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Articles by डेविड रोपर

आराम से कर सकते हैं

मेरे पिता और मैं पेड़ों को काटते थे और दो मुठ वाले आरा से उन्हें नाप में काटते थे l युवा और ऊर्जावान होने के नाते, मैंने आरी को काटने के लिए मजबूर करने की कोशिश की l “आराम से कर सकते हो,” मेरे पिता कहते थे l “आरी को काम करने दो l”
मैं फिलिपिन्स में पॉल के शब्दों के विषय सोचता हूँ : “यह परमेश्वर ही है जो आप में काम करता है” (2:13) l आराम से कर सकते हैं l उसे हमें बदलने का काम करने दें l
सी.एस. ल्युईस ने कहा कि मसीह ने जो कहा था उसे पढ़ने और करने की तुलना में विकास कहीं अधिक है l उन्होंने समझाया, “एक वास्तविक व्यक्ति, मसीह, . . . आपके लिए कार्य कर रहा है . . . धीरे-धीरे आपको स्थायी रूप से  . . . एक नए छोटे मसीह में बदल रहा है, एक प्राणी जो . . . उसकी सामर्थ्य, आनंद, ज्ञान और अनंतता में भागीदारी करता है l
परमेश्वर आज उस प्रक्रिया को पूरा कर रहा है l यीशु के चरणों में बैठें और जो कुछ वह कहना चाहता है उसे ग्रहण कर लें  l प्रार्थना करें l “अपने आप को परमेश्वर के प्रेम में बनाए रखें” (यहूदा 1:21), खुद को दिन भर याद दिलाते रहें कि आप उसके हैं l इस आश्वासन में विश्राम करें कि वह धीरे-धीरे आपको बदल रहा है l
“लेकिन क्या हमें धार्मिकता की भूख और प्यास नहीं लगनी चाहिये? आप पूछेंगे l मन में कल्पना करें कि एक छोटा बच्चा एक ऊंचे ताखे पर से एक उपहार उठाने का प्रयास कर रहा है, प्राप्त करने की इच्छा के साथ उसकी आँखें चमक रही हैं l उसके पिता उसकी इच्छा को भांपते हुए, उपहार को उतार कर उसे दे देता है l
कार्य परमेश्वर का है; आनंद हमारा है l आराम से कर सकते हैं l हम किसी दिन वहां पहुँचेंगे l

असफल लकड़हारा

एक साल जब मैं कॉलेज में था, मैं जलाऊ लकड़ी काटता, बेचता, और पहुंचाता था l यह एक कठिन काम था, इसलिए मेरे पास 2 राजा 6 की कहानी में अभागे लकड़हारे के लिए सहानुभूति है l  

एलिशा का नबियों का समूह समृद्ध हुआ था, और उनके मिलने की जगह बहुत छोटी हो गयी थी l किसी ने सुझाव दिया कि वे जंगल में जाएँ, लकड़ी का कुंदा काटें, और अपनी सुविधाओं को बढ़ाएं l एलिशा सहमत हुआ और कार्यकर्ताओं के साथ गया l काम ठीक चल रहा था जब तक कि किसी की कुल्हाड़ी पानी में न गिर गयी (पद.5) l 

कुछ लोगों ने सुझाव दिया है कि एलिशा केवल अपनी छड़ी से पानी में टटोलता रहा जब तक कि उसने पता न लगा लिया और फिर उसे खींच कर निकाल लिया l हालाँकि, यह शायद ही ध्यान देने योग्य होगा l नहीं, वह एक आश्चर्यकर्म था : परमेश्वर के हाथों ने उस कुल्हाड़ी को गति प्रदान की और वह तैरने लगा ताकि वह व्यक्ति उसे प्राप्त कर सके (पद.6-7) l 

इस साधारण आश्चर्यकर्म में एक गहरा सच है : परमेश्वर जीवन की छोटी चीजों की परवाह  करता है – खोई हुए कुल्हाड़ियाँ, खोयी हुयी चाबी, खोए हुए चश्मे, खोए हुए फोन – छोटी चीजें जो हमारे लिए खीज का कारण बनती हैं l जो खो जाता है, उन सभी को वह बहाल नहीं करता है, परन्तु वह समझता है और हमारे संकट में हमें आराम देता है l 

