जाने देना
“आपके पिता की मृत्यु सक्रिय रूप से हो रही है,” मरणासन्न रोगियों के आश्रय स्थल(hospice) की नर्स बोली l “सक्रिय रूप से मृत्यु होना” मरने की प्रक्रिया की अंतिम चरण को संदर्भित करता है और मेरे लिए एक नया शब्द था, अजीब तरह से एक एकल सड़क पर यात्रा करने जैसा महसूस होना l मेरे पिता के अंतिम दिन, नहीं जानते हुए कि वे हमारी सुन पा रहे हैं कि नहीं, मेरी बहन और मैं उनके बिस्तर के निकट बैठ गए l हमने उनके सुन्दर गंजे सिर को चूमा l हमने उनको परमेश्वर की प्रतिज्ञाएं फुसफुसायी l हमने एक गाना गया और 23वाँ भजन उद्धृत किया l हमने उन्हें बताया कि हम उनसे प्यार करते हैं और हमारे पिता होने के लिए उन्हें धन्यवाद दिया l हमें पता था कि उनका दिल यीशु के साथ रहने के लिए लालायित था, और हमने उनसे कहा कि वह जा सकते हैं l उन शब्दों को बोलना जाने देने के लिए पहला कठिन कदम था l कुछ मिनटों के बाद, हमारे पिताजी का उनके शास्वत घर में ख़ुशी से स्वागत किया गया l
किसी प्रियजन का अंतिम छुटकारा कष्टदायक होता है l यहाँ तक कि यीशु के आँसू बह गए जब उसके अच्छे मित्र लाजर की मृत्यु हो गई (यूहन्ना 11:35) l लेकिन परमेश्वर के वादों के कारण, हमें शारीरिक मृत्यु के आगे आशा है l भजन 116:15 कहता है कि ईश्वर के “भक्त” – जो उसके हैं – उसके लिए “अनमोल” है l हालाँकि वे मर जाते हैं, वे फिर से जीवित होंगे l
यीशु प्रतिज्ञा करता है, “पुनरुत्थान और जीवन मैं हूँ; जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए तौभी जीएगा, और जो कोई जीवित है और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनंतकाल तक न मरेगा” (यूहन्ना 11:25-26) l यह जानने में हमें कितना सुकून मिलता है कि हम हमेशा के लिए परमेश्वर की उपस्थिति में होंगे l

पिता की राह पर
एक प्राचीन कहानी एक लालची, अमीर ज़मींदार के विषय बतायी गई है जिसने एक गरीब किसान को घर के साथ कुआँ बेचा l अगले दिन जब किसान ने अपने खेतों के लिए पानी खींचना चाहा, तो ज़मींदार ने यह कहते हुए आपत्ति जताई कि उसने केवल कुआँ बेचा है, उसमें का पानी नहीं l व्याकुल होकर, किसान ने राजा अकबर के दरबार में न्याय माँगा l इस अज़ीबोगरीब मामले को सुनने के बाद, राजा ने सलाह के लिए अपने बुद्धिमान मंत्री बीरबल की ओर रुख किया l बीरबल ने ज़मींदार से कहा, “सच है, कुएँ का पानी किसान का नहीं है और कुआँ तुम्हारा नहीं है l इसलिए यदि तुम किसान के कुएँ में पानी जमा करना चाहते हो तो भला है कि तुम उस जगह के लिए किराए का भुगतान करो l” तुरंत जमींदार समझ गया कि वह मात खा गया है, और उसने घर और कुएँ पर अपने दावों को छोड़ दिया l
शमूएल ने भी अपने पुत्रों को इस्राएल के ऊपर न्यायी नियुक्त किया, और वे लालच से प्रेरित थे l उसके बेटे “उसकी राह पर न चले” (1 शमूएल 8:3) l शमूएल की ईमानदारी की तुलना में, उसके बेटे “लालच में आकर घुस लेते और न्याय बिगाड़ते थे” और अपने लाभ के लिए अपने स्थिति का उपयोग करने लगे l इस अन्यायपूर्ण व्यवहार ने इस्राएल के वृद्धों और परमेश्वर को नाराज़ किया, और राजाओं का एक क्रम आरंभ हुआ जिससे पुराना नियम के पन्ने भरे पड़े हैं (पद.4-5) l
