सामर्थी शिशु
मैंने पहली बार उसे देखा, और रो दिया l वह पालने में सो रहा एक नवजात शिशु ही दिखाई दे रहा था l किन्तु हम जानते थे कि वह कभी नहीं जागेगा l जब तक कि वह यीशु की बाहों में न हो l
वह बहुत महीनों तक जीवित रहा l तब उसकी माँ ने हृदय को अत्यंत कष्ट पहूंचानेवाली ई-मेल भेजी l उसने “उस अत्यंत दुःख के विषय लिखा जो किसी के अन्दर शोक उत्पन्न करता है l” तब वह बोली, “परमेश्वर ने उस छोटे जीवन द्वारा अपने प्रेम के कार्य को कितनी गहराई से हमारे हृदयों में डाला था!” वह कितना सामर्थी जीवन था l”
सामर्थी? वह ऐसा कैसे कह सकती थी?
उस परिवार के इस छोटे प्रिय बच्चे ने उनको और हमको दर्शा दिया था कि हमें सब कुछ के लिए परमेश्वर पर निर्भर रहना है l विशेषकर जब स्थिति अत्यंत ही ख़राब हो! कठिन किन्तु तसल्ली देनेवाला सच यह है कि परमेश्वर हमारे दुःख में हमसे मुलाकात करता है l एक बेटे के खोने का दर्द उसे मालूम है l
हमारे गहरे दुःख में, हम दाऊद के गीतों की ओर ध्यान देते हैं क्योंकि वह अपने दुःख में लिखता है l “मैं कब तक अपने मन ही मन में युक्तियाँ करता रहूँ, और दिन भर अपने हृदय में दुखित रहा करूँ?” उसने पूछा (भजन 13:2) l “मेरी आँखों में ज्योति आने दे, नहीं तो मुझे मृत्यु की नींद आ जाएगी” (पद.3) l फिर भी दाऊद अपने बड़े प्रश्नों को परमेश्वर को सौंप सकता था l “परन्तु मैंने तो तेरी करुणा पर भरोसा रखा है; मेरा हृदय तेरे उद्धार से मगन होगा” (पद.5) l
केवल परमेश्वर ही हमारे सबसे दुखद समयों को सर्वश्रेष्ठ महत्त्व दे सकता है l
भाई- भाई में
मेरा भाई और मैं जिनमें एक वर्ष से भी कम अंतर है, उम्र में बढ़ते हुए बहुत “प्रतियोगी” रहे (अनुवाद : हम लड़ते थे! ) l पिता समझ गए l उनके पास भाई थे l माँ? थोड़ा समझ पायी l
हमारी कहानी उत्पत्ति की पुस्तक में ठीक बैठ सकती थी, जिसे एक अच्छा नाम दिया जा सकता था भाईयों के आपसी झगड़े का संक्षिप्त इतिहास l कैन और हाबिल (उत्प.4); इसहाक और इश्माएल (21:8-10); बिन्यामिन को छोड़कर, यूसुफ और बाकी सब (अध्याय 37) l किन्तु भाईयों की दुश्मनी में याकूब और एसाव अव्वल हैं l
एसाव अपने जुड़वाँ भाई याकूब से दो बार धोखा खाने पर उसकी हत्या करना चाहा (27:41) l दशकों बाद याकूब और एसाव मेल करनेवाले थे (अध्याय 33) l किन्तु उनके वंशज एदोम और इस्राएल राष्ट्र में शत्रुता चलती रही l इस्राएलियों के प्रतिज्ञात देश में प्रवेश करते समय, एदोम धमकी और सेना के साथ उनसे मिला (गिनती 20:14-21) l बहुत बाद में, जब आक्रमणकारियों से यरूशलेम वासी भागने लगे, एदोम ने शरणार्थियों को मारा (ओबद्याह 1: 10-14) l
हमारे लिए सुखकर है कि बाइबिल केवल हमारे टूटेपन की नहीं किन्तु परमेश्वर के छुटकारे की कहानी भी बताती है l यीशु ने सब कुछ बदल दिया और अपने शिष्यों से कहा, “मैं तुम्हें एक नयी आज्ञा देता हूँ कि एक दूसरे से प्रेम रखो” (यूहन्ना 13:34) l तब वह हमारे लिए मर कर उसका अर्थ बता दिया l
बड़े होकर हम दोनों भाई निकट आ गए l परमेश्वर के साथ भी ऐसा है l जब हम उसके द्वारा प्रदत्त क्षमा का उत्तर देते हैं, वह भाई-बहनों के बीच विरोध को भाईचारे के प्रेम में बदल देता है l
संकट में कल्पना की गई
