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Articles by एमी बाउचर पाई

कटनी के लिए तैयार

गर्मी बाद, हम इंगलैंड के न्यू फारेस्ट में घूमने गए और वहां पर जंगली बेर चुनने का आनंद लिया और पास ही घोड़ों को उछलते कूदते देखा l  दूसरों के द्वारा वर्षों पहले लगाए गए पेड़ों के मीठे फलों का आनंद लेते हुए, मैंने यीशु द्वारा शिष्यों को कहे गए शब्दों को याद किये, “मैंने तुम्हें वह खेत काटने के लिए भेजा जिसमें तुमने परिश्रम नहीं किया” (यूहन्ना 4:38) l

मैं इन शब्दों में परमेश्वर के राज्य की उदारता पसंद करता हूँ l वह हमें दूसरों की मेहनत के फल का आनंद लेने देता है, जैसे जब हम किसी सहेली के साथ, जिसके परिवार को हम नहीं जानते हैं, और जो वर्षों से उसके लिए प्रार्थना कर रहा है, के साथ मसीह का प्रेम बांटते हैं l मुझे यीशु के शब्दों की सीमा भी पसंद है, कि हम बीज बोएँगे किन्तु हम नहीं कोई और कटनी काट सकेगा l इसलिए हम उस कार्य में भरोसा कर सकते हैं जो हमारे सामने है l हम इस सोच से धोखा नहीं खाएंगे कि हम परिणाम के लिए जिम्मेदार हैं l आखिरकार, परमेश्वर का कार्य हम पर निर्भर नहीं है l भरपूर कटनी के लिए उसके पास समस्त साधन है, और हम सौभाग्यशाली हैं कि हम भी उसमें भूमिका निभा सकते हैं l

मैं सोचता हूँ कि किस तरह के खेत आपके सामने और मेरे सामने कटनी के लिए तैयार हैं? हम यीशु के प्रेमी निर्देश का पालन करें : “अपनी आँखें उठाकर खेतों पर दृष्टि डालो कि वे कटनी के लिए पाक चुके हैं” (पद. 4:35) l

भय नहीं किन्तु विश्वास

मेरी एक सहेली ने मुझे बताया कि उसके पति को दूसरे देश में जाकर कार्य करने की तरक्की मिली, किन्तु इससे उसके मन में घर छोड़ने का भय उत्पन्न हो गया जिससे उसके पति ने नहीं चाहकर भी उस पेशकश को ठुकरा दिया l उसने समझाया कि इस बड़े बदलाव के समय उसके भय ने उसे इस नए अभियान को अपनाने से रोका, और वह कभी-कभी सोचती रही कि उसने उस अवसर को उन्होंने खो दिया था जिससे उन्नत्ति रुक गयी थी l  

इस्राएलियों की चिंता ने उन्हें भरपूर और उपजाऊ देश में जाने से रोका जिसमें “दूध और शहद” (निर्ग. 33:3) की धाराएं बहती थीं l वे बड़े नगरों में शक्तिशाली लोगों के विषय सुनकर (पद.27), डरने लगे l अधिकतर लोगों ने प्रतिज्ञात देश में प्रवेश करने से इनकार किया l

किन्तु यहोशू और कालेब ने यह कहकर लोगों को परमेश्वर पर भरोसा करने को कहा, “न उस देश के लोगों से डरो, क्योंकि ... यहोवा हमारे संग है” (पद.9) l यद्यपि दुश्मन बहुत थे, वे भरोसा कर सकते थे कि परमेश्वर उनके साथ है l

मेरे सहेली को इस्राएलियों की तरह दूसरे देश में जाने की आज्ञा नहीं मिली थी, फिर भी उसके भय ने उसको उस सुअवसर को प्राप्त करने से रोक दिया l आपके साथ कैसा है, क्या आप भयभीत करनेवाली स्थिति का सामना कर रहे हैं? यदि हाँ, तो जानिये कि परमेश्वर आपके साथ है और आपका मार्गदर्शन करेगा l उसके अचूक प्रेम पर भरोसा करके, हम विश्वास से आगे बढ़ सकते हैं l

