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Articles by लौरेंस दरमानी

ज्योति में चलना

जब चन्द्रमा ओझल हो गया तो जंगल में स्थित हमारा गाँव गहरे अँधेरे में डूब गयाl आकाश में बिजली कौंध रही थी, और फिर वर्षा के साथ आंधी और तीखी कड़कड़ाहट सुनाई देने लगीl मैं जाग रहा था और भयभीत था, और एक बच्चे के रूप में मेरे दिमाग में कल्पनाएँ आ रही थीं कि मानो हर तरह के भयानक दैत्य जैसे मुझ पर टूट पड़ने के लिए तैयार हैं! लेकिन दिन होते ही, सारी आवाज़ें गायब हो गईं, सूर्य उदय हुआ, और धूप में चहचहाते पंछियों के साथ चारों ओर सबकुछ सामान्य और शांत दिखाई देने लगाl रात के भयभीत करने वाले अन्धकार और दिन की रौशनी के आनन्द के बीच का अंतर असाधारण रूप से तीखा थाl    

इब्रानियों का लेखक उस समय को स्मरण करता है जब इस्रालियों ने सीनै पर्वत पर एक ऐसा अनुभव किया जो इतना अन्धकार भरा और प्रचंड था कि वे भयभीत होकर छिप गए (निर्गमन 20:18-19)l उन्हें परमेश्वर की उपस्थिति अन्धकारपूर्ण और भयभीत करने वाली प्रतीत हुई, भले ही उसने इसे व्यवस्था के अपने प्रेमपूर्ण उपहार के रूप में प्रगट किया थाl ऐसा इसलिए था क्योंकि जो इस्राएली थे वे पापी लोग होने के कारण परमेश्वर के मानदंडों पर खरे नहीं उतर पाए थेl अपने पाप के कारण ही उन्हें अन्धकार और भय में होकर चलना पड़ा (इब्रानियों 12:18-21)l

परन्तु परमेश्वर ज्योति है; उस में कुछ भी अन्धकार नहीं (1 यूहन्ना 1:5)l इब्रानियों 12 में, सीनै पर्वत परमेश्वर की पवित्रता और अनाज्ञाकारिता के हमारे पुराने जीवन को दिखाता है, जबकि सीनै पर्वत की सुन्दरता परमेश्वर के अनुग्रह और यीशु में जोकि “नई वाचा का मध्यस्थ है” (पद 22-24), विश्वासियों के नये जीवन को प्रगट करती हैl

जो कोई यीशु के पीछे हो लेगा वह “कभी अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा” (यूहन्ना 8:12)l उसके माध्यम से हम अपने पुराने जीवन के अन्धकार को त्यागकर ज्योति में चलने और उसके राज्य की सुन्दरता के आनन्द का उत्सव मना सकते हैंl

आईने और सुननेवाले

जब मैं काम्पाला, यूगांडा, के अपने होटल से बाहर आया, हमारे सेमीनार के लिए मुझे लेने आयी मेरी परिचारिका ने मुझे एक अजीब मुस्कराहट से देखा l “मजाकिया क्या है?” मैंने पूछा l वह हंस कर पूछी, “क्या आपने अपने बाल में कंघी नहीं की?” अब मेरे हँसने की बारी थी, क्योंकि वास्तव में मैंने अपने बाल में कंघी नहीं की थी l मैंने अपने प्रतिबिम्ब को आईने में देखा था l जो मैंने देखा था उसपर ध्यान क्यों नहीं दिया?

