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Articles by लौरेंस दरमानी

उसकी उपस्थिति

चिंतित पिता और उसका किशोर पुत्र मनोचिकित्सक के सामने बैठे थे l “मनोचिकित्सक ने पूछा, “आपका बेटा कितना दूर जानेवाला है?” उस व्यक्ति का उत्तर था, “उस बड़े शहर में, और वह बहुत समय तक वहाँ रहेगा l” पिता को एक ताबीज देते हुए, उसने कहा, “यह उसकी हर जगह रक्षा करेगा l”
हालाँकि, मैं ही वह लड़का था, मनोचिकित्सक और उसकी ताबीज मेरे लिए कुछ भी नहीं कर सके l उस शहर में रहते हुए, मैंने यीशु में विश्वास किया l मैंने वह ताबीज फेंककर मसीह में विश्वास कर लिया l मेरे जीवन में मसीह का होना परमेश्वर की उपस्थिति की गारंटी थी l
तीस वर्ष बाद, अब मेरे पिता विश्वासी हैं, मेरे भाई को हॉस्पिटल ले जाते समय उन्होंने मुझसे कहा, आओ पहले प्रार्थना करें; परमेश्वर का आत्मा तुम्हारे साथ जाएगा और सम्पूर्ण मार्ग में तुम्हारे साथ रहेगा!” हमने सीखा है कि परमेश्वर की उपस्थिति और सामर्थ्य ही हमारी सुरक्षा है l
मूसा ने ऐसा ही पाठ सीखा l उसे परमेश्वर ने एक चुनौतीपूर्ण कार्य सौंपा था - लोगों को मिस्र के दासत्व से निकालकर प्रतिज्ञात देश में पहुँचाना (निर्गमन 3:10) l किन्तु परमेश्वर ने उसे आश्वास्त किया, “मैं आप ही तेरे साथ चलूँगा” (पद.12) l
हमारी यात्रा में चुनौतियों का अभाव नहीं है, किन्तु हमें परमेश्वर की उपस्थिति की निश्चयता प्राप्त है l जिस प्रकार यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, “देखो मैं जगत के अंत तक सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20 l

शब्दों से कहीं बढ़कर

एक स्थानीय अफ़्रीकी भाषा में अनुदित बाइबल के समर्पण समारोह में, उस क्षेत्र के मुखिया को उनकी प्रति भेंट की गयी l प्रशंसा में, उन्होंने बाइबल को स्वर्ग की ओर ऊपर उठाकर चिल्लाया, “अब हम जान गए हैं कि परमेश्वर हमारी भाषा समझता है! हम अपनी मातृभाषा में बाइबल पढ़ सकते हैं l”
हमारी भाषा से हटकर भी, हमारा स्वर्गिक पिता समझता है l किन्तु अक्सर हम अपनी गहरी इच्छाएँ उसको बताने में अक्षम होते हैं l प्रेरित पौलुस हमें अपनी भावनाओं से ऊपर उठकर प्रार्थना करने के लिए उत्साहित करता है l पौलुस हमारे दुखी संसार और हमारे दुःख के विषय कहता है : “सारी सृष्टि अब तक मिलकर कराहती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है” (रोमियों 8:22), और वह उसकी तुलना हमारे पक्ष में पवित्र आत्मा के कार्य के साथ करता है l वह लिखता है, “आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है : क्योंकि हम नहीं जानते कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए, परन्तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर, जो ब्यान से बाहर है, हमारे लिए विनती करता है” (पद.26) l
परमेश्वर का पवित्र आत्मा हमें निकटता से जानता है l वह हमारी इच्छाएं, हमारे मन की भाषा, और हमारे अनकहे शब्दों को जानता है, और परमेश्वर के साथ हमारी बातचीत में सहायता करता है l उसका आत्मा हमें परमेश्वर पुत्र की छवि में रूपांतरित होने के लिए अपनी ओर आकर्षित करता है (पद.29) l
हमारा स्वर्गिक पिता हमारी भाषा समझता है और हमसे अपने वचन के द्वारा बातचीत करता है l जब हमें हमारी प्रार्थनाएं दुर्बल या बहुत छोटी महसूस हो, उसका आत्मा हमारे द्वारा पिता से बातचीत करने में हमारी मदद करता है l उसकी इच्छा है कि हम प्रार्थना में उससे बातचीत करें l

पुल निर्माण

हमारे पड़ोस में, हमारे घर के चारोंओर कंक्रीट की ऊँची दीवारें हैं l इनमें से कई एक दीवारों के उपरी भाग पर कटीले तार लगे हैं जिनमें विद्युत् प्रवाहित होती है l उद्देश्य? चोरों को दूर रखने के लिए l

