पौलुस हमें भरोसा देता है कि परमेश्वर की शांति हमारे “हृदय और [हमारे] विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी” (फ़िलि. 4:7) l “उस प्रकार का कोई सप्ताह” होने के बावजूद, हमेंउसकी  शांति मिल सकती है l

प्रकृति देखभाल

बड़ी भूरी ट्राउट मछलियाँ शरद ऋतू की अपनी क्रियापद्धति अनुसार ओविही नदी में अंडे दे रही हैं l आप उन्हें छिछले कंकरीले जल में अपना घोंसला बनाते देख सकते हैं l

बुद्धिमान मछुए यह जानकार कि मछलियाँ अंडे पर हैं उन्हें परेशान नहीं करते l अंडे न दब जाएँ, वे कंकरीली जगहों पर पाँव नहीं रखते अथवा अण्डों के स्थान से धारा के प्रतिकूल नहीं जाते जहाँ पथरीले टुकड़े बिखरकर अण्डों को दबा न दें l और मछली पकड़ने के प्रलोभन के बावजूद, वे घोंसलों के निकट ट्राउट मछलियों का शिकार नहीं करते हैं l

ये बचाव जिम्मेदार मछली पकड़ने की नियम नीतियाँ हैं l किन्तु और गंभीर और बेहतर कारण भी हैं l

वचन कहता है कि परमेश्वर ने हमें पृथ्वी दी है (उत्पत्ति 1:28-30) l यह हमारे उपयोग के लिए है, किन्तु हम इससे प्रेम करनेवाले की तरह इसका उपयोग करें l

मैं परमेश्वर के हाथों के कार्यों पर विचार करता हूँ : एक तीतर का घटी में बोलना, एक बारहसिंघा का लड़ाई आरंभ करना, दूर एक हिरन का झुण्ड, एक ट्राउट मछली और रंग बदलते उसके गुलाबी बच्चे, झरने में अपने बच्चों के साथ खेलती हुई एक माता उदबिलाऊ -मैं इनको पसंद करता हूँ, क्योंकि मेरे पिता ने अपने महान प्रेम में इन्हें मेरे आनंद के लिए मुझे दिए हैं l

और जिनसे मैं प्रेम करता हूँ, उनकी सुरक्षा भी करता हूँ l

परमेश्वर को देखना

लेखक और पासवान इरविन लूज़र एक टेलेविज़न कार्यक्रम में मेज़बान आर्ट लिंकलेटर और एक छोटे बच्चे की परमेश्वर की तस्वीर बनाने की कहानी बताते हैं l लिंकलेटर, खुश होकर, बोले, “तुम नहीं बना पाओगे क्योंकि कोई नहीं जानता कि परमेश्वर कैसा है l”

“मेरे बनाने के बाद वे जान जाएंगे!” बच्चे ने कहा l

हम सोच सकते हैं, परमेश्वर कैसा है? क्या वह अच्छा है, दयालु है, चिंता करता है?  फिलिप्पुस के निवेदन पर यीशु का प्रतिउत्तर इसका उत्तर था : “हे प्रभु, पिता को हमें दिखा दे l” यीशु ने उत्तर दिया, “हे फिलिप्पुस, मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूँ, और क्या तू मुझे नहीं जानता? जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है” (यूहन्ना 14:8-9) l

परमेश्वर को देखने की कभी इच्छा हो तो यीशु को देखें l “वह तो अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप है,” पौलुस ने कहा (कुलुस्सियों 1:15) l मत्ती, मरकुस, लूका, और यूहन्ना, चारों सुसमाचार पढ़कर यीशु के कार्य और वचन पर ध्यान दें l “पढ़ते समय अपने परमेश्वर का दिमागी चित्र “बनाएं l” पूरा पढ़ने के बाद, वह कैसा है, आप बहुत कुछ जान जाएंगे l

एक बार मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा कि यीशु में दिखाई देनेवाले एकमात्र परमेश्वर में ही वह विश्वास करता है l निकट से देखने पर आप भी मानेंगे l उसके विषय पढ़ने पर आपका हृदय बहुत खुश होगा, क्योंकि यद्यपि आप जानते नहीं, यीशु ही वह परमेश्वर है जिसे आप सम्पूर्ण जीवन खोज रहें हैं l