गीत गाने का कारण
13 वर्ष के होने पर हमारे स्कूल के नियमों के अनुसार छात्रों को चार शोधपूर्ण कोर्स लेने अनिवार्य थे जिसमें गृह-अर्थशास्त्र, कला, गायक-वृंद तथा बढ़ईगिरी शामिल थे। गायन की पहली कक्षा में प्रशिक्षक ने छात्रों की आवाज सुनने के लिए एक-एक करके पियानो के पास बुलाया और उनकी स्वर क्षमता के अनुसार कमरे में पंक्तिबद्द किया। अपनी बारी पर मैंने पियानो के साथ गाने की कोशिश की, कई प्रयासों के बाद मुझे किसी पंक्ति की बजाए कोई दूसरी कक्षा लेने के लिए काउंसलिंग ऑफिस भेज दिया गया। मुझे लगा कि मुझे नहीं गाना चाहिए।
मैंने 10 वर्ष तक यह बात मन में रखी जबतक कि मैंने भजन-संहिता 98 ना पढ़ा। लेखक "प्रभु के लिए गाने" (भजन 98:1) के निमंत्रण से इसे आरम्भ करता है। इसका हमारे गाने की क्षमता से कोई सारोकार नहीं। वह अपने सभी बच्चों के धन्यवाद और स्तुति के गीतों से प्रसन्न होते हैं। वह हमें इसलिए गाने को कहता है क्योंकि परमेश्वर ने "अद्भुतकाम किए हैं "(पद 1)।
भजनकार ने अपने गीतों और व्यवहार में आनन्दित होकर परमेश्वर की स्तुति करने के दो कारण दिए: हमारे जीवन में उनके उद्धार का कार्य और उनकी निरंतर रहने वाली विश्वासयोग्यता। परमेश्वर की गायन मंडली में हम में से प्रत्येक के पास उनके अद्भुत कामों के लिए गीत होते हैं।
जो हम सुनना चाहते हैं
हमारी प्रवृति अपने विचारों से मेल खाती जानकारी खोजने की होती है। अनुसंधान दिखाते हैं कि अपनी स्थिति से मेल खाती जानकारी खोजने की संभावना वास्तव में दो गुना अधिक होती है। अपनी सोच के प्रति अत्यंत प्रतिबद्ध होने के कारण हम उन विचारों से बचते हैं जो हमारी स्थिति के प्रतिकूल हों।
इस्राएल के राजा अहाब ने और यहूदा के राजा यहोशापात ने गिलाद के रामोत पर चढ़ाई की चर्चा की, तो अहाब ने अपने 400 भविष्यवक्ताओं को एकत्रित किया-जिन्हें उसने इस भूमिका के लिए स्वयं नियुक्त किया था, जो वही कहेंगे जिसे वह सुनना चाहता था-निर्णय में उसकी सहायता के लिए। उन्होंने उत्तर दिया चढ़ाई कर...(2 इतिहास 18:5)। यहोशापात के पूछने पर कि, क्या यहोवा का चुना और कोई नबी है जिससे पूछ लें? इस्राएल के राजा ने यहोशापात से...(पद 7)। मीकायाह ने कहा...(पद 16)।
मैं देखती हूं कि उनकी कहानी के समान मैं भी कैसे,बुद्धिमानी से भरी सलाह से बचने की प्रवृति रखती हूं, यदि वह वो ना हो जिसे मैं सुनना चाहती हूं। अहाब का उसके “चापलूस”-400 भविष्यवक्ताओं-को सुनने का परिणाम-विनाशकारी हुआ (पद 34)। हम बाइबिल में परमेश्वर के वचन की सच्ची वाणी की खोज करें और उसे सुनने के लिए तैयार रहें भले ही वह हमारी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के विपरीत क्यों ना हो।
तीन-अक्षर का विश्वास
निराशावादी होने कारण मैं जीवन की स्थितियों के प्रति नकारात्मक धारणा शीघ्र बना लेती हूँ। यदि मुझे एक प्रोजेक्ट में असफलता मिले तो मैं मान लेती हूँ कि सारे प्रोजेक्ट फेल हों जाएँगे-भले ही वह आपस में संबंधित ना हों। धिक्कार है मुझ पर! मैं एक खराब माँ हूँ, जो कुछ ठीक नहीं करती। एक क्षेत्र में असफलता अनावश्यक रूप से कई क्षेत्रों में मेरी भावनाओं को प्रभावित करती है।
