पिता और पुत्र
मेरे पिता एक अच्छे पिता थे, और, अधिकतर सभी बातों में, मैं आज्ञाकारी पुत्र था l किन्तु मैंने अपने पिता को एक बात से वंचित रखा जो मैं दे सकता था यानी अपने आप को l
वे एक शांत व्यक्ति थे; मैं भी बराबर से शांत था l परस्पर बिना बातचीत किये हुए हम अक्सर घंटों तक साथ- साथ काम करते थे l वे कभी नहीं पूछते थे; मैंने उनको अपनी गहरी इच्छाएँ और महत्वकांक्षाएँ, अपनी आशाएं और भय कभी नहीं बताए l
समय रहते हुए मैंने अपनी चुप्पी तोड़ी l शायद मेरे बड़े बेटे के जन्म के बाद मुझे अनुभूति हुयी, या जब, एक-एक करके, मेरे पुत्र इस संसार में खो गए l अब मेरी चाहत है काश मैं अपने पिता के लिए उनके बेटा समान होता l
मैं उन सारी बातों के विषय सोचता हूँ जो मैं उन्हें बता सकता था l और सब बातें जो वह मुझे बता सकते थे l उन्हें दफनाने के समय मैं उनके शव पेटी के निकट खड़ा होकर, अपनी भावनाओं को समझने में संघर्ष कर रहा था l “अब बहुत देर हो चुकी है, हैं न?” मेरी पत्नी धीमे से बोली l “बिलकुल,” मैंने कहा l
मेरा सुख इस तथ्य में है कि हम स्वर्ग में बातों को ठीक कर लेंगे, क्योंकि क्या वह स्थान नहीं जहां हर एक आँसू पोछा जाएगा? (प्रकाशितवाक्य 21:4) l
यीशु में विश्वासियों के लिए, मृत्यु स्नेह का अंत नहीं है किन्तु अनंत अस्तित्व का आरम्भ जहां कोई भी ग़लतफ़हमी नहीं होगी; सम्बन्ध ठीक हो जाएंगे और प्रेम हमेशा बढ़ता जाएगा l वहाँ पर, पुत्रों का मन माता-पिता की ओर और माता-पिता का मन पुत्रों की ओर फिरेगा (मलाकी 4:6) l
सर्वोत्तम
मछुआरों की एक कहानी बतायी जाती है जो पूरे दिन मछली पकड़ने के बाद स्कॉटलैंड के एक होटल में इकट्ठे हुए l जब एक मछुआरा अपने मित्रों से मछली पकड़ने की एक घटना का वर्णन कर रहा था, उसका हाथ मेज़ पर रखी एक कांच की गिलास से टकराया और टूटा गिलास दीवार से टकराकर सफ़ेद दीवार पर एक दाग छोड़ गया l वह व्यक्ति अपनी गलती स्वीकार कर होटल के मालिक को उस हानि की भरपाई करना चाही, किन्तु वह कुछ करने में असमर्थ था; दीवार ख़राब हो चुकी थी l निकट बैठे एक व्यक्ति ने कहा, “चिंता न करें l” उठकर, उसने अपने पॉकेट से एक चित्रकारी उपकरण निकालकर उस कुरूप दाग़ के चारों ओर कुछ बनाने लगा l धीरे-धीरे एक शानदार बारहसिंगा का सिर उभर आया l वह व्यक्ति स्कॉटलैंड के सर्वश्रेष्ठ प्राणी कलाकार, सर ई. एच. लैंडसिअर थे l
भजन 51 का लिखनेवाला इस्राएल का प्रसिद्ध राजा, दाऊद, अपने पापों के कारण खुद के लिए और अपने राष्ट्र के लिए लज्जा का कारण बना l उसने अपने एक मित्र की पत्नी के साथ व्यभिचार किया और मित्र की हत्या भी करवा दी-दोनों ही कृत्य मृत्यु के योग्य थे l ऐसा महसूस हो रहा था मानों उसका जीवन नष्ट हो गया हो l किन्तु उसने परमेश्वर से अनुनय-विनय की : “अपने किये हुए उद्धार का हर्ष मुझे फिर से दे, और उदार आत्मा देकर मुझे संभाल” (भजन 51:12) l