परमेश्वर के तरीकों पर चलने से इनकार करना उन मूल्यों के विकृत होने की अनुमति देता है, और परिणामस्वरूप अन्याय पनपता है l उसके तरीके से चलने का मतलब ईमानदारी और न्याय केवल हमारे शब्दों में ही नहीं बल्कि हमारे कर्मों में भी स्पष्ट रूप से देखा जाता है l वे अच्छे काम कभी अपने आप में अंत नहीं होते, लेकिन हमेशा ऐसे होते है कि दूसरे देखेंगे और हमारे स्वर्गिक पिता की महिमा करेंगे l

प्रेम किया गया, खुबसूरत, वरदान प्राप्त
मोहन एक किशोर के रूप में आत्मविश्वास से भरा दिखाई दिया l लेकिन यह आत्मविश्वास एक मुखौटा था l सच में, एक अशांत घर ने उसे भयभीत, स्वीकृति के लिए बेताब, और अपने परिवार की समस्याओं के लिए गलत तरीके से जिम्मेदार महसूस कराया l “जहां तक मुझे याद है,” वह कहता है, “हर सुबह मैं बाथरूम में जाता था, आईने में देखता हूँ, और खुद से ज़ोर से कहता था, ‘तुम मुर्ख हो, तुम बदसूरत हो, और यह तुम्हारी गलती है l’”
मोहन का स्वयं से नफरत तब तक जारी रहा, जब तक वह इक्कीस वर्ष का नहीं हो गया, जब उसे यीशु में अपनी पहचान का एक दिव्य रहस्योद्घाटन मिला’ l “मुझे एहसास हुआ कि ईश्वर मुझे बिना शर्त प्यार करता है और कोई भी इसे कभी नहीं बदलेगा,” वह याद करता है l “मैं ईश्वर को कभी शर्मिन्दा नहीं कर सकता था, और वह मुझे कभी भी अस्वीकार नहीं करने वाला था l” आखिरकार, मोहन ने आईने में देखा और खुद से अलग बात की l “तुमको प्यार किया जाता है, तुम विशेष हो, तुम प्रतिभाशाली हो,” उसने कहा, “और यह तुम्हारी गलती नहीं है l”
मोहन का अनुभव बताता है कि यीशु में विशवास करने वाले के लिए परमेश्वर की आत्मा क्या करती है – वह यह प्रगट करके कि हमसे कितनी गहराई से प्रेम किया जाता है हमें भयमुक्त करता है (रोमियों 8:15, 38-39), और पुष्टि करता है कि हम उन सभी लाभों के साथ परमेश्वर के बच्चे हैं जो वह स्थिति लाती है (8:16-17; 12:6-8) l परिणामस्वरूप, हम अपनी सोच को नूतन करके (12:2-3) खुद को सही ढंग से देखना शुरू कर सकते हैं l
वर्षों बाद, मोहन अभी भी उन शब्दों को हर दिन फुसफुसाता है, परमेश्वर जो कहता है कि वह कौन है को दृढ़ करता है l पिता की नज़रों में उससे प्यार किया जाता है, सुन्दर है, और प्रतिभाशाली है l और इसलिए हम हैं l

काम में परमेश्वर की करुणा
मेरा क्रोध तब तेज़ हो गया जब एक महिला ने मेरे साथ बदसलूकी की, मुझे दोषी ठहराया और मेरे बारे में बकवास की l मैं चाहती थी कि हर कोई यह जान जाए कि उसने क्या किया है – मैं चाहती थी कि उसको भी तकलीफ हो जैसे उसके व्यवहार के कारण मुझे तकलीफ हुई थी l मैं तब तक आक्रोष में डूबी रही, जब तक कि मेरी कनपटी में दर्द नहीं हुआ l लेकिन जैसा कि मैंने अपने दर्द के दूर होने के लिए प्रार्थना करना शुरू किया, पवित्र आत्मा ने मुझे दोषी ठहराया l राहत के लिए परमेश्वर से भीख मांगते हुए मैं कैसे बदला लेने की योजना बना सकती? अगर मुझे भरोसा है कि वह मेरी देखभाल करेगा, तो मैं इस स्थिति को संभालने के लिए उस पर भरोसा क्यों नहीं कर सकती थी? यह जानते हुए कि जो लोग आहत हैं, वे अक्सर दूसरे लोगों को आहत करते हैं, मैंने परमेश्वर से कहा कि वह मुझे उस स्त्री को माफ़ करने और सुलह की दिशा में काम करने में मदद करे l