हमारे उद्धार के आश्वासन के आगे, परमेश्वर की देखभाल की निश्चयता ज़रूरी है l इसके बिना हम असंख्य चिंताओं के संपर्क में संसार में अकेला महसूस करेंगे, l यह जानना अच्छा है कि वह परवाह करता है और हमारी हानि से दुखित होता है – चाहे वे कितनी ही छोटी हों l हमारी चिंताएं उसकी चिंताएं हैं l 

गरजनेवाला चूहा

कई साल पहले मैंने और मेरे बेटों ने पहाड़ों पर एक जंगल में कैम्पिंग करके कुछ दिन गुज़ारे l 

यह स्थान एक टाइगर रिज़र्व था, लेकिन हमने किसी भी अप्रिय मुठभेड़ से बचने के लिए यथासंभव सुरक्षित रहने की कोशिश की l 

एक शाम, आधी रात में, मैंने सुना मानो रोहित, मेरा बेटा अपने डेरे से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है l मैंने अपनी टोर्च उठाकर उसे चालु कर दिया, इस अपेक्षा से कि वह वास्तविक खतरे में है l 

वहाँ, अपने कूबड़ पर सीधा बैठा और हवा में अपने पंजे लहराता हुआ, लगभग 4 इंच “ऊँचा एक चूहा था l उसने मजबूती से अपने दाँतों से रोहित की टोपी पकड़े हुए था l उस छोटे प्राणी ने पूरी ताकत से रोहित की टोपी खींचकर उसके सिर से उतार ली l जब मैं हँसा, वह चूहा टोपी गिराकर रफूचक्कर हो गया l हम वापस अपने तम्बू में चले गए l मैं, हालाँकि, पूरी तरह जागा रहा, और सो न सका और एक और लुटेरा – शैतान – के बारे में सोचता रहा l 

शैतान द्वारा यीशु की परीक्षा पर विचार करें (मत्ती 4:1-11) l उसने पवित्रशास्त्र से परीक्षाओं का सामना किया l प्रत्येक उत्तर के साथ, यीशु ने खुद को याद दिलाया कि परमेश्वर ने इस मुद्दे पर बात की थी और इसलिए वह अवज्ञा नहीं करेगा l इससे शैतान भाग गया l 

हालाँकि शैतान हमें खा जाना चाहता है, यह याद रखना अच्छा है कि वह उस छोटे क्रितंक(कुतरने वाला जानवर) की तरह रचा गया प्राणी है l यूहन्ना ने कहा, “जो [हममें] है वह उस से जो संसार में है बड़ा है” ( 1 यूहन्ना 4:4) l 

मिट्टी का पुराना बरतन

मैंने वर्षों में कई पुराने मिट्टी के बरतन प्राप्त किये हैं l मेरा पसंदीदा बर्तन अब्राहम के समय के एक जगह से खुदाई में निकला था l यह मेरे घर की कम से कम एक वस्तु है जिसकी उम्र मुझसे अधिक है! देखने के लिए इसमें ज्यादा कुछ नहीं है : दाग लगा हुआ, फूटा हुआ, खंडित, और जिसे साफ़ करने की ज़रूरत है l मैं इसे याद दिलाने के लिए रखता हूँ कि मैं मिट्टी से बना केवल एक मनुष्य हूँ l हालाँकि नाजुक और कमजोर, मेरे अन्दर  एक अनमोल कीमती खजाना है – यीशु l हमारे पास यह खजाना [यीशु] मिट्टी के बरतनों में रखा है” (2 कुरिन्थियों 4:7) l 

