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Articles by एमी पिटरसन

नए जीवन का मुर्ख मार्ग

कुछ चीजें जब तक आप उनको अनुभव न करें बिलकुल समझ में नहीं आती हैं l जब मैं अपने पहले बच्चे के साथ गर्भवती थी, तो मैंने बच्चे के जन्म के बारे में कई किताबें पढ़ीं और दर्जनों महिलाओं से उनकी प्रसव पीड़ा की कहानियाँ सुनीं l लेकिन मैं अभी भी वास्तव में कल्पना नहीं कर सकती थी कि अनुभव कैसा होगा l मेरा शरीर जो करने वाला था वह असंभव लग रहा था!

1 कुरिन्थियों में पौलुस लिखता है कि परमेश्वर के राज्य में जन्म लेना, उद्धार जो परमेश्वर मसीह के द्वारा हमें देता है, समान रूप से उनके लिए समझ से परे है जिन्होंने उसका अनुभव नहीं किया है l यह कहना “मुर्खता” सी लगती है कि क्रूस के द्वारा उद्धार मिल सकता था – निर्बलता, हार और अपमान द्वारा चिन्हित एक मृत्यु l फिर भी यह “मुर्खता” ही वह उद्धार था पौलुस ने जिसका प्रचार किया!

यह ऐसा नहीं था जिसकी कोई कल्पना कर सकता है l कुछ लोगों ने सोचा कि उद्धार एक मजबूत राजनैतिक नेता या एक चमत्कारी संकेत के द्वारा आयेगा l दूसरों ने सोचा कि उनकी अपनी शैक्षिक या दार्शनिक उपलब्धियां उनका उद्धार बनेंगी (1 कुरिन्थियों 1:22) l लेकिन परमेश्वर ने सभी को इस तरह से उद्धार दिलाकर आश्चर्यचकित कर दिया, जो केवल उन लोगों की समझ में आता है जिन्होंने इसे अनुभव किया l

परमेश्वर ने कुछ शर्मनाक और दुर्बल वस्तु लिया – क्रूस पर एक मृत्यु – और उसे बुद्धिमत्ता और सामर्थ्य का आधार बना दिया l परमेश्वर अकल्पनीय करता है l वह जगत के मूर्खों और निर्बलों को चुनता है कि ज्ञानवानों को लज्जित करे (पद.27) l

और उसका चकित करनेवाले, असंगत तरीके हमेशा ही सर्वोत्तम तरीके होते हैं l

हस्तांतरित प्रेम

मेरी बेटी नैन्सी ड्रियू (एक जासूसी उपन्यास श्रृंखला) से मोहित हो गयी है l पिछले तीन हफ़्तों में, उसने कम से कम एक दर्जन उपन्यास पढ़े, जिसमें एक जासूस लड़की का वर्णन है l वह जासूसी कहानियों से अपने लगाव/प्रेम को ईमानदारी से दर्शाती है : मैं जब छोटी थी उस समय  भी इन पुस्तकों से प्रेम करती थी, और नीली जिल्द वाली प्रतियां जो मेरी माँ 1960 के दशक में पढ़ती थी अभी भी उनके घर के एक शेल्फ में सजी हुई हैं l

इस स्नेह को स्थानांतरित होते देख मुझे आश्चर्य होता है कि मैं और क्या स्थानांतरित कर रहा हूँ l तीमुथियुस को लिखे अपने दूसरे पत्र में, पौलुस ने लिखा है कि जब उसने तीमुथियुस के बारे में सोचा, तो उसे “निष्कपट विश्वास” याद आया जो तीमुथियुस की दादी और माँ में था l मुझे आशा है कि रहस्यों/जासूसी से प्रेम के साथ, मेरी बेटी विश्वास की विरासत भी प्राप्त कर रही है – और वह सेवा” भी करेगी जैसे उसके नाना-नानी ने भी की है, कि वह प्रार्थना करेगी, और कि वह “उस जीवन की प्रतिज्ञा के अनुसार जो मसीह यीशु में है” थामे रहेगी l (2 तीमुथियुस 1:1) l

