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Articles by डेविड रोपर

अंधकार में दबी हुई हँसी

वाशिंगटन पोस्ट  अख़बार में “Tech Titans’ Latest Project: मृत्यु को चुनौती दें, नामक एक लेख में अराइना छा ने मानव जीवन को अनिश्चित काल तक बढ़ाने पर पीटर थील और दूसरे तकनिकी बादशाहों के प्रयास बताती है l वे इस परियोजना पर अरबों खर्च करना चाहते हैं l  

उन्होंने थोड़ी देर कर दी l मृत्यु हार चुकी है! यीशु ने कहा, “पुनरुत्थान और जीवन मैं हूँ; जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए तौभी जीएगा, और जो कोई जीवित है और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनंतकाल तक न मरेगा” (यूहन्ना 11:25-26) l यीशु हमें आश्वस्त करता है कि उसमें विश्वास करनेवाले किसी भी परिस्थिति में कभी नहीं मरेंगे l

बात यह है, हमारे शरीर मर जाएंगे-और यह बदला नहीं जा सकता l किन्तु हमारे व्यक्तित्व के रोमांचक हिस्से, सोच, विवेक बुद्धि, स्मरण करना, प्रेम करना, जिसे हम “मुझको, खुद, और मैं” कहते हैं कभी नहीं मरेंगे l

और यहाँ सर्वोत्तम है : यह एक उपहार है! आपको केवल यीशु का उद्धार स्वीकारना है l इस धारणा के विषय सी.एस. ल्युईस अपनी सोच में इसे “अंधकार में दबी हुई हँसी” कहते हैं-अर्थात् उत्तर इतना सरल है l

कुछ लोगों के अनुसार, “यह अत्यधिक  सरल है l” अच्छा, तो मैं कहता हूँ, यदि आपके जन्म से पूर्व परमेश्वर ने आपसे प्रेम किया और उसकी इच्छा है कि आप हमेशा उसके साथ रहें, तो वह इसे कठिन क्यों बनेएगा?

जहाँ आप हैं वहीं से आरम्भ करें

आज मैंने अपने खलिहान में एकलौता फूल देखा-एक छोटा बैगनी फूल “रेतीले स्थान में अपना मिठास बिखेरते हुए” कवि थॉमस ग्रे की खूबसूरत पंक्तियाँ हैं l निश्चित तौर पर इस ख़ास फूल को पहले किसी ने नहीं देखा था, और शायद आगे भी कभी नहीं देखेगा l यह ख़ूबसूरती ऐसी जगह क्यों? मैं विचारा l

प्रकृति बर्बाद नहीं होती l प्रतिदिन यह अपने सृष्टिकर्ता की सच्चाई, भलाई, और सुन्दरता दर्शाती है l प्रतिदिन प्रकृति परमेश्वर की महिमा को नए और निर्मल तरीके से प्रगट करती है l क्या मैं उसको उस खूबसूरती में देखता हूँ, अथवा उस पर सरसरी नज़र डालकर उसको नज़रन्दाज़ कर देता हूँ l

समस्त प्रकृति सृष्टिकर्ता की खूबसूरती फैलाती है l हमारा प्रतिउत्तर उपासना, प्रशंसा, और धन्यवाद हो सकता है-मक्के के फूल की चमक, सूर्योदय के प्रताप, और एक खास वृक्ष की बनावट के लिए l

सी.एस.ल्युईस गर्मी के एक दिन जंगल में टहलने का वर्णन करते हैं l उसने अभी-अभी अपने मित्र को परमेश्वर के प्रति धन्यवादी होना सिखाया था l उसके पैदल साथी ने निकट की एक छोटी नदी में जाकर झरने में अपना चेहरा और हाथ धोकर पुछा, “क्यों न इसी से आरंभ की जाए?” ल्युईस के अनुसार उसने उस क्षण एक महान सिद्धांत सिखा : “जहाँ आप हैं वहीं से आरम्भ करें l”

एक टपकती जलधारा, वृक्षों के मध्य बहती हवा, एक छोटी चिड़िया, एक छोटा फूल l  क्यों नहीं हम इनसे धन्यवाद आरंभ करें?

