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Articles by जॉन ब्लैस

अनुत्तरित प्रार्थनाएं

क्या हम वहां पहुँच गए  हैं? / अभी नहीं। / क्या हम अब वहां  पहुँच गए है? / अभी नहीं।  जब हमारे बच्चे छोटे थे, तब हम सोलह घंटे की घर वापसी की पहली (और निश्चित रूप से आखिरी नहीं) यात्रा पर खेले जाने वाले आगे-पीछे के खेल(back-and-forth game) खेले l  हमारे सबसे बड़े दो बच्चों ने खेल को जीवित और चलता हुआ रखा, और अगर हर बार उनके मांगने पर मेरे पास एक रुपया होता, तो सहज ही, मेरे पास रुपयों का ढेर होता। यह एक ऐसा सवाल था जिससे मेरे बच्चे आसक्त थे, लेकिन मैं (ड्राइवर) भी उतना ही आसक्त था और सोच रहा था, क्या हम वहां पहुँच गए  हैं? और जवाब था, अभी नहीं, लेकिन जल्द ही।

सच कहा जाए, तो अधिकांश वयस्क उस प्रश्न पर भिन्नता पूछ रहे हैं, हालाँकि हम इसे ज़ोर से नहीं बोल सकते। लेकिन हम इसे उसी कारण के लिए पूछ रहे हैं─ हम थके हुए हैं, और हमारी आंखें "शोक से [बैठ गयी हैं]” (भजन 6:7)। हम रात की ख़बरों से लेकर रोज़मर्रा की परेशानी से लेकर कभी न खत्म होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं से लेकर रिश्ते के तनाव तक हर चीज़ के बारे में हम “कराहते कराहते थक” चुके हैं (पद 6), और सूची जारी है। हम रोते हैं : “क्या हम वहां पहुँच गए  हैं? कब तक प्रभु, कब तक?”

भजनहार उस तरह की थकान को अच्छी तरह जानता था, और वह ईमानदारी से उस मुख्य प्रश्न को परमेश्वर के पास लेकर आया l एक देखभाल करने वाले माता-पिता की तरह, उसने दाऊद की पुकार सुनी और अपनी बड़ी दया से उन्हें स्वीकार किया (पद 9)। पूछने में कोई शर्म नहीं थी। इसी तरह, आप और मैं स्वर्ग में हमारे पिता के पास हमारी ईमानदार पुकार "कब तक?" और उसका उत्तर हो सकता है "अभी नहीं, लेकिन जल्द ही। मैं भला हूँ। मेरा यकीन करो।"

जीवित रहने तक दें

एक सफल व्यवसायी ने अपने जीवन के अंतिम कुछ दशक अपने विपुर संपत्ति को देने के लिए हर संभव प्रयास करते हुए बिताए। एक बहु अरबपति होकर, उन्होंने उत्तरी आयरलैंड में शांति लाने और वियतनाम की स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का आधुनिकीकरण करने जैसे कई कारणों से नकद दान दिया; और मरने से कुछ समय पहले, उन्होंने न्यूयॉर्क में एक द्वीप को एक प्रौद्योगिकी केंद्र में बदलने के लिए $350 मिलियन (35 करोड़) खर्च किए। उस व्यक्ति ने कहा, “मैं जीते-जी देने में दृढ़ विश्वास रखता हूं। मुझे देने में देरी करने का कोई कारण नहीं दिखता . . . l  इसके अलावा, जब आप मर चुके होते हैं तो देने की तुलना में जीने के दौरान देने में बहुत अधिक मज़ा आता है। जब आप जीते हैं तो दें—क्या अद्भुत मनोभाव है।

यूहन्ना के अंधे पैदा हुए व्यक्ति के विवरण में, यीशु के शिष्य यह निर्धारित करने की कोशिश कर रहे थे कि "किसने पाप किया" (9:2)। यीशु ने संक्षेप में उनके प्रश्न का उत्तर यह कहकर दिया, “न तो इस ने पाप किया था, न  इसके माता-पिता ने . . . परन्तु यह इसलिये हुआ कि परमेश्वर के काम उस में प्रगट हों। जिसने मुझे भेजा है, हमें उसके काम दिन ही दिन में करना अवश्य है” (पद.3-4) l यद्यपि हमारा कार्य यीशु के आश्चर्यकर्मों से बहुत अलग है, चाहे हम अपने आप को कितना भी दे दें, हमें इसे एक तैयार और प्रेमपूर्ण आत्मा के साथ करना है। चाहे हमारे समय, संसाधनों, या कार्यों के माध्यम से, हमारा लक्ष्य यह है कि परमेश्वर के कार्यों को प्रदर्शित किया जा सके।