मैं यहाँ उन लोगों के लिए भी आशा रखता हूँ जिनके पास यीशु को जानने वाले माता-पिता या नाना-नानी/दादा-दादी नहीं हैं l यद्यपि तीमुथियुस के पिता का उल्लेख नहीं किया गया है, पौलुस तीमुथियुस को अपना “प्रिय पुत्र” (पद.2) कहता है l जिन लोगों के पास विश्वास स्थानांतरित करने वाले परिवार नहीं है, वे अभी भी चर्च में माता-पिता और दादा-दादी/नाना-नानी ढूंढ सकते हैं – ऐसे लोग जो हमें यह जानने में मदद करेंगे कि “पवित्र जीवन” (पद.9) कैसे जिया जाए, और परमेश्वर द्वारा दिए गए “सामर्थ्य और प्रेम और संयम” के उपहारों को ग्रहण किया जाए l हमें (पद.7) l सचमुच, हम सभी के पास एक सुन्दर विरासत है l

अपने आँसू परमेश्वर के पास ले जाएँ

पिछली गर्मियों में, तलेक्वा(Talequah) नामक एक व्हेल (मछली) ने जन्म दिया l हत्यारे व्हेल(killer whales) तलेक्वा जलीय स्तनधारियों (aquatic mammals) का समूह लुप्तप्रायः (endangered) था, और उसका नवजात भविष्य के लिए उनकी आशा थी l लेकिन उसका बच्चा एक घंटे से कम तक जीवित रहा l दुःख के इस दृश्य में जिसे दुनिया भर के लोग देख रहे थे, तलेक्वा ने अपने मृत बच्चे को छोड़ने से पहले सत्रह दिनों तक प्रशांत महासागर के ठन्डे पानी में धकेलती रही l
कभी-कभी मसीह में विश्वासियों को यह जानने में कठिनाई होती है कि दुःख के साथ क्या किया जाए l शायद हम डरते हैं कि हमारा दुःख आशा की कभी की तरह दिख सकता है l लेकिन बाइबल हमें मनुष्यों के कई उदाहरण देती है जो दुःख में परमेश्वर को पुकारते हैं l विलाप और आशा दोनों एक वफादार प्रतिक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं l
विलापगीत पांच कविताओं की पुस्तक है जो उन लोगों के दुःख को व्यक्त करती है जो अपना घर खो चुके हैं l वे दुश्मनों द्वारा अहेर किये गए थे और मृत्यु के निकट थे (3:52-54). और वे रोते हैं और भगवान् से न्याय करने के लिए पुकारते हैं( पद.64) l वे परमेश्वर से न्याय लाने के लिए रोते और उसको पुकारते हैं l वे परमेश्वर को इसलिए नहीं पुकारते हैं कि उन्होंने आशा खो दी है, परन्तु इसलिए कि वे भरोसा करते हैं कि परमेश्वर सुन रहा है l और जब वे पुकारेंगे, परमेश्वर अवश्य ही निकट आता है (पद. 57) l
हमारे संसार में और अपने जीवन में टूटी वस्तुओं के विषय विलाप करना गलत नहीं है l परमेश्वर हमेशा सुन रहा है, और आप निश्चित हो सकते हैं की परमेश्वर स्वर्ग से नीचे देखेगा और आपको देखेगा l

आपके मांगने से पहले ही

मेरे मित्र रॉबर्ट और कॉलिन ने दशकों तक एक स्वस्थ विवाह का अनुभव किया है, और मुझे उन्हें बातचीत करते हुए देखना अच्छा लगता है l रात्री भोजन के समय मांगने से पहले ही उनमें से एक आगे बढ़कर दूसरे को मक्खन देगा l दूसरा बिलकुल ठीक समय पर गिलास को भर देगा l जब वे कहानी बताएँगे, वे एक दूसरे के वाक्यों को पूरा करते हैं l कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि वे एक दूसरे के मन को पढ़ सकते हैं l 

यह तसल्लीदायक है कि परमेश्वर जानता है और किसी भी व्यक्ति की तुलना में जिसे हम जानते हैं और प्रेम करते हैं हमारी अधिक देखभाल करता है l जब नबी यशायाह आनेवाले राज्य में परमेश्वर और उसके लोगों के बीच संबंध का वर्णन करता है, तो वह एक कोमल, अन्तरंग रिश्ता का वर्णन करता है l परमेश्वर अपने लोगों के बारे में कहता है, “उनके पुकारने से पहले ही मैं उनको उत्तर दूंगा, और उनके मांगते ही मैं उनकी सुन लूँगा” (यशायाह 65:24) l 