वह देखकर हबक्कूक की प्रतिक्रिया क्या रही होगी जो परमेश्वर ने उन्हें दिखाया था, मैं कल्पना कर सकती हूँ। परमेश्वर के लोगों पर कठिनाइयां आते देख उसके पास निराश होने का कारण था; लंबे और कठिन वर्ष आगे खड़े थे। सब अंधकारमयी लग रहा था: फल, मांस, प्राणी और सुख कुछ न होगा। ये शब्द निराशापूर्ण हैं, पर तीन अक्षर इसे बदल देते हैं:तौभी मैं। "तौभी मैं यहोवा के कारण आनन्दित और मग्न रहूंगा" (हबक्कूक 3:18)। आने वाली कठिनाईयों के बावजूद, हबक्कूक को आनन्दित होने का कारण इस में मिला कि परमेश्वर कौन हैं। कठिनाएयों को हम बढ़ा-चढ़ा कर बताते हैं। परन्तु यदि कठिनाईयों के बावजूद हबक्कूक परमेश्वर की स्तुति कर सकते हैं, तो कदाचित हम भी कर सकते हैं। निराशा के भंवर में फंस जाने पर, हम परमेश्वर की ओर देख सकते हैं जो हमें ऊपर खींच लेते हैं।
स्पष्ट निर्देश
मेरी दूसरी बेटी अपनी बड़ी बहन के बिस्तर पर सोने के लिए बैचेन थी। ब्रिट्टा को बिस्तर से न निकलने की चेतावनी देकर मैं कहती कि अगर उसने उलंघन किया तो उसे अपने बिछौने पर जाना पड़ेगा। हर रात उसे गलियारे में देख मैं अपनी निरुत्साहित बेटी को उसके बिछौने पर सुला देती। वर्षों बाद मैंने जाना कि मेरी बड़ी बेटी को कमरे में रूममेट पसंद नहीं था। वह उसे कहती कि मैं उसे बुला रही हूँ, उसकी बात सुनकर ब्रिट्टा कमरे से निकल आती और उसे अपने बिछौने पर जाना पड़ता।
गलत बात मानने के परिणाम हो सकते हैं। जब यहोवा से वचन पाकर परमेश्वर का जन बेतेल गया, तो उसे स्पष्ट आज्ञा थी, न तो रोटी खाना...(1 राजा 13:9)। भविष्यवक्ता ने राजा यारोबाम के आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। एक बड़े नबी के आमंत्रण पर उसने पहले मना किया, बाद में सहमत हो गया। नबी ने यह कहकर उसे धोखा दिया, कि स्वर्गदूत ने उसे बताया है कि इसमें कुछ गलत नहीं। जैसे ब्रिट्टा को "बड़े बिस्तर" का आनंद देने की मेरी इच्छा थी, वैसे परमेश्वर को दुःख पहुंचा होगा कि उसने उनकी आज्ञा को न माना।
हमें परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए। उनका वचन हमारे जीवन का मार्ग है, जिसे सुनने और पालन करने में बुद्धिमानी है।
न्याय से अधिक दया
झगड़ा करके एक मेरे बच्चे शिकायत करने मेरे पास आए, मैंने दोनों का पक्ष बारी बारी से सुना। क्योंकि दोष दोनों का था, तो चर्चा के बाद मैंने दोनों ही से पूछा, कि उनके अनुसार दूसरे के लिए उचित, न्यायसंगत दंड क्या होना चाहिए। उनका सुझाव दूसरे को कठोर दंड देने का था। पर बजाय इसके जब उनको मैंने वही दण्ड दिया, जो उन्होंने अपने भाई के लिए चुना था तो वे आश्चर्यचकित थे। वही दंड जो उन्हें दूसरे के लिए उचित लग रहा था, जब उन पर आया तो उन्हें "अनुचित" लगने लगा।
