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प्रकृति पर ध्यान देना

एक दोस्त और मैंने हाल ही में मेरा एक पसंदीदा घूमने का स्थान गए l  तेज हवा वाली पहाड़ी पर चढ़कर,  हमने जंगली फूलों वाले एक मैदान को पार करके ऊंची चीड़ के पेड वाले जंगल में प्रवेश किए, उसके बाद एक घाटी में उतरकर हम थोड़ा समय के लिए ठहर गए l बादल हमारे ऊपर धीरे-धीरे उड़ रहे थे l पास में एक धारा बह रही थी l ध्वनियाँ केवल पक्षियों की थीं l मैं और मेरा दोस्त पंद्रह मिनट तक चुपचाप खड़े रहकर यह सब गौर से देखते रहे l

जैसा कि पता चला,  उस दिन हमारे कार्य बेहद उपचारात्मक थे l एक अमेरिकी विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार,  जो लोग ठहरकर प्रकृति पर चिंतन करते हैं वे उच्च स्तर की खुशी,  चिंता के नीचा स्तर और पृथ्वी की देखभाल की अधिक इच्छा का अनुभव करते हैं l हालांकि,  जंगल से गुजरना पर्याप्त नहीं है l आपको बादलों को देखना होगा,  पक्षियों को सुनना होगा l कुंजी प्रकृति में रहना नहीं है,  लेकिन इसे ध्यान से देखना है l

क्या प्रकृति के फायदों का आध्यात्मिक कारण हो सकता है?  पौलुस ने कहा कि सृष्टि परमेश्वर की सामर्थ्य और प्रकृति को प्रगट करती है (रोमियों 1:20) l परमेश्वर ने अय्यूब से कहा कि वह उसकी उपस्थिति के प्रमाण के लिए समुद्र,  आकाश और तारों को देखे (अय्यूब 38-39) l यीशु ने कहा कि “आकाश के पक्षी” और “जंगली सोसनों” पर ध्यान करना परमेश्वर की देखभाल प्रगट कर सकता है और चिंता कम कर सकता है (मत्ती 6:25-30) l बाइबल में, प्रकृति पर ध्यान देना एक आत्मिक अभ्यास है l

वैज्ञानिक सोचते हैं कि प्रकृति हमें सकारात्मक रूप से क्यों प्रभावित करती है? शायद एक कारण यह है कि प्रकृति पर ध्यान करने से हम परमेश्वर की एक झलक प्राप्त कर सकते हैं जिसने इसे बनाया और जो हमें ध्यान से देखता है l

कानूनी रूप से उसका

शीबा ने खुशी के कारण रोयी जब उसने और उसके पति ने अपने बच्चे के लिए जन्म प्रमाण पत्र और पासपोर्ट प्राप्त किया, जिससे गोद लेना कानूनी रूप से बाध्यकारी बन गया l अब मीना हमेशा उनकी बेटी होगी, हमेशा के लिए उनके परिवार का हिस्सा l जब शीबा ने कानूनी प्रक्रिया पर विचार किया, उसने “सच्चे आदान-प्रदान” के बारे में भी सोचा जो तब होता है जब हम यीशु के परिवार का हिस्सा बनते हैं : “अब हम पाप और टूटेपन के अपने जन्मसिद्ध अधिकार से दबाकर रखे गए हैं l” इसके बजाय, उसने जारी रखा, जब हम उसके बच्चों के रूप में अपनाए जाते हैं, तो हम कानूनी रूप से परमेश्वर के राज्य की पूर्णता में प्रवेश करते हैं l

प्रेरित पौलुस के दिनों में, यदि एक रोमी परिवार एक पुत्र को अपनाता था, तो उसकी कानूनी स्थिति पूरी तरह बदल जाती थी l उसके पुराने जीवन प्रत्येक ऋण रद्द कर दिया जाता था और वह अपने नए परिवार के सभी अधिकारों और विशेषाधिकारों को हासिल कर लेता था l पौलुस चाहता था कि यीशु में रोम के विश्वासी समझें कि यह नया दर्जा उनपर भी लागू होता था l अब वे पाप और दण्डाज्ञा के लिए बाध्य नहीं थे, लेकिन अब वे “आत्मा के अनुसार” चलते थे (रोमियों 8:4) l और जिनकी अगुवाई आत्मा करता है वे परमेश्वर की संतान के रूप में गोद लिए जाते हैं (पद. 14-15) l उनका कानूनी दर्जा बदल गया जब वे स्वर्ग के नागरिक बन गए l

यदि हमें उद्धार का उपहार मिला है, तो हम भी परमेश्वर के बच्चे हैं, उनके राज्य के उत्तराधिकारी हैं और मसीह के साथ संयुक्त l हमारे ऋण यीशु के बलिदान के उपहार द्वारा रद्द कर दिए गए हैं l हमें अब डर या दण्डाज्ञा में जीने की जरूरत नहीं है l

