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उसकी शांति

कई महीनों तक, मैंने कार्यस्थल की गहन राजनीति और साज़िशों का सामना किया। चिंता करना मेरा एक स्वभाव बन गया था, इसलिए खुद को शांति में पाकर मैं हैरान था। चिंतित महसूस करने के बजाय, मैं शांत मन और हृदय से जवाब दे पा रहा था। मैं जानता था कि यह शांति केवल परमेश्वर से ही मिल सकती है।

इसके विपरीत, मेरे जीवन में एक और दौर था जब सब कुछ ठीक चल रहा था─और फिर भी मैंने अपने दिल में एक गहरी अशांति महसूस की। मुझे पता था कि ऐसा इसलिए था क्योंकि मैं परमेश्वर और उसकी अगुवाई पर भरोसा करने के बजाय अपनी क्षमताओं पर भरोसा कर रहा था। पीछे मुड़कर देखने पर, मैंने महसूस किया है कि सच्ची शांति—परमेश्वर की शांति—हमारी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उस पर हमारे भरोसे से परिभाषित होती है।

परमेश्वर की शांति हमें तब मिलती है जब हमारा मन स्थिर होता है (यशायाह 26:3)। इब्रानियों में, स्थिर शब्द का अर्थ है "आश्रित होना।" जब हम उस पर निर्भर होंगे, हम उसकी शांत उपस्थिति का अनुभव करेंगे। हम परमेश्वर पर भरोसा कर सकते हैं, यह याद करते हुए कि वह अभिमानी और दुष्टों को नम्र करेगा और उन लोगों के मार्ग को सुगम करेगा जो उससे प्रेम करते हैं (वव. 5-7)।

जब मैंने कठिनाई के समय में आराम के बजाय शांति का अनुभव किया, तो मैंने पाया कि परमेश्वर की शांति संघर्ष की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि संकट में भी सुरक्षा की गहन भावना है। यह एक ऐसी शांति है जो मनुष्यों की समझ से परे है और सबसे कठिन परिस्थितियों के बीच में हमारे दिलों और दिमागों की रक्षा करती है (फिलिप्पियों 4:6-7)।

प्रार्थना का सार

जब अब्राहम लिंकन संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति बने, तो उन्हें एक खंडित राष्ट्र का नेतृत्व करने का काम सौंपा गया। लिंकन को एक बुद्धिमान नेता और उच्च नैतिक चरित्र के व्यक्ति के रूप में देखा जाता है, लेकिन उनके चरित्र का एक अन्य तत्व, शायद, बाकी सब चीजों की नींव था। वह यह समझ गए थे कि जो काम उनके हाथ में है उसके लिए वह अपर्याप्त है। उस अपर्याप्तता पर उनकी प्रतिक्रिया? लिंकन ने कहा, "मैं कई बार अपने घुटनों पर इस भारी भोझ के कारण आया कि मेरे पास और कोई जगह नहीं है जाने के लिए। मेरी अपनी बुद्धि और मुझसे सम्बंधित सब कुछ उस दिन के लिए अपर्याप्त महसूस हुआ ।”

जब हम जीवन की चुनौतियों और अपने स्वयं के सीमित ज्ञान, समझ या सामर्थ की पकड़ में आते हैं, तो हम पाते हैं, लिंकन की तरह, हम पूरी तरह से यीशु पर निर्भर हैं─जिसकी कोई सीमा नहीं है। पतरस ने हमें इस निर्भरता की याद दिलाई जब उसने लिखा, "अपनी सारी चिन्ता उसी पर डाल दो, क्योंकि उस को तुम्हारा ध्यान है" (1 पतरस 5:7)।

अपने बच्चों के लिए परमेश्वर का प्रेम, उसकी पूर्ण शक्ति के साथ, उसे वह सिद्ध व्यक्ति बनाता है जिसके पास हम अपनी कमजोरियों के साथ जा सकते है—और यही प्रार्थना का सार है। हम यीशु के पास जाते हैं यह स्वीकार करते हुए (और स्वयं) कि हम अपर्याप्त हैं और वह अनंतकाल तक के लिए प्रयाप्त है। लिंकन ने कहा कि उन्हें लगा कि उनके पास "कोई जगह नहीं जाने के लिए।" लेकिन जब हम हमारे प्रति परमेश्वर की बड़ी परवाह को समझना शुरू करते हैं, तो यह अद्भुत रूप से अच्छी खबर है। हम उसके पास जा सकते हैं!

