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Articles by डेविड मैकैसलैंड

अनुग्रह के लय

विवाह के छियासठ वर्ष पूरे करके, नब्बे वर्षीय मेरा एक मित्र और उनकी पत्नी, ने अपने बच्चों, नाती-पोंतों और आनेवाली पीढ़ियों के लिए अपना पारिवारिक इतिहास लिखा l अंतिम अध्याय, “माता और पिता की ओर से एक पत्र,” में सीखे गए महत्वपूर्ण जीवन-पाठ हैं l एक से मैंने अपने जीवन-सूची पर विचार किया : “यदि आपको महसूस हो कि मसीहियत आपको थकाकर ऊर्जा छीनता है, तो आप यीशु मसीह के साथ सम्बन्ध का आनंद न लेकर धर्म का अभ्यास कर रहे हैं l प्रभु के साथ आप थकेंगे नहीं, वह आपको स्फूर्तिदायक, सामर्थी और क्रियाशील करेगा” (मत्ती 11:28-29) l

युजिन पिटरसन की व्याख्या अनुसार इस परिच्छेद में यीशु का निमंत्रण निम्नांकित है, “क्या तूम थककर टूट गए हो? धर्म को मानते हुए अक्रियाशील हो गए हो? ... मेरे संग चलो और काम करो ... अनुग्रह के सहज लय सीखो” (The Message) l

यह सोचकर कि परमेश्वर की सेवा मेरे ऊपर है, मैं उसके साथ  न चलकर, उसके लिए  काम करना आरंभ कर देता हूँ l एक महत्वपूर्ण अंतर है l मसीह के साथ नहीं चलने से, मेरी आत्मा सूखकर भंगुर हो जाती है l लोग मुसीबत हैं, परमेश्वर के स्वरुप में बनाए गए संगी मनुष्य नहीं l कुछ सही नहीं दिखता l

महसूस करके कि मैं यीशु के संग सम्बन्ध का आनंद न लेकर धर्म का अभ्यास कर रहा हूँ, अपना बोझ उतारकर उसके अनुग्रह के सहज लय” में उसके साथ चलने का समय है l

पंद्रह मिनट की चुनौती

लम्बे समय तक हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अध्यक्ष रहे, डॉ. चार्ल्स डब्ल्यू इलियट, मानते थे कि साधारण लोग भी निरंतर विश्व के महान साहित्य से कुछ मिनट प्रतिदिन पढ़कर अनमोल ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं l 1910 में, उन्होंने विश्व-साहित्यों से कुछ भाग चुनकर द हार्वर्ड क्लासिक्स नाम से पचास पुस्तकें संकलित कीं l पुस्तकों के हर सेट में डॉ. इलियट की “हर दिन पंद्रह मिनट” शीर्षक की पठन मार्गदर्शिका थी जिसमें पूरे वर्ष हर दिन आठ से दस पृष्ठ पढ़ने की सलाह थी l

कितना अच्छा होता यदि हम प्रतिदिन पन्द्रह मिनट परमेश्वर का वचन पढ़ते? हम भजनकार के साथ बोल पाते, “मेरे मन को लोभ की ओर नहीं, अपनी चितौनियों ही की ओर फेर दे l मेरी आँखों को व्यर्थ वस्तुओं की ओर से फेर दे; तू अपने मार्ग में मुझे जिला” (भजन 119:36-37) l

प्रतिदिन पन्द्रह मिनट जुड़कर एक वर्ष में इक्यानवे घंटे हो जाते हैं l किन्तु हम बाइबिल पठन के लिए जितना भी समय देते हों, रहस्य निरंतरता और मुख्य सामग्री सिद्धता नहीं किन्तु दृढ़ता है l यदि हम एक दिन अथवा एक सप्ताह भूल जाते हैं, हम पुनः आरंभ करें l जैसे पवित्र आत्मा सिखाता है, परमेश्वर का वचन हमारे मस्तिष्क से हृदय को ओर, उसके बाद हमारे हाथों और पैरों तक अर्थात हमें ज्ञान से रूपांतरण तक ले जाता है l