पौलुस जारी रखता है : “हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, पर संकट में नहीं पड़ते; निरुपाय तो हैं, पर निराश नहीं होते; सताए तो जाते हैं, पर त्यागे नहीं जाते; गिराए तो जाते हैं, पर नष्ट नहीं होते” (पद.8-9) l चारों ओर से क्लेश भोगना, निरुपाय होना, सताया जाना, गिराया जाना l ये वे दबाव हैं जिन्हें उस बरतन को बर्दाश्त करना है l संकट में नहीं पड़ते, निराशा नहीं होते, त्यागा नहीं जाते, नष्ट न होते l ये हम में यीशु की प्रतिकार शक्ति के प्रभाव हैं l 

“हम यीशु की मृत्यु को अपनी देह में हर समय लिए फिरते हैं” (पद.10) l यह वह आचरण है जो यीशु की विशेषता है जो हर दिन खुद के प्रति मर गया l और यह वह दृष्टिकोण है जो हमारी पहचान बन सकती है – जो हम में रहता है उसकी पूरी क्षमता पर भरोसा करते हुए, आत्म-प्रयास के प्रति मरने की इच्छा l 

“कि यीशु का जीवन भी हमारी देह में प्रगट हो” (पद.10) l यही परिणाम है : एक पुराने मिट्टी के बर्तन में दिखाई देने वाली यीशु की सुन्दरता l 

एक अभिकल्पित कमी

एक प्राकृतिक झरना है जो यरूशलेम शहर के पूर्व की ओर से निकलता है l प्राचीन काल में यह शहर की एकमात्र जलापूर्ति थी और दीवारों के बाहर स्थित थी l इस प्रकार यह यरूशलेम की सबसे बड़ी भेद्यता (vulnerability) का बिंदु था l खुले झरने का मतलब था कि शहर, अन्यथा अभेद्य, आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर किया जा सकता था यदि एक हमलावर झरने की दिशा बदल देता या उसे बाँध देता l

राजा हिजकिय्याह ने शहर में 1,750 फीट ठोस चट्टान के अन्दर से एक सुरंग बनवाकर, झरना को नगर के जलाशय में पहुंचाकर इस परेशानी को दूर किया (देखें 2 राजा 20:20; 2 इतिहास 32:2-4) l लेकिन इन सब में, हिजकिय्याह ने “उसके कर्ता को स्मरण नहीं किया, जिसने प्राचीनकाल से उसको ठहरा रखा था[उसकी योजना बनायी थी]” (यशायाह 22:11) l क्या योजना बनायी थी?

यरूशलेम शहर को परमेश्वर ने इस तरह “नियोजित” किया था कि उसकी पानी की आपूर्ति असुरक्षित थी l दीवार के बाहर झरना एक निरंतर ताकीद था कि शहर के निवासियों को अपने उद्धार के लिए पूरी तरह से परमेश्वर पर निर्भर होना चाहिए l

क्या यह हो सकता है कि हमारी कमियाँ हमारे भले के लिए मौजूद हों? निसंदेह, प्रेरित पौलुस ने कहा कि वह अपनी कमजोरियों में “घमण्ड” करेगा, क्योंकि इस कमजोरी के द्वारा ही यीशु की सुन्दरता और सामर्थ्य उस में दिखाई देती थी (2 कुरिन्थियों 12:9-10) l क्या तब हम प्रत्येक कमजोरी को एक उपहार के रूप में मान सकते हैं जो परमेश्वर को हमारी सामर्थ्य के रूप में प्रकट करता है?

सड़क जिस पर यात्रा नहीं की गयी हो

लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या मेरे पास पंचवर्षीय योजना है l जिस सड़क पर मैंने कभी यात्रा नहीं की है, मैं पांच साल “आगे” की योजना कैसे बना सकता हूँ?

मैं मुड़कर 1960 के दशक में देखता हूँ जब मैं सैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में विद्यार्थी के मध्य पासबान था l मैं कॉलेज में भौतिक शिक्षा में विशेषता प्राप्त करने गया था और बहुत आनंद किया था, परन्तु मैं विद्वता हासिल नहीं कर सका l अपनी नयी जिम्मेदारी में मैंने खुद को अयोग्य महसूस किया l अधिकाँश दिन मैं परिसर में घूमता रहा, अँधेरे में एक अंधे आदमी की तरह टटोलते हुए, परमेश्वर से पूछता रहा कि मुझे क्या करना है l एक दिन एक विद्यार्थी “अनपेक्षित रूप से” मुझ से अपनी बिरादरी में एक बाइबल अध्ययन में अगुवाई करने को कहा l यही आरम्भ था l

