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Articles by लिन्डा वाशिंगटन

बच्चों के मूँह से

दस वर्ष की विओला को एक पेड़ की शाखा को एक माइक्रोफोन की तरह इस्तेमाल करके एक प्रचारक की नक्ल करते हुए देखने के बाद, मिशेल ने विओला को एक गाँव में प्रचार के दौरान “प्रचार करने” का मौका देने का निर्णय किया। विओला ने स्वीकार कर लिया। दक्षिण सूडान में एक मिशनरी, मिशेल ने लिखा, “भीड़ भावविभोर हो गई...एक छोटी बच्ची जिसे छोड़ दिया गया था, उनके सामने राजाओं के राजा की बेटी के रूप में अधिकार के साथ खड़ी हुई और सामर्थ के साथ परमेश्वर के राज्य के बारे में बताया। आधी भीड़ यीशु को स्वीकार करने के लिए आगे आई” (मिशेल पैरी, लव हैज़ ए फेस ) ।

उस दिन उस भीड़ ने एक बच्चे को प्रचार करते हुए सुनने की आशा नहीं की थी। यह घटना मन में एक ही वाक्य ले कर आती है, “बच्चों और दूध पिउवों के मुँह से” जो भजन संहिता 8 में पाया जाता है दाऊद ने लिखा, “तू ने अपने बैरियों के कारण बच्‍चों और दूध पिउवों के द्वारा सामर्थ्य की नींव डाली है, ताकि तू शत्रु और पलटा लेनेवालों को रोक रखे” (पद 2)। बाद में मत्ती 21:16 में यीशु ने इस पद का सन्दर्भ दिया, जब महायाजकों और शास्त्रियों ने यरूशालेम के मन्दिर में बच्चों के यीशु की प्रशंसा करने की आलोचना की। इन अगुवों के लिए बच्चे एक सरदर्द थे। इस पवित्रशास्त्र के अंश का सन्दर्भ देने के द्वारा यीशु ने दर्शाया कि परमेश्वर ने इन बच्चों की प्रशंसा को गम्भीरता से लिया। उन्होंने वही किया जो वे अगुवे करने के लिए अनिच्छुक थे: इच्छित मसीह को महिमा देना। 

 जैसे विओला और मन्दिर के बच्चों ने दर्शाया, परमेश्वर एक बच्चे को भी अपनी महिमा करवाले के लिए इस्तेमाल कर सकता है। उनके इच्छित हृदयों से प्रशंसा का एक झरना बह निकला।

मन:स्थिति बनाने वाला

जब मैं अपने सप्ताह भर के आने-जाने के समय में एक बार ट्रेन के स्टेशन पर प्रतीक्षा कर रहा था, तो कुछ नकारात्मक विचारों से मेरा मस्तिष्क भर गया, जैसे की यात्री ट्रेन में चढ़ने के लिए लाईन में खड़े हैं-ऋण के तनाव में, मुझे कहे गए बुरे शब्द, निसहायता में या परिवार के किसी सदस्य के साथ हाल ही में हुए अन्याय का सामना करते हुए। जब तक ट्रेन आई, मैं बहुत ही विचलित मन:स्थिति में थी।

ट्रेन में, एक दूसरा विचार मेरे मन में आया: परमेश्वर को एक नोट लिखूँ और उसे मेरे दुःख के बारे में बताऊँ। जल्द ही जब मैंने अपने विचारों को अपने जनरल में लिख डाला, तो उसके बाद मैंने अपना फोन निकाला और उसमें स्तुति के गीतों को सुनना शुरू कर दिया। और कुछ ही समय में बुरी मन:स्थिति पूरी तरह से बदल गई। 

