Month: मार्च 2020

जीवन से भी उत्तम

यद्यपि मेरी यीशु से प्यार करती थी – जीवन कठिन था, बहुत कठिन l दो बेटों के साथ दो पोतों की मृत्यु हो चुकी थी दोनों ही गोली के शिकार हुए थे l और मेरी को खुद अशक्त करनेवाला दिल का दौरा पड़ा जिससे वह एक ओर लकवाग्रस्त हो गयी थी l फिर भी, जैसे ही वह सक्षम हुयी उसने चर्च की आराधनाओं में जाने के लिए अपना रास्ता बना लिया जहाँ यह उसके लिए असामान्य नहीं था – खंडित बोली के साथ – प्रभु की प्रशंसा करने के लिए ऐसे शब्दों का उपयोग, “मेरी आत्मा यीशु से प्यार करती हैं; उसका नाम धन्य हो!”

मेरी द्वारा परमेश्वर की प्रशंसा करने से बहुत पहले, दाऊद ने भजन 63 के शब्दों को कलमबद्ध किया था l भजन का शीर्षलेख बताता है कि दाऊद ने लिखा था कि “जब वह यहूदा के जंगल में था l” यद्यपि वह एक कम चाहनेयोग्य – निराशाजनक भी – स्थिति में था, वह निराश नहीं हुआ क्योंकि उसकी आशा परमेश्वर में थी l “हे परमेश्वर, तू मेरा परमेश्वर है, मैं तुझे यत्न से ढूँढूँगा; . . . सुखी और निर्जल ऊसर भूमि पर, मेरा मन तेरा प्यासा है” (पद.1) l 

शायद आप खुद को बिना सही दिशा और अपर्याप्त संसाधन के साथ, कठिनाई के स्थान में पाते हैं l असुविधाजनक परिस्थितियाँ हमें भ्रमित कर सकती हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वे हमें पटरी से उतार दे, जब हम उससे चिपके रहते हैं जो हमसे प्रेम करता है (पद.3), हमें को संतुष्ट करता है (पद.5), हमारी सहायता करता है (पद.7), और जिसका दाहिना हाथ हमें थामता है (पद.8) l क्योंकि परमेश्वर का प्रेम जीवन से उत्तम है, मेरी और दाऊद के समान, हम परमेश्वर की प्रशंसा और सम्मान करने वाले होंठों के द्वारा संतुष्टि व्यक्त कर सकते हैं (पद.3-5) l 

पूर्ण संतोष

आप जानते होंगे कि यह कैसा है l एक चिकित्सा प्रक्रिया के बाद बिल आते रहते हैं – निश्चेतक से, शल्यचिकित्सक से, लैब से, चिकित्सालय से l रोहन ने आपातकालीन सर्जरी के बाद इसका अनुभव किया l उसने शिकायत की, “हम बीमा के बाद हज़ारों रुपयों के देनदार होते हैं l यदि केवल हम इन बिलों का भुगतान कर सकते हैं, तो जीवन अच्छा होगा और मुझे संतोष होगा! फिलहाल, मुझे ऐसा लग रहा है कि बेतरतीब क्रिकेट की गेंदों से मुझ पर प्रहार हो रहा है, जिसके कारण मुझे पार्क से बाहर जाना पड़ता है l  

जीवन उसी प्रकार कभी-कभी हमारे पास आता है l प्रेरित पौलुस निश्चित रूप से हमदर्दी रख  सकता था l उसने कहा, “मैं दीन होना भी जानता हूँ,” फिर भी उसने “सब दशाओं में . . तृप्त होना” सीख लिया था (फिलिप्पियों 4:12) l उसका रहस्य? जो मुझे सामर्थ्य देता है उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ” (पद.13) l जब मैं ख़ास तौर पर असंतुष्ट समय से निकल रहा था, तो मैं एक बधाई पत्र पर इसे पढ़ा : “यदि यह यहाँ नहीं है, तो यह कहाँ है?” यह एक शक्तिशाली अनुस्मारक था कि अगर मैं यहाँ और अभी संतुष्ट नहीं हूँ, तो कौन सी बात मुझे सोचने को विवश करती है कि यदि मैं किसी दूसरी स्थिति में होता तो मैं संतुष्ट होता?

