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Articles by लिन्डा वाशिंगटन

परम संतोष

एक बाइबल स्कूल कार्यक्रम में बच्चों को नाश्ता बांटते हुए, हमने एक बच्चे को लालच से  अपना नाश्ता खाते देखा l फिर उसने बच्चों का छोड़ा हुआ नाश्ता भी खा लिया l वह पोपकोर्न का एक बड़ा पैकेट प्राप्त करने के बाद भी संतुष्ट नहीं हुआ l अगुआ होने के कारण हम चिंतित थे कि क्यों यह छोटा लड़का इतना भूखा था l

मेरे मन में यह विचार आया कि हम भी अपनी भावनाओं के सम्बन्ध में उस छोटे लड़के की तरह हो सकते हैं l हम अपनी गहरी इच्छाओं की संतुष्टि के लिए रास्ता ढूंढते हैं, किन्तु हमें पूरी तरह संतुष्ट करने वाली वस्तु नहीं मिलती है l नबी यशायाह भूखे लोगों को बुलाता है, “आओ . . .  मोल लो और खाओ” (यशायाह 55:1) l किन्तु उसके बाद पूछता है, “जो भोजनवस्तु नहीं है, उसके लिए तुम क्यों रुपया लगाते हो, और जिस से पेट नहीं भरता उसके लिए क्यों परिश्रम करते हो ? (पद.2) l यशायाह यहाँ पर केवल शारीरिक भूख की बात नहीं करता है l परमेश्वर हमारी आत्मिक और भावनात्मक भूख को अपनी उपस्थिति की प्रतिज्ञा से संतुष्ट कर सकता है l पद 3 में “सदा की वाचा” 2 शमूएल 7:8-6 में परमेश्वर द्वारा दाऊद को दी गयी प्रतिज्ञा याद दिलाती है l दाऊद के परिवार से, एक उद्धारकर्ता  लोगों को परमेश्वर के साथ जोड़ने के लिए आएगा l बाद में, यूहन्ना 6:35 में और 7:37 में, यीशु ने यशायाह का ही निमंत्रण देकर, खुद को यशायाह और दूसरे नबियों द्वारा बताया गया उद्धारकर्ता कहा l

आप भूखे हैं? परमेश्वर आपको पास आकर उसकी उपस्थिति से भर जाने का नेवता देता है l

बिगड़ा न्याय

मैं सड़क पर चलते हुए और हाथ में फ़ोन पकड़े हुए किसी पर भी दोष लगा देती हूँ l वे किस तरह उन कारों से बेखबर रह सकते हैं जो उनको टक्कर मार सकते हैं?  क्या वे अपनी सुरक्षा नहीं देखते हैं?  मैंने खुद से बोला है l किन्तु एक दिन, मैं एक गली का रास्ता पार करते समय, इतना अधिक टेक्स्ट मेसेज में डूबी हुई थी, कि मैं अपनी बाँयी ओर से आती हुई कार को देख न सकी l संयोग से मैं बच गयी, चालक ने मुझे देख लिया और तुरन्त गाड़ी रोक दी l किन्तु मैं शर्मिंदा हो गयी l मेरा स्वधर्मी होकर दूसरों में दोष ढूढ़ना मुझे ही परेशान करने लगा l मैंने दूसरों में दोष खोजा था, और अब मैं ही दोषी थी l

मेरा पाखंड वही सोच थी जिसे यीशु ने अपने पहाड़ी उपदेश में संबोधित किया था : “हे कपटी, पहले अपनी आँख में से लट्ठा निकाल ले, तब तू अपने भाई कि आँख का तिनका भली भांति देखकर निकाल सकेगा”(मत्ती 7:5) l मेरी आँख में एक बड़ा “लट्ठा” – एक अंध बिंदु थी जिसमें से होकर मैंने अपने कमज़ोर न्याय से दूसरों का न्याय किया l

यीशु ने यह भी कहा, “जिस प्रकार तुम दोष लगते हो, उसी प्रकार तुम पर भी दोष लगाया जाएगा” (7:2) l उस दिन उस चालक का चिढ़ा हुए चेहरा याद करके, जिसने मेरे उसकी गाड़ी के सामने आने पर अचानक अपनी गाड़ी रोकनी पड़ी थी, मुझे भी ताकीद मिलती है कि लोग मुझे अपने फोन में मगन देखकर परेशान होते होंगे l

हममें से कोई पूर्ण नहीं है l किन्तु कभी-कभी मैं भूल जाती हूँ कि जल्दीबाजी में मुझे दूसरों पर दोष नहीं लगाना चाहिए l हम सभों को परमेश्वर का अनुग्रह चाहिए l