गर्जन और बिजली

कई वर्ष पूर्व मेरा मित्र और मैं ऊदबिलाव वाले तालाब में लगातार मछली पकड़ रहे थे जब बारिश शुरू हुई l हम निकट के सफ़ेद पीपल के पेड़ के जंगल में छिपने गए किन्तु बारिश होती रही l उन पेड़ों के हिलते पत्ते आवाज़ कर रहे थे l इसलिए हम उस स्थान को छोड़कर गुज़रते ट्रक को पुकारा l ट्रक का दरवाजा खोलते समय, आवाज़ के साथ बिजली उन पेड़ों पर गिरी जिससे उनके पत्ते और छाल निकल गए, और कुछेक डालियाँ सुलगती रहीं l और  तब शांति हो गई l

हम विचलित हुए और डर गए l

हमारे आइडहो घाटी में बिजली चमकती है और गर्जना होता है l बाल-बाल बचने पर भी- मुझे पसंद है l मुझे यह प्राकृतिक शक्ति पसंद है l वोल्टेज! टकराव! आश्चर्य और विस्मय! पृथ्वी और जो कुछ उसमें है थरथराती है और कांपती है l और फिर शांति l

मुझे बिजली और गर्जन पसंद है क्योंकि ये परमेश्वर की आवाज़ के संकेत हैं (अय्यूब 37:4), वचन द्वारा विस्मयकारक, प्रबल आवाज़ में बोलना l “यहोवा की वाणी आग की लपटों को चीरती है ... यहोवा अपने प्रजा को बल देगा; यहोवा अपनी प्रजा को शांति की आशीष देगा” भजन 29:7,11) l वह हमें सहने की, धीरज धरने की, दयालुता की, शांत रहने की, उठकर जाने की, और कुछ हानि नहीं करने की शक्ति देगा l

शांति का परमेश्वर आपके साथ हो l

यों ही दयालुता के कार्य

कुछ लोगों के अनुसार अमरीकी लेखिका ऐन हर्बर्ट ने 1982 में एक रेस्टोरेंट में मेजपोश पर यों ही यह वाक्यांश लिख दी “यों ही भलाई और खूबसूरती के अर्थहीन काम करें l” उस समय से यह मनोभाव फिल्म और साहित्य द्वारा लोकप्रिय बनाया गया है और हमारे शब्दावली का हिस्सा बन गया है  l

प्रश्न उठता है “क्यों?” हम दया क्यों दिखाएं? यीशु के अनुयायियों के लिए, उत्तर स्पष्ट है : परमेश्वर की करुणा और दयालुता प्रकट करने हेतु l

यह सिद्धांत पुराने नियम की मोआब की एक प्रवासिन, रूत, की कहानी में है l वह विदेशी एक अपरिचित देश में रहती थी जिसकी भाषा और संस्कृति उस से परे थी l इसके अतिरिक्त, वह बहुत निर्धन थी, लोगों के दान पर निर्भर जो उसकी सुधि कम ही लेते थे l

हालाँकि, एक इस्राएली ने रूत पर अनुग्रह करके उसके हृदय को छुआ (रूत 2:13) l वह उसे अपने खेत में अनाज बीनने दिया, किन्तु सरल उपकार से बढ़कर, उसने अपनी सहानुभूति द्वारा परमेश्वर की कोमल करुणा प्रकट की, जिसकी छाया में वह आश्रय पा सकती थी l वह बोअज की दुल्हन बनी, परमेश्वर के परिवार का हिस्सा, और उस वंसज का एक भाग जिससे यीशु था, जो संसार के लिए उद्धार लेकर आया (देखें मत्ती 1:1-16) l

हमें नहीं मालुम कि यीशु के नाम में दया के एक कार्य का क्या परिणाम हो सकता है l

अल्प निद्रा

एक अन्य युग के स्कॉटलैंड के पास्टर, हेनरी दर्बनविले, स्कॉटलैंड के एक सुदूर इलाके में रहनेवाली अपनी ही कलीसिया की एक वृद्ध महिला के विषय बताते हैं l वह एडिनबर्ग शहर देखना चाहती थी, किन्तु उस लम्बे, अँधेरे  सुरंग से भय खाती थी जिसमें से होकर ट्रेन जाती थी l  

एक दिन, हालाँकि, अवस्था ने उसे एडिनबर्ग जाने को मजबूर किया, और ट्रेन तेज गति से शहर की ओर चली जिससे उसकी घबराहट बढ़ गई l किन्तु ट्रेन के सुरंग में पहुँचने से पूर्व उसकी आँख लग गई और वह गहरी नींद में सो गई l जागने पर उसने खुद को शहर में पाया!