“हे यहोवा, मुझे अपनी विधियों का मार्ग दिखा दे; तब मैं उसे अंत तक पकड़े रहूँगा” (पद.33) l

जो कुछ हमें चाहिए

मैं अक्सर खुद को अपने कामों में पूर्ण अयोग्य पाता हूँ l सन्डे स्कूल पढ़ाना, किसी मित्र को सलाह, अथवा किसी प्रकाशन में लेख लिखना, चुनौती मेरी योग्यता से बड़ी लगती है l मुझे पतरस की तरह, बहुत सीखना है l

नया नियम प्रभु के पीछे चलने को प्रयासरत पतरस की कई कमजोरियाँ दर्शाता है l पतरस यीशु की ओर पानी पर चलते समय, डूबने लगा (मत्ती 14:25-31) l यीशु की गिरफ्तारी बाद, पतरस ने शपथ खाकर उसका इनकार किया l (मरकुस 14:66-72) l किन्तु पुनरुत्थित मसीह से सामना और पवित्र आत्मा की सामर्थ्य ने उसको बदल दिया l

पतरस ने समझा कि परमेश्वर की “ईश्वरीय सामर्थ्य ने सब कुछ जो जीवन और भक्ति से सम्बन्ध रखता है, हमें उसी की पहचान के द्वारा दिया है, जिसने हमें अपनी ही महिमा और सद्गुण के अनुसार बुलाया है” (2 पतरस 1:3) l एक कमज़ोर व्यक्ति की अद्भुत उक्तियाँ!

“[परमेश्वर ने] हमें बहुमूल्य और बहुत ही बड़ी प्रतिज्ञाएं दी हैं : ताकि इनके द्वारा तुम उस सड़ाहट से छूटकर, जो संसार में बुरी अभिलाषाओं से होती है, ईश्वरीय स्वभाव के समभागी हो जाओ” (पद.4) l

मसीह यीशु के साथ हमारा सम्बन्ध बुद्धिमत्ता, धीरज, और सामर्थ्य का श्रोत है जो परमेश्वर की महिमा, दूसरों की मदद, और आज की चुनौतियों का सामना करने में हमें चाहिए l जिससे, हम हिचकिचाहट और अयोग्यता पर जय पाएंगे l

प्रत्येक स्थिति में, उसने हमें उसकी सेवा और महिमा हेतु सब कुछ दिये हैं l

दुष्क्रियात्मक

शब्द दुष्क्रियात्मक  अक्सर व्यक्तियों, परिवारों, संबंधों, संस्थाओं, और सरकारों को परिभाषित करने में उपयोग होता है l जबकि क्रियात्मक  का अर्थ है, उचित क्रियाशील  व्यवस्था में होना, दुष्क्रियात्मक  इसका विपरीत है-टूटा हुआ, ठीक से कार्य नहीं कर रहा, अपने बनाए जाने के मकसद को पूरा नहीं कर रहा l

रोमियों की अपनी पत्री में पौलुस आत्मिक दुष्क्रियात्मक मानवता का वर्णन करना आरम्भ करता है (1:18-32) l हम सब उस विद्रोही समूह के हैं : “सब भटक गए हैं, सब के सब निकम्मे बन गए हैं; कोई भलाई करने वाला नहीं, एक भी नहीं ... इसलिए कि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं” (3:12,23) l

सुसमाचार है कि “[सब] उसके अनुग्रह से उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, सेंत-मेंत धर्मी ठहराए जाते हैं ... जो विश्वास करने से कार्यकारी होता है” (पद.24-25) l जब हम अपने जीवनों में मसीह को आमंत्रित करके परमेश्वर की क्षमा और नए जीवन की पेशकश स्वीकारते हैं, हम उसकी इच्छानुकूल व्यक्ति बनते हैं l हम तुरंत सिद्ध नहीं बनते, किन्तु अब हमें टूटा और दुष्क्रियात्मक रहने की ज़रूरत नहीं l