क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने दिया। बदले में, जब तक हम जीते हैं, दें।

हमें अपने चर्च समुदाय की आवश्यकता है

मैं एक दक्षिणी बैपटिस्ट उपदेशक के पहलौठे पुत्र के रूप में पला-बढ़ा हूं। हर रविवार को उम्मीद स्पष्ट थी : मुझे चर्च में रहना था। संभावित अपवाद? शायद अगर मुझे तेज बुखार होता। लेकिन सच्चाई यह है कि, मुझे जाना बहुत पसंद था, और मैं कई बार बुखार में भी गया। लेकिन दुनिया बदल गई है, और चर्च में नियमित उपस्थिति पहले की तरह नहीं है। बेशक, त्वरित सवाल यह है कि क्यों? उत्तर कई और विविध हैं। लेखक कैथलीन नॉरिस ने उन उत्तरों को एक पासबान से प्राप्त प्रतिक्रिया के साथ सामना करते हुए कहा, "हम चर्च क्यों जाते हैं?" उन्होंने कहा, "हम अन्य लोगों के लिए चर्च जाते हैं। क्योंकि वहां किसी को आपकी जरूरत हो सकती है।"

अब किसी भी तरह से हमारे चर्च जाने का एकमात्र कारण है यह नहीं है, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया इब्रानियों के लिए लेखक के दिल की धड़कन के साथ प्रतिध्वनित होती है। उसने विश्वासियों को विश्वास में बने रहने के लिए आग्रह किया, और उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसने "एक दूसरे के साथ इकठ्ठा होना न [छोड़ने]" पर जोर दिया (इब्रानियों 10:25)। क्यों? क्योंकि हमारी अनुपस्थिति में कुछ महत्वपूर्ण छूट जाएगा : "एक दूसरे को समझाते रहें” (पद 25)। हमें "प्रेम और भले कामों में उकसाने के लिए” आपसी प्रोत्साहन की आवश्यकता है (पद 24)।

भाइयों-बहनों, मिलते रहें, क्योंकि वहाँ किसी को आपकी आवश्यकता हो सकती है। और संगत सच्चाई यह है कि आपको उनकी भी आवश्यकता हो सकती है।

सच्चे आराधक

उसे आख़िरकार उस चर्च जाने का मौका मिला । वह तहखाने के भीतरी भाग में, वह छोटे गुफा या खोह(grotto) में पहुंची । वह संकरा स्थान मोमबत्तियों से भरा था और फर्श का एक कोना लटके हुए लैंप्स से आलोकित था । वह यहाँ था──एक चौदह नोकवाला चाँदी का तारा, जो संगमरमर के फर्श के उभरे हुए हिस्से को ढँक रहा था । वह बेतलहेम में ग्रोटो ऑफ़ द नेटीविटी में थी──वह स्थान जहाँ परम्परा के अनुसार मसीह ने जन्म लिया था । फिर भी लेखिका एनी डिलार्ड प्रभावित से कम महसूस करते हुए समझ ली कि परमेश्वर इस स्थान से बहुत बड़ा था । 

फिर भी, ऐसे स्थान हमारे विश्वास की कहानियों में बड़ा महत्व रखते हैं । एक और ऐसा स्थान यीशु और कूंएं पर उस स्त्री के बीच बातचीत में वर्णित है──वह पहाड़──गरिज्जीम पर्वत का सन्दर्भ देते हुए(व्यवस्थाविवरण 11:29)──जहाँ उसके “बापदादों ने आराधना की” (यूहन्ना 4:20) । वह सामरियों के लिए पवित्र था, जिन्होंने इसे यहूदी जिद्द के विपरीत बताया कि यरूशलेम ही था जहाँ सच्ची आराधना होती थी (पद.20) । हालाँकि, यीशु ने घोषणा की कि वह समय आ चूका है जब आराधना किसी ख़ास स्थान तक सीमित नहीं थी, लेकिन एक व्यक्ति : सच्चे भक्त पिता की आराधना आत्मा और सच्चाई से करेंगे” (पद.23) । उस स्त्री ने मसीह(Messiah) में अपना विश्वास जताया, लेकिन उसने नहीं पहचाना कि वह उससे बात कर रही थी । “यीशु ने उस से कहा, ‘मैं जो तुझ से बोल रहा हूँ, वही हूँ’” (पद.26) । 

