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Articles by लौरेंस दरमानी

पुल निर्माण

हमारे पड़ोस में, हमारे घर के चारोंओर कंक्रीट की ऊँची दीवारें हैं l इनमें से कई एक दीवारों के उपरी भाग पर कटीले तार लगे हैं जिनमें विद्युत् प्रवाहित होती है l उद्देश्य? चोरों को दूर रखने के लिए l

हमारे इलाके में अक्सर विद्युत् कटौती की समस्या रहती है l इससे सामने के फाटक की घंटी नहीं बजती है l इसके कारण विद्युत् कटौती के समय कोई भी आगंतुक को चिलचिलाती धुप और मूसलाधार बारिश में बाहर खड़े रहना पड़ सकता है l घंटी बजने के बाद भी, आगंतुक को पहचानना ज़रूरी होता है l हमारी दीवारों का उद्देश्य अच्छा है, किन्तु वे भेदभाव की दीवारें भी बन सकती हैं – बावजूद इसके कि आगंतुक बिना अधिकार के प्रवेश करनेवाला नहीं है l

कूँए पर यीशु से मुलाकात करनेवाली स्त्री भी इस प्रकार के भेदभाव का सामना कर रही थी l यहूदियों को सामरियों से कुछ लेना देना नहीं था l यीशु के उससे पानी मांगने पर, उसने कहा, “तू यहूदी होकर मुझ सामरी से पानी क्यों मांगता है?” (यूहन्ना 4:9) l यीशु से बात करते हुए उसने जीवन परिवर्तन का अनुभव किया जिससे वह और उसके पड़ोसी प्रभावित हो गए (पद.39-42) l यीशु वह पुल/सेतु बन गया जिससे शत्रुता और पक्षपात की दीवारें टूट गयीं l

भेदभाव करने का प्रलोभन वास्तविक है, जिसे हमें अपने जीवनों में पहचानना होगा l जिस प्रकार यीशु ने दिखाया, हम नागरिकता, सामाजिक दर्जा, अथवा लोकमत/प्रसिद्धि से ऊपर उठकर सभी लोगों तक पहुँच सकते हैं l वह पुल/सेतु बनाने(जोड़ने) आया l

वह हमें जानता है

क्यापरमेश्वर जानता था कि मैं रात में गाड़ी चलाकर 100 मील दूर अपने गाँव जा रहा था? मैं जिस स्थिति में था, वह बताना सरल नहीं है l मुझे तेज़ बुखार था और मेरे सर में दर्द l मैंने प्रार्थना की, “प्रभु, मैं जानता हूँ कि आप मेरे साथ हैं, किन्तु मैं पीड़ा में हूँ!”

थका हुआ और कमज़ोर, मैंने अपनी गाड़ी एक छोटे गाँव के निकट सड़क के किनारे खड़ी कर दी l दस मिनट के बाद, मैंने एक आवाज़ सुनी l “हेल्लो, क्या आपको कोई मदद चाहिए?” एक व्यक्ति मित्रों के साथ उस गाँव से आकर बोला l उनकी उपस्थिति अच्छी लगी l मैं उनसे उनके गाँव का नाम ना मी न्याला(अर्थात्, “राजा मेरे विषय जानता है!”), सुनकर चकित हुआ l मैं बगैर रुके इस गाँव से कई बार गुज़रा था l इस बार, प्रभु ने मुझे याद दिलाने के लिए इस गाँव के नाम का उपयोग किया कि, वास्तव में, सड़क पर मेरी पीड़ादायक स्थिति में राजा मेरे साथ था l उत्साहित होकर, मैं निकट के दवाखाना की ओर आगे बढ़ गया l

हमारी परिस्थिति के बावजूद, हमारे दैनिक कामों में जो हम अलग-अलग स्थानों और स्थितियों में करते हैं, परमेश्वर हमें पूरी तरह जानता है (भजन 139:1-4, 7-12) l वह हमें न छोड़ता है न भूलता है; न ही वह इतना व्यस्त है कि हमारा परवाह न करे l परेशानी में या कठिन स्थितियों में अर्थात “रात” और “दिन” (पद 11-12), हम उसकी उपस्थिति से छिपे हुए नहीं हैं l यह सच्चाई हमें इतनी आशा और निश्चयता देती है कि हम प्रभु की प्रसंशा कर सकते हैं जिसने हमें सावधानी से रचा है और सम्पूर्ण जीवन में अगुवाई करता है (पद.14) l