हम परमेश्वर के आदर हेतु अपने वचन और कार्य में पवित्र आत्मा द्वारा दैनिक सामर्थ्य पाते हैं और “पुराने मनुष्यत्व [को] उतारकर ... नए मनुष्यत्व को पहिन [लेते हैं] जो परमेश्वर के अनुरूप सत्य की धार्मिकता और पवित्रता में सृजा गया है” (इफि. 4:22-24) l

बच्चे की तैयारी

अनेक लालन-पालन वेबसाइटों पर एक वाक्यांश होता है, “सड़क के लिए बच्चे को तैयार करें, बच्चे के लिए सड़क को नहीं l” हमारे जीवन में समस्त बाधाओं को हटाने की कोशिश करके बच्चों के लिए मार्ग तैयार करने की अपेक्षा, हमें आगे के मार्ग में आनेवाली बाधाओं का सामना करने के लिए उन्हें तैयार करना चाहिए l

भजनकार लिखता है, “हम ... होनहार पीढ़ी के लोगों से, यहोवा का गुणानुवाद और उसकी सामर्थ्य और आश्चर्यकर्मों का वर्णन करेंगे l ... उसने हमारे पितरों को आज्ञा दी, कि तुम इन्हें अपने अपने बाल-बच्चों को बताना; कि आनेवाले पीढ़ी के लोग, अर्थात् जो बच्चे उत्पन्न होनेवाले हैं, वे इन्हें जानें; और अपने-अपने बाल-बच्चों से इनका बखान करने में उद्यत हों” (भजन 78:4-6) l लक्ष्य है कि “वे  परमेश्वर का भरोसा रखें, और परमेश्वर के बड़े कामों को भूल न जाएं” (पद. 7) l

दूसरे अपने कथन और आचरण के द्वारा हम पर जो सामर्थी आत्मिक प्रभाव डालें हैं, उस पर विचार करें l उनकी बातचीत और निरूपण ने हमारा ध्यान खींचकर हमें यीशु का अनुसरण करने हेतु उत्तेजित किया है l

आने वाली पीढ़ी और पीढ़ियों को हमारे जीवनों के लिए परमेश्वर का वचन और उसकी योजना बांटना एक अद्भुत सौभाग्य है l उनके जीवन में आगे जो भी हो, वे तैयार रहकर  प्रभु की सामर्थ्य में उनका सामना करें, यही हमारी इच्छा है l

बीज बिखेरना

मैंने एक स्त्री से एक अदभुत ई-मेल प्राप्त किया, “1958 में पुटमेन सिटी में तुम्हारी माँ मेरी प्रथम कक्षा की शिक्षिका थी l वह बहुत अच्छी और दयालु, किन्तु सख्त शिक्षिका थी! उन्होंने हमें भजन 23 कंठस्थ करके पूरी कक्षा के सामना दोहराने को कहा, और मैं डर गया l किन्तु 1997 में मसीही बनने तक बाइबिल का मेरा एकमात्र संपर्क वही था l और इसे पुनः पढ़ते समय श्रीमति मैकेसलैंड की यादें सैलाब की तरह लौटती हैं l”

यीशु ने एक बड़ी भीड़ को विभिन्न प्रकार की भूमि-एक कठोर, चट्टानी, झाड़ियों, और अच्छी भूमि पर-बीज बोनेवाले एक किसान का दृष्टान्त बताया (मत्ती 13:1-9) l  जबकि कुछ बीज उगे नहीं, “अच्छी भूमि पर गिरी हुई बीज, सुनकर समझने वाले व्यक्ति का सन्दर्भ देता है” और “सौ गुना, कोई साठ गुना, और कोई तीस गुना [फलता है] (पद.23) l

उन बीस वर्षों में मेरी माँ ने पब्लिक स्कूल में पढ़ाते हुए, पठन, लेखन और गणित के साथ परमेश्वर के प्रेम का सन्देश और दयालुता के बीज बोए l

उसके पूर्व विद्यार्थी के ई-मेल के अंत में लिखा था, “मेरे जीवन के बाद के वर्षों में अवश्य ही, अन्य मसीही प्रभाव था l किन्तु मेरा हृदय [भजन 23] और [आपकी माँ] के दयालु स्वभाव की ओर लौटता है l”