बच्चों ने जिस "दया रहित निर्णय" को चुना था उसके विरुद्ध परमेश्वर हमें सावधान करते हैं (याकूब 2:13)। याकूब कहते हैं, कि परमेश्वर की इच्छा है कि धनवान या स्वयं के लिए भी पक्षपात न दिखाकर हम अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखें (8)। दूसरों का स्वार्थ अनुसार उपयोग करने या जो हमें लाभ न दें उनकी उपेक्षा करने के बजाय, याकूब हमें उनके समान व्यवहार करने का निर्देश देते हैं जो जानते हैं कि हमें कितना दिया और माफ किया गया है-और दूसरों पर भी वही दया दिखाएं।
परमेश्वर ने हमें उदारता से दया प्रदान की है। अपने व्यवहार में, हम उस दया को याद रखें जो और दूसरों पर भी इसे दिखाएं।
अग्रिम टीम
हाल ही में, मेरी एक मित्र अपने वर्तमान गृहनगर से दूर एक अन्य नगर में शिफ्ट करने की तैयारी कर रही थी। समय बचाने के लिए उसने और उसके पति ने कामों को बाँट लिया। पति ने नए घर की व्यवस्थाओं के प्रबंध किए, जबकि उसने सामान पैक किया। बिना घर देखे शिफ्ट करने के लिए उसका तैयार हो जाना हैरानी की बात थी, मैंने उससे पूछा कि वह ऐसा कैसे कर लेती है, उसने कहा कि इतने वर्षों से साथ रहते, उसकी पसंद-नापसन्द और ज़रूरतों का इतना ध्यान रखे जाने के कारण वह अपने पति पर विश्वास करती थी।
ऊपरी कक्ष में, यीशु ने अपनी मृत्यु के विषय में चेलों को बताया। यीशु के सांसारिक जीवन की और उनके चेलों की भी, सबसे अंधकारपूर्ण घड़ी आने वालीं थी। उन्होंने उन्हें आश्वस्त किया कि वे स्वर्ग में उनके लिए एक स्थान तैयार करेंगे, चेलों के प्रश्न पूछने पर, उन्होंने उनके साथ बिताए समय और उन चमत्कारों की बातें कहीं जिन्हें उन्होंने यीशु को करते देखा था। यद्यपि उन्हें यीशु की मृत्यु का और ना रहने का दुःख होगा, उन्होंने उन्हें याद दिलाया कि जैसा उन्होंने कहा था वैसा करने के लिए वे उनपर विश्वास कर सकते हैं।
हमारे सबसे अंधकारपूर्ण घड़ियों में भी, हम उस पर भरोसा कर सकते हैं।
अंदर क्या है?
“तुम देखोगी कि अंदर क्या है?" मेरी मित्र ने पूछा। उसकी बेटी के हाथों में कपड़े की गुड़िया थी। “हाँ, अवश्य”, मैंने जवाब दिया। एमिली ने गुड़िया के पीठ में लगी ज़िप खोली। उसके अन्दर से, उसने एक ख़जाना निकाला: उसकी अपनी गुड़िया जिसके साथ 20 वर्ष पूर्व अपने बचपन में वह खेलती थी। "बाहरी" गुड़िया इस भीतरी गुडिया का केवल ढाँचा थी जिससे उसे ताकत और रूप दिया जा सके।
यीशु के जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान का विवरण पौलुस एक खजाने के रूप में करते हैं, जो परमेश्वर के लोगों की कमजोर मानवता के अन्दर छिपा है। जो विश्वासियों को बल देता है कि कठिन परिस्थितियों में डटे रहकर वे सेवा करते रहें। जिससे लोगों की मानवीयता से उनकी ज्योति-उनका जीवन प्रकाशित होता हैं। पौलुस हम सभी को “हियाव न छोड़ने का” प्रोत्साहन देते हैं (2कुरिन्थियों 4:16)। परमेश्वर हमें उनके कार्य करने के सामर्थ से भरते हैं।