मार्क को वह क्षण याद है जब उसके पिता ने परिवार को बुलाया l कार ख़राब थी, महीने के अंत तक परिवार के पास पैसे नहीं होते l पिता ने प्रार्थना करके परिवार को परमेश्वर पर आशा रखने को कहा l
आज मार्क को परमेश्वर की अद्भुत सहायता याद है l एक मित्र ने कार मरम्मत करवा दी; अनपेक्षित चेक आ गए; घर में भोजन पहुँच गया l परमेश्वर की स्तुति सरल थी l किन्तु परिवार की कृतज्ञता संकट की भट्टी में विकसित हुई थी l
आराधना गीतों को भजन 57 से अत्यधिक प्रेरणा मिली है l जब दाऊद ने कहा, “तू स्वर्ग के ऊपर महान है” (पद.11), हम उसे मध्य पूर्व के अद्भुत रात में आसमान की ओर टकटकी लगाए, अथवा मंदिर की आराधना में गाते हुए कल्पना कर सकते हैं l किन्तु वास्तव में भयभीत दाऊद एक गुफा में छिपा था l
“मेरा प्राण सिंहों के बीच में है,” दाऊद कहता है l ये “मनुष्य” हैं जिनके “दांत बर्छी और तीर” हैं (पद.4) l दाऊद की प्रशंसा संकट से निकली l यद्यपि वह उसकी मृत्यु चाहनेवाले शत्रुओं से घिरा था, दाऊद ने ये अद्भुत शब्द लिखे : “हे परमेश्वर, मेरा मन स्थिर है ... मैं गाऊंगा वरन् भजन कीर्तन करूँगा” (पद.7) l
आज हम हर संकट में, परमेश्वर से मदद प्राप्त कर सकते हैं l तब हम आशा से, उसकी अनंत देखभाल में उसकी बाट जोह सकते हैं l
साँप और तिपहिया साइकिल
वर्षों से मैंने घाना देश की एक कहानी बार-बार बताई है जब मेरा भाई और मैं छोटे थे l मैं याद करता हूँ कि उसने अपनी लोहे की पुरानी तिपहिया साइकिल एक छोटे नाग सांप के ऊपर खड़ी कर दी थी l तिपहिया साइकिल उस सांप के लिए बहुत भारी थी, जो अगले पहिये के नीचे दबा रहा l
किन्तु मेरी मौसी और मेरी माँ की मृत्यु के बाद, हमें माँ का लिखा हुआ एक पुराना पत्र मिला जिसमें इस घटना का वर्णन था l वास्तव में, मैंने सांप के ऊपर साइकिल खड़ी कर दी थी, और मेरा छोटा भाई इसके विषय मेरी माँ से कहने गया था l उन्होंने सचमुच में इस घटना को देखा था और वास्तविक घटना के विषय उनके लिखने से सच्चाई प्रगट हुआ l
इतिहासकार लूका सही शब्दों के महत्त्व को जानता था l उसने समझाया कि “जो पहले ही से इन बातों के देखनेवाले . . . थे” यीशु की कहानी को हम तक पहुँचाया (लूका 1:2) l उसने थियुफिलुस को लिखा, “उन सब बातों का सम्पूर्ण हाल और आरम्भ से ठीक-ठीक जांच करके, उन्हें तेरे लिए क्रमानुसार लिखूं ताकि तू यह जान ले कि वे बातें जिनकी तू ने शिक्षा पायी है, कैसी अटल हैं” (पद.3-4) l लूका का सुसमाचार परिणाम है l उसके बाद, प्रेरितों के काम की पुस्तक के आरंभ में, लूका यीशु के विषय कहता है, “उसने दुःख उठाने के बाद बहुत से पक्के प्रमाणों से अपने आप को उन्हें जीवित दिखाया” (प्रेरितों 1:3) l
हमारा विश्वास अफ़वाह और अभिलाषी सोच पर आधारित नहीं है l वह यीशु के जीवन के लिखित प्रमाणों पर आधारित है, जो परमेश्वर के साथ हमारा मेल कराने आया l उसकी कहानी अटल है l
मोड़
एक सेवानिवृत सैनिक के अंतिम संस्कार के समय एक पासवान के मन में ख्याल आया कि वह सैनिक कहाँ होगा l किन्तु तब ही, लोगों को यह न बताकर कि वे परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं, उसने काल्पनिक बातें करनी शुरू कर दी जो बाइबिल में नहीं हैं l ऐसी बातें सुनकर मैं सोचने लगा l आशा कहाँ है?
