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Articles by डेविड मैकेसलैंड

हमदर्दी की सामर्थ्य

R70i उम्र पोशाक पहन लें और आप तुरंत खुद को कमज़ोर दृष्टिवाला , ऊंचा सुनने वाला, और चलने-फिरने में सीमित, 40 वर्ष अधिक उम्र का महसूस करने लगेंगे l देखभाल करनेवालों द्वारा अपने मरीजों को बेहतर समझने के लिए उम्र पोशाक बनाया गया है l वाल स्ट्रीट जर्नल (अख़बार) के संवाददाता जेफरी फौलर ने एक उम्र पोशाक पहनने के बाद लिखा, “हमेशा याद रहनेवाला और कभी-कभी तकलीफ़देह, यह अनुभव केवल बुढ़ापा पर ही प्रकाश नहीं डालता है, किन्तु  प्रभाव डालनेवाली वास्तविक सामग्री भी हमदर्दी सिखा सकती है और हमारे चारों ओर के संसार के विषय हमारे दृष्टिकोण को आकार दे सकती है l”

हमदर्दी दूसरों की भावनाओं को समझने और उसे साझा करने की शक्ति है l यीशु के अनुयायियों के कठिन सताव के समय, इब्रानियों के लेखक ने सह-विश्वासियों से कहा, “कैदियों की ऐसी सुधि लो कि मानो उनके साथ तुम भी कैद हो, और जिनके साथ बुरा बर्ताव किया जाता है, उनकी भी यह समझकर सुधि लिया करो कि हमारी भी देह है” (इब्रानियों 13:3) l

हमारे उद्धारकर्ता ने भी ऐसा ही हमारे साथ किया l यीशु हमारे समान बनाया गया, “सब बातों में भाईयों के समान ... जिससे वह ... लोगों के पापों के लिए प्रायश्चित करे l क्योंकि जब उसने परीक्षा की दशा में दुःख उठाया, तो वह उनकी भी सहायता कर सकता है जिनकी परीक्षा होती है” (2:17-18) l

मसीह प्रभु, जो हमारे समान बन गया, हमें दूसरों के साथ खड़े होने के लिए बुलाता है “मानो जैसे [हम] उनके साथ” उनकी ज़रूरत के समय थे l

चिनार के पेड़ के बीज

जब हमारे बच्चे छोटे थे, वे पड़ोस के चिनार के पेड़ के गिरते बीजों को पकड़ना पसंद करते थे l प्रत्येक बीज हेलीकॉप्टर के पंखों की तरह उड़ता हुआ नीचे गिरता था l इन बीजों का उद्देश्य उड़ना नहीं था, किन्तु भूमि पर गिरकर पेड़ के रूप में उगना था l

यीशु ने क्रूसित होने से पहले, अपने चेलों से कहा, “वह समय आ गया है कि मनुष्य के पुत्र की महिमा हो ... जब तक गेहूँ का एक दाना भूमि में पड़कर मर नहीं जाता, वह अकेला रहता है; परन्तु जब मर जाता है, तो बहुत फल लाता है” (यूहन्ना 12:23-24) l

जब यीशु के चेले चाहते थे कि वह मसीह के रूप में सम्मानित किया जाए, उसने अपना जीवन बलिदान किया ताकि उसमें विश्वास करने के द्वारा हम क्षमा किए जाएँ और रूपांतरित किये जाएँ l यीशु के अनुयायी होकर, हम उसकी आवाज़ सुनते हैं, “जो अपने प्राण को प्रिय जानता है, वह उसे खो देता है; और जो इस जगत में अपने प्राण को अप्रिय जानता है, वह अनंत जीवन के लिए उस की रक्षा करेगा l यदि कोई मेरी सेवा करे, तो मेरे पीछे हो ले; और जहाँ में हूँ, वहाँ मेरा सेवक भी होगा l यदि कोई मेरी सेवा करे, तो पिता उसका आदर करेगा” (पद.25-26) l

चिनार पेड़ के बीज, उद्धारकर्ता, यीशु के आश्चर्यकर्म की ओर इशारा कर सकते हैं, जिसने मृत्यु सही कि हम उसके लिए जी सकें l

और कितना!

