कठिन स्थानों में आनन्द
जब भी वह मेरे फोन का जवाब देने में असमर्थ होती थी, तो मेरी मित्र की वॉयसमेल रिकॉर्डिंग मुझे उसके लिए एक सन्देश छोड़ने के लिए कहती थी। वह रिकॉर्डिंग बहुत ही प्रसन्नता के साथ सन्देश को समाप्त करती थी, “आपका दिन अच्छा हो!” जब मैंने उसके शब्दों पर ध्यान दिया, तो मुझे अहसास हुआ कि हमारे दिन को अच्छा बनाने की सामर्थ हम में नहीं है-कुछ परिस्थितियाँ वास्तव में हानिकारक होती हैं। परन्तु ध्यान से देखना मेरे दिन में कुछ अच्छा और सुन्दर प्रकट कर सकता है, चाहे उसमें चीज़ें अच्छी हो रही हों या बुरी।
हब्बकूक सरल परिस्थितियों का सामना नहीं कर रहा था। एक नबी के रूप में परमेश्वर ने उसे आने वाले दिनों को दिखाया था जब कोई भी फसल या पशु-जिन पर परमेश्वर के लोग निर्भर थे-फलदायी नहीं होगा। (3:17) । आने वाली कठिनाइयों को सहन करने के लिए आशावादी होने से अधिक किसी और चीज़ की आवश्यकता होगी। एक समुदाय के रूप में इस्राएल बहुत अधिक गरीबी में होगा। हब्बकूक कलेजा कम्पा देने, ओंठ थरथरा देने, खड़े-खड़े कम्पा देने वाले भय का अहसास कर रहा था। (पद 16) ।
तौभी हब्बकूक ने कहा कि वह “यहोवा के कारण आनन्दित और मगन” रहेगा (पद 18) । उसने परमेश्वर में अपनी आशा की घोषणा की, जो कठिन स्थानों में चलने के लिए सामर्थ प्रदान करता है (पद 19) ।
कईबार हम गहन पीड़ा और कठिनाई के समय से हो कर गुज़रते हैं। परन्तु इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम ने क्या खोया है या हम जो चाहते थे वह कभी नहीं पाया, हम ह्ब्बकूक के समान प्रेमी परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध में आनन्दित हो सकते हैं। तब भी जब हमें लगे कि हमारे पास कुछ भी शेष नहीं रहा है, वह हमें कभी भी नहीं छोड़ेगा और कभी नहीं त्यागेगा (इब्रानियों 13:5) । वह जो “उन लोगों को उपलब्ध करवाता है, जो विलाप करते हैं” वही हमारे आनन्द का अन्तिम कारण है (यशायाह 61:3)।

साहस के साथ स्थिर रहना
जबकि (जर्मनी) कलीसिया के अनेक अगुवों ने हिटलर के सामने हार मान ली थी, थियोलौजियन(धर्मशास्त्री) और पासबान मार्टिन निमोल्लर उन बहादुर आत्माओं में से एक थे, जिन्होंने नाज़ी दुष्टता का विरोध किया था। मैंने एक घटना पढ़ी थी जिसमें 1970 में वृद्ध जर्मन लोगों का एक समूह एक बड़े होटल के बाहर खड़ा है, जबकि एक युवक उस समूह के सामान के साथ दौड़-धूप कर रहा है। किसी ने पूछा कि वह समूह किन लोगों का था। उत्तर आया “जर्मन पासबान” । “और वह युवक कौन था?” वह मार्टिन निमोल्लर थे-वह अस्सी वर्ष के थे। वह जवान बने रहे क्योंकि वह अभीत थे।”
निमोल्लर इसलिए भय का विरोध करने के योग्य नहीं थे क्योंकि उनमें भय से उनकी प्रतिरक्षा करने के लिए कुछ दिव्य वस्तु विद्यमान थी, परन्तु वह परमेश्वर के अनुग्रह के कारण ऐसे थे। वास्तव में एक समय में तो वह यहूदी विरोधी दृष्टिकोण तक रखते थे। परन्तु उन्होंने पश्चाताप किया और परमेश्वर ने उन्हें सम्भाला और परमेश्वर ने उन्हें आवाज़ उठाने और सत्य के लिए जीने में सहायता की।
मूसा ने इस्राएलियों को भय का विरोध करने और सत्य में परमेश्वर के पीछे चलने के लिए प्रोत्साहित किया। यह जानने के पश्चात कि मूसा को शीघ्र ही उनसे ले लिए जाएगा, वे भयभीत हो गए, तब उस अगुवे (में) बिना डरे उनके लिए ये शब्द थे: “तू हियाव बाँध और दृढ़ हो, उनसे न डर और न भयभीत हो; क्योंकि तेरे संग चलनेवाला तेरा परमेश्वर यहोवा है; वह तुझ को धोखा न देगा और न छोड़ेगा।” (व्यवस्थाविवरण 31:6) । मात्र एक ही कारण से एक अनिश्चित भविष्य के सामने काँपने का कोई भी कारण नहीं था: क्योंकि परमेश्वर उनके साथ था।
