Month: मई 2020

मैं क्यों?

द बुक ऑफ़ ऑड्स(The Book of Odds) का कहना है कि एक लाख लोगों में से एक पर आकाशीय बिजली गिरती है l वह यह भी कहता है कि 25,000 में से एक को भारी आघात या नुक्सान की स्थिति में “टूटा हृदय सिंड्रोम(broken heart syndrome)” नामक एक चिकित्सीय स्थिति का अनुभव होता है l एक के बाद एक पृष्ठ में विशिष्ठ समस्याओं को अनुभव करने की असंगत बात बिना उत्तर के इकठ्ठा होती हैं : क्या होगा यदि हम ही वह व्यक्ति हैं?
अय्यूब ने सभी बाधाओं को ललकारा l परमेश्वर ने उसके विषय में कहा, “उसके तुल्य खरा और सीधा और मेरा भय माननेवाला और बुराई से दूर रहनेवाला मनुष्य और कोई नहीं है” (अय्यूब 1:8) l फिर भी अय्यूब को उन कई हानियों को सहने के लिए चुना गया जो समस्त असंगतियों को ललकारा l पृथ्वी पर सभी लोगों में से, अय्यूब के पास जवाब मांगने का कारण था l हमारे समझने के लिए उसके हताश संघर्ष एक अध्याय के बाद दूसरे अध्याय में लिखे हुए हैं, “मैं क्यों?”
अय्यूब की कहानी हमें अस्पष्ट पीड़ा और बुराई के रहस्य का जवाब देने का एक तरीका देती हैं l परमेश्वर की भलाई और दया के सबसे अच्छे उदाहरणों में से एक (अध्याय 25) के दुःख और भ्रम का वर्णन करके, हम बोने और काटने के अटल नियम का विकल्प प्राप्त कहते हैं (4:7-8) l शैतानी बेचैनी की पृष्ठभूमि को (अध्याय 1) और परमेश्वर की ओर से एक अंत बताकर (42:7-17) जो एक दिन अपने पुत्र को हमारे पापों को उठाने के लिए अनुमति देगा, अय्यूब की कहानी हमें दृष्टि के बजाए विश्वास से जीने का कारण देती है l

मधु से भी मीठा

उनका विषय नस्लीय तनाव था l फिर भी वक्ता शांत और संयमित रहा l बड़ी संख्या में  दर्शकों के सामने मंच पर खड़े होकर, उन्होंने निर्भीकता से बात की – लेकिन अनुग्रह, विनम्रता, दया और यहाँ तक कि हास्य के साथ l जल्द ही तनावपूर्ण दर्शकों ने प्रत्यक्ष रूप से आराम महसूस किया, और वक्ता के साथ उस असमंजस के विषय हँसे जिसका वे सामना कर रहे थे : अपने गर्म मुद्दे को कैसे हल करें, लेकिन अपनी भावनाओं और शब्दों को शांत करें l हाँ, मीठे अनुग्रह के साथ एक खट्टे विषय से कैसे निपटें l
राजा सुलैमान ने हम सभी के लिए इसी पद्धति की सलाह दी : “मनभावने वचन मधुभारे छत्ते के समान प्राणों को मीठे लगते, और हड्डियों को हरी-भरी करते हैं” (नीतिवचन 16:24) l इस तरह, “बुद्धिमान का मन . . . बुद्धिमानी प्रगट करता है” (पद.23) l
सुलैमान जैसा शक्तिशाली राजा यह कहने के लिए समय क्यों देता कि हम कैसे बोलते हैं? क्योंकि शब्द नष्ट कर सकते हैं l सुलैमान के समय में, राजा अपने राष्ट्रों के बारे में जानकारी के लिए दूतों पर निर्भर थे, और शांत और विश्वसनीय दूत अत्यधिक महत्वपूर्ण थे l उन्होंने विवेकपूर्ण शब्दों का प्रयोग किया और तर्कपूर्ण शब्दों का उपयोग किया, मामले के बावजूद अतिशियोक्ति नहीं की या कठोरता से बात नहीं की l
हम सब अपनी राय और विचारों को ईश्वरीय और विवेकपूर्ण मिठास से सजाकर लाभ प्राप्त कर सकते हैं l सुलैमान के शब्दों में, “मन की युक्ति मनुष्य के वश में रहती है, परन्तु मुँह से कहना यहोवा की ओर से होता है” (पद.1) l

स्मरण रखना

स्मारक दिवस(Memorial Day) पर, मैं कई पूर्व सैनिकों के बारे में सोचता हूँ, लेकिन विशेष रूप से मेरे पिताजी और चाचा, जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सेना में सेवा की थी l वे घर लौट आए, लेकिन उस युद्ध में सैंकड़ों हजारों परिवारों ने दुखद रूप से अपने देश की सेवा में अपने प्रियजनों को खो दिया l फिर भी, जब पूछा गया, मेरे पिताजी और उस युग के अधिकांश सैनिक कहते कि वे अपने प्रियजनों की रक्षा के लिए अपनी जान देने के लिए तैयार थे और वे जो सही मानते थे, उसके लिए खड़े थे l
जब कोई अपने देश की रक्षा में मर जाता है, तो यूहन्ना 15:13 –“इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिए अपना प्राण दे” – अक्सर उनके बलिदान का सम्मान करने के लिए अंतिम संस्कार सेवा के दौरान सुनाया जाता है l लेकिन इस पद के पीछे क्या स्थिति थी?
जब यीशु ने उन लोगों से अंतिम भोज के दौरान अपने शिष्यों से बात की, वह मृत्यु के निकट था l और, वास्तव में, उसके शिष्यों के एक छोटे से समूह से, यहूदा ने पहले ही उसे धोखा देने के लिए छोड़ दिया था (13:18-30) l फिर भी मसीह यह सब जानता था और फिर भी उसने अपने दोस्तों औरदुश्मनों के लिए अपने जीवन को बलिदान करने का विकल्प चुना l
यीशु उन लोगों के लिए मरने के लिए इच्छित और तैयार था जो एक दिन उस पर विश्वास करने वाले थे, यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी जो अभी भी उसके दुश्मन थे (रोमियों 5:10) l बदले में, वह अपने शिष्यों (तब और अब) से “एक-दूसरे से प्यार करने” के लिए कहता है जैसे  उसने उनसे प्यार किया था (यूहन्ना 15:12) l उसका महान प्रेम हमें दूसरों के लिए बलिदानी प्रेम करने के लिए मजबूर करता है – मित्र और शत्रुओं को एक समान l