मुझे नहीं पता था कि मैं भजनकार 94 के नमूने का पालन कर रही थी। भजनकार ने पहले अपनी शिकायतों को उंडेल डाला: “हे पृथ्वी के न्यायी, उठ; और घमण्डियों को बदला दे... कुकर्मियों के विरुद्ध मेरी ओर कौन खड़ा होगा? मेरी ओर से अनर्थकारियों का कौन सामना करेगा?” (भजन संहिता 94:2, 16)। जब उसने परमेश्वर से बात की तो उसने विधवाओं और अनाथों के साथ हुए अन्याय के बारे में कुछ बचाकर नहीं रखा। एकबार जब उसने परमेश्वर को अपना दुःख बता दिया, तो वह भजन स्तुति की ओर चला गया: “परन्तु यहोवा मेरा गढ़, और मेरा परमेश्‍वर मेरी शरण की चट्टान ठहरा है” (पद 22)।

परमेश्वर हमें अपने दुःख उसे बताने के लिए बुलाता है। वह हमारे भय, उदासी और निस्सहायता को स्तुति में बदल सकता है।

प्रार्थना

मैंअपनी आंटी ग्लैडिस की बेबाक़ स्वाभाव का आदर करती हूँ यद्यपि कभी-कभी वह मेरे विषय होता है l आंटी ने ई-मेल भेजा, “कल मैंने अखरोट का पेड़ काट दिया” जिससे मैं चिंतित हुयी l
प्रार्थना का सदैव उपयोग करनेवाली मेरी आंटी छिहत्तर वर्ष की हैं! अखरोट का वह पेड़ उनके गेराज के पीछे उग गया था l जब उसके जड़ से गेराज की कंक्रीट के फटने का डर उत्पन्न हो गया, उन्होंने उसे काटने का निर्णय किया l किन्तु उन्होंने हमें बताया, “मैं उस तरह का काम करने से पूर्व प्रार्थना करती हूँ l”
इस्राएल के निर्वासन के समय फारस के राजा का पियाऊ होकर सेवा करते हुए, नहेम्याह को  यरूशलेम लौट आए लोगों के विषय खबर मिली l कुछ काम होना ज़रूरी था l “यरूशलेम की शहरपनाह टूटी हुयी, और उसके फाटक जले हुए हैं” (नहेम्याह 1:3) l टूटी दीवारों के कारण वे दुश्मनों के आक्रमण की संभावनाओं से असुरक्षित थे l नहेम्याह अपने लोगों पर तरह खाकर भागीदारी करने का मन बनाया l किन्तु प्रार्थना प्राथमिक बात थी, क्योंकि नए राजा ने पत्र भेजकर यरूशलेम के निर्माण प्रयास को रोकना चाहा था (देखें एज्रा 4) l नहेम्याह ने अपने लोगों के लिए प्रार्थना की(नहेम्याह 1:5-10), और राजा से अनुमति माँगने से पूर्व परमेश्वर से सहायता मांगी (पद.11) l
क्या प्रार्थना आपका प्रतिउत्तर है? जीवन में किसी कार्य या परीक्षा का सामना करते समय यह हमेशा सबसे अच्छा तरीका है l

परम संतोष

एक बाइबल स्कूल कार्यक्रम में बच्चों को नाश्ता बांटते हुए, हमने एक बच्चे को लालच से  अपना नाश्ता खाते देखा l फिर उसने बच्चों का छोड़ा हुआ नाश्ता भी खा लिया l वह पोपकोर्न का एक बड़ा पैकेट प्राप्त करने के बाद भी संतुष्ट नहीं हुआ l अगुआ होने के कारण हम चिंतित थे कि क्यों यह छोटा लड़का इतना भूखा था l