व्यावहारिक समरूपता में, याकूब हमें वचन के अध्ययन को और लाभकारी बनाने हेतु कुछ उपयोगी आयाम देता है l जैसे हम खुद की जाँच करने के लिए आइना में देखते हैं कि कुछ सुधार तो नहीं चाहिए – बाल में कंधी, धुला चेहरा, शर्ट के लगे हुए बटन l आईने की तरह, बाइबल हमें अपना चरित्र, आचरण, विचार, और व्यवहार की जाँच करने में सहायता करती है (याकूब 1:23-24) l यह हमें अपने जीवन परमेश्वर के प्रगट सिद्धांतों के अनुकूल बनाने में सहायता करती है l हम “अपने जीभ पर लगाम” लगाएं (पद.26) और “ अनाथों और विधवाओं के क्लेश में उनकी सुधि लें” (पद.27) l हम अपने अन्दर वास करनेवाले परमेश्वर के पवित्र आत्मा की मानेंगे और अपने को “संसार से निष्कलंक” रखेंगे (पद.27) l

जब हम ध्यानपूर्वक “स्वतंत्रता की सिद्ध व्यवस्था पर ध्यान” करते हैं और अपने जीवनों में लागू करते हैं, तो हम अपने कामों में आशीष पाएंगे (पद.25) l जब हम वचन के आईने में देखते हैं, हम नम्रता से ग्रहण कर सकते हैं जो हमारे “हृदयों में बोया गया” है (पद.21) l  

अकेला क्रिसमस

मैंने अपना सबसे अकेला क्रिसमस उत्तरी घाना के साकोगु के निकट अपने दादा के छोटे घर में बिताया था l मैं केवल पंद्रह वर्ष का था, और मेरे माता-पिता और भाई-बहन एक हज़ार किलोमीटर दूर थे l बीते वर्षों में, जब मैं उनके साथ और गाँव के मित्रों के साथ था, क्रिसमस हमेशा बड़ा और यादगार होता था l किन्तु यह क्रिसमस शांत और अकेला था l जब मैं सुबह क्रिसमस के दिन अपनी चटाई पर लेता हुआ था, मुझे एक स्थानीय गीत याद आ गया : साल ख़त्म हो गया है, क्रिसमस आ गया है; परमेश्वर का बेटा जन्मा है; शांति और आनंद सब के लिए l शोकाकुल ढंग से मैंने इसे बार बार गाया l

मेरे दादा ने आकर मुझसे पूछे, “यह कैसा गीत है?” मेरे दादा क्रिसमस– या मसीह के विषय नहीं जानते थे l इसलिए क्रिसमस के विषय जितना मैं जानता था उन्हें बता दिया l उन क्षणों ने मेरे अकेलेपन को रोशन कर दिया l

केवल भेंड़ और कभी-कभी परभक्षियों के साथ खेतों में, युवक चरवाहा दाऊद ने अकेलापन अनुभव किया l यह एकमात्र समय नहीं रहा होगा l बाद में उसने अपने जीवन में लिखा, “मैं अकेला और दीन हूँ” (भजन 25:16) l लेकिन दाऊद ने अकेलेपन को निराश करने की अनुमति नहीं दिया l इसके बदले, उसका गीत था : मुझे तेरी ही आशा है” (पद.21) l

समय-समय से हम सब अकेलापन का अनुभव करते हैं l आप क्रिसमस में कहीं भी रहें, अकेले या साथ में, आप मसीह के साथ इस मौसम का आनंद ले सकते हैं l

उसकी उपस्थिति

चिंतित पिता और उसका किशोर पुत्र मनोचिकित्सक के सामने बैठे थे l “मनोचिकित्सक ने पूछा, “आपका बेटा कितना दूर जानेवाला है?” उस व्यक्ति का उत्तर था, “उस बड़े शहर में, और वह बहुत समय तक वहाँ रहेगा l” पिता को एक ताबीज देते हुए, उसने कहा, “यह उसकी हर जगह रक्षा करेगा l”
हालाँकि, मैं ही वह लड़का था, मनोचिकित्सक और उसकी ताबीज मेरे लिए कुछ भी नहीं कर सके l उस शहर में रहते हुए, मैंने यीशु में विश्वास किया l मैंने वह ताबीज फेंककर मसीह में विश्वास कर लिया l मेरे जीवन में मसीह का होना परमेश्वर की उपस्थिति की गारंटी थी l
तीस वर्ष बाद, अब मेरे पिता विश्वासी हैं, मेरे भाई को हॉस्पिटल ले जाते समय उन्होंने मुझसे कहा, आओ पहले प्रार्थना करें; परमेश्वर का आत्मा तुम्हारे साथ जाएगा और सम्पूर्ण मार्ग में तुम्हारे साथ रहेगा!” हमने सीखा है कि परमेश्वर की उपस्थिति और सामर्थ्य ही हमारी सुरक्षा है l
मूसा ने ऐसा ही पाठ सीखा l उसे परमेश्वर ने एक चुनौतीपूर्ण कार्य सौंपा था - लोगों को मिस्र के दासत्व से निकालकर प्रतिज्ञात देश में पहुँचाना (निर्गमन 3:10) l किन्तु परमेश्वर ने उसे आश्वास्त किया, “मैं आप ही तेरे साथ चलूँगा” (पद.12) l
हमारी यात्रा में चुनौतियों का अभाव नहीं है, किन्तु हमें परमेश्वर की उपस्थिति की निश्चयता प्राप्त है l जिस प्रकार यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, “देखो मैं जगत के अंत तक सदा तुम्हारे संग हूँ” (मत्ती 28:20 l