परमेश्वर किसी पहाड़ या भौतिक स्थान तक सीमित नहीं है । वह हमारे साथ सभी जगह उपस्थित है । हर दिन जो सच्चा तीर्थ हम करते हैं वह उसके सिंहासन के पास पहुँचना है क्योंकि हम साहसपूर्वक कहते हैं, “हमारे पिता,” और वह वहाँ उपस्थित है । 

परमेश्वर आपके लिए गाता है

हमारे पहले बच्चे──एक लड़का──के जन्म के सत्रह महीने बाद, एक लड़की पैदा हुई  l मैं एक लड़की का विचार करके अत्यधिक आनंदित हुआ, लेकिन मैं थोड़ा असहज भी था, क्योंकि जब मैं छोटे लड़कों के बारे में कुछ बातें जानता था, मैं बेटियों के सम्बन्ध में अनजान था l हमने उसका नाम सारा (Sarah) रखा, और उसको हिला-डुला कर सुलाना मेरा सौभाग्य था ताकि मेरी पत्नी आराम कर सके l मुझे नहीं मालूम क्यों, लेकिन मैंने उसे गाना गाकर सुलाना शुरू किया, और गाने का चुनाव था “यू आर माई सनशाइन l” चाहे उसे अपनी बाहों में थामे हुए या उसके पालने के ऊपर झुके हुए, मैं पूरी तरह से उसके लिए गाता था, और गाने के हर क्षण का आनंद लेता था l अब वह 20 वें वर्ष में है, और मैं अभी भी उसे सनशाइन(Sunshine) बुलाता हूँ l 

हम आमतौर पर स्वर्गदूतों के गाने के बारे में सोचते हैं l लेकिन आखिरी बार आपने परमेश्वर के गायन के बारे में कब सोचा था? सही है──परमेश्वर का गायन l और इसके अलावा, आखिरी बार आपने उसको आपके लिए कब गाते सुना है? सपन्याह यरूशलेम के लिए अपने सन्देश में स्पष्ट है, “तेरा परमेश्वर यहोवा” तेरे कारण आनंद से मगन होगा, यहाँ तक कि वह “ऊंचे स्वर से गाता हुआ तेरे कारण मगन होगा” (3:17) l यद्यपि यह संदेश सीधे तौर पर यरूशलेम से बात करता है, यह संभव है कि परमेश्वर हमारे लिए भी गाता है──जिन्होंने यीशु को उद्धारकर्ता ग्रहण किया है! कौन सा गीत वह गाता है? पवित्रशास्त्र इसके सम्बन्ध में स्पष्ट नहीं है l लेकिन वह गीत उसके प्रेम से उत्पन्न हुआ है, इसलिए हम भरोसा कर सकते हैं कि यह सच्चा है और उत्कृष्ट है और सही है और पवित्र है और खूबसूरत है और प्रशंसनीय है (फिलिप्पियों 4:8) l 

जो कुछ भी

प्रत्येक शुक्रवार की शाम, मेरा परिवार जो राष्ट्रीय समाचार देखता है वह अपना प्रसारण एक प्रेरक कहानी को हाईलाइट करके समाप्त करता है l यह हमेशा ताज़ी हवा का श्वास है l हाल ही के एक “शुभ” शुक्रवार की कहानी एक रिपोर्टर के ऊपर केन्द्रित थी जो कोविड-19 से बीमार होकर, पूरी तरह स्वस्थ हो चुकी थी, और उसके बाद दूसरों की वायरस के विरुद्ध उनकी लड़ाई में सम्भवतः मदद करने के लिए प्लाज्मा दान करने का निर्णय ली थी l उस समय, न्याय समिति यह फैसला करने की कोशिश कर रही थी कि एंटीबोडी कितनी प्रभावशाली होगी l लेकिन जब हममें से अनेक खुद को असहाय महसूस किये और (सूई द्वारा) प्लाज्मा दान करने की बेचैनी के प्रकाश में भी, उसने महसूस किया कि वह “संभावित अदाएगी के लिए एक छोटी कीमत थी l”