दाऊद की तरह अतीत के हमारे लज्जाजनक कार्य और उनकी यादें हमें मध्य रात्रि में परेशान करती हैं l हमें बहुत कुछ सुधारने की इच्छा होती है l
अनुग्रह है जो केवल हमें क्षमा ही नहीं करता किन्तु हमें पहले से बेहतर बनाता है l परमेश्वर कुछ भी बर्बाद नहीं करता है l
चिरस्थाई सुख
हम अक्सर सुनते हैं कि काम अपने तरीके से करो तो ही सुख मिलती है। इसमें कुछ सच्चाई नहीं है। ऐसी मानसिकता से केवल ख़ालीपन, चिंता और दिल दुखाता है।
खालीपन भरने के लिए भोग विलास में पड़े लोगों के विषय में कवि डब्लू एच ऑदेन लिखते हैं: "अँधेरे के डर से भटके लोग / जो न खुश न भले हैं।"
हमारे डर और दुख के उपाय में भजनकार गाता है, "मैं यहोवा के पास...। " (भजन संहिता 34:4)। सुख कार्य को परमेश्वर के तरीके में करने से मिलती है, इस तथ्य की पुष्टि हर दिन की जा सकती है। "जिन्होंने उसकी ओर...(पद 5);"I इसे आजमाने पर हम जानेंगे कि उनके कहने का यही अर्थ था कि "परखकर देखो कि यहोवा कैसा भला है!"(पद 8)।
हम कहते हैं, "देखना विश्वास है।" देखकर हम इस दुनिया के बारे में जानते हैं। प्रमाण दो और मैं विश्वास करूंगा। इसे परमेश्वर दूसरी तरह से कहते हैं, विश्वास करना देखना है "परखो और फिर तुम देखोगे।"
प्रभु के वचन पर विश्वास करो। वह करो जो परमेश्वर आप से करने को कह रहे हैं और आप देखेंगे कि वह सही करने का आपको अनुग्रह और उससे भी बढ़कर स्वयं को–जो सब भलाई का एकमात्र स्रोत हैं-दे देंगे और साथ ही चिरस्थाई सुख भी।
हमारे समान पापी
मेरी एक मित्र है जिसका नाम इडिथ है l उसने मुझे उस दिन के विषय बताया जिस दिन उसने यीशु के पीछे चलने का निर्णय लिया था l
इडिथ धर्म का परवाह नहीं करती थी l किन्तु एक दिन वह अपने घर के निकट स्थित चर्च में गयी क्योंकि वह अपनी असंतुष्ट आत्मा की तृप्ति के लिए कुछ ढूँढ़ रही थी l उस दिन का बाइबल वचन लूका 15:1-2 था, जिसे पास्टर ने किंग जेम्स अनुवाद से पढ़ा : “सब चुंगी लेनेवाले और पापी उसके पास आया करते थे ताकि उसकी सुनें l पर फरीसी और शास्त्री कुड़कुड़ाकर कहने लगे, “यह तो पापियों से मिलता है और उनके साथ खाता भी है l”
वहाँ पर यही लिखा था, किन्तु इडिथ ने कुछ और सुना : यह तो पापियों के साथ इडिथ से भी मिलता है l” वह अपने सीट पर सीधे बैठ गयी! आखिरकार उसने अपनी गलती मान ली, किन्तु वह विचार कि यीशु पापियों से मिलता है और उसमें इडिथ भी शामिल है, उसके मन में चल रहा था l वह सुसमाचार पढ़ने लगी, और जल्द ही उसमें विश्वास करके उसकी शिष्या बन गयी l
यीशु के दिनों के धार्मिक लोग इस वास्तविकता से अपमानित होते थे कि वह पापी, और बुरे लोगों के साथ खाता पीता था l उनका नियम ऐसे लोगों के साथ उनको सहभागिता रखने के लिए मना करता था l यीशु ने मनुष्यों द्वारा बनाए गए नियमों की परवाह नहीं करता था l उसने दीन-हीन व्यक्तियों को अपने पास बुलाया, चाहे वे कितनी ही दूर चले गए हों l
यह आज भी सच है, और आप जानते हैं : यीशु पापियों को बुलाता है और (आपका नाम शामिल है) l
आपका जुनून क्या है?
