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Articles by डेविड मैकैसलैंड

दौड़ और विश्राम

मुख्य समाचार ने मुझे आकर्षित किया, धावकों के लिए आराम के दिन आवश्यक हैं l” टॉमी मैनिंग के लेख में अमरीकी पर्वत धावक टीम, ने समर्पित धावकों द्वारा कभी-कभी नज़रन्दाज़ करने वाले एक सिद्धांत पर बल दिया-अभ्यास के बाद शरीर को विश्राम और फिर से ताकत पाने के लिए समय चाहिए l मैनिंग ने लिखा, “मनोवैज्ञानिक रूप से, प्रशिक्षण के परिणामस्वरूप सुधार आराम से ही होता है l इसका अर्थ है, कि काम के बराबर आराम है l”

यह हमारे विश्वास और सेवा में भी उतना ही सच है l अक्रियाशीलता और निराशा से दूर रहने के लिए नियमित आराम चाहिए l अत्यधिक ज़रूरत के समय भी, यीशु अपने पृथ्वी पर के जीवन में आत्मिक संतुलन बनाए रखा l शिष्यों के शिक्षण और चंगाई के ज़ोरदार सेवकाई के बाद लौटने पर, “उसने उनसे कहा, ‘तुम आप अलग किसी एकांत स्थान में चलकर थोड़ा विश्राम करो l’” (मरकुस 6:31) l किन्तु एक बड़ी भीड़ उनके पीछे हो ली, इसलिए यीशु ने उनको उपदेश दिया और केवल पाँच रोटी और दो मछलियों से उन सब को भोजन कराया (पद.32-44) l सभी के चले जाने पर, यीशु “पहाड़ पर प्रार्थना करने को गया” (पद.46) l

यदि हमारे जीवन काम से परिभाषित हैं, तो हमारे कार्य अत्यधिक प्रभावहीन होते चले जाते हैं l यीशु नियमित रूप से हमसे उसके साथ मिलकर प्रार्थना करने और कुछ विश्राम करने को आमंत्रित करता है l

आपके बाद

कुछ एक संस्कृतियों में बड़ा भाई छोटे भाई को कमरे में पहले प्रवेश देता है l दूसरी में, सबसे विशेष अथवा ऊँचे पद वाले व्यक्ति पहले प्रवेश करते हैं l चाहे कोई भी संस्कृति हो, हम विशेष विषयों में किसी को पहले चुनाव करने देना कठिन महसूस करते हैं, विशेषकर जब वह अधिकार हमारे पास हो l

अब्राम (बाद में अब्राहम) और उसके भतीजा लूत के पास बहुत पशु-धन, और तम्बू थे और उनकी यात्रा में उनके भोजन आदि की ज़रूरतें पूरी नहीं हो पा रही थी l अब्राम ने अलग होने की सलाह दी, और पहले लूत को क्षेत्र चुनने दिया l उसके भतीजे ने यर्दन की उपजाओ घाटी का चुनाव किया, और अब्राम को कम मनचाहा क्षेत्र मिला l

अब्राम ने इस स्थिति में अपने बड़े होने का अधिकार छोड़कर भविष्य के लिए परमेश्वर पर भरोसा किया l अब्राम ने लूत से कहा, “मेरे और तेरे बीच, और मेरे और तेरे चरवाहों के बीच में झगड़ा न होने पाए; ... क्या सारा देश तेरे सामने नहीं? इसलिए मुझ से अलग हो जा; यदि तू बाईं ओर जाए तो मैं दाहिनी ओर जाऊँगा; और यदि तू दाहिनी ओर जाए, तो मैं बाईं ओर जाऊँगा” (उत्प.13:8-9 ) l लूट का चुनाव आखिरकार उसके पुरे परिवार के लिए खौफनाक परिणाम लेकर आया (उत्प. 19) l

आज, अनेक चुनावों का सामना करते हुए; हम परमेश्वर से उसके मार्गदर्शन भरोसा करें l वह हमारी चिंता करने की प्रतिज्ञा करता है l वह हमारी ज़रूरत पूरी करेगा l

विपत्ति-संकेत!(Mayday!)