उस शुक्रवार के प्रसारण के बाद, मेरा परिवार और मैं प्रोत्साहित महसूस हुए──हिम्मत के साथ मैं कहता हूँ आशा से भरपूर l “जो कुछ भी” की सामर्थ्य यही है जिसका वर्णन पौलुस फिलिप्पियों 4 में करता है : “जो जो बातें सत्य हैं, और जो जो बातें आदरणीय हैं, और जो जो बातें उचित हैं, और जो जो बातें पवित्र हैं, और जो जो बातें सुहावनी हैं, और जो जो बातें मनभावनी हैं” (पद.8) l क्या पौलुस के मन में प्लाज्मा दान करना था? जी नहीं l लेकिन क्या उसके मन में दूसरे ज़रुरतमंदों के लिए लाभहीन कार्य थे──दूसरे शब्दों में, मसीह के समान व्यवहार? मुझे कोई शक नहीं कि उत्तर हाँ है l 

लेकिन उस आशापूर्ण समाचार का पूरा प्रभाव नहीं होता यदि वह प्रसारित नहीं होता l यह हमारा विशेषाधिकार है कि हम अपने चारों ओर “जो कुछ भी” को देखने और सुनने के लिए परमेश्वर की भलाई के साक्षी हैं और फिर दूसरों के साथ उस अच्छी खबर को साझा करें जिससे वे प्रोत्साहित हो सकते हैं l 

एक अच्छा कारण

दोनों महिलाओं ने एक दूसरे के आरपार गलियारों के सीट हासिल कर लिए l उड़ान दो घंटे की थी, इसलिए मैं उनकी कुछ परस्पर क्रियाओं को देखने से खुद को रोक न सका l यह स्पष्ट था कि वह एक दूसरे से परिचित थीं, शायद सम्बंधित भी होंगी l दोनों में से कम उम्र की महिला (शायद साठ के दशक में) निरंतर अपने बैग से ताज़े सेब के फांक, उसके बाद घर के बनी सैंडविच, फिर सफाई के लिए टिश्यू पेपर, और अंत में अखबार की ताजी प्रति उम्र में बड़ी महिला (मेरे अनुमान में जो नब्बे की दशक में थी) को देती रही l प्रत्येक वस्तु बड़ी कोमलता, बड़े आदर से दी गयी l जब हम विमान से बाहर निकल रहे थे, मैंने उम्र में कम महिला से कहा, ‘मैंने आपके देखभाल के तरीके पर ध्यान दिया l वह बहुत सुन्दर था l” उसने उत्तर दिया, “वह मेरी सबसे प्रिय मित्र है l वह मेरी माँ है l”

यह कितनी महान बात होती यदि हम सब कुछ उस प्रकार बोल पाते? कुछ माता-पिता सबसे अच्छे मित्र की तरह होते हैं l कुछ माता-पिता उस तरह के बिलकुल नहीं होते l सच्चाई यह है कि उस प्रकार के सम्बन्ध अपने सर्वोत्तम में हमेशा जटिल होते हैं l जबकि तीमुथियुस को लिखी गई पौलुस की पत्री इस जटिलता की उपेक्षा नहीं करती है, इसके बावजूद यह हमें अपने माता-पिता और दादा-दादी──हमारे “अपने,” अपने “घराने” की देखभाल करने के द्वारा “पहले अपने ही घराने के साथ भक्ति का बर्ताव” करने का आह्वान करता है (1 तीमुथियुस 5:4,8) l 

हम सभी भी अक्सर इस तरह की देखभाल का अभ्यास करते हैं, यदि परिवार के सदस्य हमारे लिए अच्छे थे या हैं l दूसरे शब्दों में, अगर वे इसके लायक हैं l लेकिन पौलुस उन्हें चुकाने के लिए एक और सुन्दर कारण प्रस्तुत करता है l उनकी देखभाल करें क्योंकि “यह परमेश्वर को भाता है” (पद.4) l 

न्याय का परमेश्वर

शायद यह इतिहास का सबसे महान “बलि की गाय” थी। हम नही जानते कि उसका नाम डेज़ी, मेडलिन, या ग्वेंडोलिन था (हर एक नाम सुझाया गया नाम है), पर शिकागो में 1871 की आग के लिए श्रीमती ओ’लियरी की गाय को दोषी माना गया जिसके कारण शहर का हर तीसरा निवासी बेघर हो गया था l लकड़ियों की संरचनाओं में से गुज़रती हुयी आग तेज हवा के कारण तीन दिनों तक जलती रही और लगभग तीन-सौ लोगों की जान ले ली l 