लेकिन यह कैसे सच हो सकता है? ऐसी चीजें हैं जिनके विषय बिना प्रत्युत्तर प्राप्त किये मैंने सालों तक प्रार्थना की है l मेरा मानना है कि जैसे-जैसे हम परमेश्वर के साथ अंतरंगता में बढ़ते हैं, अपने दिलों को उसके साथ जोड़ते हैं, हम उसके समय और देखभाल पर भरोसा करना सीख सकते हैं l हम वही इच्छा करना शुरू कर सकते हैं जो परमेश्वर चाहता है l जब हम प्रार्थना करते हैं, तो हम अन्य चीजों में से उन चीजों को मांगते हैं जो परमेश्वर के राज्य का हिस्सा हैं जैसा कि यशायाह 65 में वर्णित है : दुःख का अंत (पद.19) l सभी लोगों के लिए सुरक्षित घर और भर पेट भोजन और सभी के लिए अर्थपूर्ण काम (पद.21-23) l स्वाभाविक संसार में शांति (पद.25) l जब परमेश्वर का राज्य अपने पूर्णता में आएगा, तब परमेश्वर पूर्ण रूप से इन प्रार्थनाओं का उत्तर देगा l 

कछुआ के साथ इंतज़ार

हर शरद् ऋतु में, जब पेंटेड कछुआ(Painted Turtle - एक प्रजाति का कछुआ) को सर्दी आने का अहसास होता है, वह अपने आप को मिट्टी और कीचड़ में दफ़न करते हुए तालाब की तलहटी में पहुँचा देती है l वह अपने कवच में सिमट जाती है और शांत हो जाती है : उसकी हृदय गति धीमी हो जाती है l उसके शरीर का तापमान गिरता है, जमाव बिंदु से ठीक ऊपर रहता है l वह साँस लेना बंद कर देती है, और इंतज़ार करती है l छह महीने तक, वह दफ़न रहती है, और उसका शरीर उसकी हड्डियों से कैल्शियम को उसके रक्तप्रवाह में छोड़ता है, जिससे वह धीरे-धीरे अपने आकार को भी खोने लगती है l 

लेकिन जब तालाब का बर्फ पिघलेगा, वह फिर से तैरेगी और साँस लेगी l उसकी हड्डियों में सुधार होगा, और वह अपने कवच पर सूरज की गर्मी महसूस करेगी l 

जब मैं परमेश्वर के इंतज़ार के बारे में भजनकार के विवरण को पढ़ती हूँ, तो मैं पेंटेड कछुआ के विषय सोचती हूँ l भजनकार “दलदल” की “कीच” में पड़ा है, परन्तु परमेश्वर उसकी सुनता है (भजन 40:2) l परमेश्वर उसे बाहर निकालता है, और उसे खड़े होने के लिए एक दृढ़ स्थान देता है l वह गाता है, परमेश्वर “मेरा सहायक और छुड़ानेवाला है” (पद.17) l 

शायद ऐसा महसूस होता है कि आप सदा से कुछ चीज़ के बदलने के लिए इंतज़ार कर रहे हैं – अपनी जीविका में एक नयी दिशा के लिए, एक रिश्ते को बहाल करने के लिए, एक बुरी आदत को तोड़ने के लिए इच्छाशक्ति के लिए, या एक कठिन परिस्थिति से छुटकारे के लिए l पेंटेड कछुआ और भजनकार हमें परमेश्वर में भरोसा करने के लिए याद दिलाने के लिए यहाँ हैं : वह सुनता है, और वह छुटकारा करेगा l 

हृदय पर लिखित

एक प्रोफेसर के तौर पर, मुझे अक्सर छात्रों द्वारा उनके लिए सिफारिश पत्र लिखने के लिए कहा जाता है – नेतृत्व के पदों, विदेश में अध्ययन कार्यक्रमों, स्नातक स्कूलों और यहाँ तक कि नौकरियों के लिए l प्रत्येक पत्र में, मेरे पास छात्र के चरित्र और योग्यता की प्रशंसा करने का एक मौका होता है l

जब प्राचीन संसार में मसीही यात्रा करते थे, वे अपनी कलीसियाओं से इसी प्रकार की “सिफारिस की पत्रियाँ” लेकर चलते थे l इस तरह के पत्र सुनिश्चित करते थे कि यात्री भाई या बहन की पहुनाई की जाएगी l