शब्दों से कहीं बढ़कर

एक स्थानीय अफ़्रीकी भाषा में अनुदित बाइबल के समर्पण समारोह में, उस क्षेत्र के मुखिया को उनकी प्रति भेंट की गयी l प्रशंसा में, उन्होंने बाइबल को स्वर्ग की ओर ऊपर उठाकर चिल्लाया, “अब हम जान गए हैं कि परमेश्वर हमारी भाषा समझता है! हम अपनी मातृभाषा में बाइबल पढ़ सकते हैं l”
हमारी भाषा से हटकर भी, हमारा स्वर्गिक पिता समझता है l किन्तु अक्सर हम अपनी गहरी इच्छाएँ उसको बताने में अक्षम होते हैं l प्रेरित पौलुस हमें अपनी भावनाओं से ऊपर उठकर प्रार्थना करने के लिए उत्साहित करता है l पौलुस हमारे दुखी संसार और हमारे दुःख के विषय कहता है : “सारी सृष्टि अब तक मिलकर कराहती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है” (रोमियों 8:22), और वह उसकी तुलना हमारे पक्ष में पवित्र आत्मा के कार्य के साथ करता है l वह लिखता है, “आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है : क्योंकि हम नहीं जानते कि प्रार्थना किस रीति से करना चाहिए, परन्तु आत्मा आप ही ऐसी आहें भर भरकर, जो ब्यान से बाहर है, हमारे लिए विनती करता है” (पद.26) l
परमेश्वर का पवित्र आत्मा हमें निकटता से जानता है l वह हमारी इच्छाएं, हमारे मन की भाषा, और हमारे अनकहे शब्दों को जानता है, और परमेश्वर के साथ हमारी बातचीत में सहायता करता है l उसका आत्मा हमें परमेश्वर पुत्र की छवि में रूपांतरित होने के लिए अपनी ओर आकर्षित करता है (पद.29) l
हमारा स्वर्गिक पिता हमारी भाषा समझता है और हमसे अपने वचन के द्वारा बातचीत करता है l जब हमें हमारी प्रार्थनाएं दुर्बल या बहुत छोटी महसूस हो, उसका आत्मा हमारे द्वारा पिता से बातचीत करने में हमारी मदद करता है l उसकी इच्छा है कि हम प्रार्थना में उससे बातचीत करें l

पुल निर्माण

हमारे पड़ोस में, हमारे घर के चारोंओर कंक्रीट की ऊँची दीवारें हैं l इनमें से कई एक दीवारों के उपरी भाग पर कटीले तार लगे हैं जिनमें विद्युत् प्रवाहित होती है l उद्देश्य? चोरों को दूर रखने के लिए l

हमारे इलाके में अक्सर विद्युत् कटौती की समस्या रहती है l इससे सामने के फाटक की घंटी नहीं बजती है l इसके कारण विद्युत् कटौती के समय कोई भी आगंतुक को चिलचिलाती धुप और मूसलाधार बारिश में बाहर खड़े रहना पड़ सकता है l घंटी बजने के बाद भी, आगंतुक को पहचानना ज़रूरी होता है l हमारी दीवारों का उद्देश्य अच्छा है, किन्तु वे भेदभाव की दीवारें भी बन सकती हैं – बावजूद इसके कि आगंतुक बिना अधिकार के प्रवेश करनेवाला नहीं है l