मेरे मन में यह विचार आया कि हम भी अपनी भावनाओं के सम्बन्ध में उस छोटे लड़के की तरह हो सकते हैं l हम अपनी गहरी इच्छाओं की संतुष्टि के लिए रास्ता ढूंढते हैं, किन्तु हमें पूरी तरह संतुष्ट करने वाली वस्तु नहीं मिलती है l नबी यशायाह भूखे लोगों को बुलाता है, “आओ . . .  मोल लो और खाओ” (यशायाह 55:1) l किन्तु उसके बाद पूछता है, “जो भोजनवस्तु नहीं है, उसके लिए तुम क्यों रुपया लगाते हो, और जिस से पेट नहीं भरता उसके लिए क्यों परिश्रम करते हो ? (पद.2) l यशायाह यहाँ पर केवल शारीरिक भूख की बात नहीं करता है l परमेश्वर हमारी आत्मिक और भावनात्मक भूख को अपनी उपस्थिति की प्रतिज्ञा से संतुष्ट कर सकता है l पद 3 में “सदा की वाचा” 2 शमूएल 7:8-6 में परमेश्वर द्वारा दाऊद को दी गयी प्रतिज्ञा याद दिलाती है l दाऊद के परिवार से, एक उद्धारकर्ता  लोगों को परमेश्वर के साथ जोड़ने के लिए आएगा l बाद में, यूहन्ना 6:35 में और 7:37 में, यीशु ने यशायाह का ही निमंत्रण देकर, खुद को यशायाह और दूसरे नबियों द्वारा बताया गया उद्धारकर्ता कहा l

आप भूखे हैं? परमेश्वर आपको पास आकर उसकी उपस्थिति से भर जाने का नेवता देता है l

बिगड़ा न्याय

मैं सड़क पर चलते हुए और हाथ में फ़ोन पकड़े हुए किसी पर भी दोष लगा देती हूँ l वे किस तरह उन कारों से बेखबर रह सकते हैं जो उनको टक्कर मार सकते हैं?  क्या वे अपनी सुरक्षा नहीं देखते हैं?  मैंने खुद से बोला है l किन्तु एक दिन, मैं एक गली का रास्ता पार करते समय, इतना अधिक टेक्स्ट मेसेज में डूबी हुई थी, कि मैं अपनी बाँयी ओर से आती हुई कार को देख न सकी l संयोग से मैं बच गयी, चालक ने मुझे देख लिया और तुरन्त गाड़ी रोक दी l किन्तु मैं शर्मिंदा हो गयी l मेरा स्वधर्मी होकर दूसरों में दोष ढूढ़ना मुझे ही परेशान करने लगा l मैंने दूसरों में दोष खोजा था, और अब मैं ही दोषी थी l

मेरा पाखंड वही सोच थी जिसे यीशु ने अपने पहाड़ी उपदेश में संबोधित किया था : “हे कपटी, पहले अपनी आँख में से लट्ठा निकाल ले, तब तू अपने भाई कि आँख का तिनका भली भांति देखकर निकाल सकेगा”(मत्ती 7:5) l मेरी आँख में एक बड़ा “लट्ठा” – एक अंध बिंदु थी जिसमें से होकर मैंने अपने कमज़ोर न्याय से दूसरों का न्याय किया l

यीशु ने यह भी कहा, “जिस प्रकार तुम दोष लगते हो, उसी प्रकार तुम पर भी दोष लगाया जाएगा” (7:2) l उस दिन उस चालक का चिढ़ा हुए चेहरा याद करके, जिसने मेरे उसकी गाड़ी के सामने आने पर अचानक अपनी गाड़ी रोकनी पड़ी थी, मुझे भी ताकीद मिलती है कि लोग मुझे अपने फोन में मगन देखकर परेशान होते होंगे l

हममें से कोई पूर्ण नहीं है l किन्तु कभी-कभी मैं भूल जाती हूँ कि जल्दीबाजी में मुझे दूसरों पर दोष नहीं लगाना चाहिए l हम सभों को परमेश्वर का अनुग्रह चाहिए l