जब प्रेरित पौलुस ने कुरिन्थुस की कलीसिया से बात की उसे सिफारिस के पत्र की ज़रूरत नहीं थी – वे उसे जानते थे l इस कलीसिया को लिखी अपनी दूसरी पत्री में, पौलुस ने लिखा कि उसने मन की सच्चाई से, और व्यक्तिगत लाभ के लिए उपदेश नहीं दिया था (2 कुरिन्थियों 2:17) l लेकिन तब उसने सोचा कि क्या उसके पाठक यह सोचेंगे कि उपदेश देने में अपने इरादों का बचाव करने के लिए, वह खुद के लिए एक सिफारिश पत्र लिखने की कोशिश कर रहा था l

उसने कहा, कि उसे इस प्रकार की पत्री की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि कुरिन्थुस की कलीसिया के लोग खुद सिफारिश की पत्री की तरह थे l उनके जीवनों में मसीह का दृश्य कार्य एक पत्री की तरह था “जो स्याही से नहीं परन्तु जीवते परमेश्वर के आत्मा से” लिखा गया था (3:3) l उनका जीवन सच्चे सुसमाचार की गवाही देते थे जो पौलुस ने उन्हें सुनाया था – उनका जीवन सिफारिश की पत्रियाँ थीं जिन्हें “सभी मनुष्य [पहिचान] और [पढ़ सकते थे]” (3:2) l जब हम यीशु का अनुसरण करते हैं, यह हमारे लिए भी सच है – हमारा जीवन सुसमाचार की अच्छाई की कहानी बताता है l  

परमेश्वर की बातें

बारना समूह द्वारा 2018 में किये गए एक अध्ययन में पाया गया कि अधिकाँश अमरीकी परमेश्वर के बारे में बात करना पसंद नहीं करते हैं l केवल सात फीसदी अमरीकी लोगों का कहना है कि वे नियमित रूप से आध्यात्मिक मामलों के बारे में बात करते हैं – और अमेरिका में यीशु में व्यवहारिक विश्वासीउतने भिन्न नहीं है l केवल तेरह फीसदी नियमित रूप से चर्च जानेवाले कहते हैं कि वे सप्ताह में एक बार आध्यात्मिक बातचीत करते हैं l 

शायद यह आश्चर्य की बात नहीं है कि आध्यात्मिक बातचीत गिरावट पर है l परमेश्वर के बारे में बात करना खतरनाक हो सकता है l चाहे एक ध्रुवीकृत(polarized) राजनितिक माहौल के कारण, क्योंकि असहमति किसी सम्बन्ध में दरार पैदा कर सकती है, या क्योंकि एक आध्यात्मिक बातचीत से आपको अपने जीवन में बदलाव की आवश्यकता का अहसास हो सकता है – ये उच्च स्तर की बातचीत की तरह महसूस हो सकते हैं l

लेकिन परमेश्वर के लोगों को दिए गए निर्देशों में, इस्राएली, व्यवस्थाविवरण की पुस्तक में, परमेश्वर के बारे में बात करना रोजमर्रा की ज़िन्दगी का एक सामान्य, स्वभाविक हिस्सा हो सकता है l परमेश्वर के लोगों को उनके शब्दों को याद करना और उन्हें उन जगहों पर प्रदर्शित करना था जहाँ वे अक्सर देखे जाते थे l व्यवस्था में कहा गया है कि अपने बच्चों के साथ जीवन के लिए परमेश्वर के निर्देशों के बारे में बात करें “घर में बैठे मार्ग पर चलते, लेटते-उठते” (11:19) l

परमेश्वर हमें बातचीत करने के लिए बुलाता है l एक मौका ले लें, आत्मा पर भरोसा करें, और अपनी छोटी सी बात को और गहरा करने की कोशिश करें l परमेश्वर हमारे समुदायों को आशीष देगा क्योंकि हम उसके शब्दों के बारे में बात करते हैं और उनका अभ्यास करते हैं l

प्रेमोत्सव

एक डैनिश फिल्म बैबेट फीस्ट (Babette’s Feast) में, एक तटीय गाँव में एक फ्रांसीसी शरणार्थी दिखाई देता है l समाज के धार्मिक जीवन की अगुआई करनेवाली, दो वृद्ध बहनें, उसे अपने घर के भीतर ले जाती हैं और चौदह वर्ष के लिए बैबेट उनकी सेविका के रूप में काम करती है l जब बैबेट ढेर सारा पैसा कमा लेती हैं वह बारह लोगों की मंडली को अपने साथ असाधारण फ्रांसीसी भोजन और बहुत कुछ और खाने को आमंत्रित करती है l

