
अपने पड़ोसियों से प्रेम करना
कोरोनावाइरस महामारी के समय आत्म-अलगाव/स्वपृथकीकरण और लॉकडाउन के दिनों में, मार्टिन लूथर किंग जूनियर द्वारा उनके “लेटर फ्रॉम ए बर्मिंघम जेल” के शब्द सच्चे थे l अन्याय के विषय बोलते हुए, उन्होंने टिप्पणी की कि कैसे वह एक शहर में आलस्य से नहीं बैठ सकते और दूसरे में क्या होता है इसके बारे में चिंतित नहीं हो सकते l “हम पारस्परिकता के एक अपरिहार्य नेटवर्क में फंस गए हैं,” उन्होंने कहा, “नियति के एक ही परिधान में बंधे हुए हैं l जो कुछ भी प्रत्यक्ष रूप से एक को प्रभावित करता है, अप्रत्यक्ष रूप से सभी को प्रभावित करता है l”
उसी प्रकार, कोविड-19 महामारी हमारी संयुक्तता(कनकटेडनेस/connectedness) को उजागर किया जब संसार भर के शहरों और देशों ने वायरस के प्रसार को रोकने के लिए खुद को बंद कर दिया था l जिसने एक शहर को प्रभावित किया वह जल्द ही दूसरे को प्रभावित कर सकता था l
कई शताब्दी पहले, परमेश्वर ने अपने लोगों को निर्देश दिया था कि कैसे दूसरों के लिए चिंता दर्शाएँ l मूसा के द्वारा, उसने इस्राएलियों को उनका मार्गदर्शन करने और उन्हें एक साथ रहने में सहायता करने के लिए व्यवस्था दी l उसने उनसे कहा कि “न अपने पड़ोसी की हत्या के उद्देश्य से घात लगाना” (लैव्यव्यवस्था 19:16); और बदला लेने या दूसरों से बैर रखने के लिए नहीं, वरन् “अपने पड़ोसी को अपने ही समान प्रेम करना” (पद.18) परमेश्वर जानता था कि समुदाय का टूटकर बिखरना शुरू हो जाएगा यदि लोग दूसरों की चिंता नहीं करेंगे, उनके जीवनों को उतना महत्व नहीं देंगे जितना अपने जीवनों को देते हैं l
हम भी परमेश्वर की बुद्धिमत्ता के निर्देश को अपना सकते हैं l जब हम अपने दैनिक गतिविधियों में लगे रहते हैं, हम याद रख सकते हैं कि हम कितने एक दूसरे से जुड़े हुए हैं जब हम परमेश्वर से पूछते हैं कि हम किस तरह उनसे प्रेम और उनकी सेवा अच्छी तरह कर सकते हैं l

सोमवार के लिए शुक्रगुज़ार
मैं सोमवार से डरता था l कभी-कभी, जब मैं अपनी पिछली नौकरी पर जाने के लिए ट्रेन से उतरता था, तो मैं स्टेशन पर थोड़ी देर के लिए बैठ जाता, बिल्डिंग तक पहुँचने में थोड़ा समय लगाता, भले ही केवल कुछ मिनटों के लिए ही सही l मेरा हृदय तेजी से धड़कता था जब मैं समय सीमा को पूरा करने और एक तुनकमिज़ाज बॉस के मूड को सँभालने के बारे में चिंतित होता था l
हममें से कुछ एक लोगों के लिए, एक और नीरस कार्य-सप्ताह(workweek) को आरम्भ करना विशेष रूप से कठिन हो सकता है l हम अपने कार्य में अभिभूत या कम सराहनीय महसूस कर रहे हों l राजा सुलैमान कार्य के परिश्रम का वर्णन करता है जब उसने लिखा : “मनुष्य जो धरती पर मन लगा लगाकर परिश्रम करता है उससे उसको क्या लाभ होता है? उसके सब दिन तो दुखों से भरे रहते हैं” (सभोपदेशक 2:22-23) l
हालांकि उस बुद्धिमान राजा ने हमें कार्य को कम तनावपूर्ण या अधिक लाभकारी बनाने का सम्पूर्ण हल नहीं दिया, परन्तु उसने हमें हमारे दृष्टिकोण में बदलाव अवश्य दिया l चाहे हमारा कार्य कितना भी कठिन हो, वह हमें परमेश्वर की ओर से (पद.24) प्राप्त करके उसमें “संतोष पाने” के लिए प्रोत्साहित करता हैं l शायद यह तब आएगा जब पवित्र आत्मा हमें मसीह के समान चरित्र प्रदर्शित करने में सक्षम बनाता है l या जब हम किसी ऐसे व्यक्ति से सुनते हैं जिसे हमारी सेवा के माध्यम से आशीष मिली है l या जैसा कि हम उस बुद्धिमत्ता को याद करते हैं जिसे परमेश्वर ने एक कठिन परिस्थति से निपटने के लिए प्रदान किया था l यद्यपि हमारा कार्य कठिन हो सकता है, हमारा विश्वासयोग्य परमेश्वर हमारे साथ है l उसकी उपस्थिति और सामर्थ्य उदास व् धुंधले दिनों को भी प्रकाशित कर सकती है l उसकी मदद से हम सोमवार के लिए शुक्रगुजार हो सकते हैं l