अक्टूबर 1915 में, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ऑस्वाल्ड चैम्बर्स ब्रिटिश राष्ट्रमंडल सैनिकों के लिए, YMCA की ओर से पादरी की सेवा करने मिस्र में काहिरा के निकट एक सेना प्रशिक्षण शिविर, जीटोन  शिविर पहुंचे l चैम्बर्स के द्वारा एक सप्ताह की रात्री धार्मिक सेवा की घोषणा पर, 400 लोग उस बड़े YMCA  झोपड़े में उसका उपदेश सुनने आ गए जिसका शीर्षक था, “प्रार्थना की अच्छाई क्या है?” बाद में, युद्ध के मध्य परमेश्वर को ढूँढ़ने वाले लोगों से व्यक्तिगत रूप से बातें करते हुए, ऑस्वाल्ड ने अक्सर लूका 11:13 का सन्दर्भ दिया, “अतः जब तुम बुरे होकर अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा” (लूका 11:13) l

परमेश्वर के पुत्र, यीशु के द्वारा मुफ्त उपहार क्षमा, आशा, और पवित्र आत्मा द्वारा हमारे जीवनों में उसकी जीवित उपस्थिति है l “क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो कोई ढूंढ़ता है, वह पाता है; और जो खटखटाता है, उसके लिए खोला जाएगा” (पद.10) l

नवम्बर 15, 1917 को अचानक अपेंडिक्स(बड़ी आंत का एक अतिरिक्त भाग) के फूटने से ऑस्वाल्ड चैम्बर्स की मृत्यु हो गयी l ऑस्वाल्ड की सेवा के परिणामस्वरुप विश्वास करनेवाला एक सैनिक संगमरमर पत्थर की बनी खुली बाइबिल की एक प्रतिरूप पर लूका 11:13 खुदवाकर उसके कब्र के निकट रख दिया : “स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा!”

प्रतिदिन परमेश्वर का यह अद्भुत उपहार हमारे लिए उपलब्ध है l

गुमनाम जीवन

जेन योलन का लेख “वर्किंग अप टू एनॉन”(गुमनाम) के  मेरी प्रति जिसे मैंने बहुत बार पढ़ा बहुत वर्ष पूर्व द राइटर  पत्रिका से निकाली गयी थी l वह कहती है, “सर्वश्रेष्ठ लेखक वे हैं जो वास्तव में, अन्दर से, गुमनाम रहना चाहते हैं l बतायी गई कहानी महत्वपूर्ण है, कहानी बतानेवाला नहीं l

हम यीशु, उद्धारकर्ता की कहानी बताते हैं, जिसने हमारे लिए अपना प्राण दिया l दूसरे विश्वासियों के साथ हम उसके लिए जीवन बिताते हैं और दूसरों के साथ उसका प्रेम बाँटते हैं l

रोमियों 12:3-21 दीनता और प्रेम के आचरण का वर्णन करता है जो यीशु के अनुयायिओं के रूप में हमारे परस्पर संबंधों में फैला होना चाहिए l “जैसा समझना चाहिए उससे बढ़कर कोई भी अपने आप को न समझे; पर जैसा परमेश्वर ने हर जगह हर एक को विश्वास परिमाण के अनुसार बाँट दिया है ... भाईचारे के प्रेम से एक दूसरे से स्नेह रखो; परस्पर आदर करने में एक दूसरे से बढ़ चलो” (पद.3, 10)

हमारी पिछली उपलब्धियों में घमंड करना दूसरों के वरदान के प्रति हमें अँधा कर सकता है l अभिमान हमारे भविष्य को गन्दा कर सकता है l

यूहन्ना बप्तिस्मादाता, जिसका उद्देश्य यीशु का मार्ग तैयार करना था, ने कहा, “वह बढ़े और मैं घटूँ” (यूहन्ना 3:30) l

हम सब के लिए यह सिद्धांत अच्छा है l

रहस्य सुलझाना

मैंने पीनट(कार्टून) के रचयिता, चार्ल्स शुलत्ज़ के ज्ञान और अंतर्दृष्टि का हमेशा आनंद उठाया है l चर्च के युवाओं के विषय एक पुस्तक में मेरा एक सबसे पसंदीदा कार्टून दिखाई दिया l उसमें एक युवा अपने हाथों में बाइबिल लिए हुए फोन पर अपने मित्र से बोल रहा था, “मेरी समझ में मैंने पुराने नियम के रहस्यों को समझने में प्रथम कदम बढ़ाया है ... मैंने पढ़ना शुरू कर दिया है!” (किशोर होना एक बीमारी नहीं  है) l