हम यीशु में संतुष्ट होना कैसे सीखते हैं? शायद यह ध्यान देने की बात है l आनंद और अच्छे के लिए आभारी होने के विषय l एक वफादार पिता के बारे में अधिक जानने के लिए l विश्वास और धैर्य में बढ़ने में l यह पहचानने में कि जीवन परमेश्वर के बारे में है और मेरे बारे में नहीं है l उसमें निहित संतुष्टता मुझे सिखाने का आग्रह करना l  

समस्त सुअवसर

आपने कभी शेर पकड़ा है? जब तक मेरे बेटे ने मुझे अपने फोन पर गेम डाउनलोड करने के लिए राज़ी नहीं किया, तब तक मैं नहीं पकड़ा था l वास्तविक संसार को दर्शाते हुए एक डिजिटल मानचित्र का बनाकर, खेल आपको आपके निकट रंगीन प्राणियों को पकड़ने की अनुमति देता है l

अधिकाँश मोबाइल गेमों के विपरीत, इसमें गति की ज़रूरत होती है l कहीं भी आप जाएँ खेल के मैदान का हिस्सा हैं l परिणाम? मैं बहुत अधिक चल रहा हूँ! कभी भी मेरा बेटे और मैं खेलते हैं, हम अपने आसपास रहनेवाले जानवरों को दबोचने के लिए हर अवसर को अधिकतम करने का प्रयास करते हैं l 

इस पर ध्यान केन्द्रित करना आसान है, यहाँ तक कि उसमें ग्रस्त होना, एक गेम जो उपयोगकर्ताओं को लुभाने के लिए तैयार किया गया है l लेकिन जैसा जब मैंने खेल खेला था, मैं इस सवाल से दोषी महसूस किया :  क्या मैं अपने आस-पास के आध्यात्मिक अवसरों को अधिकतम करने के बारे में स्वेच्छाचारी/जिद्दी हूँ? 

पौलुस जानता था कि हमारे चारों ओर परमेश्वर के कार्य के प्रति सतर्क रहने की ज़रूरत है l कुलुस्सियों 4 में, उसने सुसमाचार को साझा करने के अवसर के लिए प्रार्थना के लिए कहा (पद.3) l फिर उसने चुनौती दी, “अवसर को बहुमूल्य समझकर बाहरवालों के साथ बुद्धिमानी से व्यवहार करो” (पद.5) l पौलुस नहीं चाहता था कि कुलुस्से के लोग मसीह की ओर दूसरों को प्रभावित करने का कोई मौका छोड़ें l लेकिन ऐसा करने के लिए वास्तव में उन्हें और उनकी ज़रूरतों को देखने की आवश्यकता होगी, फिर उन तरीकों में संलग्न होना होगा जो “अनुग्रह सहित” (पद.6) है l 

हमारे संसार में, एक खेल के काल्पनिक शेरों की तुलना में कहीं अधिक चीजें हमारे समय और ध्यान को आकर्षित करती हैं l लेकिन परमेश्वर हमें हर दिन एक वास्तविक संसार में साहसिक कार्य के लिए आमंत्रित करता है, हर दिन उसकी ओर इंगित करने के अवसरों की खोज करना l  

वह सब कुछ जानता है

हमारे घर में दो वर्षों तक एक पालतू मछली(fighter fish) थी l मेरी छोटी बेटी अक्सर झुककर उस टैंक में खाना डालते के बाद उसके साथ बातें करती थी l जब बालवाड़ी में पालतू जानवरों का विषय आया, तो उसने गर्व से दावा किया कि वह उसका है l आखिरकार, मछली मर गयी, और मेरी बेटी दुखित हुयी l 