कूँए पर यीशु से मुलाकात करनेवाली स्त्री भी इस प्रकार के भेदभाव का सामना कर रही थी l यहूदियों को सामरियों से कुछ लेना देना नहीं था l यीशु के उससे पानी मांगने पर, उसने कहा, “तू यहूदी होकर मुझ सामरी से पानी क्यों मांगता है?” (यूहन्ना 4:9) l यीशु से बात करते हुए उसने जीवन परिवर्तन का अनुभव किया जिससे वह और उसके पड़ोसी प्रभावित हो गए (पद.39-42) l यीशु वह पुल/सेतु बन गया जिससे शत्रुता और पक्षपात की दीवारें टूट गयीं l

भेदभाव करने का प्रलोभन वास्तविक है, जिसे हमें अपने जीवनों में पहचानना होगा l जिस प्रकार यीशु ने दिखाया, हम नागरिकता, सामाजिक दर्जा, अथवा लोकमत/प्रसिद्धि से ऊपर उठकर सभी लोगों तक पहुँच सकते हैं l वह पुल/सेतु बनाने(जोड़ने) आया l

वह हमें जानता है

क्यापरमेश्वर जानता था कि मैं रात में गाड़ी चलाकर 100 मील दूर अपने गाँव जा रहा था? मैं जिस स्थिति में था, वह बताना सरल नहीं है l मुझे तेज़ बुखार था और मेरे सर में दर्द l मैंने प्रार्थना की, “प्रभु, मैं जानता हूँ कि आप मेरे साथ हैं, किन्तु मैं पीड़ा में हूँ!”

थका हुआ और कमज़ोर, मैंने अपनी गाड़ी एक छोटे गाँव के निकट सड़क के किनारे खड़ी कर दी l दस मिनट के बाद, मैंने एक आवाज़ सुनी l “हेल्लो, क्या आपको कोई मदद चाहिए?” एक व्यक्ति मित्रों के साथ उस गाँव से आकर बोला l उनकी उपस्थिति अच्छी लगी l मैं उनसे उनके गाँव का नाम ना मी न्याला(अर्थात्, “राजा मेरे विषय जानता है!”), सुनकर चकित हुआ l मैं बगैर रुके इस गाँव से कई बार गुज़रा था l इस बार, प्रभु ने मुझे याद दिलाने के लिए इस गाँव के नाम का उपयोग किया कि, वास्तव में, सड़क पर मेरी पीड़ादायक स्थिति में राजा मेरे साथ था l उत्साहित होकर, मैं निकट के दवाखाना की ओर आगे बढ़ गया l

हमारी परिस्थिति के बावजूद, हमारे दैनिक कामों में जो हम अलग-अलग स्थानों और स्थितियों में करते हैं, परमेश्वर हमें पूरी तरह जानता है (भजन 139:1-4, 7-12) l वह हमें न छोड़ता है न भूलता है; न ही वह इतना व्यस्त है कि हमारा परवाह न करे l परेशानी में या कठिन स्थितियों में अर्थात “रात” और “दिन” (पद 11-12), हम उसकी उपस्थिति से छिपे हुए नहीं हैं l यह सच्चाई हमें इतनी आशा और निश्चयता देती है कि हम प्रभु की प्रसंशा कर सकते हैं जिसने हमें सावधानी से रचा है और सम्पूर्ण जीवन में अगुवाई करता है (पद.14) l

परमेश्वर की भलाइयों की प्रशंसा

हमारे बाइबल अध्ययन समूह के एक व्यक्ति ने सलाह दी, “आइये हम अपने भजन लिखें!” पहले तो कुछ लोगों ने विरोध किया कि उनके पास लिखने का गुण नहीं है,  किन्तु कुछ प्रोत्साहन के बाद हर एक ने अपने जीवन में परमेश्वर के कार्य का वर्णन करते हुए एक मार्मिक काव्यात्मक गीत लिखा l परीक्षा, सुरक्षा, प्रबन्ध, पीड़ा और आँसू के परिणाम स्वरुप  निकले स्थायी संदेशों ने हमारे भजनों को चिताकर्षक प्रसंग दिए l भजन 136 की तरह, प्रत्येक भजन ने दर्शाया कि परमेश्वर की करुणा सदा की है  l  