मेरे बैंक का एक गणक(teller) अपनी खिड़की पर शेल्बी कोबरा गाड़ी का फोटोग्राफ लगा रखा है l (फोर्ड मोटर कम्पनी द्वारा निर्मित कोबरा एकउच्च-प्रदर्शन मोटर-गाड़ी है l)
एक दिन बैंक में व्यवसाय सम्बंधित लेन-देन करते समय, मैंने उनसे पूछा कि क्या वह उनकी कार थी l उनका उत्तर था, “नहीं,” यह मेरा जुनून है, प्रतिदिन सुबह उठकर काम पर जाने का कारण l एक दिन मेरे पास भी यह गाड़ी होगी l”
मैं इस युवा व्यक्ति का जुनून समझ सकता हूँ l मेरे एक मित्र के पास कोबरा गाड़ी थी, और एक बार मैंने भी उसे चलाया था! यह सचमुच करने का इरादा रखने वाली गाड़ी है! किन्तु संसार में और सब वस्तुओं की तरह, कोबरा गाड़ी का जुनून व्यर्थ है l जो लोग परमेश्वर के अलावा अन्य वस्तुओं पर भरोसा रखते हैं, वे भजनकार के अनुसार “झुक [जाएंगे] और गिर [पड़ेंगे] (भजन 20:8) l
इसलिए कि हम परमेश्वर के लिए रचे गए हैं और बाकी बातें व्यर्थ हैं अर्थात् एक ऐसा सच जिसे हम अपने दैनिक अनुभव में प्रमाणित करते हैं : हम ये वस्तु या वह वस्तु खरीदते हैं क्योंकि हमारी सोच है कि ये वस्तुएं हमें खुशी देंगी, किन्तु हम एक बच्चे की तरह जो क्रिसमस के एक दर्जन से अधिक उपहार पाता है, खुद से पूछते हैं, “क्या इतना ही है?” हमेशा कुछ न कुछ कम ही होता है l
ये संसार हमें कुछ नहीं दे सकता अर्थात् बहुत अच्छी वस्तुएं भी जो हमें तृप्त कर सकें l उनमें एक सीमा तक ही आनंद है, किन्तु हमारी ख़ुशी जल्द ही समाप्त हो जाती है (1 यूहन्ना 2:17 l वास्तव में, सी.एस.लयूईस कहते हैं “परमेश्वर खुद से बाहर हमें ख़ुशी और शांति दे नहीं सकता है l और यह बिलकुल सच है l
चेहरे
जब हमारी पौत्री सारा छोटी थी, उसने मुझे समझाया कि मृत्यु के बाद क्या होता है : “केवल आपका चेहरा स्वर्ग जाता है, आपका शरीर नहीं l आपको नया शरीर मिलता है, किन्तु चेहरा वही होता है l”
वास्तव में, हमारे अनंत की स्थिति के विषय में सारा का विचार एक बच्चे की समझ थी, किन्तु वह एक विशेष सच्चाई समझ गयी थी l एक अर्थ में, हमारे चेहरे अदृश्य आत्मा का दृश्य प्रतिबिम्ब है l
मेरी माँ कहती थी कि किसी दिन क्रोधित रूप मेरे चेहरे पर ठहर जाएगा l वह अपने ज्ञान से बुद्धिमान थी l एक चिंतित ललाट, हमारा क्रोधित चेहरा, हमारी आँखों में एक कुटिल दृष्टि एक दयनीय आत्मा को दर्शाती है l दूसरी ओर, झुर्री, दाग़, और अन्य कुरूपता के बावजूद दयालु आँखें, एक कोमल दृष्टि, स्नेही और स्वागत करनेवाली मुस्कराहट आंतरिक रूपांतरण के चिन्ह बन जाते हैं l
जिस चेहरे के साथ हम जन्म लिए हैं उसके विषय में हम अधिक कुछ नहीं कर सकते हैं, किन्तु हम जिस तरह के व्यक्ति बन रहे हैं उसके विषय ज़रूर कुछ कर सकते हैं l हम नम्रता, धीरज, दयालुता, धीरज, कृतज्ञता, क्षमा, शांति, और प्रेम के लिए प्रर्थना कर सकते हैं (गलातियों 5:22-26) l
परमेश्वर की सहायता से, और उसके नाम में, आप और मैं अपने प्रभु के आंतरिक स्वरुप में बढ़ते जाएं, एक सादृश्यता जो दयालु, वृद्ध चेहरे में झलकता है l इसलिए, जिस तरह अंग्रेजी कवी जॉन डॉन (1572-1631) ने कहा है, कि उम्र “आखिरी दिन में सबसे खुबसूरत” हो जाती है l
प्रतिज्ञाओं पर अटल
मेरे मित्र के भाई ने अपनी बहन को, जब वे दोनों छोटे थे, भरोसा दिलाया कि यदि वह “विश्वास” करेगी तो उसे ऊपर थामने के लिए एक छाते में प्रयाप्त ताकत है l इसलिए “विश्वास से” उसकी बहन अनाजघर के छत से कूद गयी, जिससे उसे थोड़ी चोट लग गयी l
परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार करता है l किन्तु हम इस बात को भली रीति से जान लें कि हम प्रतिज्ञा को अपनाते समय परमेश्वर के वास्तविक वचन पर अटल हैं, क्योंकि केवल उसी स्थिति में परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा अनुसार देगा अथवा करेगा l विश्वास में खुद उतनी ताकत नहीं है l वह तब सार्थक होता है जब वह परमेश्वर से प्राप्त स्पष्ट और अमिश्रित प्रतिज्ञा पर आधारित है l इसके अलावा सब कुछ केवल ख़याली पुलाव है l