अंतर्राष्ट्रीय विपत्ति संकेत “Mayday” हमेशा तीन बार दोहराया जाता है-Mayday- Mayday- Mayday”-ताकि खतरनाक आपातकाल जैसी स्थिति बिल्कुल समझ में आ जाए l 1923 में, लन्दन क्रॉयडन एअरपोर्ट पर नियुक्त, वरिष्ठ रेडियो अफसर, फ्रेडरिक मोक्फोर्ड ने यह शब्द रचा था l वर्तमान में बंद इस सुविधा में पेरिस के ली बोरगेट एअरपोर्ट से लन्दन और वापस अनेक उड़ाने थीं l नेशनल मारीटाइम अजायबघर के अनुसार, मोक्फोर्ड ने Mayday शब्द को फ़्रांसीसी शब्द m’aidez, अर्थात्, मेरी सहायता करें” से बनाया l

दाऊद अपने सम्पूर्ण जीवन में, खतरनाक स्थितियों का सामना किया जिसका हल कठिन था l फिर भी, हम भजन 86 में पढ़ते हैं कि दाऊद का भरोसा सबसे कठिन समय में, परमेश्वर में था l “हे यहोवा, मेरी प्रार्थना की ओर कान लगा, और मेरे गिड़गिड़ाने को ध्यान से सुन l संकट के दिन मैं तुझ को पुकारूँगा क्योंकि तू मेरी सुन लेगा” (पद.6-7) l

दाऊद परमेश्वर का मार्गदर्शन माँगकर तात्कालिक खतरे से परे देखा l “हे यहोवा, अपना मार्ग मुझे दिखा, तब मैं तेरे सत्य मार्ग पर चलूँगा, मुझ को एक चित्त कर कि मैं तेरे नाम का भय मानूँ” (पद.11) l संकट समाप्ति के बाद भी, वह परमेश्वर के साथ चलना चाहता था l

हमारे द्वारा कठिनतम स्थिति का सामना प्रभु के साथ गहरे सम्बन्ध का द्वार खोल दे सकते हैं l यह हमारे संकट में, और दैनिक जीवन में उसके मार्ग पर चलने हेतु सहायता मांगने से आरंभ होता है l

हममें से एक

लोकप्रिय पीनट  कॉमिक  का बनानेवाला, चार्ल्स शुल्त्ज़ (1922-2000) की यादगार सभा में, मेरा दोस्त और सहयोगी और कार्टूनिस्ट कैथी गुज़वाईट ने उसकी मानवता और सहानुभूति बताया l “उसने वास्तविक भावनाओं से परिचित संसार के चरित्रों द्वारा और फिर उसने कार्टूनिस्ट को स्वयं को उपयोग करने देकर, हमें अनुभव कराया कि कभी भी हम अकेले नहीं हैं ... उसने हमें उत्साहित किया l उसने हमारे साथ सहानुभूति प्रगट की l उसने हमें महसूस करने दिया कि वह बिल्कुल हमारे समान था l”

जब हम अनुभव करते और समझते हैं कि कोई भी हमें न समझता है और न ही मदद करता है, हम याद करते हैं कि यीशु ने खुद को हमारे लिए दे दिया, और वह पूरी तौर से हमें और हमारी समस्याओं को जानता है l

इब्रानियों 2:9-18 अद्भुत सच्चाई प्रगट करता है कि यीशु पृथ्वी पर हमारी मानवता में भागीदार हुआ (पद.14) l  उसने “ हर एक मनुष्य के लिए मृत्यु का स्वाद [चखा] (पद.9), शैतान को निकम्मा [किया] (पद.14), और “जितने मृत्यु के भय के मारे जीवन भर दासत्व में फंसे थे, उन्हें छुड़ा [लिया] (पद.15) l यीशु हमारे समान बना, “जिससे वह उन बातों में जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखती हैं, एक दयालु और विश्वासयोग्य महायाजक बने ताकि लोगों के पापों के लिए प्रायश्चित करे” (पास.17) l प्रभु, हमारी मानवता में भागीदार बनने के लिए धन्यवाद, कि हम आपकी सहायता को जानकर आपकी उपस्थिति में सर्वदा रह सकें l  

सम्पूर्ण मन से!