यह संभव है कि हम सब मृत्यु का अनुभव नहीं करेंगे l यीशु के लौटने पर यदि हम जीवित रहेंगे, हम “हवा में प्रभु से [मिलेंगे]” (1 थिस्स. 4:13-18) l किन्तु हममें से अनेक मृत्यु द्वारा प्रभु से मिलेंगे और यह विचार बहुत घबराहट पैदा करती है l हमारी चिंता है कि मृत्यु की प्रक्रिया सहना बहुत कठिन है l

अपने उद्धारकर्ता यीशु के आश्वासन द्वारा हमें भरोसा है कि पृथ्वी पर अपनी आँखें बंद करके मृत्यु से गुजरने पर हम परमेश्वर की उपस्थिति में अपनी आँखें खोलेंगे l “हमारी अल्प निद्रा पश्चात हम अनंत में जागेंगे,” जॉन डॉन कहते हैं l

स्थायी दयालुता

मैं बचपन में एल. फ्रैंक बौम की लैंड ऑफ़ ओज़ पुस्तकों का उत्साही पाठक था l हाल ही में मुझे रिंकीटिंक इन ओज़  समस्त मूल कलाकृतियों के साथ मिली l मैं पुनः बौम के अदम्य, दयालु राजा रिंकीटिंक की व्यवहारिक भलाइयों पर हँसा l युवराज इंगा उत्तम वर्णन करता है : “उसका हृदय दयालु और कोमल है और यह बुद्धिमान होने से बेहतर है l”

किनता सरल और विवेकपूर्ण l फिर भी हमारे किसी प्रिय का हृदय किस ने कठोर शब्द से नहीं दुखाया है? ऐसा करके, हम उस समय की शांति और सुख में विघ्न डालकर   अपने प्रेमियों से की गई भलाइयों को बिगाड़ते हैं l  “एक छोटी सी दयाहीनता एक बड़ी गलती है,” 18 वीं शताब्दी के अंग्रेजी लेखक हैना ने कहा l

और यहाँ खुसखबरी है : कोई भी दयालु हो सकता है l शायद हम प्रेरणादायक उपदेश, कठिन प्रश्नों का हल न दे सकें, अथवा बहुतों को सुसमाचारित न कर सकें, किन्तु दयालु हो सकते हैं l

कैसे? प्रार्थना द्वारा l यही हमारे हृदयों को नम्र बना सकता है l “हे यहोवा, मेरे मुख पर पहरा बैठा, मेरे होठों के द्वार की रखवाली कर! मेरा मन किसी बुरी बात की ओर फिरने न दें” (भजन 141:3-4) l

संसार, जहाँ प्रेम ठंडा हो गया हैं, हमारे द्वारा दूसरों के समक्ष परमेश्वर के हृदय से निकलने वाली दयालुता सबसे अधिक सहायक और चंगा करने वाली होगी l

लाल शिखा/कलगी

अनेक वर्ष पूर्व, मैं ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी के एक यूनानी लेखक के मछली पकड़ने के ज्ञान सम्बन्धी एक लेख के कुछ अंश से चकित हुआ l “बोरोका और थिस्सलुनीके के बीच एस्त्राकस नदी है, जिसमें चितकबरी त्वचा वाली ट्राउट मछलियाँ हैं l” फिर वह “मछलियों के लिए फंदा, जिससे उनको अच्छी और अधिक मछलियाँ मिलती हैं, बताता है l वे दो पंखों के साथ सुर्ख लाल ऊन एक कांटे में लगाते हैं l फिर वे अपने फंदे को पानी में फेंकते हैं, और मछलियाँ रंग से आकर्षित होकर ऊपर आकर खाना चाहती हैं” (ऑन द नेचर ऑफ़ एनिमल्स) l

मछुआरे आज भी यह आकर्षण उपयोग करते हैं l इसे लाल शिखा/कलगी कहते हैं l 2,200 वर्ष पूर्व उपयोगी फंदा “अधिक ट्राउट मछलियाँ पकड़ने में” आज भी उपयोगी है l

उस प्राचीन लेख को पढ़कर मैंने सोचा : समस्त पुरानी बातें अप्रचलित नहीं हुई गईं हैं-विशेषकर लोग l यदि संतुष्ट और आनंदित वृद्धावस्था द्वारा हम परमेश्वर की परिपूर्णता और गहराई दर्शाते हैं, हम अपने जीवन के अंत तक उपयोगी रहेंगे l वृद्धावस्था गिरते स्वास्थ्य, पूर्व अवस्था पर केन्द्रित हों ज़रूरी नहीं है l यह परमेश्वर के साथ वृद्ध होनेवालों का फल अर्थात् शांतचित्तता और आनंद और साहस और दयालुता से भरपूर हो सकता है l