सही शब्द

पिछले एक साल में,  कई लेखकों ने विश्वासियों से आग्रह किया है कि वे हमारे विश्वास की “शब्दावली” पर नए सिरे से विचार करें l जैसे, एक लेखक ने,  इस बात पर जोर दिया कि विश्वास के धर्मवैज्ञानिक समृद्ध शब्द भी अपना प्रभाव खो सकते हैं,  जब, अति सुपरिचय और अति उपयोग के कारण,  हम सुसमाचार की गहराई और ईश्वर की आवश्यकता के साथ स्पर्श खो देते हैं l जब ऐसा होता है,  तो उसने सुझाव दिया,  हमें विश्वास की भाषा “आरम्भ से” पुनः सीखने की आवश्यकता है, अपनी मान्यताओं को त्यागकर जब तक कि हम सुसमाचार को पहली बार न देख सकें l

“आरंभ से परमेश्वर की बातें बोलना” सीखने का निमंत्रण मुझे पौलुस की याद दिलाता है,  जिसने “सभी मनुष्यों के लिए सब कुछ [बनकर]”  . . . सुसमाचार के लिए अपना जीवन समर्पित किया” (1 कुरिन्थियों 9:22-23) l उसने कभी नहीं माना कि जो यीशु ने किया था उसे वह सबसे श्रेष्ठ तरीके से संप्रेषित करना जानता था l इसके बजाय,  उसने लगातार प्रार्थना पर भरोसा किया और साथी विश्वासियों से उसके लिए प्रार्थना करने के लिए अनुनय किया─कि सुसमाचार साझा करने में उसे “प्रबल वचन”(इफिसियों 6:19 IBP) मिलने में सहायता मिल सके l

प्रेरित मसीह में प्रत्येक विश्वासी की आवश्यकता को भी जानता था कि वह उसके प्रेम में गहरी जड़ों की आवश्यकता के लिए हर दिन विनम्र और ग्रहणशील बना रहे (3:16–17) l यह तभी संभव है जब हम परमेश्वर के प्रेम में अपनी जड़ें गहरी करते जाते हैं,  प्रत्येक दिन उसके अनुग्रह पर अपनी  निर्भरता के बारे में अधिक जागरूक होते जाते हैं,  कि उसने हमारे लिए किया है उसके विषय अविश्वसनीय समाचार साझा करने के लिए हमें प्रबल शब्द मिल सके l

भारी लेकिन आशावान

पीनट्स(Peanuts) कॉमिक स्ट्रिप(पट्टी) में,  बहुत ही उत्साही चरित्र लूसी ने पांच सेंट(cent) के बदले में “मनोचिकित्सीय मदद” देने का विज्ञापन दिया l लाइनस उसके कार्यालय में आकर   अपनी “उदासी की गहरी भावना” उसे बताया l जब उसने उससे पूछा कि वह अपनी स्थिति के बारे में क्या कर सकता है,  तो लूसी का त्वरित उत्तर था,  "इससे संभलो! कृपया, पांच सेंट दीजिये l”

जबकि इस तरह का सुकून देने वाला मनोरंजन एक क्षणिक मुस्कुराहट लाता है,  वास्तविक जीवन में होने वाली उदासी और निराशा हमें जकड़ सकती है,  जिन्हें आसानी से खारिज नहीं किये जा सकता l निराशा और नाउम्मीदी की भावनाएं वास्तविक हैं,  और कभी-कभी पेशेवर ध्यान देने की आवश्यकता होती है l

लूसी की सलाह वास्तविक पीड़ा को संबोधित करने में सहायक नहीं थी l हालाँकि,  भजन 88 का लेखक कुछ शिक्षाप्रद और आशावादी सलाह देता है l मुसीबत से भरा एक ट्रक उसके दरवाजे पर आ गया l और इसलिए,  नम ईमानदारी के साथ,  उसने परमेश्वर के समक्ष अपना हृदय उंडेल दिया l “मेरा प्राण क्लेश से भरा हुआ है, और मेरा प्राण अधोलोक के निकट पहुँचा है” (पद.3) l “तू ने मुझे गढ़हे के तल ही में, अँधेरे और गहिरे स्थान में रखा है” (पद.6) l “अंधकार ही मेरा साथी है” (पद.18 Hindi-C.L.) l हम भजनहार की पीड़ा के विषय सुनते हैं,  महसूस करते हैं, और शायद उसके साथ तादात्म्य स्थापित करते हैं l फिर भी,  सब कुछ यह नहीं है l उसका विलाप आशा से पूर्ण है l “हे मेरे उद्धारकर्ता परमेश्वर यहोवा, मैं दिन को और रात को तेरे आगे चिल्लाता आया हूँ l मेरी प्रार्थना तुझ तक पहुंचे, और मेरे चिल्लाने की ओर कान लगा” (पद. 1-2; देखें पद. 9, 13) l भारी चीजें आती हैं और व्यावहारिक कदम जैसे परामर्श और चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता हो सकती है l लेकिन ईश्वर में कभी आशा नहीं छोड़नी चाहिए l