क्रिसमस लाइट
जब मेरी बहन को हमारे बचपन की कहानियों की किताब मिली, तो मेरी माँ, जो अब सत्तर के दशक की हैं, बहुत खुश हुयी l उसे एक भालू के बारे में सारी मज़ेदार बातें याद आ गयी, जिसने शहद चुराया था और क्रोधित मधुमक्खियों के झुण्ड ने उसका पीछा किया था l उसे यह भी याद आया कि भालू के भागने की उम्मीद पर मैं और मेरी बहन कैसे हँसे थे l “जब हम बच्चे थे तो हमें हमेशा कहानियाँ सुनाने के लिए धन्यवाद,” मैंने अपनी माँ से कहा l वह मेरी पूरी कहानी जानती है, जिसमें यह भी शामिल है कि मैं एक छोटे बच्चे के रूप में कैसी थी l अब जबकि मैं व्यस्क हो गयी हूँ, वह अब भी मुझे जानती और समझती है l
परमेश्वर भी हमें जानता है—किसी भी इंसान से कहीं अधिक गहराई से, जिसमें हम स्वयं भी शामिल हैं l दाऊद का कहना है कि उसने हमारी “जाँच” की है(भजन सहिंता 139:1) l अपने प्रेम में, उसने हमारी जांच की है और हमें पूरी तरह से समझता है l परमेश्वर हमारे विचारों को जानता है, हम जो कहते हैं उसके पीछे के कारणों और अर्थों को समझता है(पद.2,4) l वह गहराई से हमारे हर एक विवरण से परिचित है जो हमें बनाता है कि हम कौन हैं, और वह इस ज्ञान का उपयोग हमारी मदद करने के लिए करता है(पद.2-5) l वह जो हमें सबसे अधिक जानता है, हमारी उपेक्षा करके हमसे दूर नहीं जाता है बल्कि अपने प्रेम और बुद्धिमत्ता के साथ हम तक पहुंचता है l
जब हम अकेला, अनदेखा और भूला हुआ महसूस करते हैं, तो हम इस सच्चाई में सुरक्षित रह सकते हैं कि परमेश्वर हमेशा हमारे साथ हैं, हमें देखता है और हमें जानता है(पद.7-10) l वह हमारे उन सभी पक्षों को जानता है जो दूसरे नहीं जानते—और उससे भी अधिक l दाऊद की तरह, हम विश्वास के साथ कह सकते हैं, “तू ने मुझे . . . जान लिया है . . . तू अपने हाथ से मेरी अगुवाई करेगा, और अपने दाहिने हाथ से मुझे पकड़े रहेगा”(पद.1, 10) l

आपसी प्रोत्साहन
“विशुद्ध प्रोत्साहन(Sheer encouragement) l” इसी वाक्यांश द्वारा जे.आर.आर. टॉकिन ने अपने मित्र और सहकर्मी सी.एस. ल्युईस को उनके व्यक्तिगत समर्थन को परिभाषित किया जब वे महाकाव्य(epic) द लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स(The Lord of the Rings) ग्रन्थत्रय(trilogy) लिख रहे थे l श्रृंखला पर टॉकिन का काम अति परिश्रमी और सटीक था, और उन्होंने व्यक्तिगत रूप से लम्बी पांडुलिपियों को दो से अधिक बार टाइप किया था l जब उन्होंने उन्हें ल्युईस के पास भेजा, तो ल्युईस ने उत्तर दिया, “आपने इस पर जितने लम्बे वर्ष खर्च किये हैं, वे उचित हैं l”
संभवतः पवित्रशास्त्र का सबसे प्रसिद्ध प्रोत्साहन करनेवाला साइप्रस का युसूफ था, जिसे बरनबास(जिसका अर्थ है “प्रोत्साहन का पुत्र) के नाम से जाना जाता है, नाम जिसे प्रेरितों ने उसे दिया था (प्रेरितों के काम 4:36) l यह बरनबास ही था जिसने प्रेरितों के सामने पौलुस का समर्थन किया था(9:27) l बाद में, जब गैर-यहूदी विश्वासियों ने यीशु में विश्वास आरम्भ किया तो लूका हमें बताता है कि बरनबास “आनंदित हुआ, और सब को उपदेश दिया कि तन मन लगाकर प्रभु से लिपटे रहो”(11:23) l लूका ने उसका वर्णन “भला मनुष्य” और पवित्र आत्मा और विश्वास से परिपूर्ण” व्यक्ति के रूप में किया, और कहा कि उसके कारण, “बहुत से लोग प्रभु में आ गए”(पद.24) l
उत्साहवर्धक शब्दों का मूल्य मापा नहीं जा सकता है l जब हम दूसरों को विश्वास और प्रेम के शब्द पेश करते हैं, परमेश्वर—जो “अनंत प्रोत्साहन(शांति)” देता है (2 थिस्सलुनीकियों 2:16)—जो कुछ हम साझा करते हैं उसके द्वारा किसी के जीवन को हमेशा के लिए बदल सकता है l आज वह किसी को “विशुद्ध प्रोत्साहन” देने में हमारी सहायता करे!