 प्रतिदिन परमेश्वर के वचन की शक्ति को समझने और अनुभव करने की लेखक की भूख भजन 119 में दिखाई देती है l “आहा! मैं तेरी व्यवस्था से कैसी प्रीति रखता हूँ! दिन भर मेरा ध्यान उसी पर लगा रहता है” (पद.97) l यह उत्साही प्रयास बढ़ती बुद्धिमान, समझ, और परमेश्वर की आज्ञाकारिता की ओर ले जाती है (पद. 98-100) l

बाइबिल अपने पन्नों में “रहस्यों को सुलझाने” का कोई जादुई सूत्र नहीं बताती है l प्रक्रिया मानसिक से परे है और जो हम पढ़ते हैं उसके प्रति उत्तर मांगती है l यद्यपि हमारे लिए कुछ एक परिच्छेद पेचीदा होंगे, हम उन सच्चाइयों को अपना कर जिन्हें हमने समझ लिया है, प्रभु से कहें, “तेरे वचन मुझ को कैसे मीठे लगते हैं, वे मेरे मुँह में मधु से भी मीठे हैं! तेरे उपदेशों के कारण मैं समझदार हो जाता हूँ, इसलिए मैं सब मिथ्या मार्गों से बैर रखता हूँ” (पद.103-104) l

परमेश्वर के वचन में खोज की एक अद्भुत यात्रा हमारा इंतज़ार कर रही है l

पत्थरों से सामना

शताब्दियों के युद्ध और विनाश के बाद, यरूशलेम का आधुनिक शहर वस्तुतः अपने ही मलबा पर बना है l एक पारिवारिक भ्रमण पर, हम विया दोलोरोसा अर्थात् दुःख के मार्ग पर चले, परंपरा अनुसार वह मार्ग जिसपर यीशु क्रूस लेकर चला था l दिन गर्म था, इसलिए हम विश्राम के लिए ठहरकर सिस्टर्स के मठ के ठन्डे तलघर घूमें l वहाँ मैंने रास्ते के प्राचीन पत्थर देखे जो हाल ही के निर्माण के समय खोद कर निकले गए थे-ऐसे पत्थर जिनपर खेल खुदे हुए थे जो रोमी सिपाही अपने खाली समय में खेलते थे l

वे ख़ास पत्थर, जो संभवतः यीशु के काल के बाद के थे, ने मुझे मेरे आत्मिक जीवन पर विचार करने को विवश किया l एक थका हुआ और व्यर्थ समय बिताते हुए रोमी सिपाही की तरह, मैं परमेश्वर और दूसरों के प्रति लापरवाह और अस्नेही हो गया था l मैं याद करके द्रवित हुआ कि उस स्थान के निकट जहाँ में खड़ा था, प्रभु पर मार पड़ी, उसका उपहास किया गया, उसकी निंदा की गयी, और उसे अपमानित किया गया जब उसने मेरे समस्त पराजय और विरोध को अपने ऊपर ले लिए l

“वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया; हमारी ही शांति के लिए उस पर ताड़ना पड़ी, कि उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो जाएँ” (यशा. 53:5) l

उन पत्थरों से मेरा सामना अभी भी मुझसे यीशु के स्नेही अनुग्रह की बात करता है जो मेरे समस्त पापों से महान है l

चेतावनी!

उन दिनों में जब मैं नियमित यात्रा करता था, मैं हर दिन एक नए शहर में रात बिताते समय होटल में जागने की घंटी लगवाता था l मुझे सुबह उठकर अपने काम में जाने के लिए एक व्यक्तिगत अलार्म के साथ, टेलीफोन की तेज घंटी की भी ज़रूरत होती थी l

प्रेरित यूहन्ना प्रकाशितवाक्य में एशिया प्रान्त की सात कलीसियाओं को लिखे पत्रों में चेतावनी देता है l उसने सरदीस की कलीसिया को यीशु मसीह का यह सन्देश दिया : “मैं तेरे कामों को जानता हूँ : तू जीवित तो कहलाता है, पर है मरा हुआ l जागृत हो, और उन वस्तुओं को जो बाकी रह गईं हैं ... उन्हें दृढ़ कर, क्योंकि मैं ने तेरे किसी काम को अपने परमेश्वर के निकट पूरा नहीं पाया” (प्रका. 3:1-2) l