हर काम का निश्चित समय

हाल ही के विमान यात्रा में मैंने एक माँ और उसके बच्चों पर ध्यान दिया l नन्हे बच्चे के शांति से खेलते समय, माँ अपने नवजात शिशु की आँखों में निहारती और मुस्कराती हुई उसके गाल सहलाए l बच्चा भी अचरज से आँखें फाड़कर देखा l मैंने थोड़ी उत्कंठा से उस क्षण का आनंद लेकर अपने बच्चों के बीते हुए बचपन को याद किया l

हालाँकि, मैंने सभोपदेशक में “प्रत्येक काम का, जो आकाश के नीचे होता है” के विषय राजा सुलेमान के शब्द स्मरण किये (पद.1) l वह विपरीत शब्दों की श्रृंखला द्वारा संबोधित किया कि किस तरह “हर एक बात का एक अवसर” होता है (पद.1) : “जन्म का समय, और मरन का भी समय, बोने का समय; और बोए हुए को उखाड़ने का भी समय” (पद.2) l शायद इन पदों में राजा सुलेमान जीवन के व्यर्थ चक्र से निराश हुआ l किन्तु वह प्रत्येक ऋतू में परमेश्वर की भूमिका को भी देखा, कि हमारा कार्य “परमेश्वर का दान” है (पद.13) और “जो कुछ परमेश्वर करता है वह सदा स्थिर रहेगा” (पद.14) l

हम अपने जीवनों में समयों को लालसा से याद कर सकते हैं, जैसे मैंने अपने बच्चों को शिशुओं के रूप में याद किया l यद्यपि, हम जानते हैं, कि प्रभु हमारे साथ जीवन के हर ऋतू में रहेगा (यशा.41:10) l  हम उसकी उपस्थिति पर भरोसा करके उसमें चलने का अपना उद्देश्य खोज सकते हैं l

आमने-सामने

यद्यपि संसार आज इलेक्ट्रानिक तरीके से जिस तरह जुड़ा है, पूर्व में कभी नहीं था, व्यक्तिक रूप से बिताया गया समय सर्वोत्तम है l हम सहभागिता और खिलखिलाहट द्वारा-लगभग अनजाने में-अगले व्यक्ति के चेहरे की गत्विधियों को देखकर उसकी भावनाएं जान जाते हैं l जो आपस में प्रेम करते हैं, चाहे परिवार या मित्र, आमने-सामने संगति करना चाहते हैं l

हम इस तरह का आमने-सामने का सम्बन्ध परमेश्वर और उसके लोगों की अगुवाई करने वाले, मूसा के मध्य देखते हैं l मूसा परमेश्वर का अनुसरण करता गया, और लोगों के अक्खड़पन और मूर्तिपूजा के बावजूद उसका अनुसरण करता रहा l लोगों द्वारा प्रभु के बदले सोने के बछड़े की उपासना करने के बाद (देखें निर्ग. 32), मूसा ने परमेश्वर से मुलाकात करने हेतु एक तम्बू लगाया, जबकि लोग दूर ही से देख सकते थे (33:7-11) l जब परमेश्वर की उपस्थिति बादल के खम्बे में तम्बू पर आकर ठहरता था, मूसा उनका प्रतिनिधि होकर बातें करता था l परमेश्वर ने उनके साथ अपनी उपस्थिति का वादा किया (पद.14) l

यीशु की क्रूसित मृत्यु और पुनरुत्थान के कारण, हमें परमेश्वर से बातें करने के लिए मूसा की तरह व्यक्ति नहीं चाहिए l इसके बदले, शिष्यों के सामने यीशु की पेशकस की तरह, हम मसीह द्वारा परमेश्वर के साथ मित्रता कर सकते हैं (यूहन्ना 15:15) l हम भी उससे मुलाकात कर सकते हैं, प्रभु के साथ मित्र की तरह बातें कर सकते हैं l

विश्राम दिवस

एक रविवार को, मैं एक कलकल नदी के निकट खड़ी थी जो हमारी उत्तरी लन्दन आबादी क्षेत्र की ओर मुड़कर अपनी ख़ूबसूरती भिन्न प्रकार से बसे क्षेत्र को प्रदान करती है l जलप्रपात को देखकर और चिड़ियों की चहचाहट सुनकर मुझे आराम मिला l मैंने रुककर प्रभु को हमारी आत्माओं को विश्राम देने के लिए धन्यवाद दिया l

