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Articles by कीला ओकोआ

शांति का रहस्य

ग्रेस एक विशिष्ट महिला है। उसके बारे में सोचकर एक ही शब्द मन में आता है:शांति। जबसे मै उसे जानती हूँ, उसके मुख का शांत और स्थिर भाव शायद ही कभी बदला हो, तब भी नहीं जब दुर्लभ रोग के कारण उसके पति को अस्पताल में भर्ती कराया गया।

मैंने ग्रेस से उसकी शांति का रहस्य पूछा, तो उसने कहा, "यह कोई रहस्य नहीं है, यह एक व्यक्ति है। यह यीशु है जो मुझमें है। इस तूफान में भी जिस शांति का मैं अनुभव करती हूं उसे बताने का कोई और तरीका नही है"।

शांति का रहस्य यीशु मसीह के साथ संबंध में निहित है। वे हमारी शांति हैं। जब यीशु हमारे उद्धारकर्ता और परमेश्वर होते हैं,  और हम और अधिक उनके समान बनते हैं तो शांति एक वास्तविकता बन जाती है। बीमारी, आर्थिक कठिनाइयों या विपत्ति में भी शांति आश्वासन देती है कि हमारे प्राण परमेश्वर के हाथों में हैं (दानिय्येल 5:23) और हम भरोसा कर सकते हैं, कि अंत में सब बातें भलाई को उत्पन्न करेंगी।

क्या हमने उस शांति को अनुभव किया है जो तर्क और समझ से परे है? क्या हमें  निश्चय है कि परमेश्वर नियंत्रण में हैं?  पौलुस के शब्दों को आज मैं सबके लिए दोहराना चाहती हूं:”अब प्रभु जो शान्ति का...”(2 थिस्सलुनीकियों 3:16)।

मीठा और कड़वा

कुछ लोग कड़वा और कुछ मीठा चॉकलेट पसंद करते हैं। मध्य अमरिका के मायनों में इस का आनंद पेय के रूप में लिया जाता था और लोग इसमें मिर्च मिलाते थे। उन्हें यह “कड़वा पानी” पसंद था। वर्षों बाद यह स्पेन में प्रस्तुत हुआ, पर स्पेनियों को चॉकलेट मीठा पसंद था तो कड़वाहट कम करने के लिए उन्होंने इसमें चीनी और शहद मिलाई।

चॉकलेट के समान, दिन भी कड़वे या मीठे हो सकते हैं। ब्रदर लॉरेंस ने लिखा, “यदि हम जानते कि [परमेश्वर] हमें कितना प्रेम करते हैं, तो हम उनके हाथ से मीठा और कड़वा” समान रूप से लेने के लिए सदा तैयार रहते। मीठा और कड़वा समान रूप से स्वीकार करें? यह कठिन है! ब्रदर लॉरेंस किसकी बात कर रहे हैं? कुंजी परमेश्वर के चरित्र में मिलती है। भजनकार ने परमेश्वर से कहा, "तू भला है, और..." (भजन 119:68)।

चंगाई और औषधीय गुणों के लिए मायनों वासियों ने कड़वे चॉकलेट के महत्व को समझा। कड़वे दिनों का भी महत्व होता है। वह हमें हमारी कमजोरियों से अवगत कराते हैं और परमेश्वर पर निर्भर करने में हमारी सहायता करते हैं। भजनकार ने लिखा, “मुझे जो दुख हुआ...(पद 71)। परमेश्वर की भलाई का आश्वासन रखकर-आइये आज जीवन को, इसके भिन्न स्वाद समेत अपनाएं। हम कहें, "हे यहोवा, तू ने अपने वचन..."(पद 65)।

देखो और मौन रहो

"लुक ऐट हिम (उनकी ओर देखो)" गीत में, मैक्सिकन संगीतकार रूबेन सैटेलो ने क्रूस पे यीशु का वर्णन किया है। वह कहते हैं, यीशु को देखो और मौन रहो, क्योंकि क्रूस पे दिखाए यीशु के प्रेम के सामने वास्तव में कहने को कुछ नहीं है। सुसमाचार में वर्णित इस दृश्य की कल्पना हम विश्वास के द्वारा कर सकते हैं, क्रूस, लहू, कीलों, और पीड़ा की।