“वे यहोवा के भवन में रोपे जाकर, ... पुराने होने पर भी फलते रहेंगे, और रस भरे और लहलहाते रहेंगे” (भजन 92:13-14) l

एक कठिन पहाड़

हमारे घर आइडाहो के उत्तर में पर्वतों की जुगहैंडल चोटी की परत में ऊपर एक हिम झील है l इस झील तक का मार्ग शिलाखंडों और अलग-अलग पत्थरों के बीच खड़ी चढ़ाई, और खुला संकरा ऊंचा भाग है l यह प्रचंड चढ़ाई है l

हालाँकि, चढ़ाई के आरंभ में, एक छोटी नदी है-एक जल-श्रोत जो मुलायम, काईदार धरती से निकलकर हरे-भरे मैदान के बीच से बहती है l यह आगे की कठिन चढ़ाई के लिए संतुष्ट होने तक जल पीने का स्थान और तैयारी है l

मसीही जीवन पर जॉन बनयन की उत्कृष्ट कृति, द पिल्ग्रिम्स प्रोग्रेस, में मसीही पहाड़ कठिनाई नामक, एक खड़ी चढ़ाई के निकट पहुँचता है, “जिसके नीचे एक सोता था ... मसीही अब उस सोते तक गया और तरोताज़गी हेतु जल पीया, और तब पहाड़ पर चढ़ने लगा l”

शायद आपके लिए कठिन पहाड़ एक विद्रोही बच्चा या एक गंभीर चिकित्सीय रोग की पहचान हो सकती है l चुनौती आपके सहन से बाहर दिखती है l

अपने अगले मुख्य कार्य का सामना करने से पूर्व, तरोताज़गी के सोता परमेश्वर से मिलें l

अपने समस्त कमजोरी, थकान, बेकसी, भय और शंका के साथ उसके पास आएँ l तब उसकी

सामर्थ्य, ताकत, और बुद्धिमत्ता का पान करें l परमेश्वर आपकी समस्त परिस्थितियाँ जानता है और आत्मिक शक्ति और धैर्य का अत्यधिक सुख देगा l वह आगे बढ़ने हेतु आपके सिर को ऊँचा

करके सामर्थ्य देगा l

अवस्था दर अवस्था

बाइबिल में गिनती 33 ऐसा अध्याय है जिसपर हम चिंतन किये बगैर शायद आगे बढ़ जाना चाहेंगे l यह मिस्र में रामसेस से मोआब के मैदान तक इस्राएलियों के पहुँचने तक की यात्रा के दौरान स्थानों की एक लम्बी सूची है l यह विशेष है क्योंकि यह गिनती में एकमात्र स्थल है जिसके पहले ये शब्द लिखे हैं : “मूसा…

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आप नहीं हैं

दाऊद ने योजना बनायी, फर्नीचर अभिकल्पित किया, सामग्री इकट्ठा किया, समस्त प्रबंध किया (देखें 1 इतिहास 28:11-19) l किन्तु यरूशलेम का प्रथम मंदिर दाऊद का नहीं, सुलेमान का मंदिर कहलाता है l

क्योंकि परमेश्वर ने कहा था, “तू घर बनवाने न पाएगा” (1 इतिहास 17:4) l परमेश्वर दाऊद के पुत्र सुलेमान को मंदिर बनाने के लिए चुना था, इस इनकार का प्रतिउत्तर अनुकरणीय था l वह परमेश्वर के कार्य पर केन्द्रित रहा (पद.16-25) l उसकी आत्मा धन्वादित थी l उसने सम्पूर्ण प्रयास किया और मंदिर बनाने में योग्य लोगों से सुलेमान की मदद करवायी (देखें 1 इतिहास 22) l

बाइबिल टीकाकार जे. जी, मेक्कोन्विल ने लिखा : “अक्सर हमें स्वीकार करना होगा कि मसीही सेवा के रूप में जो कार्य हम करना पसंद करेंगे, वो नहीं है जिसके लिए हम योग्य हैं, और जिसके लिए परमेश्वर हमें बुलाया है l यह दाऊद की तरह हो सकता है, कार्य का आरंभ, जो भविष्य में और भी भव्य होगा l