हममें से हर एक के पास परमेश्वर के प्रेम की कहानी है – चाहे हम उसे लिखते हैं या गाते हैं या बताते हैं l कुछ लोगों के लिए, हमारे अनुभव रोमांचक अथवा भावुक हो सकते हैं – भजन 136 के लेखक की तरह जिसने याद किया कि किस तरह परमेश्वर ने अपने लोगों को दासत्व से छुड़ा कर अपने दुश्मनों पर विजय प्राप्त की (पद.10-15) l अन्य लोग केवल परमेश्वर की अद्भुत सृष्टि का वर्णन करेंगे; जिसने “अपनी बुद्धि से आकाश बनाया . . . पृथ्वी को जल के ऊपर फैलाया . . . बड़ी बड़ी ज्योतियाँ बनायीं, - . . . दिन पर प्रभुता करने के लिए सूर्य को बनाया . . . और रात पर प्रभुता करने के लिए चंद्रमा और तारागन को बनाया” (पद.5-9) l

यह याद करना कि परमेश्वर कौन है और उसने क्या किया प्रशंसा और धन्यवाद लेकर आता है जिससे उसकी महिमा होती है l तब हम प्रभु की भलाइयों के विषय जिसकी करुणा सदा की है  -  “आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत”  गाते हैं (इफिसियों 5:19) l

परमेश्वर और उसके कार्यों को स्मरण करने का परिणाम प्रशंसा और धन्यवाद होता है जिससे वह महिमामंडित होता है l तब हम प्रभु की भलाइयों का जिसकी करुणा सदा की है “आपस में भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाया [करें]” (इफि.5:19) l परमेश्वर के प्रेम के अपने अनुभव को अपनी प्रशंसा के गीत बनाइये और उसके अनवरत भलाइयों का आनंद उठाइये l

दुख में सामर्थ

18 वर्षीय सैमी के यीशु को उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करने पर, उसके परिवार ने उसे त्याग दिया क्योंकि उनकी परंपरा भिन्न विश्वास की थी। परंतु मसीही समुदाय ने उसे प्रोत्साहन दिया, और शिक्षा के लिए आर्थिक समर्थन देकर उसका स्वागत किया। उसकी गवाही के एक पत्रिका में प्रकाशित होने पर उसका सताव और बढ़ गया।

परंतु जब संभव होता सैमी परिवार से मिलने जाता और अपने पिता से बातें करता। हालाँकि, उसके भाई-बहन उसे परिवार के मामलों में भाग लेने से रोकते। पिता की बीमारी पर उसने परिवार की नाराजगी को नज़रअंदाज़ करके चंगाई के लिए प्रार्थनाएं करते हुए, पिता की सेवा की। जब परमेश्वर ने उन्हें चंगा कर दिया तो परिवार सैमी के प्रति स्नेह दिखाने लगा। समय के साथ उसकी प्रेममई गवाही से उसके प्रति उनका व्यवहार नर्म हुआ-और कुछ परिजन यीशु के बारे में सुनने के लिए इच्छुक हो गए। 

मसीह का अनुसरण करने का हमारा निर्णय कठिनाइयों ला सकता है। पतरस ने लिखा,  “क्योंकि यदि कोई...(1 पतरस 2:19)। विश्वास के कारण जब हम दुख उठाते हैं तो हम ऐसा इसलिए करते हैं, “क्योंकि मसीह भी...(पद 21)। 

जब दूसरों ने उनका अपमान किया, “वह गाली सुन कर...(पद 23)। दुख उठाने का हमारा उदाहरण यीशु हैं। सामर्थ पाने के लिए हम उनके पास आ सकते हैं।