आखिर में उसने अंतिम गीत गाने को कहा l और जब हम खड़े होकर “प्रभु महान” गाने लगे, लोग अपने हृदय की गहराई से परमेश्वर की प्रशंसा करने लगे l कुछ ही क्षणों में, पूरे कमरे का वातावरण ही बदल गया था l अचानक, आश्चर्यजनक रूप से, तीसरे पद के मध्य मेरी भावनाएं मेरी आवाज़ से तीव्र थी l
जब सोचता हूँ कि पिता अपना पुत्र, मरने भेजा है वर्णन से अपार,
कि क्रूस पर उसने मेरे पाप सब लेकर, रक्त बहाया कि मेरा हो उद्धार l
उस गीत के गाने तक, मैं सोच रहा था कि परमेश्वर उस अंतिम संस्कार में उपस्थित होगा या नहीं l सच्चाई यह है कि वह तो कभी छोड़ता ही नहीं है l एस्तेर की पुस्तक से यह सच्चाई प्रगट होती है l यहूदी बन्धुआई में थे, और शक्तिशाली लोग उनको मारना चाहते थे l फिर भी सबसे कठिन समय में, अधर्मी राजा ने दास बनाए गए इस्राएलियों को उनके विरुद्ध खुद का बचाव करने की अनुमति दी जो उनको मार डालना चाहते थे (एस्तेर 8:11-13) l परिणामस्वरूप एक सफल बचाव दिखा और उत्सव मनाया गया (9:17-19) l
यदि किसी अंतिम संस्कार में परमेश्वर एक गीत के शब्दों द्वारा खुद को प्रगट करता है तो इसमें चकित होने की ज़रूरत नहीं l आखिरकार, उसने एक प्रयासित जातिसंहार को उत्सव में और एक क्रूसीकरण को जी उठने और उद्धार में बदल दिया!
एक साल में बाइबिल
अपने विद्यार्थियों की खराब लेखन आदतों से परेशान, प्रसिद्ध लेखक और कॉलेज प्रोफेसर डेविड फ़ॉस्टर वालस ने उनके कौशल को सुधारने का विचार किया l उसी क्षण एक चौंकाने वाले प्रश्न से उसका सामना हुआ l प्रोफेसर ने खुद से पूछा कि क्यों एक विद्यार्थी उसके जैसा “आत्म संतुष्ट, संकुचित, पाखंडी, [और] दूसरों को नीचा दिखाने वाले” की सुने l वह जानता था कि वह अहंकारी था l
वह प्रोफेसर बदल सकता था और बदल भी गया किन्तु अपने किसी विद्यार्थी के समान नहीं बन सका l तथापि जब यीशु इस धरती पर आया, वह हममें से एक के समान बनकर हमें नम्रता दिखा दिया l सभी सीमाओं को लांघकर, यीशु सेवा, शिक्षा, और अपने पिता की इच्छा पूरा करते हुए हर स्थान को अपने घर जैसा बना दिया l
उसी प्रकार क्रूसित होते समय भी, यीशु ने अपने हत्यारों के लिए क्षमा मांगी (लूका 23:34) l हर एक तकलीफदेह श्वास लेने का प्रयास करते समय भी उसने अपने साथ मरते हुए एक अपराधी को अनंत जीवन प्रदान किया(पद. 42-43) l
यीशु ने ऐसा क्यों करना चाहा? क्यों उसने अपने जीवन के अंत में भी हमारे समान लोगों की सेवा की? प्रेरित यूहन्ना बताता है l प्रेम के कारण! वह लिखता है, “हम ने प्रेम इसी से जाना कि उसने हमारे लिए अपने प्राण दे दिए l” तब वह हमें इसे स्वीकार करने हेतु बाध्य करता है l “और हमें भी भाइयों के लिए प्राण देना चाहिए” (1 यूहन्ना 3:16) l
यीशु ने हमें दिखाया कि उसका प्रेम हमारे अहंकार को, हमारी आत्म-संतुष्टि को, दूसरों को नीचा दिखाने वाला हमारे स्वभाव को समाप्त कर देता है l
बच निकलना
शरद ओलंपिक्स 2004 में यूटाह में हुआ था l कनाडा के क्षेत्र-पार स्की करनेवाली बेकी स्कॉट उस समय काँस्य पदक जीती थी l दो अयोग्य खिलाड़ियों को महीनों बाद वर्जित पदार्थ सेवन के कारण अयोग्य होने पर, जून 2004 में, वैंक्यूवर आर्ट गैलरी में, स्कॉट को ओलिंपिक स्वर्ण पदक मिला l
आख़िरकार स्कॉट को अपना स्वर्ण मिल गया, किन्तु वह मंच पर खड़ी होकर राष्ट्रगान बजते हुए सुनने से रह गई l अन्याय का हल नहीं निकला l
अन्याय तकलीफ़देह होते हैं, और मेहनत से जीते गए पदक से वंचित होने से भी बड़े अन्याय हैं l कैन और हाबिल की कथा अन्याय की चरम क्रिया है (उत्प. 4:8) l और प्रथम झलक में ऐसा लग सकता है कि वह भाई की हत्या करके बच गया l आख़िरकार, वह लम्बी आयु और पूरा जीवन जीकर, एक नगर भी बसाया (पद.17) l