कालिब “सम्पूर्ण मन” का व्यक्ति था l वह और यहोशू मूसा और लोगों को प्रतिज्ञात देश की छानबीन रिपोर्ट देनेवाले बारह-व्यक्तियों की टोह लेनेवाली टीम का हिस्सा थे l कालिब ने कहा, “हम अभी ... उस देश को अपना कर लें; क्योंकि निःसंदेह हम में ऐसा करने की शक्ति है” (गिनती 13:30) l किन्तु टीम के बाकी दस लोगों ने परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के बाद भी, इसे असंभव कहकर केवल बाधाएं देखीं (पद. 31-33) l

दस लोगों द्वारा लोगों को हताश करके परमेश्वर के विरुद्ध बड़बड़ाने से उन्हें निर्जन-स्थान में चालीस वर्ष भटकना पड़ा l किन्तु कालिब डटा रहा l परमेश्वर ने कहा, “इस कारण कि ... कालिब के साथ और ही आत्मा है, और उसने ... मेरा अनुसरण किया है, मैं उसको उस देश में ... पहुँचाऊँगा, और उसका वंश उस देश का अधिकारी होगा” (गिनती 14:24) l पैंतालिस वर्ष बाद परमेश्वर ने 85 वर्षीय कालिब को, हेब्रोन नगर दिया “क्योंकि वह इस्राएल के परमेश्वर यहोवा का पूरी रीति से अनुगामी था” (यहोशू 14:14) l

शताब्दियों बाद एक व्यवस्थापक ने यीशु से पूछा, “कौन सी आज्ञा बड़ी है?” यीशु ने उत्तर दिया, “ ‘तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन ... सारे प्राण, ... सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख l’ बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है” (मत्ती 22:35-38) l

आज, कालिब हमारे मन के सम्पूर्ण प्रेम, भरोसा, और समर्पण के योग्य परमेश्वर में अपने भरोसे से हमें प्रेरित कर रहा है l

वाइरल सुसमाचार

बोस्टन के नार्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी में वायरल विषय वस्तु प्रोजेक्ट यह अध्ययन कर रहें है कि 1800 के दशक में मुद्रित विषय अखबारों द्वारा-उस काल का सोशल मीडिया नेटवर्क-कैसे फैलता था l यदि एक लेख पुनः 50 से अधिक बार छपती थी, वे उसे उस ओद्योगिक काल में “वाइरल” मानते थे l स्मिथसोनियन  पत्रिका में लिखते हुए, ब्रिट पीटरसन ने पाया कि यीशु के किस अनुयायी की मृत्यु विश्वास के कारण कैसे हुई, एक उन्नीसवीं-शताब्दी के खबर लेख कम-से-कम 110 भिन्न प्रकाशनों में दिखाई दिया l

थिस्सलुनीके के मसीहियों को लिखते हुए प्रेरित पौलुस ने, उन्हें यीशु का साहसिक और आनंदित साक्षी बनने के लिए सराहाना की l  “तुम्हारे यहाँ से न केवल मकिदुनिया और अखया में प्रभु का वचन सुनाया गया, पर तुम्हारे विश्वास की जो परमेश्वर पर है, हर जगह ऐसी चर्चा फ़ैल गई है” (1 थिस्स.1:8) l यीशु मसीह द्वारा रूपांतरित इन लोगों के जीवन द्वारा सुसमाचार वायरल हो गया l कठिनाई और सताव के बावजूद, वे शांत न रह सके l

हम प्रभु को जाननेवाले करुणामय हृदयों, मददगार हाथों, और ईमानदार शब्दों द्वारा मसीह में क्षमा और अनंत जीवन को फैलाते हैं l सुसमाचार हमें और हमसे मिलने वालों के जीवन रूपांतरित करता है l

आज भी हम सभों द्वारा सुसमाचार फैलता जाए!