प्रभु ने सब्त का दिन स्थापित किया-विश्राम और नवीनीकरण का दिन-अपने लोगों के लिए प्राचीन निकट पूर्व क्योंकि उसकी इच्छा थी कि वे जीवित रहें l जैसे कि हम निर्गमन में पाते हैं, वह उनको छः वर्ष खेती करने को और सातवें वर्ष विश्राम करने को कहता है l इसी तरह छः दिन काम और सातवें दिन विश्राम l उसके तरीके ने इस्राएलियों को अन्य राष्ट्रों से अलग किया, क्योंकि केवल वे ही नहीं किन्तु विदेशी और उनके घर के दासों को भी उनके तरीके मानना अनुमत था l

हम विश्राम दिवस में अपेक्षा और रचनात्मकता के साथ उपासना करके अपनी आत्माओं को पोषित कर सकते हैं, जो हमारे चुनावों के अनुसार भिन्न होगा l कोई खेल खेलना पसंद करेंगे; कोई बगीचे में काम; कोई मित्रों और परिजनों के साथ भोजन करेंगे; कोई दोपहर में आराम करेंगे l

हम किस तरह विश्राम दिवस की खूबसूरती और भरपूरी को पुनः खोजेंगे, यदि वह हमारे जीवनों में नहीं है?

व्यवहारिक विश्वास

किराने की दूकान जाते समय मेरी सहेली को लगा जैसे सड़क किनारे जाती स्त्री को अपने कार में बैठा लूँ l कार में बैठाने के बाद, उसने जाना कि पैसे नहीं होने के कारण वह गर्म और आर्द्र वातावरण में अनेक मील पैदल चलकर वापस अपने घर जा रही थी l केवल वह पैदल लम्बी यात्रा करके घर ही नहीं जा रही थी किन्तु उसी दिन अनेक घंटे चलकर प्रातः 4 बजे अपने काम पर भी पहुंची थी l

उस स्त्री को अपनी कार में बैठाकर मेरी सहेली ने आज के सन्दर्भ में याकूब के मसीहियों को अपने कार्यों द्वारा अपने विश्वास को प्रगट करने का निर्देश पूरा किया : “विश्वास भी, यदि कर्म सहित न हो तो अपने स्वभाव में मरा हुआ है” (पद.17) l उसकी चिंता थी कि कलीसिया विधवाओं और अनाथों की देखभाल करें (याकूब 1:27), किन्तु वह यह भी चाहता था कि वे मात्र शब्दों पर नहीं किन्तु विश्ववास पर चलकर प्रेम के कार्य करें l

हम अपने कर्मों से नहीं विश्वास से बचाए गए हैं, किन्तु हम दूसरों से प्रेम करके और उनकी ज़रूरतों को पूरा करके विश्वास को प्रगट करते हैं l इस जीवन में साथ चलते हुए, काश हम भी, मेरी सहेली की तरह, ज़रुरतमंदों के प्रति सजग रहें जिन्हें हमारी मदद चाहिए l

शांति का मेल

एक विषय पर विचारों में अंतर होने पर मैंने ई-मेल द्वारा अपनी सहेली का सामना किया किन्तु उसने उत्तर नहीं दिया l क्या मैंने हद पार कर दी थी? मैं उसको परेशान करके स्थिति को और बदतर नहीं बनाना चाहती थी, और उसकी विदेश यात्रा से पूर्व समस्या का समाधान चाहती थी l आनेवाले कुछ दिनों तक उसकी याद आने पर, मैंने आगे की बातें न जानते हुए भी उसके लिए प्रार्थना की l तब एक दिन स्थानीय पार्क में घूमते हुए मैंने उसे देखा l जब उसने मुझे देखा उसके चेहरे पर दर्द था l “प्रभु धन्यवाद, कि मैं उससे बातें कर सकती हूँ, मैं धीरे से बोलकर इच्छित हृदय से उसकी ओर बढ़ी l हम दोनों खुलकर बातें किये और समस्याएँ सुलझ गयीं l