परमेश्वर की भलाइयों की प्रशंसा

हमारे बाइबल अध्ययन समूह के एक व्यक्ति ने सलाह दी, “आइये हम अपने भजन लिखें!” पहले तो कुछ लोगों ने विरोध किया कि उनके पास लिखने का गुण नहीं है,  किन्तु कुछ प्रोत्साहन के बाद हर एक ने अपने जीवन में परमेश्वर के कार्य का वर्णन करते हुए एक मार्मिक काव्यात्मक गीत लिखा l परीक्षा, सुरक्षा, प्रबन्ध, पीड़ा और आँसू के परिणाम स्वरुप  निकले स्थायी संदेशों ने हमारे भजनों को चिताकर्षक प्रसंग दिए l भजन 136 की तरह, प्रत्येक भजन ने दर्शाया कि परमेश्वर की करुणा सदा की है  l  

हममें से हर एक के पास परमेश्वर के प्रेम की कहानी है – चाहे हम उसे लिखते हैं या गाते हैं या बताते हैं l कुछ लोगों के लिए, हमारे अनुभव रोमांचक अथवा भावुक हो सकते हैं – भजन 136 के लेखक की तरह जिसने याद किया कि किस तरह परमेश्वर ने अपने लोगों को दासत्व से छुड़ा कर अपने दुश्मनों पर विजय प्राप्त की (पद.10-15) l अन्य लोग केवल परमेश्वर की अद्भुत सृष्टि का वर्णन करेंगे; जिसने “अपनी बुद्धि से आकाश बनाया . . . पृथ्वी को जल के ऊपर फैलाया . . . बड़ी बड़ी ज्योतियाँ बनायीं, - . . . दिन पर प्रभुता करने के लिए सूर्य को बनाया . . . और रात पर प्रभुता करने के लिए चंद्रमा और तारागन को बनाया” (पद.5-9) l

यह याद करना कि परमेश्वर कौन है और उसने क्या किया प्रशंसा और धन्यवाद लेकर आता है जिससे उसकी महिमा होती है l तब हम प्रभु की भलाइयों के विषय जिसकी करुणा सदा की है  -  “आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत”  गाते हैं (इफिसियों 5:19) l

परमेश्वर और उसके कार्यों को स्मरण करने का परिणाम प्रशंसा और धन्यवाद होता है जिससे वह महिमामंडित होता है l तब हम प्रभु की भलाइयों का जिसकी करुणा सदा की है “आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाया [करें]” (इफि.5:19) l परमेश्वर के प्रेम के अपने अनुभव को अपनी प्रशंसा के गीत बनाइये और उसके अनवरत भलाइयों का आनंद उठाइये l

दुख में सामर्थ

18 वर्षीय सैमी के यीशु को उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करने पर, उसके परिवार ने उसे त्याग दिया क्योंकि उनकी परंपरा भिन्न विश्वास की थी। परंतु मसीही समुदाय ने उसे प्रोत्साहन दिया, और शिक्षा के लिए आर्थिक समर्थन देकर उसका स्वागत किया। उसकी गवाही के एक पत्रिका में प्रकाशित होने पर उसका सताव और बढ़ गया।

परंतु जब संभव होता सैमी परिवार से मिलने जाता और अपने पिता से बातें करता। हालाँकि, उसके भाई-बहन उसे परिवार के मामलों में भाग लेने से रोकते। पिता की बीमारी पर उसने परिवार की नाराजगी को नज़रअंदाज़ करके चंगाई के लिए प्रार्थनाएं करते हुए, पिता की सेवा की। जब परमेश्वर ने उन्हें चंगा कर दिया तो परिवार सैमी के प्रति स्नेह दिखाने लगा। समय के साथ उसकी प्रेममई गवाही से उसके प्रति उनका व्यवहार नर्म हुआ-और कुछ परिजन यीशु के बारे में सुनने के लिए इच्छुक हो गए। 

मसीह का अनुसरण करने का हमारा निर्णय कठिनाइयों ला सकता है। पतरस ने लिखा,  “क्योंकि यदि कोई...(1 पतरस 2:19)। विश्वास के कारण जब हम दुख उठाते हैं तो हम ऐसा इसलिए करते हैं, “क्योंकि मसीह भी...(पद 21)। 

जब दूसरों ने उनका अपमान किया, “वह गाली सुन कर...(पद 23)। दुख उठाने का हमारा उदाहरण यीशु हैं। सामर्थ पाने के लिए हम उनके पास आ सकते हैं।