बोलने वाले टेबल

अकेलापन, और उसके समान चीजों के द्वारा प्रभावित कर रहा है l एक अध्ययन के अनुसार सभी लोगों में से लगभग दो-तिहाई उम्र या लिंग की परवाह किए बिना कम से कम कुछ समय तक अकेलापन महसूस करते हैं l एक ब्रिटिश सुपरमार्केट ने लोगों के बीच सम्बन्ध को बढ़ावा देने के तरीके के रूप में अपने स्टोर कॉफ़ी हाउस में “टॉकिंग टेबल” बनाए हैं l जो मनुष्यों के बीच बातचीत करने की इच्छा रखते हैं वे उस उद्देश्य के साथ एक निर्धारित टेबल पर बैठकर, दूसरों से जुड़ते हैं या जुड़ने की इच्छा का संकेत देते हैं l कनेक्शन/ सम्बन्ध और समुदाय की भावना प्रदान करने के लिए बातचीत होती है l
प्रारंभिक कलीसिया के लोग भी साझा कनेक्शन/सम्बन्ध के लिए प्रतिबद्ध थे l एक दूसरे के बिना, वे संभवतः अपने विशवास के अभ्यास में बहुत अकेले महसूस करते थे, जो संसार के लिए अभी भी नया था l केवल, उन्होंने यीशु के पीछे चलने के बारे में जानने के लिए प्रेरितों के “शिक्षण” के लिए अपने आप को “समर्पित” ही नहीं किया, वे “मंदिर में इकठ्ठा” होते थे और आपसी प्रोत्साहन और संगति के लिए अपने घरों में “रोटी तोड़ते थे” (प्रेरितों 2:42,46) l
हमें मानवीय कनेक्शन/सम्बन्ध चाहिये; परमेश्वर ने हमें इस तरह से रचा है! अकेलेपन के दर्दनाक मौसम उस ज़रूरत की ओर इशारा करते हैं l प्रारंभिक कलीसिया के लोगों की तरह, हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम मानव सहचारिता को हमारी भलाई के लिए संलग्न करें और इसे हमारे आस-पास के उन लोगों के लिए भी प्रस्तुत करें जिनको इसकी आवश्यकता है l

ज्योति के रखवाले

वे उन्हें “ज्योति के रक्षक” संबोधित करते हैं l
संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तरी कैरोलिना तट से दूर हैट्टेरस प्रायद्वीप के अंतिम बिंदु पर, 1803 से उन लोगों के लिए एक स्मारक है, जिन्होंने वहाँ के प्रकाश स्तंभों(light house) को संभाला है l तटरेखा के कटाव के कारण मौजूदा संरचना को देश के भीतरी भाग में स्थानांतरित किये जाने के थोड़े ही समय के बाद, रखवालों के नाम पुराने नींव के पत्थरों पर खोदे गए और रंगशाला (ampitheatre) के आकार में व्यवस्थित किये गए जिसके सामने नया स्थान था l इस तरह – जैसे कि एक घोषणा पत्र समझाता है – आज के दर्शक ऐतिहासिक रखवालों के पदचिन्हों का अनुसरण कर सकते हैं और प्रकाश स्तम्भ की “देखरेख भी कर सकते हैं l”
यीशु ही एकमात्र ज्योति देनेवाला है l “जगत की ज्योति मैं हूँ, जो मेरे पीछे हो लेगा वह अन्धकार में न चलेगा, परन्तु जीवन की ज्योति पाएगा” (यूहन्ना 8:12) l यह किसी के लिए भी एक क्रांतिकारी दावा है l लेकिन यीशु ने कहा कि यह उसके स्वर्गिक पिता, प्रकाश और जीवन की सृष्टिकर्ता के साथ उसके रिश्ते की पुष्टि करने के लिए है जिसने उसे भेजा था l
जब हम यीशु की ओर देखते हैं और उसकी शिक्षा का अनुसरण करते हैं, परमेश्वर के साथ हमारा रिश्ता पुनर्स्थापित होता है, और वह हमें नयी सामर्थ्य और उद्देश्य देता है l उसका रूपांतरित करने वाला जीवन और प्रेम – “समस्त मानव की ज्योति” (1:4) – हममें और हमारे द्वारा चमकता है और बाहर अँधेरे में और कभी-कभी खतरनाक संसार में भी l
यीशु के अनुयायी होने के कारण
,
हम “ज्योति के रखवाले है
l”
काश दूसरे उसकी ज्योति को हमारे द्वारा चमकते देख सकें और उस जीवन और आशा को प्राप्त कर सकें जो केवल वही दे सकता है!