दाऊद ने अपनी नहीं, परमेश्वर की महिमा खोजी l उसने परमेश्वर के मंदिर के लिए विश्वासयोग्यता से सब कुछ किया, उसके लिए एक मजबूत नींव डाला जो उसके बाद कार्य को संपन्न करनेवाला था l काश हम भी, उसी तरह, परमेश्वर का चुना हुआ कार्य धन्यवादी हृदय से करें! जाहिर है कि हमारा प्रेमी परमेश्वर  “अधिक भव्य” ही करेगा l

उसका अद्भुत चेहरा

मेरा चार वर्षीय बेटा जिज्ञासु है और निरंतर बातें करता है l मुझे उससे बातें करना पसंद है, किन्तु वह अपनी पीठ मेरी ओर करके बातें करने की खेदजनक आदत बना ली है l मैं अक्सर कहती हूँ, “मैं तुम्हारी सुन नहीं सकती-कृपया मेरी ओर देखकर बातें करो l”

कभी-कभी परमेश्वर हमसे भी यही कहता है-इसलिए नहीं कि वह सुन नहीं सकता, किन्तु हम वास्तव में “उसे देखे बिना” उससे बातचीत करना चाहते हैं l हम प्रार्थना करते समय अपने प्रश्नों में उलझकर और स्वकेन्द्रित रहकर, भूल जाते हैं किससे प्रार्थना कर रहे हैं l मेरे बेटे की तरह, हम उसकी ओर केन्द्रित हुए बिना प्रश्न करते हैं जिससे हम बातचीत कर रहे हैं l

हम, परमेश्वर कौन है और उसने क्या किया है, के विषय खुद को याद दिलाकर अपने अनेक चिंताओं को संबोधित कर सकते हैं l केवल पुनः केन्द्रित होकर, ही हम उसके चरित्र को जानकर सुख पाते हैं : कि वह प्रेमी, क्षमाशील, प्रभु, और अनुग्रहकारी है l

भजनकार का विश्वास था कि हम परमेश्वर का मुख निरंतर निहारें (भजन 105:4) l  दाऊद द्वारा अगुओं को उपासना और प्रार्थना के लिए नियुक्ति पर, उसने लोगों को परमेश्वर के चरित्र की प्रशंसा करने और उसके पूर्व विश्वासयोग्यता की चर्चा करने को उत्साहित किया (1 इतिहास 16:8-27) l

परमेश्वर का खूबसूरत चेहरा निहारने पर, हम सामर्थ्य और सुख पाते हैं जो हमें हमारे अनुत्तरित प्रश्नों के मध्य भी संभालता हैं l

सुख का पलना

मेरी सहेली ने मुझे अपने चार दिन की बेटी को गोद में लेने का सौभाग्य दिया l बच्चावह मेरे गोद में आने के बाद ही हलचल करने लगा l मैंने उसे दुलारा, अपने गाल उसके सिर से लगाया, और उसे चुप करने के लिए हिलाते हुए एक गीत गुनगुनाने लगी l इन प्रयासों के साथ, दस वर्षों के अपने लालन-पालन अनुभव के बाद भी, मैं उसे शांत न कर सकी l मैंने उसे उसकी अधीर माँ के बाहों में डालने तक वह अत्यंत परेशान रही l तुरन ही वह शांत हो गई; उसका रोना बंद हो गया और उसकी बेचैनी उसके भरोसेमंद सुरक्षा में तब्दील हो गई l  मेरी सहेली अपनी बेटी को गोद लेना और उसकी परेशानी दूर करना जानती थी l

परमेश्वर अपने बच्चों को माता की तरह सुख देता है : कोमल, भरोसेमंद, और बच्चे को शांत करने में चिन्ताशील l हमारे थकित अथवा परेशान होने पर, वह हमें अपनी बाहों में उठाता है l हमारा पिता और सृष्टिकर्ता होकर, वह हमें निकटता से जानता है l “जिसका मन तुझ में धीरज धरे हुए है, उसकी तू पूर्ण शांति के साथ रक्षा करता है, क्योंकि वह तुझ पर भरोसा रखता है” (यशा. 26:3) l

जब हमें संसार का भारी बोझ दबाए, हम इस ज्ञान में सुख पाते हैं कि वह प्रेमी अभिभावक की तरह हमें अर्थात् अपने बच्चों को सुरक्षित रखता और उनके लिए लड़ता है l