जो आप हैं
फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी में अपने कॉलेज के दिनों में, चार्ली वार्ड दो-खेल के छात्र एथलीट थे l 1993 में, इस युवा क्वार्टरबैक/quarterback(खेल में एक स्थान) ने देश के सवर्श्रेष्ठ कॉलेज अमेरिकी फुटबॉल खिलाड़ी के रूप में हेज़मैन ट्रॉफी(Heisman Trophy) जीती, और वे बास्केटबॉल टीम में भी सर्वोत्तम रहे l
एक दिन खेल से पहले बातचीत में, उनके बास्केटबॉल कोच ने अपने खिलाड़ियों से बातचीत में कुछ अभद्र भाषा उपयोग किया l उन्होंने देखा कि चार्ली “आरामदायक नहीं था,” और कहा, “चार्ली, क्या चल रहा है?” वार्ड ने कहा, “कोच, आप जानते हैं, कोच बोडेन {फुटबॉल कोच] उस तरह की भाषा का उपयोग नहीं करते हैं, और वह हमें बहुत कठिन खेल खिलाते हैं l”
चार्ली के मसीह जैसे चरित्र ने उसे इस मुद्दे पर अपने बास्केटबॉल कोच से धीरे से बात करने की अनुमति दी l जब कोच ने चार्ली से बात की तो वास्तव में, उन्होंने एक रिपोर्टर से कहा : “यह लगभग ऐसा है जैसे कोई स्वर्गदूत आपको देख रहा है l”
अविश्वासियों के साथ एक नेकनामी और मसीह का एक विश्वासयोग्य साक्षी होना कठिन है l लेकिन साथ ही, यीशु में विश्वास करने वाले उसके जैसे बन सकते हैं क्योंकि वह हमारी सहायता और हमारा मार्गदर्शन करता है l तीतुस 2 में, युवा पुरुषों, और विस्तार से सभी विश्वासियों को, बुलाया गया है कि वे “संयमी”(पद.6) और “[उनके] उपदेश में . . . ऐसी खराई [हो] . . . कि कोई . . . दोष लगाने का अवसर न पा [सके]”(पद.7-8) l
जब हम इस तरह मसीह की सामर्थ्य में जीते हैं, तो हम न केवल उसका आदर करेंगे बल्कि एक अच्छा नाम भी निर्मित करेंगे l फिर चूँकि परमेश्वर हमें आवश्यक बुद्धि प्रदान करता है, लोगों के पास हमें सुनने का कारण होगा l

चेतावनी की ध्वनि
कच्ची मछली और वर्षा का जल l तिमोथी नाम का एक ऑस्ट्रेलियाई नाविक तीन महीने तक केवल इन्हीं प्रावधानों पर जीवित रहा l तूफ़ान से क्षतिग्रस्त बेड़ा/लकड़ी के लट्ठो को बांधकर बनाया गया नौकाcatamaran] पर असहाय होकर, वह उम्मीद खो रहा था—प्रशांत महासागर में भूमि से 1,200 मील दूर डोल रहा था l लेकिन तभी मेक्सीकन टूना नाव(मछली पकड़ने वाली नाव) के चालाक दल ने उसकी अस्थिर नाव को देखा और उसे बचा लिया l बाद में, दुबले-पतले और मौसम से पीड़ित व्यक्ति ने कहा, “मेरी जान बचाने वाले कप्तान और मछली पकड़ने वाली कंपनी का, मैं बहुत आभारी हूँ!”