भजनकार दाऊद ने अनुचित व्यवहार को सहन करते हुए परमेश्वर पर भरोसा करने की कठिनाई को समझा l हालाँकि दाऊद ने एक प्यार करने वाले सेवक होने की पूरी कोशिश की, राजा शाऊल ने ईर्ष्या के आगे घुटने टेक दिए और उसकी हत्या करना चाहा (1 शमूएल 24:1-2) l दाऊद को तब तक तकलीफ झेलनी पड़ी जब परमेश्वर ने बातों को हल किया और उसे सिंहासन लेने के लिए तैयार किया, लेकिन फिर भी उसने बदला लेने की बजाय परमेश्वर का आदर करने का चुनाव किया (पद.3-7) l उसने शाऊल के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए अपनी जिम्मेदारी पूरी की और परिणाम परमेश्वर के हाथों में छोड़ दिया (पद.8-22) l
जब ऐसा लगता है कि दूसरे लोग गलत कामों के परिणाम से बच रहे हैं, हम अन्याय के साथ संघर्ष करते हैं l लेकिन हमारे दिलों और दूसरों के दिलों में परमेश्वर की करुणा के काम के साथ, हम क्षमा कर सकते हैं जैसे उसने हमें माफ़ कर दिया है और वह आशीष प्राप्त कर सकते हैं जो उसने हमारे लिए तैयार किया है l
युद्ध समाप्त हो चूका है l वास्तव में l
द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद उनतीस वर्षों तक, एक जापानी सैनिक, हीरू ओनोडा जंगल में छिपा रहा, और यह विशवास करने से इनकार कर दिया कि उसके देश ने आत्मसमर्पण कर दिया था l जापानी सैन्य अगुओं ने उसे अमेरिकी और ब्रिटिश सेना की जासूसी करने के आदेश के साथ फिलिपीन्स के एक दूरदराज़ के द्वीप पर भेज दिया था l शांति संधि पर हस्ताक्षर किये जाने के लम्बे समय बाद और शत्रुता समाप्त होने के बाद भी, बह जंगल में रहा l 1974 में, उसके कमांडिंग ऑफिसर को उसे खोजने और उसे भरोसा दिलाने के लिए कि युद्ध समाप्त हो चूका है उस द्वीप तक यात्रा करनी पड़ी l
तीन दशकों तक, यह व्यक्ति दरिद्र, अलग-थलग जीवन जीया, क्योंकि उसने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया था – विश्वास करने से इनकार कर दिया था कि संघर्ष ख़त्म हो चुका था l हम भी उसी प्रकार की गलती कर सकते हैं l पौलुस इस आश्चर्यजनक सत्य की घोषणा करता है कि “हम सब जिन्होंने मसीह यीशु का बप्तिस्मा लिया, उसकी मृत्यु का बप्तिस्मा लिया” (रोमियों 6:3) l क्रूस पर, एक शक्तिशाली, रहस्मय तरीके से, यीशु ने शैतान के झूठ को, मौत के आतंक को और पाप की कठोर पकड़ को मौत के घाट उतार दिया l हालाँकि, हम “पाप के लिए तो [मरे हुए], और “परमेश्वर के लिए जीवित” थे (पद.11), हम अक्सर ऐसे जीवित रहते हैं जैसे कि बुराई अभी भी शक्ति रखती है l हम परीक्षा के सामने हार मान जाते हैं, पाप के बहकावे में आकर परास्त हो जाते हैं l हम झूठ सुनते हैं, यीशु पर भरोसा करने में असफल होते हैं l लेकिन हमें हार नहीं माननी है l हमें झूठे कथा में नहीं जीना है l परमेश्वर के अनुग्रह से हम मसीह की जीत की सच्ची कहानी को अपना सकते हैं l
जबकि हम अभी भी पाप के साथ कुश्ती कर रहे हैं, छुटकारा तब मिलता है जब हम समझते हैं कि यीशु ने पहले ही लड़ाई जीत ली है l हम उस सच्चाई को उसकी शक्ति में जी सकते हैं l