पिता की सलाह

“सम्पादकीय कार्य से मुक्त होने के बाद, मैंने परमेश्वर से एक नये कार्य के लिए प्रार्थना की l और नेटवर्किंग और आवेदन करने के मेरे प्रयास के बाद भी कोई सकारात्मक परिणाम नहीं मिलने की स्थिति में मैं खिजने लगी l “क्या आपको पता नहीं कि मेरे लिए नौकरी महत्वपूर्ण है?” यह महसूस करते हुए कि मेरी प्रार्थना सुनी नहीं गयी है, मैंने परमेश्वर से अपनी दोनों बाहें विरोध में मोड़ कर पूछा l

जब मैंने अपने पिता से, जिन्होंने मेरी नौकरी के विषय परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करने के विषय मुझे अक्सर याद दिलाया था, बातें की, तो उनका उत्तर था, “मेरी इच्छा है कि तुम परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर विश्वास करने की स्थिति में पहुँच जाओ l”

मेरे पिता की सलाह मुझे नीतिवचन 3 याद दिलाती है, जिसमें एक प्रिय बच्चे को एक अभिभावक की सलाह सम्मिलित है l यह परिचित परिच्छेद विशेषकर मेरी स्थिति के अनुकूल था : “तू अपनी समझ का सहारा न लेना, वरन् सम्पूर्ण मन से यहोवा पर भरोसा रखना l उसी को स्मरण करके सब काम करना, तब वह तेरे लिए सीधा मार्ग निकलेगा” (नीतिवचन 3:5-6) l “सीधा मार्ग निकालेगा” का अर्थ है कि वह हमारी उन्नत्ति के लिए अपने लक्ष्य की ओर हमारा मार्गदर्शन करेगा l उसका अंतिम लक्ष्य है कि मैं और भी उसके समान बन जाऊं l

इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके द्वारा चुना गया मार्ग सरल होगा l किन्तु मैं उस पर भरोसा कर सकती हूँ कि उसका मार्गदर्शन और समय अंततः मेरी भलाई के लिए ही होगा l

क्या आप उत्तर के लिए परमेश्वर के समक्ष ठहरे हुए हैं? उसके निकट रहने का चुनाव करें और भरोसा करें कि वह आपका मार्गदर्शन करेगा l

एक नया समुदाय

मेरी सहेली कैरी की पांच वर्षीय बेटी, माइजा का खेल के समय के विषय अलग तरीका था l वह अलग-अलग गुड़ियों को मिलाकर उनका एक अलग समूह बनाती थी l कल्पना के संसार में, सब कुछ को एक साथ लाया जा सकता है l गुड़ियाँ उसकी थीं l उसका मानना है कि अलग-अलग आकार और प्रकार के बावजूद भी साथ रहने से वे सभी सबसे अधिक प्रसन्न रहती हैं l

परमेश्वर की रचनात्मकता मुझे कलीसिया के विषय उसका उद्देश्य याद दिलाता है l लूका कहता है, पिन्तेकुस्त के दिन “आकाश के नीचे की हर एक जाति में से भक्त यहूदी यरूशलेम  में रह रहे थे” (प्रेरितों 2:5) l यद्यपि ये लोग भिन्न संस्कृति से आते थे और अलग-अलग भाषा बोलते थे, पवित्र आत्मा के आगमन ने उन्हें एक नूतन समुदाय बना दिया, अर्थात् कलीसिया l उसके बाद से, वे एक देह कहलाने वाले थे, जिन्हें यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान ने एक किया था l

इस नए देह के अगुए लोगों का एक समूह अर्थात् चेले थे जिन्हें यीशु ने इस पृथ्वी पर रहते हुए जोड़ा था l  यदि यीशु उन्हें नहीं जोड़ा होता, तो ऐसा बहुत हद तक संभव था कि वे एक समूव बन ही नहीं पाते l अब और लोग भी अर्थात् “तीन हज़ार” (2:41) मसीह के अनुयायी बन गए l पवित्र आत्मा को धन्यवाद, जो एक समय विभाजित समूह थे अब “उनकी सब वस्तुएं साझे में थीं” (पद.44) l जो कुछ उनके पास था वह एक दूसरे के साथ बांटने के लिए तैयार थे l