दौड़ ज़ारी रखना

अपने कार्यालय की इमारत के पास कंक्रीट स्लैब की दरार में से एक खूबसूरत फूल को पनपते देखकर मैं आश्चर्यचकित था। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद इस नन्हें पौधे को पैर जमाने का स्थान मिल गया था। सूखी दरार में जड़े जमाकर यह फल-फूल रहा था। मैंने देखा कि पौधे के ठीक ऊपर लगे एक एयर कंडीशनिंग यूनिट से पूरे दिन उसपरर पानी गिरता रहता है। विपरीत परिवेश में भी पौधे को उस पानी से वह मदद मिल गई थी जिसकी उसे आवश्यकता थी।

मसीही जीवन में कभी-कभी विकास कठिन लगता है परन्तु जब हम मसीह के साथ दृढ़ता से बने रहेंगे तब बाधाएं पार करना आसन होगा। चाहे हमारी परिस्थितियां प्रतिकूल हों और हम निराश हों तो भी परमेश्वर के साथ अपने संबंध में आगे बढ़ते रहने से हम उस पौधे के समान फलवंत हो सकते हैं। गंभीर कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना होने पर भी प्रेरित पौलुस ने हार नहीं मानी (2 कुरिन्थियों 11:23-27)। “मैं...उस पदार्थ को पकड़ने के लिये दौड़ता हूं...,” उसने लिखा “मैं निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं, ताकि इनाम पाऊं।” (फिलिप्पियों 3:12,14)

पौलुस ने अनुभव किया कि वह प्रभु में...सब कुछ कर सकते हैं (4:13), हम भी उनकी मदद से दौड़ जारी रख सकते हैं जो हमें सामर्थ देते हैं।

परमेश्वर के निकट जाना

प्रार्थना को इच्छुक एक स्त्री ने एक कुर्सी खींचकर उसके आगे घुटने टेक ली l “रोते हुए, वह बोली, “मेरे स्वर्गिक पिता, मेरे निकट बैठिये; हम दोनों को बात करना ज़रूरी है!” तब, खाली कुर्सी की ओर देखकर, उसने प्रार्थना किया l उसने परमेश्वर के निकट जाने में भरोसा जताया; उसने परमेश्वर को कुर्सी पर बैठे हुए कल्पना करके विश्वास की कि वह उसका निवेदन सुन रहा है l

परमेश्वर के साथ समय एक विशेष क्षण होता है जब हम सर्वशक्तिमान को उसमें शामिल करते हैं l एक आपसी भागीदारी में जब हम परमेश्वर के निकट जाते हैं (याकूब 4:8) l वह भी हमारे निकट आता है l उसने हमें आश्वस्त किया है, “मैं ... सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20) l हमारा स्वर्गिक पिता सदेव हमारा इंतज़ार करके हमारी सुनना चाहता है l

कितनी बार थके, निद्रालु, बीमार, और निर्बल होने के कारण हम प्रार्थना करने में संघर्ष करते हैं l किन्तु यीशु हमारी दुर्बलता और परीक्षाओं में हमसे सहानुभूति रखता है (इब्रा. 4:15) l इसलिए हम “अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बांधकर चलें कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएँ जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे (पद.16) l

सभी परिस्थितियों में

हम अपने उपनगर में निरंतर बिजली कटौती के विषय शिकायत करते हैं l  सप्ताह में तीन बार चौबीस घंटों के लिए, हमारा पड़ोस अन्धकार में डूबा होता है l घरेलु उपकरण उपयोग नहीं कर पाने की स्थिति में यह असुविधा अत्यंत असहनीय है l

मेरी मसीही पड़ोसन अक्सर पूछती है, “क्या हम इसके लिए भी धन्यवाद दें?” वह 1 थिस्सलुनीकियों 5:18  दोहराती है : “हर बात में धन्यवाद करो; क्योंकि तुम्हारे लिए मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है l” हम हमेशा कहते हैं, “बिल्कुल सच, हम हर बात में धन्यवाद देते हैं l” किन्तु जिस आधे मन से हम ऐसा कहते हैं, हर बार बिजली जाने पर हमारा  कुड़कुड़ाना इसका खण्डन करता है l

एक दिन, हालाँकि, हर बात में परमेश्वर को धन्यवाद देने  के हमारे विश्वास ने नया अर्थ हासिल किया l कार्य से घर लौटने पर मैंने अपने पड़ोसन को वास्तव में कांपते हुए कहते देखा, “यीशु आपका धन्यवाद कि बिजली बंद थी l मेरे घर के साथ हम सब नाश हो जाते !”