"भीतरी गुड़िया", के समान हमारे भीतर सुसमाचार का खजाना इस जीवन को उद्देश्य और संयम देता है। जब परमेश्वर का सामर्थ हम में चमकता है, तो दूसरों को पूछने के लिए बाध्य करता है, कि "अंदर क्या है"? फिर अपने हृदय की ज़िप खोल कर हम मसीह में मिलने वाले उद्धार की जीवनदाई प्रतिज्ञा को दिखा सकते हैं।
फिर आरम्भ करना
क्रिसमस के बाद, अक्सर मैं आने वाले वर्ष के बारे सोचती हूँ और परखती हूँ कि पिछला वर्ष मुझे कहाँ लाया और अगले में कहाँ पहुँचने की मैं आशा कर सकती हूँ। एक नए वर्ष के आरम्भ की बात मुझे आशा और अपेक्षा से भर देती है। लगता है, कि पिछले साल में चाहे जो भी हुआ हो, मेरे पास फिर से आरम्भ करने का अवसर है।
नए आरम्भ की मेरी कल्पना उस आशा के समाने फ़ीकी पड़ जाती है जिसे इस्राएलियों ने तब अनुभव किया होगा जब बाबुल में सत्तर साल की लम्बी बंधुआई के बाद उनके देश यहूदा लौट जाने के लिए उन्हें मुक्त किया गया था। पिछले राजा नबूकदनेस्सर ने इस्राएलियों को उनके अपने देश से निर्वासित कर दिया था। परन्तु परमेश्वर ने राजा कुस्रू से बंधकों को यहोवा के भवन के पुनर्निर्माण के लिए उनके घर यरूशलेम भेज देने को कहा (एज्रा 1: 2-3)। कुस्रू ने उन्हें वे खजाने भी लौटा दिए जिन्हें यहोवा के भवन से लाया गया था। पापों के कारण बाबुल में कठिन और लंबा समय बिताने के बाद उनके जीवन का नया आरम्भ उस स्थान पर हुआ जिसे परमेश्वर ने उनके लिए ठहराया था।
अतीत में किए अपने पापों का जब हम अंगीकार करते हैं, परमेश्वर हमें क्षमा और नया आरम्भ देते हैं।
गोश्त और अन्डे
मुर्गी और बकरे की कहानी में, दोनों ही एक रेस्टोरेंट खोलने की बात करते हैं l भोजन सूची में, मुर्गी की सलाह थी कि हम गोश्त और अन्डे परोसेंगे l बकरे ने यह कहकर तुरंत आपत्ति जतायी, “बिलकुल नहीं l इसमें मुझे पूरी तौर से समर्पित होना पड़ेगा, किन्तु इसमें तुम केवल शामिल होगी l”
यद्यपि बकरा थाली में अपने आपको रखने में सहमत नहीं हुआ, समर्पण के विषय उसकी समझ शिक्षाप्रद है जिससे मैं पूरे मन से परमेश्वर का अनुसरण करना सीखता हूँ l
यहूदा के राजा, आसा ने अपने राज्य को बचाने के लिए, इस्राएल और आराम के राजाओं के साथ संधि को तोड़ना चाहा l उसने आराम के राजा, बेन्हदद का समर्थन पाने के लिए, अपने धन के साथ-साथ “यहोवा के भवन ... में से चाँदी-सोना [निकालकर]” उसके पास भेजा(2 इतिहास 16:2) l बेन्हदद सहमत हो गया और उनकी संयुक्त सेना ने इस्राएल को मार भगाया l
किन्तु नबी हनानी ने आसा को परमेश्वर पर, जिसने दूसरे शत्रुओं को उनके अधीन कर दिया था, की जगह मानवीय सहायता पर भरोसा करने के कारण उसे मुर्ख संबोधित किया l हनानी ने दावा किया, “यहोवा की दृष्टि सारी पृथ्वी पर इसलिए फिरती रहती है कि जिसका मन उसकी ओर निष्कपट रहता है, उनकी सहायता में वह अपनी सामर्थ्य दिखाए l पद.9) l
अपनी लड़ाई और चुनौतियों का सामना करते हुए, हमेशा याद रखें कि परमेश्वर ही हमारा सबसे उत्तम मित्र है l जब हम पूरे मन से उसके लिए समर्पित होते हैं वह हमें सामर्थी बनाता है l