चाहे कैसा भी अँधेरा आप पर हावी हो, चाहे कैसे भी खतरे आप पर हमला करें-परमेश्वर आपके साथ है। परमेश्वर की दया के द्वारा आप इस ज्ञान के साथ अपने भय का सामना कर सकते हैं कि “वह तुझ को धोखा न देगा और न छोड़ेगा।” (पद 6, 8) ।

एक चिह्न से कहीं अधिक
टीम के लिए इतिहास बनाने की कगार पर आयोवा विश्वविद्यालय के बास्केटबाल के सितारे जॉर्डन बोहेनन ने जानबूझकर फ्री थ्रो को छोड़ दिया जो स्कूल के पच्चीस साल पुराने रिकॉर्ड को तोड़ देता। कुछ दिनों बाद 1993 में आयोवा के क्रिस स्ट्रीट ने लगातार चौंतीस फ्री थ्रो लिए, परन्तु उन्होंने अपना जीवन एक कार-दुर्घटना में गवाँ दिया। बोहेनन ने उनके रिकॉर्ड को न तोड़कर स्ट्रीट की याद का सम्मान करने का चुनाव किया।
बोहेनन ने अपनी बढ़ोत्तरी से महत्वपूर्ण बातों की एक तीव्र जागरुकता का प्रदर्शन किया। हम ऐसे ही मूल्य युवा योद्धा दाऊद के जीवन में भी देखते हैं। अपनी छिन्न-भिन्न सेना के साथ एक गुफ़ा में छिपे हुए, दाऊद को अपने गृह-नगर के कूएँ से पानी पीने की लालसा की, परन्तु उस स्थान पर भयानक फिलिश्तियों का कब्ज़ा था (2 शमूएल 23:14–15)।
साहस के एक स्तब्ध कर देने वाले कार्य में दाऊद के तीन योद्धा “पलिश्तियों की छावनी पर टूट पड़े” पानी भरा और उसे दाऊद के सामने ले आए। परन्तु दाऊद इसे पीने के लिए अपने पास नहीं ला पाया। परन्तु इसके स्थान पर उसने “यहोवा के सामने अर्घ करके उंडेला और कहा “क्या मैं उन मनुष्यों का लहू पीऊँ जो अपने प्राणों पर खेलकर गए थे?” ( पद 16–17)।
एक ऐसे संसार में जो उन लोगों को प्रतिफल देता है जो वह सबकुछ हड़प लेते हैं, जो वे हड़प सकते हैं फिर प्रेम और बलिदान के कार्य कितने शक्तिशाली हो सकते हैं! ऐसे कार्य मात्र चिह्नों से कहीं अधिक होते हैं।

आगे बढ़ते रहो
व्यवसायिक जगत में काम करने ने मुझे अनेक प्रतिभावान और ऊँचे स्तर के लोगों (के) साथ बात करने का अवसर प्रदान किया। परन्तु शहर से बाहर एक निरीक्षक की अगुवाई में किया गया एक कार्य एक अपवाद था। समूह की प्रगति पर ध्यान दिए बिना यह प्रबन्धक कठोरता के साथ हमारे काम की आलोचना करता था और हर सप्ताह काम का ब्यौरा लेने के लिए किए गए फोन पर और काम करने की माँग करता था। इस प्रकार बीच में आ जाने से मैं निरुत्साहित और भयभीत हो गई थी। मैं काम छोड़ देना चाहती थी।
सम्भव है कि मूसा ने भी उसके काम को छोड़ देने का अनुभव किया होगा, जब अन्धियारे की महामारी के दौरान उसका सामना फिरौन से हुआ था। परमेश्वर ने मिस्र में आठ अन्य भयावह महामारियाँ भेजी और अंततः फिरौन चिल्ला उठा, मेरे सामने से चला जा; और सचेत रह; मुझे अपना मुख फिर न दिखाना; क्योंकि जिस दिन तू मुझे मुँह दिखाए उसी दिन तू मारा जाएगा।” (निर्गमन 10:28)।
इस खतरे के बावजूद भी मूसा को परमेश्वर के द्वारा इस्राएलियों को फिरौन के नियन्त्रण से आज़ाद करवाने के लिए इस्तेमाल किया गया। “विश्वास ही से राजा के क्रोध से न डरकर उसने मिस्र को छोड़ दिया, क्योंकि वह अनदेखे को मानो देखता हुआ दृढ़ रहा।”(इब्रानियों 11:27)। मूसा ने फिरौन पर यह विश्वास करने के द्वारा जय प्राप्त कर ली कि परमेश्वर छुड़ाने की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करेगा। (निर्गमन 3:17).