पिता की सलाह

“सम्पादकीय कार्य से मुक्त होने के बाद, मैंने परमेश्वर से एक नये कार्य के लिए प्रार्थना की l और नेटवर्किंग और आवेदन करने के मेरे प्रयास के बाद भी कोई सकारात्मक परिणाम नहीं मिलने की स्थिति में मैं खिजने लगी l “क्या आपको पता नहीं कि मेरे लिए नौकरी महत्वपूर्ण है?” यह महसूस करते हुए कि मेरी प्रार्थना सुनी नहीं गयी है, मैंने परमेश्वर से अपनी दोनों बाहें विरोध में मोड़ कर पूछा l

जब मैंने अपने पिता से, जिन्होंने मेरी नौकरी के विषय परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करने के विषय मुझे अक्सर याद दिलाया था, बातें की, तो उनका उत्तर था, “मेरी इच्छा है कि तुम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करने की स्थिति में पहुँच जाओ l”

मेरे पिता की सलाह मुझे नीतिवचन 3 याद दिलाती है, जिसमें एक प्रिय बच्चे को एक अभिभावक की सलाह सम्मिलित है l यह परिचित परिच्छेद विशेषकर मेरी स्थिति के अनुकूल था : “तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन् सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना l उसी को स्मरण करके सब काम करना, तब वह तेरे लिए सीधा मार्ग निकलेगा” (नीतिवचन 3:5-6) l “सीधा मार्ग निकालेगा” का अर्थ है कि वह हमारी उन्नत्ति के लिए अपने लक्ष्य की ओर हमारा मार्गदर्शन करेगा l उसका अंतिम लक्ष्य है कि मैं और भी उसके समान बन जाऊं l

इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके द्वारा चुना गया मार्ग सरल होगा l किन्तु मैं उस पर भरोसा कर सकती हूँ कि उसका मार्गदर्शन और समय अंततः मेरी भलाई के लिए ही होगा l

क्या आप उत्तर के लिए परमेश्वर के समक्ष ठहरे हुए हैं? उसके निकट रहने का चुनाव करें और भरोसा करें कि वह आपका मार्गदर्शन करेगा l

एक नया समुदाय

मेरी सहेली कैरी की पांच वर्षीय बेटी, माइजा का खेल के समय के विषय अलग तरीका था l वह अलग-अलग गुड़ियों को मिलाकर उनका एक अलग समूह बनाती थी l कल्पना के संसार में, सब कुछ को एक साथ लाया जा सकता है l गुड़ियाँ उसकी थीं l उसका मानना है कि अलग-अलग आकार और प्रकार के बावजूद भी साथ रहने से वे सभी सबसे अधिक प्रसन्न रहती हैं l

परमेश्वर की रचनात्मकता मुझे कलीसिया के विषय उसका उद्देश्य याद दिलाता है l लूका कहता है, पिन्तेकुस्त के दिन “आकाश के नीचे की हर एक जाति में से भक्त यहूदी यरूशलेम  में रह रहे थे” (प्रेरितों 2:5) l यद्यपि ये लोग भिन्न संस्कृति से आते थे और अलग-अलग भाषा बोलते थे, पवित्र आत्मा के आगमन ने उन्हें एक नूतन समुदाय बना दिया, अर्थात् कलीसिया l उसके बाद से, वे एक देह कहलाने वाले थे, जिन्हें यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान ने एक किया था l

इस नए देह के अगुए लोगों का एक समूह अर्थात् चेले थे जिन्हें यीशु ने इस पृथ्वी पर रहते हुए जोड़ा था l  यदि यीशु उन्हें नहीं जोड़ा होता, तो ऐसा बहुत हद तक संभव था कि वे एक समूव बन ही नहीं पाते l अब और लोग भी अर्थात् “तीन हज़ार” (2:41) मसीह के अनुयायी बन गए l पवित्र आत्मा को धन्यवाद, जो एक समय विभाजित समूह थे अब “उनकी सब वस्तुएं साझे में थीं” (पद.44) l जो कुछ उनके पास था वह एक दूसरे के साथ बांटने के लिए तैयार थे l

आज भी पवित्र आत्मा मानव समूहों के बीच अंतर को पाट रहा है l हर समय हमारे विचार समान नहीं होंगे, न ही हमारी समझ l किन्तु मसीह के विश्वासी होने के कारण, हम एक दूसरे के अंग है l