हमारे इलाके में अक्सर विद्युत् कटौती की समस्या रहती है l इससे सामने के फाटक की घंटी नहीं बजती है l इसके कारण विद्युत् कटौती के समय कोई भी आगंतुक को चिलचिलाती धुप और मूसलाधार बारिश में बाहर खड़े रहना पड़ सकता है l घंटी बजने के बाद भी, आगंतुक को पहचानना ज़रूरी होता है l हमारी दीवारों का उद्देश्य अच्छा है, किन्तु वे भेदभाव की दीवारें भी बन सकती हैं – बावजूद इसके कि आगंतुक बिना अधिकार के प्रवेश करनेवाला नहीं है l

कूँए पर यीशु से मुलाकात करनेवाली स्त्री भी इस प्रकार के भेदभाव का सामना कर रही थी l यहूदियों को सामरियों से कुछ लेना देना नहीं था l यीशु के उससे पानी मांगने पर, उसने कहा, “तू यहूदी होकर मुझ सामरी से पानी क्यों मांगता है?” (यूहन्ना 4:9) l यीशु से बात करते हुए उसने जीवन परिवर्तन का अनुभव किया जिससे वह और उसके पड़ोसी प्रभावित हो गए (पद.39-42) l यीशु वह पुल/सेतु बन गया जिससे शत्रुता और पक्षपात की दीवारें टूट गयीं l

भेदभाव करने का प्रलोभन वास्तविक है, जिसे हमें अपने जीवनों में पहचानना होगा l जिस प्रकार यीशु ने दिखाया, हम नागरिकता, सामाजिक दर्जा, अथवा लोकमत/प्रसिद्धि से ऊपर उठकर सभी लोगों तक पहुँच सकते हैं l वह पुल/सेतु बनाने(जोड़ने) आया l

वह हमें जानता है

क्यापरमेश्वर जानता था कि मैं रात में गाड़ी चलाकर 100 मील दूर अपने गाँव जा रहा था? मैं जिस स्थिति में था, वह बताना सरल नहीं है l मुझे तेज़ बुखार था और मेरे सर में दर्द l मैंने प्रार्थना की, “प्रभु, मैं जानता हूँ कि आप मेरे साथ हैं, किन्तु मैं पीड़ा में हूँ!”

थका हुआ और कमज़ोर, मैंने अपनी गाड़ी एक छोटे गाँव के निकट सड़क के किनारे खड़ी कर दी l दस मिनट के बाद, मैंने एक आवाज़ सुनी l “हेल्लो, क्या आपको कोई मदद चाहिए?” एक व्यक्ति मित्रों के साथ उस गाँव से आकर बोला l उनकी उपस्थिति अच्छी लगी l मैं उनसे उनके गाँव का नाम ना मी न्याला(अर्थात्, “राजा मेरे विषय जानता है!”), सुनकर चकित हुआ l मैं बगैर रुके इस गाँव से कई बार गुज़रा था l इस बार, प्रभु ने मुझे याद दिलाने के लिए इस गाँव के नाम का उपयोग किया कि, वास्तव में, सड़क पर मेरी पीड़ादायक स्थिति में राजा मेरे साथ था l उत्साहित होकर, मैं निकट के दवाखाना की ओर आगे बढ़ गया l

हमारी परिस्थिति के बावजूद, हमारे दैनिक कामों में जो हम अलग-अलग स्थानों और स्थितियों में करते हैं, परमेश्वर हमें पूरी तरह जानता है (भजन 139:1-4, 7-12) l वह हमें न छोड़ता है न भूलता है; न ही वह इतना व्यस्त है कि हमारा परवाह न करे l परेशानी में या कठिन स्थितियों में अर्थात “रात” और “दिन” (पद 11-12), हम उसकी उपस्थिति से छिपे हुए नहीं हैं l यह सच्चाई हमें इतनी आशा और निश्चयता देती है कि हम प्रभु की प्रसंशा कर सकते हैं जिसने हमें सावधानी से रचा है और सम्पूर्ण जीवन में अगुवाई करता है (पद.14) l

परमेश्वर की भलाइयों की प्रशंसा

हमारे बाइबल अध्ययन समूह के एक व्यक्ति ने सलाह दी, “आइये हम अपने भजन लिखें!” पहले तो कुछ लोगों ने विरोध किया कि उनके पास लिखने का गुण नहीं है,  किन्तु कुछ प्रोत्साहन के बाद हर एक ने अपने जीवन में परमेश्वर के कार्य का वर्णन करते हुए एक मार्मिक काव्यात्मक गीत लिखा l परीक्षा, सुरक्षा, प्रबन्ध, पीड़ा और आँसू के परिणाम स्वरुप  निकले स्थायी संदेशों ने हमारे भजनों को चिताकर्षक प्रसंग दिए l भजन 136 की तरह, प्रत्येक भजन ने दर्शाया कि परमेश्वर की करुणा सदा की है  l  

