परमेश्वर बुलाता है
एक सुबह मेरी बेटी ने अपने ग्यारह माह के बेटे को मनाने के लिए अपना मोबाइल फ़ोन दे दिया l तुरन्त मेरा फ़ोन बजा, और उसे उठाते साथ उसकी छोटी आवाज़ सुनाई दी l उससे मेरे नंबर का “स्पीड डायल” बटन दब गया था और उसके बाद अविस्मरणीय “बातचीत” आरंभ हुई l मेरा नाती थोड़े शब्द बोलता है, किन्तु मेरी आवाज़ पहचानकर मुझे उत्तर देता है l इसलिए मैंने उससे बात करके कहा कि मैं उसे बहुत प्यार करती हूँ l
अपने नाती की आवाज़ सुनकर प्राप्त आनंद मेरे लिए परमेश्वर का हमारे साथ सम्बन्ध रखने की गहरी इच्छा की ताकीद थी l आरंभ ही से, बाइबिल बताती है कि परमेश्वर हमें सक्रियतापूर्वक खोज रहा है l आदम और हव्वा का परमेश्वर की आज्ञा उल्लंघन पश्चात छिपने पर परमेश्वर ने आदम से पूछा, “तू कहाँ है?” (उत्प. 3:9) l
परमेश्वर निरन्तर यीशु के द्वारा मानवता को खोजता रहा l क्योंकि परमेश्वर हमारे साथ सम्बन्ध चाहता है, उसने यीशु को संसार में क्रूस पर उसकी मृत्यु द्वारा हमारे पापों का दंड चुकाने भेजा l “जो प्रेम परमेश्वर ... रखता है, वह इस से प्रगट हुआ ....कि उसने ...हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा” (1 यूहन्ना 4:9-10) l
यह जानना कितना अच्छा है कि परमेश्वर हमसे प्रेम करता है और चाहता है कि हम यीशु के द्वारा उसके प्रेम का प्रतिउत्तर दें l बोलने में हमारी असमर्थता के बावजूद, हमारा पिता हमसे सुनना चाहता है!
टूटेपन की ख़ूबसूरती
इन्तसुगी मिट्टी के टूटे बर्तनों की मरम्मत करने की शताब्दियों प्राचीन कला है l धूना के साथ स्वर्ण धूल मिलाकर टूटे टुकड़े जोड़े या दरार भरे जाते हैं, परिणाम असाधारण जोड़ l मरम्मत को छिपाने की जगह, कला टूटेपन को खूबसूरत बनाता है l
बाइबिल अनुसार पापों से वास्तविक प्रायश्चित करने पर परमेश्वर हमारे टूटेपन को महत्व देता है l दाऊद के बतशेबा से व्यभिचार करने और उसके पति की हत्या के बाद, नातान का उसका सामना करने पर, उसने मन फिराया l दाऊद की बाद की प्रार्थना हमारे पाप करने पर परमेश्वर की इच्छा के विषय अंतर्दृष्टि देती है : “तू मेलबलि से प्रसन्न नहीं होता, नहीं तो मैं देता; होमबलि से भी तू प्रसन्न नहीं होता l टूटा मन परमेश्वर के योग्य बलिदान है; हे परमेश्वर, तू टूटे और पिसे हुए मन को तुच्छ नहीं जानता” (भजन 51:16-17) l
पाप के कारण हमारे हृदय के दुःख में परमेश्वर उदारता से क्रूसित उद्धारकर्ता द्वारा अमूल्य क्षमा देता है l खुद को दीन करने पर वह हमें प्रेम से स्वीकारता है और निकटता पुनरस्थापित होती है l
अति करुणामयी परमेश्वर! उसके दीन हृदय और दयालुता की विस्मयकारी खूबसूरती की इच्छा के तहत, आज हमारी एक बाइबिल-सम्बन्धी प्रार्थना हो : “हे परमेश्वर, मुझे जांचकर ... परखकर मेरी चिंताओं को जान ले! ... कि मुझ में कोई बुरी चाल है कि नहीं, और अनंत के मार्ग में मेरी अगुवाई कर” (भजन 139:23-24) l
मार्ग ढूँढना