हम आत्मिक मेहनत के मध्य परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध में सुस्ती पर ध्यान नहीं देते l किन्तु परमेश्वर हमें याद दिलाता है “स्मरण कर कि तू ने कैसी शिक्षा प्राप्त की और सुनी थी, और उसमें बना रह” (पद.3) l

कुछ लोगों ने महसूस किया है कि आत्मिक रूप से जागृत रहने के लिए प्रति सुबह  बाइबिल पठन और प्रभु से प्रार्थना करने के लिए समय निर्धारण सहायक है l यह कोई काम नहीं है किन्तु यीशु के साथ समय बिताने का आनंद है और दिन के काम के लिए उसकी ओर से तैयारी है l

दिव्य रुकावटें

विशेषज्ञ यह मानते हैं कि प्रतिदिन ख़ासा समय रुकावाटों में नष्ट हो जाता है l कार्य हो अथवा घर, एक फ़ोन कॉल अथवा किसी से अनपेक्षित मुलाकात हमें सरलता से हमारे मुख्य उद्देश्य से भटका देती हैं l

हममें से अनेक अपने जीवनों में रुकावटें पसंद नहीं करते, विशेषकर जब वे परेशानी उत्पन्न करते हैं अथवा हमारी योजनाओं को बदल देते हैं l किन्तु जो रुकावटें महसूस होती हैं उनके साथ यीशु भिन्न तरीके से पेश आया l बार-बार सुसमाचारों में, हम प्रभु को रूककर ज़रुरतमंदों की सहायता करते पाते हैं l

यीशु का यरूशलेम जाते समय जहाँ उसे क्रूसित होना था, सड़क किनारे बैठा एक अंधे व्यक्ति ने उसे पुकारा, “हे यीशु, दाऊद की संतान, मुझ पर दया कर!” (लूका 18:35-38) l भीड़ में से कुछ लोगों ने उसे शांत रहने को कहा, किन्तु वह यीशु को पुकारता रहा l यीशु ने रुककर उससे पूछा, “ ‘तू क्या चाहता है कि मैं तेरे लिए करूँ?’  ‘हे प्रभु, यह कि मैं देखने लगूँ,’ उसने कहा l यीशु ने उससे कहा, ‘देखने लग; तेरे विश्वास ने तुझे अच्छा कर दिया है’ “ (पद.41-42) l

जब एक असली ज़रूरतमंद द्वारा आपकी योजना बाधित होती है, हम उससे करुणा सहित व्यवहार करने के लिए प्रभु से बुद्धि मांगे l जिसे हम रूकावट कहते हैं वह उस दिन के लिए प्रभु की ओर से एक दिव्य सुअवसर हो सकता है l

मौसम के अनुकूल वस्त्र

खरीदे गए सर्दी के कपड़ों की कीमत लेबल हटाते समय मैं उनके पीछे लिखे शब्दों को पढ़कर मुस्कराया : चेतावनी : जब आप इन नए वस्त्रों को पहनोगे आप बाहर ही रहना चाहोगे l” मौसम के अनुसार उचित कपड़े पहनकर, एक व्यक्ति कठोर मौसम की बदलती स्थितियों में भी जीवित रह सकता है l

हमारे आत्मिक जीवनों में भी यही सिद्धांत सच है l यीशु ने बाइबिल में अपने अनुयायियों के लिए सभी मौसम के लिए आत्मिक वस्त्र बताया है l “इसलिए परमेश्वर के चुने हुओं के समान जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करुणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण  करो ... क्षमा करो; जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किये” (कुलु. 3:12-13 बल दिया गया है) l

परमेश्वर द्वारा दिए गए ये वस्त्र-जैसे भलाई, दीनता और नम्रता-धीरज, क्षमा और प्रेम के साथ विरोध और आलोचना का सामना करने में हमारी मदद करते हैं l ये हमें जीवन की आँधियों में स्थिर रहने की शक्ति देते हैं l

घर, स्कूल, अथवा कार्य में विपरीत स्थितियों का सामना करते समय परमेश्वर द्वारा बताए गए “वस्त्र” धारण करने से हमें सुरक्षा मिलती है और स्पष्ट अंतर लाने में योग्य बनाते हैं l “इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबंध है बाँध लो” (पद. 3:14) l

परमेश्वर के मार्गदर्शन अनुसार वस्त्र पहनना मौसम को नहीं बदलता-यह पहनने वाले को तैयार/लैस करता है l