हममें से हर एक के पास परमेश्वर के प्रेम की कहानी है – चाहे हम उसे लिखते हैं या गाते हैं या बताते हैं l कुछ लोगों के लिए, हमारे अनुभव रोमांचक अथवा भावुक हो सकते हैं – भजन 136 के लेखक की तरह जिसने याद किया कि किस तरह परमेश्वर ने अपने लोगों को दासत्व से छुड़ा कर अपने दुश्मनों पर विजय प्राप्त की (पद.10-15) l अन्य लोग केवल परमेश्वर की अद्भुत सृष्टि का वर्णन करेंगे; जिसने “अपनी बुद्धि से आकाश बनाया . . . पृथ्वी को जल के ऊपर फैलाया . . . बड़ी बड़ी ज्योतियाँ बनायीं, - . . . दिन पर प्रभुता करने के लिए सूर्य को बनाया . . . और रात पर प्रभुता करने के लिए चंद्रमा और तारागन को बनाया” (पद.5-9) l

यह याद करना कि परमेश्वर कौन है और उसने क्या किया प्रशंसा और धन्यवाद लेकर आता है जिससे उसकी महिमा होती है l तब हम प्रभु की भलाइयों के विषय जिसकी करुणा सदा की है  -  “आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत”  गाते हैं (इफिसियों 5:19) l

परमेश्वर और उसके कार्यों को स्मरण करने का परिणाम प्रशंसा और धन्यवाद होता है जिससे वह महिमामंडित होता है l तब हम प्रभु की भलाइयों का जिसकी करुणा सदा की है “आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाया [करें]” (इफि.5:19) l परमेश्वर के प्रेम के अपने अनुभव को अपनी प्रशंसा के गीत बनाइये और उसके अनवरत भलाइयों का आनंद उठाइये l

दुख में सामर्थ

18 वर्षीय सैमी के यीशु को उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करने पर, उसके परिवार ने उसे त्याग दिया क्योंकि उनकी परंपरा भिन्न विश्वास की थी। परंतु मसीही समुदाय ने उसे प्रोत्साहन दिया, और शिक्षा के लिए आर्थिक समर्थन देकर उसका स्वागत किया। उसकी गवाही के एक पत्रिका में प्रकाशित होने पर उसका सताव और बढ़ गया।

परंतु जब संभव होता सैमी परिवार से मिलने जाता और अपने पिता से बातें करता। हालाँकि, उसके भाई-बहन उसे परिवार के मामलों में भाग लेने से रोकते। पिता की बीमारी पर उसने परिवार की नाराजगी को नज़रअंदाज़ करके चंगाई के लिए प्रार्थनाएं करते हुए, पिता की सेवा की। जब परमेश्वर ने उन्हें चंगा कर दिया तो परिवार सैमी के प्रति स्नेह दिखाने लगा। समय के साथ उसकी प्रेममई गवाही से उसके प्रति उनका व्यवहार नर्म हुआ-और कुछ परिजन यीशु के बारे में सुनने के लिए इच्छुक हो गए। 

मसीह का अनुसरण करने का हमारा निर्णय कठिनाइयों ला सकता है। पतरस ने लिखा,  “क्योंकि यदि कोई...(1 पतरस 2:19)। विश्वास के कारण जब हम दुख उठाते हैं तो हम ऐसा इसलिए करते हैं, “क्योंकि मसीह भी...(पद 21)। 

जब दूसरों ने उनका अपमान किया, “वह गाली सुन कर...(पद 23)। दुख उठाने का हमारा उदाहरण यीशु हैं। सामर्थ पाने के लिए हम उनके पास आ सकते हैं।

दौड़ ज़ारी रखना

अपने कार्यालय की इमारत के पास कंक्रीट स्लैब की दरार में से एक खूबसूरत फूल को पनपते देखकर मैं आश्चर्यचकित था। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद इस नन्हें पौधे को पैर जमाने का स्थान मिल गया था। सूखी दरार में जड़े जमाकर यह फल-फूल रहा था। मैंने देखा कि पौधे के ठीक ऊपर लगे एक एयर कंडीशनिंग यूनिट से पूरे दिन उसपरर पानी गिरता रहता है। विपरीत परिवेश में भी पौधे को उस पानी से वह मदद मिल गई थी जिसकी उसे आवश्यकता थी।