आज, हम परमेश्वर की प्रतिज्ञा पर निर्भर हो सकते हैं कि वह हर परिस्थिति में हमारे साथ है और वह अपने पवित्र आत्मा से हमारी सहायता कर रहा है। वह हमें दिव्य सामर्थ, प्रेम, और आत्म नियन्त्रण प्रदान (2 तीमुथियुस 1:7) करने के द्वारा हमें धमकी के दबाव का विरोध करने और इस पर गलत प्रतिक्रिया करने में सहायता करता है। हमारे जीवनों में बढ़ते रहने और परमेश्वर की अगुवाई का पालन करने के लिए आत्मा वह साहस प्रदान करता है, जिसकी हमें आवश्यकता है।

तुलना से परे जीवन
एक टीवी के कार्यक्रम में युवाओं ने किशोरों के जीवन को और अच्छे से समझने के लिए माध्यमिक विद्यालय के छात्र होने का अभिनय किया। उन्होंने पाया कि किशोर अपना मूल्यांकन कैसे करते हैं, इस पर सोशल मीडिया एक मुख्य भूमिका निभाती है। एक सहभागी ने पाया कि “विद्यार्थियों का आत्म-मूल्य सोशल मीडिया से जुड़ा होता है-यह इस बात पर आधारित होता है कि “उनकी लगाई गई तस्वीर को कितने लोगों ने पसन्द किया है।” दूसरों के द्वारा स्वीकार किए जाने की यह आवश्यकता किशोरों को आनलाइन चरम सीमा तक का व्यवहार करने की ओर ले जा सकता है।
दूसरे लोगों के द्वारा स्वीकार किए जाने की चाह सर्वदा से रही है। उत्पत्ति 29 में लिआ: अपने पति याकूब के प्रेम की चाह रखती है। यह उसके पहले तीन पुत्रों के नाम में दिखाई देता है-सभी उसके अकेलेपन को दर्शा रहे हैं (पद 31-34) । परन्तु दुःख की बात यह है कि ऐसा कोई भी संकेत नहीं दिया गया है कि याकूब ने कभी भी वह प्रेम उसे प्रदान किया, जिसकी वह लालसा करती रही थी।
उसकी चौथी सन्तान के जन्म पर, लिआ: अपने पति के स्थान पर परमेश्वर की ओर मुड़ी और अपने चौथे पुत्र का नाम यहूदा रखा, जिसका अर्थ “धन्यवाद” है (पद 35) । ऐसा प्रतीत होता है कि लिआ: ने अंततः अपना मूल्य परमेश्वर में खोजने का चुनाव किया। वह परमेश्वर के उद्धार के कार्य का एक हिस्सा बन गई: यहूदा राजा दाऊद और बाद में यीशु का पूर्वज हुआ।
हम अनेक तरीकों और चीज़ों में अपना मूल्य खोजने का प्रयास कर सकते हैं, परन्तु यीशु में ही हम परमेश्वर की सन्तान, मसीह के साथ उत्तराधिकारी और उन लोगों के रूप में अपनी पहचान को प्राप्त करते हैं, जो स्वर्गीय पिता के साथ अनन्त जीवन में वास करेंगे। जैसा कि पौलुस ने लिखा कि “प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता” की तुलना इस संसार की किसी भी वस्तु से नहीं की जा सकती (फिलिप्पियों 3:8)।