यहाँ एक स्पष्ट उदाहरण है : परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की है, “… जो चाहो मांगो और वह तुम्हारे लिए हो जाएगा l मेरे पिता की महिमा इसी से होती है कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेंरे चेले ठहरोगे” (यूहन्ना 15:7-8) l ये पद ऐसी प्रतिज्ञा नहीं हैं कि परमेश्वर मेरी हर निवेदन का उत्तर देगा किन्तु ऐसी प्रतिज्ञा कि वह धार्मिकता की हमारी हर चाहत का प्रतिउत्तर देगा, जिसे पौलुस आत्मा के फल” संबोधित करता है (गला. 5:22-23) l यदि हम पवित्रता के लिए भूखे और प्यासे होते हैं, वह हमें तृप्त करेगा l इसमें समय लगेगा; क्योंकि मानवीय प्रौढ़ता की तरह ही, आत्मिक प्रौढ़ता धीरे-धीरे होता है l हार न मानें l परमेश्वर से आपको पवित्र बनाने के लिए निवेदन करते रहें l उसके अपने समय और गति में “वह तुम्हारे लिए हो जाएगा l” परमेश्वर ऐसी प्रतिज्ञाएँ नहीं करता है जिसे वह पूरी नहीं कर सकता l
प्रतीक्षा का स्थान
"प्रतीक्षा चाहे मछली के जाल में फंसने की, पतंगबाजी में हवा के रुख की या शुक्रवार शाम की हो....हर कोई प्रतीक्षा कर रहा है"-बाल-पुस्तक लेखक डॉक्टर सिउस।
जीवन का बड़ा भाग प्रतीक्षा के बारे में है,परंतु परमेश्वर उतावले नहीं होते। कहावत है, “परमेश्वर का अपना अवसर और अपना विलम्ब होता है”। इसलिए हम प्रतीक्षा करें।
प्रतीक्षा कठिन बात है। हम अंगूठा मोड़ते, पैर बदलते, उबासी को दबाते, लंबी आहें भरते, और हताश होकर चिंतित होते हैं। इतने अजीब व्यक्ति के साथ क्यों रहूं, इतना कठिन कार्य, इतना उलझन भरा व्यवहार, इतनी लाइलाज बीमारी! परमेश्वर कुछ करते क्यों नही? परमेश्वर का उत्तर:"थोड़ा ठहर और देख मैं क्या करूंगा"।
प्रतीक्षा जीवन की शिक्षिका है, इसमें हम...प्रतीक्षा के गुण को सीखते हैं-जब परमेश्वर हममें और हमारे लिए कार्य करते हैं तो प्रतीक्षा करें। प्रतीक्षा हमारे धीरज और परमेश्वर की भलाई और करुणा पर भरोसा करने की क्षमता को बढ़ाते हैं, भले ही बातें हमारे अनुरूप ना हों (भजन संहिता 70: 5)।
परंतु प्रतीक्षा का अर्थ उदासीन होना या दांत पीसना नहीं। प्रतीक्षा करते हुए हम “हर्षित और [उनमें] अनन्दित हो सकते हैं (पद 4)। हम इस आशा में प्रतीक्षा करते हैं कि परमेश्वर हमें उचित समय में छुड़ा लेंगे-इस जीवन में या अगले मेंI परमेश्वर उतावली नही करते वरन वो सदा समय पर होते हैं।
एक विरासत छोड़ना
कुछ साल पहले मैंने अपने बेटों के साथ सलेमोन, इडाहो की "रिवर ऑफ नो रिटर्न" नामक नदी पर स्थिति एक परित्यक्त फार्म में एक सप्ताह बिताया।
एक दिन फार्म पर टहलते समय मैंने एक पुरानी कब्र देखी। वहाँ काठ पर लिखी लिखावट अब मिट चुकी थी। कोई, जो जीवित था और मर गया-अब भुलाया जा चुका है। कब्र की जगह दुखद थी। घर पहुंचकर उस पुराने फार्म के इतिहास के बारे में जानने की मैंने कोशिश की। परन्तु उस व्यक्ति के बारे में कोई जानकारी ना मिली।
कहावत है कि सबसे उत्तम लोगों को लगभग सौ साल याद किया जाता है। हम बाकियों को जल्द भुला दिया जाता है। पिछली पीढ़ियों की यादें हमारी लिखावट के समान जल्द मिटने लगती है। तो भी हमारी विरासत परमेश्वर के परिवार के माध्यम से आगे पारित होती आई है। परमेश्वर से और दूसरों से हम अपने जीवन में कैसे से प्रेम करते हैं, बस वह बाकि रह जाता है। मलाकी 3:16-17 हमें बताता है, जो यहोवा का भय मानते...।
पौलुस ने दाऊद के बारे में कहा कि क्योंकि दाऊद तो...(प्रेरितों के काम 13:36)। उसके समान हम भी परमेश्वर से प्रेम करें और हमारी पीढ़ी में उसकी सेवा करें और स्मरण को उन्हीं पर छोड़ दें। “वे मेरे निज भाग ठहरेंगे,” यहोवा की वाणी है।