मसीही जीवन में कभी-कभी विकास कठिन लगता है परन्तु जब हम मसीह के साथ दृढ़ता से बने रहेंगे तब बाधाएं पार करना आसन होगा। चाहे हमारी परिस्थितियां प्रतिकूल हों और हम निराश हों तो भी परमेश्वर के साथ अपने संबंध में आगे बढ़ते रहने से हम उस पौधे के समान फलवंत हो सकते हैं। गंभीर कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना होने पर भी प्रेरित पौलुस ने हार नहीं मानी (2 कुरिन्थियों 11:23-27)। “मैं...उस पदार्थ को पकड़ने के लिये दौड़ता हूं...,” उसने लिखा “मैं निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं, ताकि इनाम पाऊं।” (फिलिप्पियों 3:12,14)

पौलुस ने अनुभव किया कि वह प्रभु में...सब कुछ कर सकते हैं (4:13), हम भी उनकी मदद से दौड़ जारी रख सकते हैं जो हमें सामर्थ देते हैं।

परमेश्वर के निकट जाना

प्रार्थना को इच्छुक एक स्त्री ने एक कुर्सी खींचकर उसके आगे घुटने टेक ली l “रोते हुए, वह बोली, “मेरे स्वर्गिक पिता, मेरे निकट बैठिये; हम दोनों को बात करना ज़रूरी है!” तब, खाली कुर्सी की ओर देखकर, उसने प्रार्थना किया l उसने परमेश्वर के निकट जाने में भरोसा जताया; उसने परमेश्वर को कुर्सी पर बैठे हुए कल्पना करके विश्वास की कि वह उसका निवेदन सुन रहा है l

परमेश्वर के साथ समय एक विशेष क्षण होता है जब हम सर्वशक्तिमान को उसमें शामिल करते हैं l एक आपसी भागीदारी में जब हम परमेश्वर के निकट जाते हैं (याकूब 4:8) l वह भी हमारे निकट आता है l उसने हमें आश्वस्त किया है, “मैं ... सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20) l हमारा स्वर्गिक पिता सदेव हमारा इंतज़ार करके हमारी सुनना चाहता है l

कितनी बार थके, निद्रालु, बीमार, और निर्बल होने के कारण हम प्रार्थना करने में संघर्ष करते हैं l किन्तु यीशु हमारी दुर्बलता और परीक्षाओं में हमसे सहानुभूति रखता है (इब्रा. 4:15) l इसलिए हम “अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बांधकर चलें कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएँ जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे (पद.16) l

सभी परिस्थितियों में

हम अपने उपनगर में निरंतर बिजली कटौती के विषय शिकायत करते हैं l  सप्ताह में तीन बार चौबीस घंटों के लिए, हमारा पड़ोस अन्धकार में डूबा होता है l घरेलु उपकरण उपयोग नहीं कर पाने की स्थिति में यह असुविधा अत्यंत असहनीय है l

मेरी मसीही पड़ोसन अक्सर पूछती है, “क्या हम इसके लिए भी धन्यवाद दें?” वह 1 थिस्सलुनीकियों 5:18  दोहराती है : “हर बात में धन्यवाद करो; क्योंकि तुम्हारे लिए मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है l” हम हमेशा कहते हैं, “बिल्कुल सच, हम हर बात में धन्यवाद देते हैं l” किन्तु जिस आधे मन से हम ऐसा कहते हैं, हर बार बिजली जाने पर हमारा  कुड़कुड़ाना इसका खण्डन करता है l

एक दिन, हालाँकि, हर बात में परमेश्वर को धन्यवाद देने  के हमारे विश्वास ने नया अर्थ हासिल किया l कार्य से घर लौटने पर मैंने अपने पड़ोसन को वास्तव में कांपते हुए कहते देखा, “यीशु आपका धन्यवाद कि बिजली बंद थी l मेरे घर के साथ हम सब नाश हो जाते !”

एक कचरा-वाहन के घर के सामने लगे बिजली खम्भे से टकराने से हाई-टेंशन तार अनेक घरों पर गिरे l बिजली रहने से, विनाश हो सकता था l

कठिन परिस्थितियाँ “धन्यवाद प्रभु” कहने में कठिनाई उत्पन्न करती हैं l हम परमेश्वर को धन्यवाद दें जो हर स्थिति को उस पर भरोसा करने का अवसर बनाता है–चाहे हम उसके  उद्देश्य को देखें या न देखें l