कबाड़खाना निपुण

नोआ प्युरिफोय ने “संग्रह” कलाकार के रूप में लॉस एंजेल्स के वाट्स क्षेत्र में 1965 के

दंगे के बाद इकट्ठी की गई तीन टन मलबा से अपना कार्य आरंभ किया l साइकिल के टूटे पहिये और फेंकने योग्य गेंद से लेकर अलग किये गए टायर्स और ख़राब टी.वी.-अनुपयोगी वस्तुएं-उसने  और उसके सहयोगी ने आधुनिक समाज में ठुकराए हुए लोगों के साथ व्यवहार के विषय सशक्त सन्देश देने वाली प्रतिमाएँ बनाईं l एक संवाददाता ने श्री पुरिफोय को “कबाड़खाना निपुण” संबोधित किया l

यीशु के काल में बीमार और शारीरिक समस्याओं से ग्रस्त लोग परमेश्वर द्वारा दण्डित पापी माने जाते थे l उनको अस्वीकृत और उपेक्षित माना जाता था l किन्तु यीशु और उसके शिष्यों के जन्म से दृष्टिहीन एक व्यक्ति से मुलाकात के बाद, यीशु ने बताया कि उसकी स्थिति पाप का परिणाम नहीं है, किन्तु परमेश्वर की सामर्थ्य देखने का एक अवसर l “जब तक मैं जगत में हूँ , तब तक जगत की ज्योति हूँ” (यूहन्ना 9:5) l यीशु के निर्देशों के अनुसरण पश्चात, दृष्टिहीन देखने लगा l

धार्मिक अधिकारीयों के प्रश्न करने पर, उस व्यक्ति ने सरलता से जवाब दिया, “मैं एक बात जानता हूँ कि मैं अँधा था और अब देखता हूँ”(पद.25) l

यीशु आज भी संसार में  “कबाड़खाना निपुण” है l हम सब पाप द्वारा बिगड़े हुए हैं, किन्तु वह हमारे टूटे जीवन को नयी सृष्टि बनाता है l

क्या यह आनंद देता है?

व्यवस्था एवं संगठन विषय पर एक युवा जापानी स्त्री की पुस्तक की लाखों प्रतियां संसार में बिक गयीं l मारी कोंडो का मुख्य सन्देश घरों और आलमारियों में अनावश्यक वस्तुएँ- जो वस्तुएं उनके लिए बोझ हैं-को हटाने में लोगों को मदद करना है l वह कहती हैं, “हर एक को ऊपर उठाकर पूछिये, “क्या यह आनंद देता है?” यदि उत्तर हाँ है, रख लीजिये l यदि नहीं, तो हटा दीजिये l

प्रेरित पौलुस फिलिप्पी के मसीहियों को मसीह के साथ सम्बन्ध में आनंद खोजने को कहा l “प्रभु में सदा आनंदित रहो; मैं फिर कहता हूँ, आनंदित रहो” (फ़िलि. 4:4) l चिंता ग्रस्त जीवन के बदले, उसने उनको हर बात के लिए प्रार्थना करने को कहा और तब परमेश्वर की शांति उनके हृदय एवं विचारों को मसीह यीशु में सुरक्षित रखेगी (पद.6-7) l

हमारे दैनिक कार्यों एवं जिम्मेदारियों में, सब कुछ आनंदायक नहीं है l किन्तु हम पूछ सकते हैं, “यह किस तरह परमेश्वर और मेरे हृदय में आनंद उत्पन्न कर सकता है? काम करने के कारण में परिवर्तन उनके विषय हमारे अहसास को रूपांतरित कर सकता है l

इसलिए हे भाइयों, जो जो बातें सत्य हैं, ... आदरणीय हैं, ... उचित हैं, ...पवित्र हैं, ... सुहावनी हैं, ... मनभावनी हैं,  अर्थात् जो भी सद्गुण और प्रशंसा की बातें हैं उन पर ध्यान लगाया करो l (पद.8) l