कैलिफोर्निया, सैंटा बारबरा, शहर में कुतूहल उत्पन्न करनेवाली एक सड़क है l उसका नाम है “सैल्सिप्युडेस,” अर्थात् “छोड़ सकते हो तो छोड़ दो l” सड़क के नामकरण के वक्त, वह क्षेत्र दलदल के किनारे था और कभी-कभी बाढ़ आती थी, और स्पेनी-भाषी नगर आयोजकों ने ठिकाने को सरल नाम देकर लोगों को उससे दूर रहने को चिताया l
परमेश्वर का वचन हमें पाप और परीक्षा के “गलत मार्ग” से दूर रहने को कहता है : “उसे छोड़ दे, उसके पास से भी न चल, उसके निकट से मुड़कर आगे बढ़ जा” (नीतिवचन 4:15) l किन्तु वचन केवल यह नहीं कहता “छोड़ सकते हो तो छोड़ दो l”वह हमें आश्वस्त करके सही मार्ग पर ले जाता है : “परमेश्वर सच्चा है और वह तुम्हें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में न पड़ने देगा, वरन् परीक्षा के साथ निकास भी करेगा कि तुम सह सको” (1 कुरिं. 10:13) l
प्रतिज्ञा कि परमेश्वर हमें सामर्थ्य से बाहर परीक्षा में नहीं पड़ने देगा एक उत्साहवर्धक ताकीद है l परीक्षा के समय परमेश्वर की ओर मुड़ते समय, हमें मालुम है कि वह हमें उससे दूर रखना चाहता है l
बाइबिल बताती है कि यीशु “हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी” होता है l” किन्तु वह “सब बातों में हमारे समान परखा तो गया, तौभी निष्पाप निकला” (इब्र.4:15) यीशु हर परीक्षा से निकलने का हल जानता है l उसकी ओर मुड़ने से वह हमें दिखाएगा l
अँधेरे में स्तुति
अपनी आखों की रोशनी जाते देख कर भी मेरा मित्र मिकी ने कहा, “मैं प्रतिदिन परमेश्वर की स्तुति करता रहूँगा, क्योंकि उसने मेरे लिए बहुत किया है l”
यीशु ने मिकी और हमें निरंतर स्तुति करने का परम कारण किया है l मत्ती 26 अध्याय हमें बताता है कि यीशु किस तरह क्रूसित होने से पूर्व अपने शिष्यों के साथ फसह का भोज खाया l पद 30 हमें भोज का अंत बताता है : “फिर वे भजन गाकर जैतून पहाड़ पर गए l”
यह भजन कोई और नहीं स्तुति का भजन था l हजारों वर्षों से, यहूदियों ने फसह के समय “हल्लेल” [Hallel] नमक भजनों का एक समूह गाते आएं हैं (इब्री भाषा में हल्लेल अर्थात “स्तुति” है l) भजन 113-118 में पायी जानेवाली प्रार्थनाएं और गीत हमारे उद्धारक परमेश्वर के आदर में है (118:21) l वह निकम्मा ठहराए गए पत्थर का सन्दर्भ देता है जो कोने का सिरा हो गया (पद. 22) और जो प्रभु के नाम में आता है (पद.26) l वे यह भी गा सकते थे, “आज वह दिन है जो यहोवा ने बनाया है; हम इसमें मगन और आनंदित हों” (पद.24) l
यीशु ने अपने शिष्यों के साथ स्तुति करके, हमें हमारे तात्कालिक स्थितियों से ऊपर नज़र उठाने का अंतिम कारण दे रहा था l वह हमारे परमेश्वर के अविरल प्रेम और विश्वासयोग्यता की प्रशंसा में अगुवाई कर रहा था l
हमेशा सुननेवाला
पिताजी कम बोलते थे l सेना में वर्षों तक ड्यूटी के दौरान सुनने की शक्ति कम होने पर वे सुनने का यंत्र लगाते थे l एक दिन जब मेरी माँ और मैं उनकी अपेक्षा से अधिक समय तक बातें करते रहे, उन्होंने मज़ाक किया, “शांति और आराम हेतु, मुझे केवल यही करना है l” उन्होंने सुननेवाले यंत्र बंद करके, सिर के पीछे दोनों हाथों को जोड़कर, धीरे से मुस्कराते हुए आँखें बंद कर लीं l
हम हँस दिए l जहाँ तक उनसे मतलब था, बातचीत ख़त्म हो चुकी थी!