नरक से आशा
1979 में, पुरातत्वविद्(archeologist/आर्केओलोजिस्ट) गेब्रियल बार्के ने चाँदी के दो छोटे घूँघर/खर्रा(scroll/स्क्रोलl) खुदाई से निकाले l धातु के स्क्रोल को नाजुक ढंग से खोलने में वर्षों लग गए, और प्रत्येक में गिनती 6:24-26 से आशीष इब्री में उकेरी हुयी देखी गयी, “यहोवा तुझे आशीष दे और तेरी रक्षा करे; यहोवा तुझ पर अपने मुख का प्रकाश चमकाए, और तुझ पर अनुग्रह करे; यहोवा अपना मुख तेरी ओर करे; और तुझे शांति दे l” विद्वानों ने स्क्रोल को सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व का बताया है l वे संसार में बाइबल के सबसे पुराने ज्ञात अंश हैं l
जिस स्थान पर वे पाए गए वह उतना ही दिलचस्प है l बार्के हिन्नोम की घाटी में एक गुफा की खुदाई कर रहे थे, वही स्थान जहाँ नबी यिर्मयाह ने यहूदा के लोगों से कहा था कि परमेश्वर उनको अपने बच्चों को बलि चढ़ाने के कारण मार डालेगा (यिर्मयाह 19:4-6) l यह घाटी ऐसी दुष्टता की जगह थी कि यीशु ने नरक के चित्र के रूप में “गेहन्ना/Gehenna” (“हिन्नोम की घाटी” के लिए इब्री नाम का एक यूनानी रूप) शब्द का प्रयोग किया था (मत्ती 23:33) l
इस जगह, लगभग उस समय यिर्मयाह अपने राष्ट्र पर परमेश्वर का न्याय घोषित कर रहा था, कोई और अपनी भावी आशीष को चाँदी के स्क्रोल पर उकेर रहा था l यह उनके जीवनकाल में घटित नहीं होने वाला था, लेकिन एक दिन—बेबीलोन के आक्रमण के दूसरी ओर—परमेश्वर अपना मुख अपने लोगों की ओर करनेवाला था और उन्हें आशीष देनेवाला था l
हमारे लिए सबक स्पष्ट है l बावजूद इसके कि हम जिसके लायक हैं वह होनेवाला/घटनेवाला है, हम परमेश्वर की आशीष को थामें रह सकते हैं l उसका हृदय हमेशा उसके लोगों के लिए लालायित रहता है l

दौड़ दौड़ना
अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्री को खोने की त्रासदियों की एक श्रृंखला के बाद, 89 की उम्र में फौजा सिंह ने दौड़ने के अपने जूनून पर ध्यान केन्द्रित करने का फैसला किया l सिंह, पंजाबी भारतीय मूल के ब्रिटेन के सौ वर्ष के इस व्यक्ति ने, टोरंटो वाटरफ्रंट लम्बी दौड़(मैराथन) खत्म करने वाले पहले 100 वर्षीय व्यक्ति बने l शायद उनके स्वस्थ आहार, और शारीरिक और मानसिक अनुशासन ने उन्हें अपने प्रतिस्पर्धा में बढ़त हासिल करने में सक्षम बनाया l सिंह अपने कमज़ोर पैरों के कारण 5 साल की उम्र तक चलने में असमर्थ थे l हालाँकि उन्हें अक्सर चिढ़ाया जाता था और उन्हें “छड़ी” कह कर पुकारा जाता था, सिंह अपनी उपलब्धियों के कारण अब “पगड़ी वाला तूफ़ान” /(Turbaned Tornedo/ टरबंड टोरनाडो) के रूप में लोकप्रिय हैंl
प्रेरित पौलुस ने अपने दिनों में उसी प्रकार का अनुशासन प्रदर्शित करनेवाले एथलीटों को मान्यता दी (1 कुरिन्थियों 9:24) l लेकिन उसने यह भी माना कि चाहे उन्होंने कितना भी प्रशिक्षण लिया हो, अंततः उनका वैभव फीका पड़ जाता है l इसके विपरीत, उसने कहा, हमारे पास यीशु के लिए इस तरह जीने का अवसर है जो अनंतकाल को प्रभावित करता है l “एक मुकुट तो हमेशा के लिए रहेगा” (पद.25) पौलुस का तात्पर्य है,यदि क्षणिक वैभव के लिए प्रयास करनेवाले एथलीट इसके लिए इतना परिश्रम कर सकते हैं, तो के लिए जीने वालों का कितना अधिक होना चाहिए l
हम उद्धार कमाने के लिए प्रशिक्षण नहीं लेते हैं l बल्कि, इसके बिलकुल विपरीत; जब हम मानते हैं कि हमारा उद्धार वास्तव में कितना अद्भुत है, वह हमारी प्राथमिकताओं, हमारे दृष्टिकोण, और वे चीजें जिनके लिए हम जीते हैं उनको पुनः आकार देता है जब हम परमेश्वर की सामर्थ्य में विश्वासयोग्यता से अपने विश्वास की दौड़ दौड़ते हैं l