पौलुस के अंतिम शब्द विचार के लिए भोजन और आनंद का नुसखा है l

हमेशा उसकी देखभाल में

जिस दिन मेरी बेटी म्युनिक से बार्सिलोना विमान यात्रा कर रही थी, मैंने अपने पसंदीदा विमान खोज वेबसाइट पर उसकी यात्रा देखना चाहा l वेबसाइट पर विमान संख्या डालने पर, कंप्यूटर ने बताया कि उसका विमान ऑस्ट्रिया को पार कर उत्तरी इटली के ऊपर से जा रहा था l उसके बाद विमान को भूमध्यसागर, फ्रांस के उष्ण तटीय क्षेत्र से होकर समय से पहुंचना था l मुझे केवल ऐसा महसूस हो रहा था कि मुझे नहीं मालूम था कि उसे दिन के भोजन में क्या परोसा जा रहा था!

मैं अपनी बेटी के ठिकाने और स्थिति की चिंता क्यों कर रहा था? क्योंकि मैं उसे प्यार करता हूँ l वह कौन है, क्या कर रही है और वह जीवन में कहाँ जा रही है के विषय मैं चिंता करता हूँ l

भजन 32 में, दाऊद हमारे लिए परमेश्वर की क्षमा, मार्गदर्शन, और चिंता का उत्सव मनाता है l एक मानव पिता से हटकर, परमेश्वर हमारे जीवनों का हर अंश और हमारे हृदयों की स्थायी ज़रूरतें जानता है l प्रभु की प्रतिज्ञा है, “मैं तुझे बुद्धि दूँगा, और जिस मार्ग में तुझे चलना होगा उस में तेरी अगुवाई करूँगा; मैं तुझ पर कृपादृष्टि रखूँगा और सम्मति दिया करूँगा” (पद.8) l

हम आज अपनी हर परिस्थिति में, परमेश्वर की उपस्थिति और देखभाल में भरोसा कर सकते हैं क्योंकि “जो यहोवा पर भरोसा रखता है वह करुणा से घिरा रहेगा” (पद.10) l

सम्बन्धित शीर्षक

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आप नहीं हैं

दाऊद ने योजना बनायी, फर्नीचर अभिकल्पित किया, सामग्री इकट्ठा किया, समस्त प्रबंध किया (देखें 1 इतिहास 28:11-19) l किन्तु यरूशलेम का प्रथम मंदिर दाऊद का नहीं, सुलेमान का मंदिर कहलाता है l

क्योंकि परमेश्वर ने कहा था, “तू घर बनवाने न पाएगा” (1 इतिहास 17:4) l परमेश्वर दाऊद के पुत्र सुलेमान को मंदिर बनाने के लिए चुना था, इस इनकार का प्रतिउत्तर अनुकरणीय था l वह परमेश्वर के कार्य पर केन्द्रित रहा (पद.16-25) l उसकी आत्मा धन्वादित थी l उसने सम्पूर्ण प्रयास किया और मंदिर बनाने में योग्य लोगों से सुलेमान की मदद करवायी (देखें 1 इतिहास 22) l

बाइबिल टीकाकार जे. जी, मेक्कोन्विल ने लिखा : “अक्सर हमें स्वीकार करना होगा कि मसीही सेवा के रूप में जो कार्य हम करना पसंद करेंगे, वो नहीं है जिसके लिए हम योग्य हैं, और जिसके लिए परमेश्वर हमें बुलाया है l यह दाऊद की तरह हो सकता है, कार्य का आरंभ, जो भविष्य में और भी भव्य होगा l

दाऊद ने अपनी नहीं, परमेश्वर की महिमा खोजी l उसने परमेश्वर के मंदिर के लिए विश्वासयोग्यता से सब कुछ किया, उसके लिए एक मजबूत नींव डाला जो उसके बाद कार्य को संपन्न करनेवाला था l काश हम भी, उसी तरह, परमेश्वर का चुना हुआ कार्य धन्यवादी हृदय से करें! जाहिर है कि हमारा प्रेमी परमेश्वर  “अधिक भव्य” ही करेगा l