जब एक दुख पाता है, सब दुख पाते हैं

मेरे सहकर्मी ने दर्द के कारण अवकाश लेने पर कार्यालय में सब चिंतित थे। उपचार के बाद उसने वापस आकर हमें दर्द की जड़ दिखाई- वह पथरी थी। मुझे वर्षों पूर्व अपने गॉल्ब्लैडर की पथरी याद आ गई जिसका दर्द बेहद कष्टदायी था।

इतनी छोटी चीज़ देह को इतनी पीड़ा दे सकती है? पौलुस ने 1कुरिन्थियों 12:26 में कहा, “इसलिये यदि एक अंग...”। पौलुस ने दुनिया भर के मसीहियों के लिए ‘देह’ का प्रयोग किया है।  "परमेश्वर ने देह को...",( पद 24)  यहाँ पौलुस मसीह की समस्त देह की बात कर रहे थे-सब मसीही। हम सभी के अलग वरदान और भूमिकाएं हैं। परंतु हम एक देह के अंग हैं इसलिए जब एक दुखी होता है तो सब दुखी होते हैं। जब एक सताव, दुख या परीक्षाओं में पड़ता है, तो हमें भी यूं कष्ट होता है मानो चोट हमें लगी है, दर्द मानो हम अनुभव कर रहे हैं।

मेरे सहकर्मी को वह मदद लेनी पड़ी जिसकी उसे आवश्यकता थी। मसीह की देह में दूसरे का दर्द हममें करुणा जगाता है और कुछ करने के लिए बाध्य करता है। हम प्रार्थना कर सकते हैं, प्रोत्साहन के शब्द कह सकते हैं या उपचार प्रक्रिया में मदद करने के लिए जो संभव हो वह कर सकते हैं। देह इसी प्रकार मिल कर काम करती है।

मुझे चट्टान पर ले चलो

वायु को नम रखने वाला उपकरण खरीदते समय मेरी भेंट एक स्त्री से हुई जो शायद वही उपकरण लेने स्टोर में आई थी। शीघ्र ही हम आपस में अपने शहर में चल रहे फ्लू वायरस के बारे में बात करने लगे जिसके कारण उसे सर्दी नजला और सरदर्द हो गया था। वह कड़वे शब्दों में वायरस के अतिक्रमण की निंदा कर रही थी। मैं असमंजस में, चुपचाप सुनती जा रही थी । नाराज़ और निराश ही वह स्टोर से निकल गई। अफ़सोस, उसकी पीड़ा कम करने के लिए मैं कुछ न कर सकी!

परमेश्वर के समुख अपने क्रोध और निराशा को व्यक्त करने के लिए दाऊद ने भजन लिखे। वह जानता था कि परमेश्वर न केवल सुनेंगे परन्तु उसके दर्द के लिए कुछ करेंगे। उसने लिखा, मूर्छा खाते समय...(भजन संहिता 61:2-3)।

जब हमें या किसी अन्य को पीड़ा हो, तो दाऊद के अच्छे उदाहरण का अनुसरण कर सकते हैं। उस चट्टान पर, जो हमसे ऊंची है, हम जा सकते हैं या किसी को वहाँ ले जा सकते हैं। काश, मैंने उस स्त्री को परमेश्वर के विषय में बाताया होता। यदि परमेश्वर हमारा दर्द कम न भी करें तो भी उनकी शांति में हम विश्राम पा सकते हैं। वे हमें आश्वासन देते हैं कि वह हमारी पुकार सुनते हैं।

समस्याओं के समय में स्तुति करना

यह "कैंसर" है। जब माँ ने कहा तो मन पक्का करने की कोशिश पर भी मेरे आंसू छलक आए। उन शब्दों को कोई नहीं सुनना चाहेगा। कैंसर के साथ माँ का तीसरी बार सामना था। उनकी बाँह के नीचे एक घातक ट्यूमर हुआ था।

 

अय्यूब के समान। जिसने अपनी संतान, संपत्ति और स्वास्थ्य खो दिए थे। परन्तु यह सुनने के बाद,  वह “भूमि पर गिरा और दण्डवत् किया"। परमेश्वर को शाप देने की सलाह पर उसने कहा, “क्या हम जो परमेश्वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें” (2:10)?  यद्यपि अय्यूब ने बाद में शिकायत की, पर अंततः स्वीकार किया कि परमेश्वर कभी बदले नहीं थे। अय्यूब जानता था कि परमेश्वर अब भी उसके साथ थे और वह अब भी उसकी परवाह करते थे।

 “समस्याओं में प्रशंसा करने की हममें से अधिकांश की प्रारंभिक प्रतिक्रिया नहीं होती। कभी तो भय या क्रोध से हम बौखला उठते हैं। परन्तु माँ की प्रतिक्रिया देखकर मुझे याद आया कि परमेश्वर अब भी उपस्थित हैं, अभी भी अच्छे हैं। वह कठिन समय से हमारी मदद करेंगे।

एक क्रोधित परमेश्वर?