यीशु के अंतिम समय में “भीड़ जो यह देखने को इकट्ठी हुई..."(लूका 23:48-49)। तब सब मौन थे, केवल  एक सूबेदार बोला, "निश्चय यह मनुष्य धर्मी था। "(पद 47)।

उस महान प्रेम पर गीत और कविताएं लिखी गई हैं। वर्षों पूर्व, तबाही के बाद यरूशलेम की पीड़ा के बारे में यिर्मयाह ने लिखा था "क्या तुम्हें इस बात की कुछ भी चिन्ता नहीं?" (विलापगीत 1:12)। उन्हें लगा कि यरूशलेम की तुलना में कोई दुःख बड़ा नहीं था। यद्यपि, क्या यीशु की पीड़ा जैसी कोई पीड़ा हो सकती है?

हम सभी क्रूस के मार्ग से गुजर रहे हैं। क्या हम उनके प्रेम को देखेंगे? इस ईस्टर पर जब परमेश्वर के प्रति हमारे आभार को व्यक्त करने के लिए शब्द और गीत कम पड़ जाएँ हम कुछ समय लेकर यीशु की मृत्यु पर मनन करें और अपने मौन हृदय में उनपर अपनी गहरी भक्ति अर्पित करें।

विश्वासयोगी बने रहने का साहस

भय हडासा का निरंतर साथी है। हडासा,  फ़्रांसिन रिवर्स की पुस्तक,  अ वॉइस इन दी विंड की  नायिका है जो रोमी परिवार में दासी है और मसीह को मानने के कारण सताव से डरती है क्योंकि मसीहियों को तुच्छ समझा जाता, सूली पर चढ़ाया जाता या शेरों के अखाड़े में फेंक दिया जाता था। अपनी परीक्षा में सत्य का समाना करने का क्या उसमें साहस होगा?

उसकी स्वामिनी और रोमी अधिकारी के विरोध पर उसके दो विकल्प होते हैं: मसीह में अपने विश्वास त्याग दे या उसे अखाड़े में ले जाया जाए। पर जब वह यीशु के मसीह होने की घोषणा करती है, उसका डर दूर हो जाता है और मृत्यु सामने होने पर भी निडर हो जाती है।

बाइबिल बताती है कि कभी-कभी सही करने पर हम दुःख उठाएँगे-चाहे सुसमाचार को बांटना या ईश्वरीय जीवन जीना हो। हमें भयभीत ना होने (1 पतरस 3:14), वरन अपने मन में “मसीह को प्रभु जान कर पवित्र समझने” के लिए कहा गया है (15)। हडासा का मुख्य युद्ध उसके अपने मन में था। और अंततः जब उसने यीशु को चुना तो विश्वासयोगी बने रहने का उसे साहस मिल गया।

जब हम मसीह को आदर देंगे,  तब वह निडर होने विरोधों के बीच में भय पर विजय पाने में हमारी मदद करेंगे।

बर्फ़ के समान सफेद

पिछले दिसंबर माह में, मेरा परिवार और मैं पहाड़ों पर गए थे। पहली बार हम सभी ने इतनी शानदार बर्फ़ को देखा। सफेद लबादे से ढके खेतों को ध्यान से देखते हुए, मेरे पति ने यशायाह से उद्धृत किया, "तुम्हारे पाप चाहे लाल रंग के हों तौभी हिम की नाईं उजले हो जाएंगे" (यशायाह 1:18)।

हमारी तीन साल की बेटी ने पूछा, "क्या रंग लाल बुरा होता है?" वह जानती है कि पाप उन बातों को कहते हैं जिन्हें परमेश्वर पसंद नहीं करते हैं, परन्तु यह पद रंगों के बारे में बात नहीं है। यहाँ चमकदार लाल रंग का वर्णन है जो एक छोटे से कीड़े के अंडे से निकलता है। कपड़े को इस लाली में दो बार रंगा जाता हैa जिससे रंग पक्का हो जाए। न तो बारिश से और न ही धोकर इसे हटाया जा सके। पाप इसी के समान होता है। कोई मानव प्रयास इसे दूर नहीं कर सकता है। इसकी जड़ मन में होती है।

पाप को दिल से केवल परमेश्वर निकाल सकते हैं। जब हम वचन का अनुसरण करते हैं "मन फिराओ...कि तुम्हारे पाप मिट जाएं" (प्रेरितों के काम 3:19), परमेश्वर हमें क्षमा कर एक नया जीवन देते हैं। केवल यीशु के बलिदान के माध्यम से-एक निष्पाप दिल पाते हैं। क्या ही अद्भुत उपहार है!