परमेश्वर एक मोड़ पर खड़े होकर रास्ता नहीं बताता है : वह मार्गदर्शक हैं, कोई संकेतचिन्ह नहीं l वह हमारे साथ चलता है, उन रास्तों पर ले चलता है जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी l केवल हमें उसके साथ-साथ चलना है l

मार्ग सरल नहीं होगा; मार्ग में “कठिन स्थान” भी होंगे l  किन्तु परमेश्वर ने वादा किया है कि वह “अंधियारे को उजियाला” में बदल देगा और हमें “कभी न [त्यागेगा]” (यशायाह 42:16) l वह पूरे रास्ते हमारे साथ रहेगा l

पौलुस कहता है कि परमेश्वर “हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक काम कर सकता हैं” (इफिसियों 3:20) l हम योजना बना सकते हैं और कल्पना कर सकते हैं, परन्तु हमारे प्रभु की कल्पना हमारी योजनाओं से परे है l हमें उन्हें बंधनमुक्त रखना चाहिए और देखना चाहिए कि परमेश्वर के मन में क्या है l

यहाँ फिसलन है!

वर्षों पहले, जब मैं स्की(बर्फ पर फिसलना) करना सीख रहा था, मैंने नीचे की ओर दिखाई देनेवाले हलके ढलान पर अपने बेटे जोश का पीछा किया l उसपर नज़र रखते हुए मैं उसे देख न सका कि वह पहाड़ पर सबसे खड़ी ढाल पर मुड़ गया, और मैं खुद को पूरी तरह से अनियंत्रित उस ढलान पर डगमगाते हुए पाया l अवश्य ही, मैं निराश हुआ l

भजन 141 दर्शाता है कि किस तरह हम सरलता से पाप के ढलान पर खुद को फिसलते हुए पाते हैं l प्रार्थना उन ढलानों में सतर्क रहने का एक तरीका है : “मेरा मन किसी बुरी बात की ओर फिरने न दे” (पद.4) एक निवेदन है जो लगभग वास्तव में प्रभु की प्रार्थना को प्रतिध्वनित करता है: “और [मुझे] परीक्षा में न ला, परन्तु [मुझे] बुराई से बचा” (मत्ती 6:13) l अपनी भलाई में, परमेश्वर इस प्रार्थना को सुनता है और उसका उत्तर देता है l

और उसके बाद मैं इस भजन में अनुग्रह का एक और कारक पाता हूँ : एक विश्वासयोग्य मित्र l “धर्मी मुझ को मारे तो यह कृपा मानी जाएगी, और वह मुझे ताड़ना दे, तो यह मेरे सिर पर का तेल ठहरेगा; मेरा सिर उससे इन्कार न करेगा” (भजन 141:5) l परीक्षाएं छली होती हैं l हम हमेशा सतर्क नहीं होते हैं कि हम गलत कर रहे हैं l एक सच्चा मित्र निष्पक्ष हो सकता है l “जो घाव मित्र के हाथ से लगें वह विश्वासयोग्य हैं” (नीतिवचन 27:6) l डांट स्वीकार करना कठिन है, परन्तु यदि हम चोट लगने को “भलाई” के रूप में देखते हैं यह अभ्यंजन बन सकता है जो हमें पुनः आज्ञाकारिता के पथ पर ला देता है l

हम एक भरोसेमंद मित्र की ओर से सच्चाई के प्रति तैयार रहें और प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर पर निर्भर रहें l  

रोटी और मछली

एक युवक चर्च से घर पहुंचकर बड़ी उत्तेजना के साथ बोला कि आज का पाठ एक युवा के विषय था जो “पूरे दिन इधर उधर घूमा और मछली पकड़ा l” निसन्देह, वह, उस छोटे लड़के के विषय सोच रहा था जिसने यीशु को रोटी और मछली दी थी l

यीशु पूरे दिन भीड़ को शिक्षा दे रहा था, और शिष्यों की राय थी कि वह उन्हें रोटी खरीदने के लिए गाँव में भेज दे l यीशु ने उत्तर दिया, “तुम ही इन्हें खाने को दो” (मत्ती 14:16) l शिष्य घबरा गए क्योंकि 5,000 से भी अधिक लोगों को भोजन खिलाने की बात थी!