एक भोजन खाने के बाद दूसरा भोजन खाना आरंभ करते के दौरान, अतिथि सुस्ताते हैं; कुछ लोग क्षमा पाते हैं, कुछ प्रेम को फिर से जागृत पाते हैं, और कुछ लोग उन आश्चर्यक्रमों को याद करने लगते हैं जो उन्होंने देखे थे और सच्चाइयाँ जो उन्होंने बचपन में सीखे थे l “याद करें कि हमें क्या सिखाया गया था?” वे कहते हैं l “छोटे बच्चे, एक दूसरे से प्यार करो l” जब भोजन समाप्त होता है, बैबेट बहनों को बताती है कि उसने भोजन पर अपना सब कुछ खर्च दिया l उसने सब कुछ दे दिया – जिसमें पेरिस में प्रसिद्द रसोइया के अपने पुराने जीवन में लौटने का कोई अवसर भी शामिल था – इसलिए कि भोजन खाने वाले उसके मित्र अपने हृदयों को खुला महसूस कर सकें l

यीशु धरती पर एक अजनबी और सेवक के रूप में आया, और उसने सब कुछ दे दिया ताकि हमारी आत्मिक भूख संतुष्ट हो जाए l युहन्ना रचित सुसमाचार में, वह अपने सुननेवालों को याद दिलाता है कि जब उनके पूर्वज मरुभूमि में भूखे भटक रहे थे, परमेश्वर ने बटेर और रोटी का प्रबंध किया (निर्गमन 16) l उस भोजन ने थोड़े समय के लिए संतुष्ट किया, परन्तु यीशु प्रतिज्ञा करता है कि जो उन्हें “जीवन की रोटी” के रूप में ग्रहण करते हैं “हमेशा तक जीवित रहेंगे” (युहन्ना 6:48, 51) l उसका बलिदान हमारी आत्मिक लालसा को संतुष्ट करता है l

सहज उपाए

पार्क के गाइड का अनुसरण करते हुए, मैंने कुछ नोट्स लिख लिए जब वह बहामा के अतिप्राचीन जंगल के वनस्पतियों के विषय बता रहा था l उसने हमें बताया कि किन पेड़ों से दूर रहना था l उसने कहा, “जहरली लकड़ी वाले पेड़ से काला रस निकलता है जिससे दर्द करनेवाली खुजली हो जाती है l परन्तु चिंता की कोई बात नहीं है! उसका इलाज उसी के निकट वाले पौधे में है l उसने बताया, “गोंध वाले धूप/धूना के पेड़ के लाल छाल को काटकर  उसके रस को खुजली पर मल दीजिए l वह तुरंत ठीक होना शुरू हो जाएगा l”

आश्चर्य से मेरी पेंसिल गिरने से बची l मैंने उस जंगल में उद्धार की तस्वीर पाने की आशा नहीं की थी l परन्तु मैंने गोंध वाले धूप के पेड़ में यीशु को देखा l जहां भी पाप का जहर पाया जाता है वह सहज उपाए है l उस पेड़ के लाल छाल की तरह, यीशु का लहू चंगाई देता है l

नबी यशायाह समझ गया था कि मानवता को चंगाई की ज़रूरत थी l पाप की खुजली ने हमें प्रभावित की थी l यशायाह ने प्रतिज्ञा की कि हमारी चंगाई “उस दुखी पुरुष” की ओर से आने वाली थी जो हमारी दुखों को अपने ऊपर ले लेगा (यशायाह 53:3) l वह व्यक्ति यीशु था l हम बीमार थे, परन्तु मसीह हमारे बदले घायल होने को तैयार था l जब हम उस पर विश्वास करते हैं, हम पाप की बीमारी से चंगाई पाते हैं (पद.5) l जो चंगाई प्राप्त कर चुके हैं उनके समान जीना सीखने में पूरा जीवन लग सकता है अर्थात् अपने पापों को पहचानकर अपने नए मनुष्त्व के पक्ष में उनको अस्वीकार करना – परन्तु यीशु के कारण, हम कर सकते हैं l