जो याद रहती हैं

फुलचुसनी चिड़िया को अंग्रेजी में हमिंगबर्ड कहते हैं क्योंकि वह अपने पंख बहुत तीव्रता से फड़फड़ाती है l पुर्तगाली भाषा में इसे फुलचुसनी अथवा स्पेनी में “उड़ती मणि” कहते हैं l इस चिड़िया को मैं ब्युलू  पुकारता हूँ, अर्थात् “जो सदा याद रहे l

जी. के. चेस्टरन लिखते हैं, “इस संसार में कभी भी अजूबों की कमी नहीं होगी, किन्तु अजीब बातों की इच्छा बनी रहेगी l” फुलचुसनी उनमें से एक अजूबा है l इन छोटे प्राणियों में कौन सी बातें रोमांचित करनेवाली हैं? शायद उनका छोटा आकार(औसत दो से तीन इंच) अथवा उनके पंख जो एक सेकंड में 50 से 200 बार फड़फड़ाते हैं l

हम नहीं जानते कि भजन 104 किसने लिखा, किन्तु अवश्य ही वह प्रकृति की सुन्दरता से मोहित था l सृष्टि की अनेक अबिबो-गरीब बातें जैसे लबानोन के देवदार और जंगली गदहों का वर्णन करने के बाद, वह गीत गाता है, “यहोवा अपने काम से आनंदित होवे”(पद.31) l उसके बाद वह प्रार्थना करता है, “मेरा ध्यान करना उसको प्रिय लगे” (पद.34) l

प्रकृति में अनेक बातें याद रहने लायक हैं क्योंकि वे सुन्दर और सम्पूर्ण हैं l हम उन पर ध्यान करके किस तरह परमेश्वर को खुश कर सकते हैं? जब हम उसके कार्य पर विचार करते हैं और चकित करनेवाली बातों का पुनः अनुभव करते हैं, हम उन पर ध्यान दे सकते हैं, आनंदित हो सकते हैं और परमेश्वर को धन्यवाद दे सकते हैं l

दूसरे अवसर

“जबकि आप मुझे जानते ही नहीं हैं फिर आप इतने दयालु कैसे हो सकते हैं!”

गलत निर्णय लेने के कारण, लिन्डा एक दूसरे देश में जेल में पहुँच गयी l और छः साल के बाद रिहा होने पर वह नहीं जानती थी कि वह कहाँ जाएँ l उसने सोचा कि उसके जीवन का अंत हो गया है! जबकि उसके परिवार ने उसके लिए घर लौटने के टिकट का इंतजाम किया, और एक दयालु पति-पत्नी ने उसे आवास, भोजन और सहायता दी l लिन्डा उनकी दया से ऐसी प्रभावित हुयी कि वह प्रेमी और दूसरा अवसर देनेवाले परमेश्वर का सुसमाचार सुनने को इच्छित हुयी l

लिन्डा मुझे विधवा, नाओमी की याद दिलाती है, जिसने एक अनजान देश में अपना पति और दो बेटे खोने के बाद सोचने लगी कि उसका जीवन समाप्त हो गया है (रूत 1) l हालाँकि, प्रभु नाओमी को नहीं भूला था, और उसकी बहु के प्यार और बोआज़ नाम के एक धर्मी मनुष्य की दया द्वारा, नाओमी ने परमेश्वर के प्रेम को देखा और उसे एक दूसरा अवसर मिला (4:13-17) l

वही परमेश्वर हमारी भी चिंता करता है l दूसरों के प्रेम द्वारा हमें उसकी उपस्थिति याद दिलायी जा सकती है l हम अनजान लोगों की सहायता में परमेश्वर का हाथ देख सकते हैं l किन्तु सबसे ऊपर, परमेश्वर हमें एक नयी शुरुआत देना चाहता है l हमें भी, लिन्डा और नाओमी की तरह, अपने दैनिक जीवन में परमेश्वर का हाथ देखना चाहिए और पहचानना चाहिए कि वह हमें निरंतर अपनी दया दिखाता है l

आपके पिता का नाम क्या है?

