संतोष को पकड़ना
एक मनोचिकित्सक के सलाह स्तम्भ में, उन्होंने ब्रेन्डा नामक एक पाठक को जवाब दिया, जिसने अफ़सोस जताया था कि उसकी महत्वाकांक्षी गतिविधियों ने उसे असंतुष्ट कर दिया था l मनोचिकित्सक के शब्द स्पष्टवादी/रूखे(blunt) थे l मनुष्य को खुश रहने के लिए नहीं बनाया गया है, उन्होंने कहा, “केवल जीवित रहने और प्रजनन करने के लिए l” हम संतोष की “चिढ़ाने वाली और मायावी तितली” का पीछा करने के लिए अभिशप्त हैं, उन्होंने कहा, “हमेशा इसे पकड़ने के लिए नहींl”
मुझे आश्चर्य है कि मनोचिकित्सक के शून्यवादी/नकारवादी(nihilistic) शब्दों को पढ़कर ब्रेन्डा को कैसा लगा होगा और अगर उसने इसके बजाय भजन 131 पढ़ा होता तो उसे कितना अलग आभास होताl अपने शब्दों में, दाऊद हमें संतोष पाने के तरीके पर एक निर्देशित विचार देता है l वह विनम्रता की मुद्रा में आरम्भ करता है,अपनी राजसी महत्वकांक्षाओं को एक तरफ रख देता है, और जबकि जीवन के बड़े सवालों से जूझना महत्वपूर्ण है, वह उन्हें भी एक तरफ रख देता है (पद.1) तब वह परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत करता है (पद.2) भविष्य को उसके हाथों में सौंपता है (पद.3) l परिणाम खुबसूरत है : वह कहता है, “जैसा दूध छुड़ाया हुआ लड़का अपनी माँ की गोद में रहता है, वैसे ही . . . मेरा मन भी रहता है” (पद.2)
हमारी तरह एक टूटी-फूटी दुनिया में, संतोष कई बार हाथ न आने वाला लगेगा l फिलिप्पियों 4:11-13 में प्रेरित पौलुस ने कहा कि संतोष सीखने की चीज़ है l लेकिन अगर हम मानते हैं कि हम केवल “जीवित रहने और पुनरुत्पादन” के लिए रचे गए हैं, तो संतोष निश्चित रूप से एक न पकड़ने वाली तितली ही होगी l दाऊद हमें एक और तरीका दिखाता है: ईश्वर की उपस्थिति में चुपचाप आराम करने के द्वारा संतोष प्राप्त करना l

भाई शाऊल
हे प्रभु, कृपया मुझे कहीं भी भेज दें लेकिन वहां नहीं l” एक वर्ष के लिए एक विदेशी विनिमय छात्र (foreign exchange student) के रूप में आरम्भ करने से पहले एक किशोर के रूप में यही मेरी प्रार्थना थी l मुझे नहीं पता था कि मैं कहाँ जाने वाला था, लेकिन मुझे पता था कि मैं कहाँ नहीं जाना चाहता था l मैं उस देश की भाषा नहीं बोलता था, और मेरा मन उसके रीति-रिवाजों और लोगों के प्रति पूर्वाग्रहों(prejudices) से भरा हुआ था l इसलिए मैंने ईश्वर से मुझे कहीं और भेजने के लिए कहा l
लेकिन ईश्वर ने अपनी असीम बुद्धि में मुझे ठीक वहीँ भेजा जहाँ मैंने नहीं जाने के लिए कहा था l मुझे बहुत ख़ुशी है कि उसने ऐसा किया! चालीस साल बाद भी, उस देश में मेरे प्रिय मित्र हैं l जब मेरी शादी हुयी, तो मेरा बेस्ट मैन(best man) स्टीफन वहां से आया l जब उसकी शादी हुयी, तो मैं उपकार लौटाने के लिए वहां हवाई जहाज़ से गया l और हम जल्द ही एक और यात्रा की योजना बना रहे हैं l
सुन्दर चीजें घटित होती हैं जब परमेश्वर हृदय परिवर्तन का कारण बनता है! इस तरह के परिवर्तन को केवल दो शब्दों द्वारा चित्रित किया गया है : “भाई शाऊल” (प्रेरितों 9:17)
वे शब्द एक विश्वासी, हनन्याह के थे, जिसे परमेश्वर ने शाऊल के ह्रदय परिवर्तन के तुरंत बाद उसकी दृष्टि ठीक करने के लिए बुलाया था (पद.10-12) शाऊल के हिंसक अतीत के कारण पहले तो हनन्याह ने विरोध किया, और प्रार्थना की : “मैं ने इस मनुष्य के विषय में बहुतों से सुना है कि इसने . . . तेरे पवित्र लोगों के साथ बड़ी-बड़ी बुराइयाँ की हैं” (पद.13)
लेकिन हनन्याह आज्ञाकारी था और चला गया l और क्योंकि उसका ह्रदय परिवर्तन हो चुका था, हनन्याह ने विश्वास में एक नया भाई प्राप्त किया, शाऊल पौलुस के रूप में जाना जाने लगा, और यीशु का सुसमाचार सामर्थ्य के साथ फैलता गयाl सच्चा परिवर्तन हमेशा उसके द्वारा संभव है!