कभी-कभी हमारे संबंधों में जब तकलीफ और खामोशी आ जाती है, उनको ठीक करना हमारे नियंत्रण से बाहर महसूस होता है l किन्तु जिस तरह प्रेरित पौलुस इफिसुस की कलीसिया को लिखता है, कि हमें अपने संबंधों में परमेश्वर की चंगाई को ढूंढते हुए, परमेश्वर की आत्मा द्वारा शांति और एकता के लिए, दीनता, नम्रता, और धीरज को धारण करने के लिए बुलाया गया है l प्रभु हममें एकता चाहता है, और उसकी आत्मा द्वारा वह अपने लोगों को एक कर सकता है-अनपेक्षित रूप से भी जब हम पार्क में घूमने जाते हैं l

सम्पूर्ण शांति

एक सहेली ने मुझे बताया कि वर्षों तक वह शांति और संतोष खोजती रही l वह और उसके पति ने एक बड़ा व्यापार स्थापित करके एक बड़ा घर, सुन्दर कपड़े, और कीमती गहने खरीदे l किन्तु इन संपत्तियों के साथ प्रभावशाली लोगों से मित्रता ने भी शांति की उसकी आन्तरिक इच्छा को सनुष्ट न कर सके l तब एक दिन जब वह उदास और परेशान थी, एक सहेली ने उसे यीशु का सुसमाचार सुनाया l वहाँ उसने शांति के राजकुमार को खोज लिया, और सच्ची शांति और संतोष के विषय उसकी समझ हमेशा के लिए बदल गयी l

अपने मित्रों के साथ आखिरी भोज खाने के बाद उसने इस तरह की ही शांति के शब्द कहे (यूहन्ना 14), जब उसने उनको आनेवाली घटनाओं-उसकी मृत्यु, पुनरुत्थान, और पवित्र आत्मा का अवतरण-के विषय तैयार किया, जो संसार देने में असमर्थ था l वह उनको कठिनाई के मध्य सुख के भाव प्राप्त करना सिखाना चाहता था l

बाद में, पुनरुत्थित प्रभु अपनी मृत्यु के बाद भयातुर शिष्यों के सामने प्रकट होकर, उनका अभिवादन किया, “तुम्हें शांति मिले!” (यूहन्ना 20:19) l अब वह उनको और हमें अपने किये हुए कार्य में विश्राम की एक नयी समझ दे सकता है l ऐसा करके हम हमेशा परिवर्तनशील भावनाओं के मध्य एक अति गहरा भरोसा प्राप्त कर सकते हैं l

परमेश्वर द्वारा आच्छादित

बचपन में मेरे बच्चे, हमारे गीले इंग्लिश बगीचे में खेलकर जल्द ही गंदे हो जाते थे l उनकी और मेरे फर्श की भलाई के लिए मैं उनके कपड़े बाहर उतरवाकर उनको तौलिये में लपेटकर नहाने ले जाती थी l वे साबुन, जल, और दुलार से जल्द साफ़ हो जाते थे l

जकर्याह को प्राप्त एक दर्शन में, हम एक महायाजक, यहोशु को मैले वस्त्र पहने हुए देखते हैं, जो पाप और दुराचार का प्रतीक है (जकर्याह 3:3) l किन्तु परमेश्वर उसके मैले कपड़े उतारकर उसे साफ़ कर उसे सुन्दर वस्त्र पहनाता है (3:5) l शुद्ध पगड़ी और वस्त्र प्रगट करते हैं कि प्रभु ने उसके पाप उससे दूर किये हैं l

यीशु के उद्धारक कार्य द्वारा परमेश्वर की शिफा से हम अपने दुराचार से स्वतंत्र होते हैं l उसके क्रूसित मृत्यु के परिणामस्वरूप, हमें परमेश्वर के संतानों का वस्त्र मिलता है l अब हम अपने बुरे कार्यों (चाहे झूठ, बकवाद, लालच, अथवा कुछ और) द्वारा परिभाषित नहीं होते हैं, किन्तु परमेश्वर अपने प्रेम करनेवालों को पुनरस्थापित, नया किया हुआ, स्वच्छ, स्वतंत्र, नाम देता है, जीनका हम दावा कर सकते हैं l

परमेश्वर से वे सारे गंदे कपड़े हटाने को कहें जो आपने पहन रखें हैं ताकि आप उसके द्वारा आपके लिए तैयार वस्त्र धारण कर सकें l