कई वर्षों तक, लोगों को यह लगा कि किसी गौशाले में रात को जलती हुयी लालटेन को उस गाय द्वारा ठोकर मारने के कारण आग लगी थी l अगली छानबीन के बाद──126 साल बाद──पुलिस और अग्नि की शहरी समिति ने स्वीकृत प्रस्ताव पारित कर गाय और उसके मालिक को दोषमुक्त करते हुए पड़ोसियों की अनुबद्ध जांच का सुझाव दिया l  

न्याय अक्सर समय लेता है, और पवित्र शास्त्र स्वीकार करता है कि यह कितना मुश्किल हो सकता है l राग में दोहराने के शब्द, "कब तक?" भजन 13 में चार बार दोहराए गए हैं, “हे परमेश्वर, कब तक?” क्या सदैव मुझे भुला रहेगा? तू कब तक अपना मुखड़ा मुझसे छिपाए रहेगा? मैं कब तक अपने मन ही मन में युक्तियाँ करता रहूँ, और दिन भर अपने हृदय में दुखित रहा करूं? कब तक मेरा शत्रु मुझ पर प्रबल रहेगा?” (पद. 1-2) l लेकिन अपने विलाप के मध्य, दाऊद विश्वास और आशा का कारण ढूंढ लेता है : “परन्तु मैंने तो तेरी करुणा पर भरोसा रखा है; मेरा हृदय तेरे उद्धार से मगन होगा (पद.5) ।”

यहाँ तक कि जब न्याय विलंबित होता है, परमेश्वर का प्रेम हमें कभी धोखा नहीं देगा l हम उस में भरोसा कर सकते हैं और आराम पा सकते है न केवल उस पल के लिए परन्तु हमेशा के लिए l 

परमेश्वर के साथ समय बिताना

ए रिवर रन्स थ्रू इट(A River Runs Through It) नॉर्मन मेक्लीन की दो लड़कों की बेहतरीन कहानी है जो अमेरिका के एक पश्चिमी राज्य में अपने पिता, एक प्रेस्बिटेरियन पास्टर के साथ बड़े हो रहे थे । रविवार की सुबह, नॉर्मन और उसका भाई, पॉल, चर्च जाते थे जहाँ वे अपने पिता को उपदेश देते हुए सुनते थे l रविवार की शाम, एक दूसरी आराधना होती थी और उनके पिता फिर से उपदेश देते थे l लेकिन उन दोनों आराधनाओं के बीच, वे उसके साथ पहाड़ियों और नदियों की सैर करने के लिए स्वतंत्र थे, “जब वह अपने आप को ताज़ा करते थे ।“ उनके पिता जानबूझकर अपने आप को “शाम के उपदेश के लिए अपनी आत्मा को नया करने और पुनः भरकर उमंडने के लिए” अलग करते थे l 

सुसमाचारों में हर जगह, यीशु पहाड़ों पर और शहरों में भीड़ को शिक्षा देते हुए और बीमारों और अस्वस्थ लोगों को चंगा करते हुए दिखाई देता है जो उसके पास लाये जाते थे l यह सब परस्पर क्रियाएँ मनुष्य के पुत्र का मिशन/उद्देश्य “खोए हुओं को ढूँढने और उनका उद्धार करने” के अनुकूल था (लूका 19:10) l  लेकिन यह भी ध्यान दिया गया है कि वह अक्सर “जंगलों में अलग जाकर प्रार्थना किया करता था” (5:16) l उसका समय वहाँ पर पिता के साथ बातचीत करने में व्यय होता था, जिससे वह तरोताज़ा और नवीकृत होकर फिर से अपने मिशन में कदम रख सके l 

सेवा करने के हमारे विश्वासयोग्य प्रयासों में, हमारे लिए यह याद रखना जरूरी है कि यीशु “अक्सर” अलग जाता था । यदि यह अभ्यास यीशु के लिए जरूरी था, तो हमारे लिए और कितना अधिक है? हम नियमित रूप से अपने पिता के साथ समय बिताएँ, जो हमें फिर से उमड़ने तक भर सकता है ।