पाप को दूर करना
जब मैंने देखा कि हमारे बरामदे के पास बगीचे की पाइप के बगल में एक टहनी निकली हुयी है, तो मैंने उस हानिकारक न लगनेवाली बदसूरत वनस्पति को नज़रअंदाज़ कर दिया l एक छोटा सा खरपतवार संभवतः हमारे लॉन (lawn)को कैसे नुक्सान पहुंचा सकता है? लेकिन जैसे-जैसे सप्ताह बीतते गए, वह दुखदायी वनस्पति एक छोटी झाड़ी के आकार का हो गया और हमारे अहाते पर कब्ज़ा करने लगा l उसकी फैली हुयी डालियाँ रास्ते के एक भाग पर झुक गए और अन्य जगहों पर उग आए l इस विनाशकारी स्थिति को स्वीकार करते हुए, मैंने अपने पति से कहा कि वे जंगली खरपतवार को जड़ से हटाने में मेरी सहायता करें और फिर खरपतवार नाशक से हमारे अहाते की रक्षा करें l
जब हम पाप की उपस्थिति को अनदेखा या अस्वीकार करते हैं, तो वह हमारे जीवन पर अवांछित अतिवृद्धि(overgrowth) की तरह आक्रमण कर सकता है और हमारे व्यक्तिगत स्थान को अँधेरा कर सकता है l हमारे निष्पाप परमेश्वर में कोई अन्धकार नहीं है . . . बिलकुल भी नहीं l उनके बच्चों के रूप में, हम सीधे पापों का सामना करने के लिए तैयार और सामर्थी किये गए हैं ताकि हम “ज्योति में चल सकें, जैसा कि वह ज्योंति में है”(1 यूहन्ना 1:7)अंगीकार और पश्चाताप के द्वारा, हम क्षमा और पाप से स्वतंत्रता का अनुभव करते हैं (पद.8-10) क्योंकि हमारे पास एक महान अधिवक्ता है—यीशु (2:1)उसने स्वेच्छा से हमारे पापों के लिए अंतिम कीमत चुकाई है—अपने जीवन का लहू—और “केवल हमारे ही नहीं वरन् सारे जगत के पापों का भीI” (पद.2)
जब परमेश्वर के द्वारा हमारे पाप हमारे ध्यान में लाए जाते हैं, तो हम इन्कार, टाल-मटोल, या उत्तरदायित्व से विमुख होना चुन सकते हैं l लेकिन जब हम स्वीकार करते हैं और पश्चाताप करते हैं, तो वह उन पापों को मिटा देता हैं जो उसके साथ और दूसरों के साथ हमारे संबंधों को नुक्सान पहुंचाते हैं l

हम अकेले नहीं हैं
फ्रेड्रिक ब्राउन की लघु रोमांचक कहानी “नॉक”(दस्तक/Knock) में उन्होंने लिखा, पृथ्वी (गृह/planet) पर का आखिरी आदमी एक कमरे में अकेला बैठा थाl दरवाजे पर दस्तक हुयीl” हाँ! वे कौन हो सकते हैं,और वे क्या चाहते हैं? उसके लिए कौन रहस्यमय प्राणी आया है? आदमी अकेला नहीं है l
हम भी नहीं हैं l
लौदीकिया की कलीसिया ने अपने द्वार पर दस्तक सुनीI (प्रकाशितवाक्य 3:20) उनके लिए कौन सा अलौकिक प्राणी आया था? उसका नाम यीशु था, “प्रथम और अंतिम . . . जो जीवता हैI” (1:17-18) उसकी आखें आग की तरह प्रज्वलित थीं, और उसका मुख “ऐसा प्रज्वलित था, जैसा सूर्य कड़ी धूप के समय चमकता है” (पद.16) जब उसके सबसे अच्छे मित्र यूहन्ना ने उसकी महिमा की एक झलक देखी, तो वह “उसके पांवों पर मुर्दा सा गिर पड़ा” (पद.17) मसीह में विश्वास का आरम्भ परमश्वर के भय से होती हैl