आप बाकी कहानी जानते होंगे : एक लड़के ने अपना भोजन दिया – पांच छोटी रोटियाँ और दो मछली – और यीशु ने उससे भीड़ को खिला दिया (पद.13-21) l एक विचार के अनुसार लड़के ने उदारता दिखाकर सरलता से भीड़ में अन्य लोगों को अपना भोजन साझा करने को प्रेरित किया, परन्तु मत्ती चाहता है कि हम समझें कि वह एक आश्चर्यक्रम था, और यह कहानी चारों सुसमाचारों में मिलती है l

हम क्या सीख सकते हैं? परिवार, पड़ोसी, मित्रगन, सहयोगी, और दूसरे हमारे चारों ओर विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं में होते हैं l क्या हम उनको अपनी योग्यता से बड़े लोगों के पास भेज दें? बिलकुल, कुछ लोगों की ज़रूरतें हमारी सहायता करने की योग्यता से अधिक हैं, लेकिन हमेशा नहीं l जो भी आपके पास है – सीने से लगाना, एक दयालु शब्द, सुनने वाला कान, छोटी प्रार्थना, कुछ बुद्धिमत्ता जो आपके पास है – यीशु को दे दें और देखें वह क्या कर सकता है l

आनंद के साथ खेलना

मेरा एक बेटा ब्रायन, हाई स्कूल बास्केटबॉल कोच है l एक साल, जब उसकी टीम वाशिंगटन स्टेट बास्केटबॉल टूर्नामेंट के दौरान बॉल को आगे की तरफ ले जाने की कोशिश कर थी, शहर के नेक-नियत लोगों ने पूछा, “क्या तुम लोग पूरे वर्ष जीतोगे?” दोनों ओर के खेलाड़ी और कोच तनावग्रस्त हो गए, इसलिए ब्रायन ने एक आदर्श-वाक्य(motto) अपना लिया : “आनंद के साथ खेलें!”

मैंने इफिसुस के प्राचीनों से कहे गए पौलुस के शब्दों पर विचार किया : “कि मैं अपनी दौड़ को [प्रेम के साथ] पूरी करूँ” (प्रेरितों 20:24) उसका लक्ष्य उस सेवा कार्य को पूरी करना था जिसे यीशु ने उसे दिया था l मैंने इन शब्दों को अपना आदर्श वाक्य और अपनी प्रार्थना बना  ली है : “मैं भी अपनी दौड़ को आनंद के साथ पूरी कर सकूँ l” या जिस प्रकार ब्रायन कहता है, “मैं भी आनंद के साथ खेल सकूँ!” और बहरहाल, ब्रायन की टीम ने उस वर्ष स्टेट चैंपियनशिप जीत ली l

हममें से हर एक के पास चिड़चिड़ा होने के लिए सारे अच्छे कारण हैं : संसार की खबरें, दैनिक तनाव, स्वास्थ्य समस्याएँ l तिस पर भी, यदि हम उससे मांगते हैं, परमेश्वर हमें ऐसा आनंद दे सकता है जो इन परिस्थितियों से आगे जाती है l हम उसे पा सकते हैं जिसे यीशु ने कहा, “मेरा आनंद” (यूहन्ना 15:11) l

आनंद यीशु की आत्मा का फल है (गलातियों 5:22) l इसलिए हम प्रति भोर याद से उससे सहायता मांगे : “मैं आनंद से खेल सकूँ!” लेखक रिचर्ड फोस्टर ने कहा, “प्रार्थना करना बदलना है l यह महान अनुग्रह है l परमेश्वर कितना भला है जो एक मार्ग बनाता है जहाँ आनंद हमारे जीवन पर अधिकार कर लेता है l