ईमानदारी का जीवन

एबेल मुताई, एक केन्याई धावक, जो एक थकानेवाले अंतरराष्ट्रीय क्रॉस-कंट्री रेस में प्रतिस्पर्धा कर रहे थे, जीत से मात्र गज की दूरी पर थे─उनकी बढ़त सुरक्षित थी। क्रम के संकेतों से भ्रमित होकर और यह सोचकर कि वह पहले ही अंतिम रेखा पार कर चुके है,  मुताई रुक गए। दूसरे स्थान पर रहे स्पेनिश धावक इवान फर्नांडीज अनाया ने मुताई की गलती देखी। जीत के लिए फायदा उठाने और बोल्ट पास्ट करने के बजाय, उन्होंने मुताई को पकड़ लिया, अपना हाथ बढ़ाया और मुताई को स्वर्ण पदक जीत के लिए आगे बढ़ाया। जब पत्रकारों ने अनाया से पूछा कि वह जानबूझकर रेस क्यों हार गए, तो उन्होंने इस बात पर जोर देकर कहा कि मुताई जीत के हकदार है, न कि वह। “मेरी जीत का क्या श्रेय होगा? उस पदक का सम्मान क्या होगा? मेरी माँ उसके बारे में क्या सोचेगी?" जैसा कि एक रिपोर्ट में कहा गया है : "अनाया ने जीत पर ईमानदारी को चुना।"

नीतिवचन कहता है कि जो लोग ईमानदारी से जीने की इच्छा रखते हैं, और जो चाहते है कि उनके जीवन से विश्वास और सत्यता प्रदर्शित हो, वे अपने फ़ायदे के बजाय सत्य के आधार पर चुनाव करते हैं। "खरे लोगों की खराई उनका मार्गदर्शन करती है" (11:3)। ईमानदारी से चलने का संकल्प न केवल जीने का सही तरीका है, बल्कि यह एक बेहतर जीवन भी प्रदान करता है। नीतिवचन में आगे लिखा है : "लेकिन विश्वासघाती अपने दोहरेपन से नष्ट हो जाते हैं" (पद ३)। लंबे समय में, बेईमानी कभी भुगतान नहीं करती है।

यदि हम अपनी ईमानदारी को त्याग दे, तो छोटे समय की हमारी "जीत" वास्तव में हार का कारण बनती है। लेकिन जब निष्ठा और सच्चाई हमें ईश्वर की शक्ति में आकार देती है, तो हम धीरे-धीरे गहरे चरित्र वाले लोग बन जाते हैं जो वास्तव में अच्छा जीवन जीते हैं।

परमेश्वर कहाँ है?

वाल्डो कहाँ है? नामक बच्चों की प्रसिद्ध पुस्तक श्रृंखला में  पकड़ में ना आने वाला एक व्यक्ति एक लाल और सफेद धारीदार शर्ट और मोज़े के साथ मेचिंग टोपी, नीली जींस, भूरे रंग के जूते और चश्मा पहनता है। सचित्र बनाने वाले ने दुनिया भर के विभिन्न स्थानों पर पात्रों की भीड़ से भरे व्यस्त चित्रों के भीतर बड़ी चतुराई से वाल्डो को सादे दृष्टि से छिपा दिया। वाल्डो को देखना हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन उसका सिरजनहार वादा करता है कि पाठक हमेशा उसे ढूंढ पाएंगे। यद्यपि परमेश्वर को खोजना वास्तव में पहेली पुस्तक में वाल्डो की तलाश करने जैसा नहीं है, किन्तु हमारा सिरजनहार वादा करता है कि हम उसे भी ढूंढ सकते हैं।

भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह के द्वारा, परमेश्वर ने अपने लोगों को निर्वासन में परदेशियों के रूप में रहने का निर्देश दिया (यिर्मयाह 29:4-9)। उसने तब तक उनकी रक्षा करने की प्रतिज्ञा की जब तक कि वह उन्हें अपनी सिद्ध योजना के अनुसार पुनर्स्थापित नहीं कर देता (पद. 10-11)। परमेश्वर ने इस्राएलियों को आश्वासन दिया कि उसकी प्रतिज्ञा का पूरा होना प्रार्थना में उसे पुकारने की उनकी प्रतिबद्धता को गहरा करेगी (पद. 12)।

आज, भले ही परमेश्वर ने यीशु की कहानी और आत्मा में स्वयं को प्रकट किया है, लेकिन इस दुनिया की व्यस्तता से विचलित होना आसान है। हम यह सवाल करने के लिए भी विवश हो सकते हैं कि, "परमेश्वर कहाँ हैं?" हालांकि, सभी चीजों का सृष्टिकर्ता और पालनकर्ता इस बात को घोषित करता हैं कि जो लोग उसके हैं वे हमेशा उसे पाएंगे यदि वे अपने पूरे दिल से उसे ढूंढते हैं (पद. 13-14)।