हम अकेले नहीं हैं,और यह सुकून देने वाला भी हैl यीशु “परमेश्वर की महिमा का प्रकाश, और उसके तत्व की छाप है,और सब वस्तुओं को अपनी सामर्थ्य के वचन से संभालता है”(इब्रानियों 1:3) फिर भी मसीह हमें मारने के लिए नहीं बल्कि हमसे प्रेम करने के लिए अपनी शक्ति का उपयोग करता हैl उसका निमंत्रण सुने, “यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा, और वह मेरे साथ” (प्रकाशितवाक्य 3:20) हमारा विश्वास डर से शुरू होता है—दरवाजे पर कौन है?—और यह एक स्वागत और मजबूत आलिंगन में समाप्त होता है l यीशु हमेशा हमारे साथ रहने की प्रतिज्ञा करता है, भले ही हम पृथ्वी पर अंतिम व्यक्ति हों l ईश्वर का धन्यवाद हो, हम अकेले नहीं हैं l

पवित्रशास्त्र प्रशिक्षण
1800 के अंत में, विभिन्न स्थानों के लोगों ने एक ही समय में एक सी सेवकाई संसाधनों का विकास किया l पहला 1877 में मोंट्रियल,कनाडा में थाl 1898 में, न्यूयार्क शहर में एक और विचार/प्रत्यय शुरू की गयी l1922 तक, इनमें से कुछ पांच हज़ार कार्यक्रम हर वर्ष गर्मियों में उत्तरी अमेरिका में सक्रिय थे l
इस प्रकार वेकेशन बाइबल स्कूल(VBS) का प्रारंभिक इतिहास शुरू हुआl जिस जुनून(passion) उन VBS अग्रदूतों को प्रेरित किया, वह युवा लोगों के लिए बाइबल जानने की इच्छा थी l
पौलुस को अपने युवा शिष्य, तीमुथियुस के लिए भी ऐसा ही जुनून था, यह लिखते हुए कि “सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है” और “और हर एक भले काम के लिए” तैयार करता हैI (2 तीमुथियुस 3:16-17) लेकिन यह केवल हितकारी सुझाव नहीं था कि “अपनी बाइबल पढ़ना अच्छा है l” पौलुस की सलाह सख्त चेतावनी का पालन करती है कि “अंतिम दिनों में कठिन समय आएँगे” (पद.1) झूठे शिक्षकों के साथ जो “सत्य की पहचान कभी नहीं” कर पाते हैं (पद.7)यह ज़रूरी है कि हम पवित्रशास्त्र के द्वारा स्वयं की रक्षा करें, क्योंकि यह हमें हमारे उद्धारकर्ता के ज्ञान में डुबो(ध्यानमग्न) देता है, हमें “मसीह पर विश्वास करने से उद्धार प्राप्त करने के लिए बुद्धिमान बना सकता है” (पद.15)
बाइबल का अध्ययन करना केवल बच्चों के लिए ही नहीं है; यह वयस्कों के लिए भी है l और यह सिर्फ गर्मियों के अवकाश के लिए नहीं है; यह हर दिन के लिए हैं l पौलुस ने तीमुथियुस को लिखा, “बचपन से पवित्रशास्त्र तेरा जाना हुआ है” (पद.15), लेकिन आरम्भ करने के लिए कभी देर नहीं होती l हम जीवन के किसी भी अवस्था में हों, बाइबल का ज्ञान हमें यीशु से जोड़ता है l यह हम सबके लिए परमेश्वर का VBS पाठ है l