किन्तु स्वयं परमेश्वर ने कैन का सामना किया l उसने कहा, “तेरे भाई का लहू ... चिल्लाकर मेरी दोहाई दे रहा है” (पद.10) l नया नियम कैन के उदाहरण से बचने को कहता है (1 यूहन्ना 3:12; यहूदा 1:11) l किन्तु हाबिल के विषय, “विश्वास ही से हाबिल ... मरने पर भी अब तक बातें करता है” (इब्रा. 11:4) l
परमेश्वर न्याय, निर्बलों का बचाव, और अन्याय को दण्डित करता है l अंत में, अन्याय करके कोई बच नहीं सकता l और विश्वास द्वारा किया गया कार्य परमेश्वर द्वारा पुरस्कृत होता है l
छोटा मार्ग अपनाना
नैंसी अपनी सहेली की खिड़की की ओर देखकर आहें भरी l बसंती वर्षा और धूप से सुरुचिपूर्ण ढंग से तैयार अनेक फूल खिले हुए थे l
“बिना मेहनत मुझे वही आभा चाहिए,” वह उत्साहपूर्वक बोली l
कुछ छोटे मार्ग ठीक और व्यावहारिक भी हैं l दूसरे हमारी आत्मा की उपेक्षा कर हमें मृत समान बनाते हैं l हम अपने से बिल्कुल भिन्न व्यक्तित्व के समक्ष स्वयं को समर्पित किये बिना किसी कठिनाई और मालिन्य के रोमांच चाहते हैं l हम वास्तविक जीवन के रोमांच में खतरा और पराजय बिना “महानता” चाहते हैं l हम असुविधा बगैर परमेश्वर को प्रसन्न करना चाहते हैं l
यीशु ने शिष्यों से कहा कि हम कठिन चुनाव से बचकर छोटे मार्ग द्वारा उसको अपना जीवन समर्पित नहीं कर सकते हैं l यीशु ने एक प्रत्याशित शिष्य को चिताया, “जो कोई अपना हाथ हल पर रखकर पीछे देखता है, वह परमेश्वर के राज्य के योग्य नहीं” (लूका 9:62) l मसीह का अनुसरण हमारी वफादारी का पूरा परिवर्तन मांगता है l
यीशु की ओर मुड़ने पर यह कार्य आरंभ होता है l किन्तु यह अत्यधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसने यह भी कहा कि जो “मेरे और सुसमाचार के लिए [त्याग करता है] ... इस समय सौ गुना न पाए, ... और परलोक में अनंत जीवन” (मरकुस 10:29-30) l मसीह का अनुसरण कठिन है, किन्तु उसने पवित्र आत्मा दिया है और पुरस्कार अभी और हमेशा का पूर्ण आनंदित जीवन है l
ख़ामोशी
सहायता ट्रकों के गाँव की टूटी झोपड़ियां हटाते समय चूज़े भागने लगे l नंगे पाँव बच्चे घूरते रहे l बारिश से उजड़ी “सड़क” पर यातायात कम थी l
अचानक, काफिले ने दीवारों से घिरी मेयर का बड़ा मकान देखा जो खाली था l लोगों के पास बुनियादी ज़रूरतें नहीं थीं जबकि वह दूर शहर में आलिशान मकान में रहता था l
ऐसा अन्याय हमें क्रोधित करता है, जिससे परमेश्वर का नबी भी क्रोधित हुआ l व्यापक शोषण देखकर हबक्कूक ने कहा, “हे यहोवा, मैं कब तक तेरी दोहाई देता रहूँगा, और तू न सुनेगा?” (हबक्कूक 1:2) l किन्तु परमेश्वर ने ध्यान देकर कहा, “हाय उस पर जो पराया धन छीन छीनकर धनवान हो जाता है? ... जो अपने घर के लिए अन्याय के लाभ का लोभी है” (2:6, 9) l न्याय निकट है!
हम दूसरों पर परमेश्वर का न्याय चाहते हैं, किन्तु हबक्कूक की एक मुख्य बात हमें रोकती है : “यहोवा अपने पवित्र मंदिर में है; समस्त पृथ्वी उसके सामने शांत रहे” (2:20) l समस्त पृथ्वी l शोषित और उत्पीड़क l कभी-कभी परमेश्वर की प्रत्यक्ष खामोशी का उचित प्रतिउत्तर ... ख़ामोशी है!
ख़ामोशी क्यों? क्योंकि हम अपनी आत्मिक दरिद्रता नहीं देखते l हम ख़ामोशी में पवित्र परमेश्वर के सामने अपने पाप देख सकेंगे l
हबक्कूक की तरह हम भी परमेश्वर पर भरोसा सीखें l हम उसके सब मार्ग नहीं जानते, किन्तु जानते हैं कि वह भला है l सब कुछ उसके नियंत्रण और समय में है l