आज बोया गया परमेश्वर के प्रेम का एक बीज किसी दिन असाधारण फसल देगा l

स्मृति की सेवा

हानि, और निराशा के हमारे अनुभव हमें क्रोधित, दोषी और भ्रमित करते हैं l चाहे हमारे चुनावों के कारण कुछ दरवाज़े नहीं खुलेंगे अथवा, हमारे दोष के बगैर, त्रासदी हमारे जीवनों में है, परिणाम अक्सर वही है जिसे ऑस्वाल्ड चेम्बर्स कहते हैं ‘हो सकता है’ का “अगाध दुःख l” हम दर्दनाक स्मृति को दबाने में असफल होंगे l

चैम्बर्स हमें याद दिलाते हैं कि परमेश्वर हमारे जीवनों में क्रियाशील है l “जब परमेश्वर अतीत को वापस लाए कभी भयभीत न होना,” उसने कहा l “स्मृति को कार्य करने दें l यह डांट, दंड और दुःख के साथ परमेश्वर का मंत्री है l परमेश्वर ‘हो सकता है’ को भविष्य हेतु एक अदभुत संस्कृति [उन्नति का स्थान] में बदल देगा l

जब परमेश्वर ने पुराने नियम के समय इस्राएलियों को बेबिलोन के निर्वासन में भेजा, उनको वापस उनके घर लाने तक उसने उनको उस विदेशी भूमि पर अपने विश्वास में बढ़ने को कहा l “क्योंकि यहोवा की यह वाणी है, कि जो कल्पनाएँ मैं तुम्हारे विषय करता हूँ उन्हें मैं जानता हूँ, वे हानि की नहीं, वरन् कुशल ही की हैं, और अंत में तुम्हारी आशा पूरी करूँगा” (यिर्मयाह 29:11) l

परमेश्वर ने उनको अतीत की घटनाओं को नज़रंदाज़ नहीं करने अथवा उनमें फंसने के बदले उस पर केन्द्रित होकर आगे देखने को कहा l परमेश्वर की क्षमा हमारे दुःख की स्मृति को उसके अनंत प्रेम में भरोसा में बदल सकती है l

हार न मानें

बॉब फोस्टर, जो 50 वर्ष से अधिक से मेरा सलाहकार और मित्र है, मुझे छोड़ा नहीं है l मेरे कठिन समय में भी, उसकी स्थिर मित्रता और प्रोत्साहन ने, मुझे आगे बढ़ने में मदद की l

हम दोनों अक्सर अपने को किसी ज़रूरतमंद की मदद करते पाते हैं l किन्तु जब हमें तुरंत सुधार नहीं दिखाई देता, हमारा संकल्प कमजोर हो सकता है और हम आखिरकार हार मान सकते हैं l हमें यह मालूम पड़ता है कि जिसे हम तात्कालिक बदलाव सोचते थे, वह चलनेवाली प्रक्रिया बन गयी है l

प्रेरित पौलुस हमसे जीवन की बाधाओं और संघर्षों में परस्पर मदद करने में धीरज रखने को कहता है l वह यह लिखते हुए, “तूम एक दूसरे का भार उठाओ” और “इस प्रकार मसीह की व्यवस्था को पूरी करो” (गला.6:2), हमारे परिश्रम की तुलना एक किसान के कार्य, समय, और इंतज़ार से करता है जो फसल के लिए ठहरा हुआ है l

हम कब तक उनके लिए प्रार्थना और उनको मदद करते रहेंगे जिनसे हम प्रेम करते हैं? “हम भले कामों में साहस न छोड़ें, क्योंकि यदि हम ढीले न हों तो ठीक समय पर कटनी काटेंगे” (पद.9) l हम कब तक मदद करें? “जहाँ तक अवसर मिले हम सब के साथ भलाई करें, विशेष करके विश्वासी भाइयों के साथ” (पद.10) l

प्रभु आज हमसे उस पर भरोसा करने, दूसरों के प्रति विश्वासयोग्य, निरंतर प्रार्थना करने, और हार न मानने को उत्साहित करता है!