आज भी पवित्र आत्मा मानव समूहों के बीच अंतर को पाट रहा है l हर समय हमारे विचार समान नहीं होंगे, न ही हमारी समझ l किन्तु मसीह के विश्वासी होने के कारण, हम एक दूसरे के अंग है l

जब एक दुख पाता है, सब दुख पाते हैं

मेरे सहकर्मी ने दर्द के कारण अवकाश लेने पर कार्यालय में सब चिंतित थे। उपचार के बाद उसने वापस आकर हमें दर्द की जड़ दिखाई- वह पथरी थी। मुझे वर्षों पूर्व अपने गॉल्ब्लैडर की पथरी याद आ गई जिसका दर्द बेहद कष्टदायी था।

इतनी छोटी चीज़ देह को इतनी पीड़ा दे सकती है? पौलुस ने 1कुरिन्थियों 12:26 में कहा, “इसलिये यदि एक अंग...”। पौलुस ने दुनिया भर के मसीहियों के लिए ‘देह’ का प्रयोग किया है।  "परमेश्वर ने देह को...",( पद 24)  यहाँ पौलुस मसीह की समस्त देह की बात कर रहे थे-सब मसीही। हम सभी के अलग वरदान और भूमिकाएं हैं। परंतु हम एक देह के अंग हैं इसलिए जब एक दुखी होता है तो सब दुखी होते हैं। जब एक सताव, दुख या परीक्षाओं में पड़ता है, तो हमें भी यूं कष्ट होता है मानो चोट हमें लगी है, दर्द मानो हम अनुभव कर रहे हैं।

मेरे सहकर्मी को वह मदद लेनी पड़ी जिसकी उसे आवश्यकता थी। मसीह की देह में दूसरे का दर्द हममें करुणा जगाता है और कुछ करने के लिए बाध्य करता है। हम प्रार्थना कर सकते हैं, प्रोत्साहन के शब्द कह सकते हैं या उपचार प्रक्रिया में मदद करने के लिए जो संभव हो वह कर सकते हैं। देह इसी प्रकार मिल कर काम करती है।

मुझे चट्टान पर ले चलो

वायु को नम रखने वाला उपकरण खरीदते समय मेरी भेंट एक स्त्री से हुई जो शायद वही उपकरण लेने स्टोर में आई थी। शीघ्र ही हम आपस में अपने शहर में चल रहे फ्लू वायरस के बारे में बात करने लगे जिसके कारण उसे सर्दी नजला और सरदर्द हो गया था। वह कड़वे शब्दों में वायरस के अतिक्रमण की निंदा कर रही थी। मैं असमंजस में, चुपचाप सुनती जा रही थी । नाराज़ और निराश ही वह स्टोर से निकल गई। अफ़सोस, उसकी पीड़ा कम करने के लिए मैं कुछ न कर सकी!

परमेश्वर के समुख अपने क्रोध और निराशा को व्यक्त करने के लिए दाऊद ने भजन लिखे। वह जानता था कि परमेश्वर न केवल सुनेंगे परन्तु उसके दर्द के लिए कुछ करेंगे। उसने लिखा, मूर्छा खाते समय...(भजन संहिता 61:2-3)।

जब हमें या किसी अन्य को पीड़ा हो, तो दाऊद के अच्छे उदाहरण का अनुसरण कर सकते हैं। उस चट्टान पर, जो हमसे ऊंची है, हम जा सकते हैं या किसी को वहाँ ले जा सकते हैं। काश, मैंने उस स्त्री को परमेश्वर के विषय में बाताया होता। यदि परमेश्वर हमारा दर्द कम न भी करें तो भी उनकी शांति में हम विश्राम पा सकते हैं। वे हमें आश्वासन देते हैं कि वह हमारी पुकार सुनते हैं।