मध्यपूर्व के क्षेत्र में मोबाइल फ़ोन खरीदते समय, मुझसे कुछ ख़ास प्रश्न पूछे गए : नाम, राष्ट्रीयता, पता l किन्तु उसके बाद क्लर्क ने फॉर्म भरते समय पूछा, “आपके पिता का नाम क्या है? मैं चकित हुई, और मैंने सोचा यह क्यों ज़रूरी है l मेरी संस्कृति में यह ज़रूरी नहीं है, किन्तु मेरी पहचान के लिए यहाँ यह ज़रूरी था l कुछ संस्कृतियों में, वंशावली ज़रूरी है l

इस्राएली भी वंशावली का महत्त्व मानते थे l वे अपने कुलपिता अब्राहम पर घमंड करते थे, और उनकी सोच में उनका अब्राहम का कुल का होना ही उनको परमेश्वर की संतान बनाता था l उनके अनुसार, उनकी मानवीय वंशावली उनके आत्मिक परिवार से जुड़ा था l

सैंकड़ों वर्ष बाद यहूदियों से बातचीत में, यीशु ने स्पष्ट किया कि यह ऐसा नहीं है l वे अब्राहम को अपना भौतिक पिता मान सकते थे, किन्तु यदि वे उससे प्रेम नहीं करते थे जिसे पिता ने भेजा था तो वे परमेश्वर के परिवार के नहीं थे l

आज भी वही सार्थक है l हम अपना भौतिक परिवार नहीं चुनते हैं, किन्तु हम अपना आत्मिक परिवार चुन सकते हैं जिसके हम हिस्से हैं l यीशु के नाम पर विश्वास करके, परमेश्वर हमें उसकी संतान बनने का अधिकार देता है (यूहन्ना 1:12) l

आपका आत्मिक पिता कौन है? क्या आपने यीशु का अनुसरण करने का चुनाव किया है? आज आप अपने पापों की क्षमा के लिए यीशु पर विश्वास करके परमेश्वर के परिवार का हिस्सा बन जाएँ l

परमेश्वर द्वारा मार्गदर्शित

कुछ माह पूर्व मुझे एक ई-मेल द्वारा “मार्गदर्शित लोगों” के समाज का सदस्य बनने का निमंत्रण मिला l मैंने जाना कि मार्गदर्शित  शब्द का अर्थ है, लक्ष्य प्राप्ति हेतु परिश्रम करनेवाला उच्च प्रेरित व्यक्ति l 

क्या मार्गदर्शित व्यक्ति होना अच्छा है?  एक अचूक जांच है : “परमेश्वर की महिमा के लिए सब कुछ करें” (1 कुरिं. 10:31) l कितनी बार हम अपने गौरव के लिए करते हैं l नूह के दिनों में जल-प्रलय पश्चात, लोगों का एक समूह “[अपने नाम] के लिए एक गुम्मट बनाना चाहा (उत्प.11:4) l वे प्रसिद्धि चाहते थे और वे संसार में फैलना नहीं चाहते थे l इसलिए कि वे परमेश्वर की महिमा के विरुद्ध कर रहे थे, भले ही, उनको गलती से मार्गदर्शित किया गया l

इसके विपरीत, जब राजा सुलेमान ने वाचा का संदूक और नया निर्मित मंदिर समर्पित किया, उसने कहा, “मैं [ने] ... परमेश्वर यहोवा के नाम से इस भवन को बनाया है” (1 राजा 8:20) l तब उसने प्रार्थना की, “वह हमारे मन अपनी ओर ऐसा फिराए रखे कि हम उसके सब मार्गों पर चला करें” (1 राजा 8:58) l

जब हमारी महानतम इच्छा परमेश्वर की महिमा और उसकी आज्ञाकारिता है, हम मार्गदर्शित, आत्मा की अगुवाई में उसके प्रेम के खोजी और उसकी सेवा करनेवाले होते हैं l  हम सुलेमान की प्रार्थना करें, हमारे “मन हमारे परमेश्वर यहोवा की ओर ... लगा रहे, कि ... [हम] उसकी विधियों पर चलते और उसकी आज्ञाएँ मानते [रहें]” (पद.61) l