वह समझता और चिंता करता है

यह पूछने पर कि उसके विचार से क्या अज्ञानता और बेपरवाही आधुनिक समाज में समस्याएँ हैं, एक व्यक्ति ने मज़ाक किया, “मुझे नहीं मालुम और मुझे परवाह नहीं l”

मेरे विचार से अनेक निराश लोग आज संसार और लोगों के विषय ऐसा ही सोचते हैं l किन्तु जब बात होती है हमारे जीवन की परेशानियों और चिंताओं की, यीशु पूरी तरह समझता, और गहरी चिंता करता है l यशायाह 53, यीश के क्रूसीकरण का पुराने नियम का नबूवत, हमारे लिए यीशु की चिंता की एक झलक है l “वह सताया गया, तौभी वह [वध होनेवाली भेड़ की तरह] शांत रहा” (पद.7) l “मेरे ही लोगों के अपराधों के कारण उस पर मार पड़ी” (पद.8) l “यहोवा को यही भाया कि उसे कुचले; उसी ने उसको रोगी कर दिया; जब वह अपना प्राण दोषबलि करे, तब वह अपना वंश देखने पाएगा, वह बहुत दिन जीवित रहेगा; उसके हाथ से यहोवा की इच्छा पूरी हो जाएगी” (पद.10) l

यीशु ने क्रूस पर स्वेच्छा से हमारे पाप और दोष सह लिए l हमारे लिए हमारे प्रभु से अधिक कोई नहीं सहा l उसे मालूम था कि हमारे पापों से हमें बचाने में उसको क्या कीमत देनी होगी, और प्रेम में, उसने अपनी इच्छा से कीमत चुका दी (पद.4-6) l

मृत्यु से पुनरुत्थान के कारण यीशु, जीवित है और हमारे साथ उपस्थित है l कोई भी स्थिति हो, यीशु समझता और चिंता करता है l वह हमें लिए चलेगा l

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ख़ामोशी

सहायता ट्रकों के गाँव की टूटी झोपड़ियां हटाते समय चूज़े भागने लगे l नंगे पाँव बच्चे घूरते रहे l बारिश से उजड़ी “सड़क” पर यातायात कम थी l

अचानक, काफिले ने दीवारों से घिरी मेयर का बड़ा मकान देखा जो खाली था l लोगों के पास बुनियादी ज़रूरतें नहीं थीं जबकि वह दूर शहर में आलिशान मकान में रहता था l

ऐसा अन्याय हमें क्रोधित करता है, जिससे परमेश्वर का नबी भी क्रोधित हुआ l व्यापक शोषण देखकर हबक्कूक ने कहा, “हे यहोवा, मैं कब तक तेरी दोहाई देता रहूँगा, और तू न सुनेगा?” (हबक्कूक 1:2) l किन्तु परमेश्वर ने ध्यान  देकर कहा, “हाय उस पर जो पराया धन छीन छीनकर धनवान हो जाता है? ... जो अपने घर के लिए अन्याय के लाभ का लोभी है” (2:6, 9) l न्याय निकट है!

हम दूसरों पर परमेश्वर का न्याय चाहते हैं, किन्तु हबक्कूक की एक मुख्य बात हमें रोकती है : “यहोवा अपने पवित्र मंदिर में है; समस्त पृथ्वी उसके सामने शांत रहे” (2:20) l समस्त  पृथ्वी l शोषित और उत्पीड़क l कभी-कभी परमेश्वर की प्रत्यक्ष खामोशी का उचित प्रतिउत्तर ... ख़ामोशी है!