कॉलेज में ग्रीक और रोमन माइथोलॉजी के अध्ययन से मैं हैरान थी कि कथाओं में कैसे मूडी और तुरंत नाराज़ हो जाने वाले देव थे। उनके क्रोध और कभी-कभी एक सनक पर लोगों के जीवन नष्ट हो जाते थे।

यह सोच कर मुझे हंसी आई कि ऐसे देवताओं पर कोई कैसे विश्वास कर सकता है। तब मैंने अपने आप से पूछा, क्या वास्तविक परमेश्वर के प्रति मेरे विचार भिन्न हैं? जब मैं संदेह करती हूं क्या मैं उन्हें आसानी से क्रोधित हो जाने वाले परमेश्वर के रूप में नहीं देखती? अफसोस है, हाँ।

मैं परमेश्वर से किए मूसा के अनुरोध की सराहना करती हूं कि "मुझे अपना तेज दिखा दे।" (निर्गमन 33:18) उनके विरुद्ध कुडकुडा रहे लोगों की अगुवाई करने के लिए चुने जाने पर, मूसा जानना चाहता था कि इस महान कार्य में क्या परमेश्वर वास्तव में उसकी मदद करेंगे। उत्तर में परमेश्वर ने अपनी महिमा और अपने नाम और विशेषताएं प्रकट कीं। यहोवा, ईश्वर दयालु...। (34:6) वे क्रोध में अचानक घात करने वाले परमेश्वर नहीं हैं। वे मुझे अपने जैसा ही बनाने के लिए लगातार कार्यरत हैं।

परमेश्वर और उनकी महिमा को हमारे प्रति उनके संयम में हम देख सकते हैं, किसी मित्र के प्रोत्साहन भरे शब्द में, सुंदर सूर्यास्त में, या मन में पवित्र आत्मा के धीमे स्वर में।

परमेश्वर की सहायता से

मैं जैसे-जैसे बूढ़ी हो रही हूँ, मैं विशेषकर सर्दियों के मौसम में जोड़ों का दर्द महसूस करती हूँ l मैं खुद को विजेता कम और एक वरिष्ठ नागरिक की चुनौतियों से अधिक पराजित महसूस करती हूँ l

इसलिए मेरा हीरो एक बूढ़ा व्यक्ति कालेब है अर्थात् वह भेदिया जिसे मूसा ने कनान यानि प्रतिज्ञात देश का भेद लेने भेजा था (गिनती 13:-14) l जब दूसरे भेदियों ने बुरा रिपोर्ट दिया, कालेब और यहोशू बारहों में से ऐसे दो भेदिये थे जिनके रिपोर्ट के आधार पर परमेश्वर ने उनको प्रतिज्ञात देश में जाने को कहा l अब, यहोशू 14 में, वह समय आ गया जब देश में कालेब को उसका भाग मिलना है l  किन्तु अभी भी शत्रु हैं जिन्हें देश से बाहर करना है l कालेब ने न  खुद सेवा छोड़ना चाहता था और न ही युद्ध को अपनी युवा पीढ़ी के हाथों में छोड़ना चाहता था l इसलिए उसने कहा, “तू ने तो उस दिन सुना होगा कि उसमें अनाक्वंशी रहते हैं, और बड़े बड़े गढ़वाले नगर भी हैं; परन्तु क्या जाने संभव है कि यहोवा मेरे संग रहे, और उसके कहने के अनुसार मैं उन्हें उनके देश से निकाल दूँ” (यहोशू 14:12) l

“कि यहोवा मेरे संग रहे l” इसी तरह का मनोभाव कालेब को युद्ध के लिए तैयार रखा l वह अपनी सामर्थ्य और अपने बुढ़ापे की बजाए परमेश्वर पर केन्द्रित था l परमेश्वर उसे ज़रूरी काम करने में मदद करनेवाला था l

हममें से अनेक लोग एक ख़ास उम्र के बाद कोई बड़ा काम नहीं करना चाहते हैं l किन्तु चाहे हम कितने भी बूढ़े हो जाएं हम परमेश्वर के लिए महान कार्य कर सकते हैं l जब कालेब की तरह अवसर हमारे सामने आते हैं, हमें उनसे दूर नहीं भागना है l परमेश्वर की सहायता से हम जीत सकते हैं!