उसका अद्भुत चेहरा

मेरा चार वर्षीय बेटा जिज्ञासु है और निरंतर बातें करता है l मुझे उससे बातें करना पसंद है, किन्तु वह अपनी पीठ मेरी ओर करके बातें करने की खेदजनक आदत बना ली है l मैं अक्सर कहती हूँ, “मैं तुम्हारी सुन नहीं सकती-कृपया मेरी ओर देखकर बातें करो l”

कभी-कभी परमेश्वर हमसे भी यही कहता है-इसलिए नहीं कि वह सुन नहीं सकता, किन्तु हम वास्तव में “उसे देखे बिना” उससे बातचीत करना चाहते हैं l हम प्रार्थना करते समय अपने प्रश्नों में उलझकर और स्वकेन्द्रित रहकर, भूल जाते हैं किससे प्रार्थना कर रहे हैं l मेरे बेटे की तरह, हम उसकी ओर केन्द्रित हुए बिना प्रश्न करते हैं जिससे हम बातचीत कर रहे हैं l

हम, परमेश्वर कौन है और उसने क्या किया है, के विषय खुद को याद दिलाकर अपने अनेक चिंताओं को संबोधित कर सकते हैं l केवल पुनः केन्द्रित होकर, ही हम उसके चरित्र को जानकर सुख पाते हैं : कि वह प्रेमी, क्षमाशील, प्रभु, और अनुग्रहकारी है l

भजनकार का विश्वास था कि हम परमेश्वर का मुख निरंतर निहारें (भजन 105:4) l  दाऊद द्वारा अगुओं को उपासना और प्रार्थना के लिए नियुक्ति पर, उसने लोगों को परमेश्वर के चरित्र की प्रशंसा करने और उसके पूर्व विश्वासयोग्यता की चर्चा करने को उत्साहित किया (1 इतिहास 16:8-27) l

परमेश्वर का खूबसूरत चेहरा निहारने पर, हम सामर्थ्य और सुख पाते हैं जो हमें हमारे अनुत्तरित प्रश्नों के मध्य भी संभालता हैं l

सुख का पलना

मेरी सहेली ने मुझे अपने चार दिन की बेटी को गोद में लेने का सौभाग्य दिया l बच्चावह मेरे गोद में आने के बाद ही हलचल करने लगा l मैंने उसे दुलारा, अपने गाल उसके सिर से लगाया, और उसे चुप करने के लिए हिलाते हुए एक गीत गुनगुनाने लगी l इन प्रयासों के साथ, दस वर्षों के अपने लालन-पालन अनुभव के बाद भी, मैं उसे शांत न कर सकी l मैंने उसे उसकी अधीर माँ के बाहों में डालने तक वह अत्यंत परेशान रही l तुरन ही वह शांत हो गई; उसका रोना बंद हो गया और उसकी बेचैनी उसके भरोसेमंद सुरक्षा में तब्दील हो गई l  मेरी सहेली अपनी बेटी को गोद लेना और उसकी परेशानी दूर करना जानती थी l

परमेश्वर अपने बच्चों को माता की तरह सुख देता है : कोमल, भरोसेमंद, और बच्चे को शांत करने में चिन्ताशील l हमारे थकित अथवा परेशान होने पर, वह हमें अपनी बाहों में उठाता है l हमारा पिता और सृष्टिकर्ता होकर, वह हमें निकटता से जानता है l “जिसका मन तुझ में धीरज धरे हुए है, उसकी तू पूर्ण शांति के साथ रक्षा करता है, क्योंकि वह तुझ पर भरोसा रखता है” (यशा. 26:3) l

जब हमें संसार का भारी बोझ दबाए, हम इस ज्ञान में सुख पाते हैं कि वह प्रेमी अभिभावक की तरह हमें अर्थात् अपने बच्चों को सुरक्षित रखता और उनके लिए लड़ता है l