तिमोथी ने अपनी कटु अनुभव के बाद धन्यवाद दिया, लेकिन दानिय्येल नबी ने संकट से पहले, उसके दौरान और बाद में एक धन्यवादी हृदय प्रकट किया l अन्य यहूदियों के साथ यहूदा से बेबीलोन में निर्वासित किये जाने के बाद(दानिय्येल 1:1-6), दानिय्येल शासन में आ गया लेकिन उसे अन्य अगुओं से धमकी मिली जो उसे मरवाना चाहते थे(6:1-7) l उसके शत्रुओं ने बेबीलोन के राजा से एक आदेश पर हस्ताक्षर करवाया कि जो कोई भी “किसी और . . . देवता से विनती करे, वह सिंहों की मांद में डाल दिया जाए”(पद.7) l सच्चे परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी सेवा करने वाला दानिय्येल, क्या करता? “जैसा वह . . . अपने परमेश्वर के सामने घुटने टेककर प्रार्थना और धन्यवाद करता था, वैसा ही तब भी करता [रहा]”(पद.10) l उसने धन्यवाद दिया, और अपने धन्यवादी हृदय को पुरुस्कृत किया गया क्योंकि परमेश्वर ने उसके जीवन को बचाया उसे सम्मान दिलाया(पद.26-28) l
जैसा कि प्रेरित पौलुस ने लिखा, परमेश्वर हमें “हर बात में धन्यवाद [करने]” में सहायता करें(1 थिस्सलुनीकियों 5:18) l चाहे हम किसी संकट का सामना कर रहे हों या अभी-अभी उसमें से निकले हों, एक धन्यवादी प्रतिक्रया उसका सम्मान करती है और हमारे विश्वास को बनाए रखने में मदद करती है l

गर्म भोजन
एक व्यक्ति ने अदालत में परमेश्वर के विरुद्ध रोकने वाला/नियंत्रण(restraining) का मुकद्दमा दायर किया l उसने दावा किया कि परमेश्वर उसके प्रति “विशेष रूप से निर्दयी” था और उसने “गंभीर रूप से नकारात्मक रवैया” दर्शाया था l पीठासीन न्यायाधीश ने यह करते हुए मुक़दमा ख़ारिज कर दिया कि उस व्यक्ति को अदालत की नहीं बल्कि अपने मानसिक स्वास्थ में सहायता की ज़रूरत है l एक सच्ची कहानी : हास्यप्रद, लेकिन दुखद भी l
लेकिन क्या हम इतने अलग/भिन्न हैं? क्या हम कभी-कभी यह नहीं कहना चाहते, “हे परमेश्वर, कृपया ठहरिये, मैंने बहुत सह लिया!” अय्यूब ने कहा l उसने परमेश्वर को न्यायिक प्रक्रिया में डाल दिया l अकथनीय व्यक्तिगत त्रासदियों को सहने के बाद, अय्यूब कहता है, “मेरी अभिलाषा परमेश्वर से वाद-विवाद करने की है”(अय्यूब 13:3) और “उससे मुकद्दमा [लड़ने]” की कल्पना करता है(9:3) l वह एक निरोधक(रोकने वाला) आदेश भी देता है : “अपनी ताड़ना मुझ से दूर कर ले, और अपने भय से मुझे भयभीत न कर”(13:21) l अय्यूब का अभियोजन पक्ष का तर्क उसकी स्वयं की बेगुनाही नहीं थी, बल्कि जिसे वह परमेश्वर की अनुचित कठोरता के रूप में देखता है : “क्या तुझे अंधेर करना . . . भला लगता है?”(10:3) l
कभी-कभी हमें लगता है कि परमेश्वर अन्यायी है l सच तो यह है कि अय्यूब की कहानी जटिल है और आसान उत्तर नहीं देती l परमेश्वर अंत में अय्यूब की भौतिक सम्पति को बहाल करता है, लेकिन हमारे लिए हमेशा उसकी योजना ऐसी नहीं होती है l शायद हमें अय्यूब की अंतिम स्वीकारोक्ति में कुछ निर्णय/फैसला मिलता है : “मैं ने तो जो नहीं समझता था वही कहा, अर्थात् जो बातें मेरे लिए अधिक कठिन और मेरी समझ से बाहर थीं जिनको मैं जानता भी नहीं था”(42:3) l मुद्दा यह है कि परमेश्वर के पास ऐसे कारण हैं जिनकी बारे में हम कुछ नहीं जानते हैं, और उसमें अद्भुत आशा है l