मेरी माँ ने मुझे सलाह दी कि मैं अपनी बेटी की भावनाओं को करीब से सुनूँ और उसे बताऊँ, “परमेश्वर इसके विषय सब कुछ जानता है l” मैं सहमत था कि परमेश्वर सब कुछ जानता है, फिर भी अचंभित हुआ, कि वह तसल्लीबक्श कैसे होगा? तब यह मेरे मन आया कि परमेश्वर केवल हमारे जीवनों की घटनाओं से अवगत ही नहीं है – वह दयापूर्वक हमारी आत्माओं में देखता है और जानता है कि वे हमें कैसे प्रभावित करते हैं l वह समझता है कि हमारी उम्र, पिछले घाव, या संसाधनहीन होने के आधार पर “छोटी चीजें” बड़ी चीजों के समान महसूस हो सकती हैं l 

यीशु ने एक विधवा के दान का वास्तविक आकार - और दिल देखा – जब उसने मंदिर के एक दान पेटी में दो सिक्के डाले l उन्होंने बताया कि उसके लिए इसका क्या मतलब है जब उसने कहा, “इस कंगाल विधवा ने सब से बढ़कर डाला है . . . इसने . . . अपनी सारी जीविका डाल दी है” (मरकुस 12:43-44) l 

विधवा अपनी स्थिति के विषय शांत थी लेकिन यीशु ने पहचान लिया कि दूसरों ने जिसे एक छोटा दान समझा था वह उस विधवा के लिए बलिदान था l वह हमारे जीवन को उसी तरह से देखता है l काश हम उसकी असीम समझ में आराम पाएँ l 

साझा करने के लिए तोड़ा गया

एक कार दुर्घटना में पत्नी की मृत्यु के बाद वो और मैं प्रत्येक गुरुवार को मुलाकात करते थे l कभी-कभी उसके पास ऐसे प्रश्न होते थे जिसके उत्तर मौजूद नहीं हैं; कभी-कभी वह यादों के साथ होता था जिनके साथ वह फिर से जीना चाहता था l समय के साथ, उसने स्वीकार किया कि भले ही दुर्घटना हमारे टूटे संसार का एक परिणाम था, परमेश्वर इसके मध्य काम कर सकता था l कुछ साल बाद, उसने हमारे चर्च में दुःख और कैसे अच्छी तरह विलाप किया जा सकता है, के बारे में एक कक्षा को पढ़ाया l जल्द ही, वह नुक्सान का अनुभव कर रहे लोगों के लिए हमारा भरोसेमंद मार्गदर्शक बन गया l कभी-कभी जब हमें ऐसा महसूस नहीं होता है कि हमारे पास देने के लिए कुछ है तो परमेश्वर हमारे “अप्रयाप्त” को लेकर “पर्याप्त से अधिक” बना देता है l

यीशु ने अपने शिष्यों से कहा कि वे लोगों को कुछ खाने के लिए दें l उन्होंने विरोध किया कि देने के लिए कुछ नहीं था; यीशु ने उनकी आपूर्ति को गुणित किया और फिर चेलों की ओर मुड़कर उन्हें वह रोटी दिया जैसे कि यह कहना हो, “तुम ही उन्हें खाने को दो” (लूका 9:13) l मसीह आश्चर्यक्रम करेगा, लेकिन वह अक्सर हमें शामिल करने का विकल्प चुनता है l 

यीशु हमसे कहते है, “तुम खुद को और जो तुम्हारे पास है मेरे हाथों में सौंप दो l अपना टूटा हुआ जीवन l अपनी कहानी l अपनी दुर्बलता और अपनी विफलता, अपने पीड़ा और अपना दुःख l मेरे हाथों में सौंप दो l तुम आश्चर्यचकित होगे कि मैं इसके साथ क्या कर सकता हूँ l” यीशु जानता है कि हमारी शुन्यता से बाहर, वह पूर्णता ला सकता है l हमारी कमजोरी से, वह अपनी ताकत को प्रकट कर सकता है l