एक कचरा-वाहन के घर के सामने लगे बिजली खम्भे से टकराने से हाई-टेंशन तार अनेक घरों पर गिरे l बिजली रहने से, विनाश हो सकता था l

कठिन परिस्थितियाँ “धन्यवाद प्रभु” कहने में कठिनाई उत्पन्न करती हैं l हम परमेश्वर को धन्यवाद दें जो हर स्थिति को उस पर भरोसा करने का अवसर बनाता है–चाहे हम उसके  उद्देश्य को देखें या न देखें l

अपने बोझ नीचे रख दें

गाँव की सड़क पर एक व्यक्ति अपनी छोटी ट्रक से जाते हुए एक महिला को बोझ उठाकर जाते देखकर, उसे अपने वाहन में बुलाया l महिला धन्यवाद देकर वाहन में सवार हो गई l

कुछ क्षण बाद, उस व्यक्ति ने उस महिला को उसके वाहन में बैठे हुए अभी भी बोझ उठाए हुए पाया! चकित होकर उसने कहा, “कृपया अपना बोझ नीचे रख कर आराम से बैठें l मेरा वाहन आपको और आपकी बोझ को उठाने में सक्षम है l”

हम जीवन के अनेक चुनौतियों के मध्य अक्सर भय, चिंता और घबराहट के बोझ के साथ क्या करते हैं? प्रभु में विश्राम करने की बजाए, मैं कभी-कभी उस महिला की तरह आचरण करता हूँ l यीशु ने कहा, “हे सब परिश्रम करनेवालों और बोझ से दबे हुए लोगों, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूंगा” (मत्ती 11:28), फिर भी जो बोझ यीशु को देना चाहिए, मैं उठाते देखा जाता हूँ l

हम प्रार्थना में अपने बोझ प्रभु के पास लाकर उतार देते हैं l प्रेरित पतरस कहते हैं, “अपनी सारी चिंता [यीशु] पर डाल दो, क्योंकि उसको तुम्हारा ध्यान है” (1 पतरस 5:7) l क्योंकि वह हमारी चिंता करता है, हम उसमें भरोसा करना सीखते हुए विश्राम करके आराम पाते हैं l हमें दबाने और श्रमित करने वाले को उठाने की जगह, हम उसे प्रभु को उठाने हेतु दें l

सुख का दूसरा पहलु

हमारे व्यस्क कैंप की विषय-वस्तु थी, “मेरे लोगों को सुख दें l” सभी उपदेशकों ने आश्वास किया l किन्तु अंतिम उपदेशक का स्वर कठोर था l उन्होंने यिर्मयाह 7:1-11 से कहा  “नींद से जागें l” उन्होंने स्पष्टता और प्रेम से, नींद से जागकर  पाप से फिरने की चुनौती दी l

उन्होंने नबी यिर्मयाह समान नसीहत दी, “परमेश्वर के अनुग्रह के पीछे न छिपें और गुप्त पाप छोड़ें l” “हम गर्व करते हैं, ‘मैं मसीही हूँ; परमेश्वर मुझसे प्रेम करता है; मैं बुराई से डरता नहीं,’ फिर भी हम बुराईयाँ करते हैं l”

हमें ज्ञात था वह हमारे विषय चिंतित था, फिर भी हम उसकी घोषणा से अपनी सीटों पर बेचैन थे, “परमेश्वर प्रेमी और भस्म करनेवाली आग भी है! (देखें इब्रा. 2:29) l वह पाप को माफ़ नहीं करेगा!”

प्राचीन यिर्मयाह लोगों को घबरा किया, “तुम जो चोरी, हत्या और व्यभिचार करते, झूठी शपथ खाते ...दूसरे देवताओं के पीछे ... चलते हो, तो क्या यह उचित है कि तुम इस भवन में आओ जो मेरा कहलाता है, और मेरे सामने ... कहो, ‘हम छूट गए हैं,’ कि ये सब घृणित काम करें?” (7:9-10) l

इस उपदेशक का किस्म “मेरे लोगों को सुख दें” परमेश्वर के सुख का दूसरा पहलु था l जैसे एक कड़वी  औषधि मलेरिया ठीक करती है, उसके शब्द आत्मिक स्वास्थ्य देनेवाले थे l कठोर शब्द सुनते समय, मुहं न फेरकर, उसके स्वास्थ्यवर्धक प्रभाव को अपनाएं l