मेरे पिता की उस दिन की क्रिया ने मुझे याद दिलाया कि परमेश्वर हमसे कितना भिन्न है l वह हमेशा हमारी सुनता है l हम बाइबिल की एक सबसे छोटी प्रार्थना से यह समझ जाते हैं l एक दिन फारस के राजा, अर्तक्षत्र का सेवक, नहेम्याह, राजा के समक्ष उदास दिखा l कारण पूछने पर, डरते हुए, नहेम्याह ने स्वीकारा कि उसके पुरखाओं का पराजित शहर, यरूशलेम, उजाड़ पड़ा है l नहेम्याह ने याद किया, “राजा ने मुझसे पूछा, ‘फिर तू क्या मांगता है?’ ”तब मैंने स्वर्ग के परमेश्वर से प्रार्थना करके , राजा से कहा ... l” (नहे. 2:4-5) l
परमेश्वर ने नहेम्याह की क्षणिक प्रार्थना सुन ली l इस प्रार्थना से यरूशलेम के लिए नहेम्याह की अन्य प्रार्थनाओं को परमेश्वर का करुणामय उत्तर मिला l उस क्षण, अर्तक्षत्र ने शहर के पुनर्निर्माण सम्बंधित नहेम्याह का निवेदन सुन लिया l
क्या यह जानना सुखकर नहीं कि परमेश्वर हमारी छोटी-बड़ी प्रार्थनाएँ सुनता है?
हमारा परम मित्र
बारह वर्ष की उम्र में, मेरा परिवार मरुभूमि क्षेत्र के एक शहर में रहने लगा l अपने स्कूल में, गर्म हवा में जिम कक्षाओं के बाद, हम दौड़ कर पानी पीने नल के पास भागते थे l अपनी कक्षा में दुबला और छोटा, मुझे पंक्ति से बाहर धकेल दिया जाता था l अपनी उम्र से बड़ा और ताकतवर मेरा मित्र, जोस, यह होते देखकर अपना एक बाँह आगे करके मेरे लिए जगह बना दिया l “सुनो!” वह चिल्लाया, “ बैंक्स को पहले पीने दो!” उसके बाद मुझे पानी पीने में परेशानी नहीं हुयी l
सीमा से परे दूसरों की दयाहीनता सहना यीशु जानता था l बाइबिल हमसे कहती है, “वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था” (यशा.53:3) l किन्तु यीशु केवल दुःख पीड़ित नहीं था, वह पक्षसमर्थक भी है l अपना जीवन देकर, यीशु ने हमारे लिए परमेश्वर के साथ सम्बन्ध में प्रवेश हेतु “[नया] और [जीवता] मार्ग” खोल दिया है (इब्रानियों 10:19) l उसने हमारे लिए वह किया जिसमें हम अक्षम थे l अपने पापों से पश्चाताप कर उस पर भरोसा करके हम उसके द्वारा उद्धार का मुफ्त उपहार पा सकते हैं l
यीशु हमारा सर्वोत्तम मित्र है l उसने कहा, “जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा” (यूहन्ना 6:37) l दूसरे हमें अपनी ताकत से संभालेंगे अथवा धकेल देंगे, किन्तु परमेश्वर ने क्रूस द्वारा हमारे लिए अपनी बाहें फैलायी है l हमारा उद्धारकर्ता कितना सामर्थी है!