ख़ामोशी क्यों? क्योंकि हम अपनी आत्मिक दरिद्रता नहीं देखते l हम ख़ामोशी में पवित्र परमेश्वर के सामने अपने पाप देख सकेंगे l   

हबक्कूक की तरह हम भी परमेश्वर पर भरोसा सीखें l हम उसके सब मार्ग नहीं जानते, किन्तु जानते हैं कि वह भला है l सब कुछ उसके नियंत्रण और समय में है l  

थोड़ा सुख बांटना

एक सहेली ने घर में बने मिट्टी के बर्तन भेजे l आते समय बहुमूल्य चीजें टूट गईं l एक कप के कुछ बड़े टुकड़े, और टुकड़े और मिट्टी की ढेर l

मेरे पति ने टुकड़ों को जोड़ दिया l मैंने इस जुड़े हुए खूबसूरत कप को सजा दिया l इस छिद्रित-जोड़े हुए मिट्टी के बर्तन समान, मेरे दाग़ भी प्रमाण हैं कि परमेश्वर मुझे कठिन समय से निकाला है, फिर भी मैं मजबूती से खड़ी हो सकती हूँ l सुख का वह प्याला याद दिलाता है कि मेरे जीवन में और मेरे जीवन के द्वारा परमेश्वर का काम दूसरों को उनके दुःख में सहायता पहुँचाती है l 

प्रेरित पौलुस परमेश्वर की प्रशंसा करता हैं क्योंकि वह “दया का पिता और सब प्रकार की शांति का परमेश्वर है” (2 कुरिं. 1:3) l प्रभु हमारे आजमाइशों और दुखों का उपयोग हमें अपने समान बनाने के लिए करता है l हमारे दुखों में उसकी सांत्वना से हम दूसरों को बताते हैं कि उसने हमारी ज़रूरतें कैसे पूरी की हैं (पद.4) l

मसीह के दुखों पर विचार करके, हम अपने दुखों में दृढ़ रहकर, भरोसेमंद हैं कि परमेश्वर हमारे अनुभवों से हमें और दूसरों को धीरजवंत धैर हेतु सामर्थी बनाता है (पद.5-7) l पौलुस की तरह, हम सुख पाते हैं कि प्रभु हमारे संघर्षों को अपनी महिमा के लिए उपयोग करता है l हम उसकी सांत्वना के भागीदार होकर पीड़ितों के लिए आश्वासन भरी आशा ला सकते हैं l

मुस्कराने का कारण

कार्यस्थल में उत्साहवर्धक शब्द अर्थपूर्ण होते हैं l कार्यकर्ताओं का परस्पर संवाद ग्राहक की संतुष्टि, कंपनी का लाभ, और सहकर्मी के मुल्यांकन को प्रभावित करता है l अध्ययन अनुसार  सबसे प्रभावशाली कार्य समूहों के सदस्य एक दूसरे को अस्वीकृति, असहमति, अथवा कटाक्ष के बदले छः गुना अधिक समर्थन देते हैं l

पौलुस ने अनुभव से संबंधों और परिणामों को आकार देने में शब्दों के महत्त्व को सीखा l दमिश्क के मार्ग पर मसीह से मुलाकात से पहले, उसके शब्द और कार्य यीशु के अनुयायियों को आतंकित करते थे l किन्तु थिस्सलुनीकियों को पत्री लिखने तक, उसके हृदय में परमेश्वर के काम से वह महान उत्साहित करनेवाला बन गया था l अब वह अपने नमूने से अपने पाठकों को परस्पर उत्साहित करने का आग्रह किया l चापलूसी से सावधान रहते हुए, उसने दूसरों को स्वीकार करने और मसीह की आत्मा को प्रतिबिंबित करना दिखाया l  

इस प्रक्रिया में, पौलुस अपने पाठकों को उत्साहवर्धन का श्रोत बताता है l उसने पाया कि अपने को परमेश्वर को सौंपने से, जो हमसे प्रयाप्त प्रेम करके क्रूस पर मरकर, हमें सुख देने, क्षमा करने और प्रेरित करने, और परस्पर प्रेम भरी चुनौती देने का कारण देता है (1 थिस्स. 5:10-11) l

पौलुस हमें बताता है कि परस्पर उत्साहित करना परस्पर परमेश्वर का धीरज और भलाई का स्वाद चखने का एक मार्ग है l