प्रेम और पुरानी जूती
कभी-कभी हम दोनों पति-पत्नी एक दूसरे के वाक्य पूरी करते हैं l हम तीस वर्षों के वैवाहिक जीवन में एक दूसरे की सोच और बात करने से बहुत अधिक परिचित हैं l हमें किसी वाक्य को पूरा करने की ज़रूरत नहीं; केवल एक शब्द अथवा एक झलक किसी विचार को ज़ाहिर करने के लिए पर्याप्त है l
इसमें सुख है-एक जोड़ी पुरानी जूती की तरह जिसे आप पहनते हैं क्योंकि वे अच्छे से पैरों में आ जाती है l कभी-कभी हम एक दूसरे को प्रेमपूर्वक “मेरी पुरानी जूती” भी पुकारते हैं-ऐसा अभिनन्दन जिसे आप समझ नहीं पाएंगे यदि आप हमें अच्छी तरह जानते नहीं हैं l हमारे वर्षों के सम्बन्ध ने अभिव्यक्तियों के साथ अपनी एक भाषा बना ली है, जो दशकों के प्रेम और भरोसा का परिणाम है l
यह जानना सुखकर है कि परमेश्वर हमें गहरी अंतरंगता से प्रेम करता है l दाऊद ने लिखा, “हे यहोवा, मेरे मुँह में ऐसी कोई बात नहीं जिसे तू पूरी रीति से न जानता हो” (भजन 139:4) l यीशु के साथ एक शांत बातचीत की कल्पना करें जब आप उसे अपने हृदय की गहरी बातें बता रहें हों l बोलने में कठिनाई होने पर, वह परिचित होने की मुस्कराहट के साथ आपकी बाते पूरी करता है l कितना भला है कि परमेश्वर के साथ बातचीत में सही शब्दों की ज़रूरत नहीं होती! वह हमें समझने के लिए हमें पर्याप्त प्रेम करता और जानता है l
यीशु पर निर्भरता
कभी-कभी रात में अपनी तकिया पर सिर रखकर प्रार्थना करते वक्त मैं कल्पना करता हूँ जैसे मैं यीशु पर टिका हुआ हूँ l ऐसा करते समय मैं परमेश्वर के वचन में वर्णित प्रेरित यूहन्ना को स्मरण करता हूँ l यूहन्ना खुद के विषय लिखता है कैसे अंतिम भोज में वह यीशु के निकट था l “उसके चेलों में से एक जिससे यीशु प्रेम रखता था, यीशु ... की ओर झुका हुआ बैठा था” (यूहन्ना 13:23) l
यूहन्ना “[चेला] जिससे यीशु प्रेम रखता था” शब्दों का प्रयोग अपना नाम लिए बगैर अपने लिए करता है l वह प्रथम-शताब्दी इस्राएल का एक ख़ास भोज विन्यास दर्शाता है, जब मेज आज से नीचे, लगभग घुटने तक हुआ करता था l बिना कुर्सियों के मेज के चारों ओर चटाई अथवा गद्दियों पर बैठना स्वाभाविक था l यूहन्ना प्रभु के करीब बैठे हुए प्रश्न पूछते समय “यीशु की छाती की ओर झुका हुआ बैठा था” (यूहन्ना 13:23) l
उस समय यूहन्ना की यीशु से निकटता आज हमारे जीवनों के लिए एक उदाहरण है l हम यीशु को स्पर्श नहीं कर सकते किन्तु अपनी कठिनतम परिस्थितियाँ उसे सौंप सकते हैं l उसने कहा, “हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरी पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा” (मत्ती 11:28) l हमारे हर परिस्थिति में हमारे साथ विश्वासयोग्य रहनेवाला उद्धारकर्ता पाकर हम धन्य हैं! क्या आज आप उस पर “टिके हुए” हैं?
स्मरण रखें कब
हमारा बेटा नशीली दवाओं की लत से सात वर्षों तक संघर्ष करता रहा, और उन दिनों में मेरी पत्नी और मैं अनेक कठिन दिनों का अनुभव किये l जब हम उसकी आरोग्यता के लिए प्रार्थना करके ठहरे रहे, हमने छोटी-छोटी जीत का उत्सव मनाना सीखा l चौबीस घंटे में कुछ बुरा नहीं होने पर, हम एक दूसरे से बोलते, “आज का दिन अच्छा था l” यह छोटा वाक्य परमेश्वर की छोटी-से-छोटी सहायता के लिए धन्यवादी बनने की ताकीद बन गयी l
भजन 126:3 में परमेश्वर की कोमल करुणा की और बेहतर ताकीद है और वे हमारे लिए आख़िरकार क्या अर्थ रखते हैं : यहोवा ने हमारे साथ बड़े बड़े काम किये हैं; और इससे हम आनंदित हैं l” क्रूस पर यीशु की करुणा को स्मरण करते हुए यह पद हमारे लिए कितनी बड़ी ताकीद है! किसी भी प्राप्त दिन की कठिनाइयाँ इस सच्चाई को बदल नहीं सकती कि जो भी आए, हमारे प्रभु ने हमें अगम दयालुता दिखाई है, और “उसकी करुणा सदा की है” (भजन 136:1) l
कठिन परिस्थिति से निकलकर परमेश्वर की विश्वासयोग्यता अनुभव करने के बाद, हमें जीवन में आनेवाली कठिनाई में बहुत अधिक सहायता मिलती है l हमें यह ज्ञात नहीं परमेश्वर हमारी परिस्थिति में हमें कैसे ले चलेगा, किन्तु अतीत में उसकी करुणा हमें उसकी सहायता का भरोसा देता है l