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Articles by एमी पिटरसन

दृढ़ प्रेम

“मैं तुमसे प्यार करता हूँ!” मेरे पिता बोले जब मैं कार के दरवाजे को ज़ोर से बंद करके स्कूल की ओर चल दी l मैं छठी कक्षा में थी, और महीनों से हर सुबह एक ही स्थिति थी l स्कूल पहुँचने पर पिता कहते थे, “तुम्हारा दिन अच्छा हो! मैं तुमसे प्यार करता हूँ!” और मैं केवल कहती थी, “अलविदा l” मैं उनसे नाराज़ नहीं थी या उनकी उपेक्षा नहीं करती थी l अपने विचारों में अत्यधिक मशगूल होने के कारण मैं उनके शब्दों पर ध्यान नहीं देती थी l फिर भी, मेरे पिता का प्रेम दृढ़ बना रहा l

परमेश्वर का प्रेम ऐसा ही है – उससे भी अधिक l वह सदा स्थिर रहता है l इस प्रकार के प्रेम के लिए इब्रानी शब्द हेसेद है l पुराना नियम में यह शब्द बार-बार दोहराया गया है, और केवल भजन सहिंता 136 में छब्बीस बार! कोई भी आधुनिक शब्द इसका अर्थ स्पष्ट नहीं कर सकता है; हम इसका अर्थ “दयालुता,” “करुणा,” “दया,” या निष्ठा” लगाते हैं l हेसेद ऐसा प्रेम है जो वाचा प्रतिबद्धता पर आधारित है; प्रेम जो निष्ठावान और विश्वासयोग्य है l परमेश्वर के लोगों द्वारा पाप करने के बावजूद, वह उनसे प्रेम करने में विश्वासयोग्य था l दृढ़ प्रेम परमेश्वर के चरित्र का एक अभिन्न भाग है (निर्गमन 34:6) l

जब मैं बच्ची थी, मैं अपने पिता के प्रेम को अनुदत्त/स्वीकार्य मान लेती थी l कभी-कभी वर्तमान में भी मैं अपने स्वर्गिक पिता के प्रेम के साथ ऐसा ही करती हूँ l मैं परमेश्वर की नहीं सुनती हूँ और उत्तर नहीं देती हूँ l मैं धन्यवादी होना भूल जाती हूँ l फिर भी मैं जानती हूँ कि मेरे लिए परमेश्वर का प्रेम दृढ़ है – एक सच्चाई जो मेरे पूरे जीवन के लिए एक निश्चित आधार है l

एक मजबूत आधार

पिछली गर्मियों में हम दोनों पति-पत्नी फालिंग वॉटर(Fallingwater) घूमने गए, ग्रामीण पेन्सिल्वेनिया में एक घर जिसे वास्तुकार फ्रैंक लोयड राइट ने 1935 में अभिकल्पित किया था l मैंने ऐसा कभी नहीं देखा है l राइट जैविक/कार्बोनिक रूप से परिदृश्य से उदित होनेवाले घर को बनाना चाहता था, मानो वह वहीं पर विकसित हुआ हो - और उसने अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लिया l उसने घर को वहाँ मौजूद एक झरने के चारोंओर निर्मित किया, और निकट के चट्टान का किनारा उसके शैली दर्पण (style mirrors) के रूप में l हमारे गाइड ने हमें समझया कि निर्माण किस प्रकार सुरक्षित किया गया है : उसने बताया, "घर का सम्पूर्ण सीधा भाग शिलाखंडों पर आधारित है l"
उसके शब्दों को सुनकर, मैंने यीशु के शब्दों को याद किया जो उसने शिष्यों से कहा था l यीशु ने पहाड़ी उपदेश में उनको बताया कि उसकी शिक्षा उनके जीवनों में निश्चित आधार होगी l यदि वे उसके शब्दों को सुनकर उसका अभ्यास करेंगे, वे किसी भी तूफ़ान का सामना कर पाएंगे l इसके विपरीत, जो सुनकर उसपर नहीं चलेंगे, बालू पर घर बनाने वाले की तरह होंगे (मत्ती 7:24-27) l बाद में, पौलुस ने भी यही बात कही, कि मसीह नींव है, और हमें उसी पर टिकाऊ निर्माण करना है (1 कुरिन्थ्यों 3:11) l
जब हम यीशु की बातें सुनकर उनका अभ्यास करते हैं, हम अपने जीवनों को अटल चट्टान के बुनियाद पर बनाते हैं l शायद हमारे जीवन फालिंग वॉटर(Fallingwater), की तरह, सुन्दर और चट्टान पर टिके रहने वाला हो l

भोली भेड़, अच्छा चरवाहा

मेरा मित्र चाड ने वायोमिंग में एक वर्ष चरवाहे के रूप में बिताया l उसने कहा, "भेड़ें इतनी भोली होती हैं कि वे केवल अपने सामने की ही घास चरती हैं l" अपने सामने का पूरा घास चरने के बाद, वे घास का नया खंड नहीं ढूँढती हैं - वे कचरा खाना आरम्भ कर देंगी!"
हम हँसे, और मैं खुद से सोचने के लिए विवश हुआ कि कितनी बार बाइबल मनुष्यों की तुलना भेड़ से करती है l कोई आश्चर्य नहीं कि हमें चरवाहे की ज़रूरत है l किन्तु इसलिए कि भेड़ें इतनी भोली हैं, किसी भी चरवाहे से काम नहीं बनेगा l भेड़ों को परवाह करनेवाले चरवाहे की ज़रूरत है l जब नबी यहेजकेल ने परमेश्वर के निर्वासित लोगों को, बेबीलोन के बंधुआ, को लिखा, उसने उनकी तुलना भेड़ों से की जिनका नेतृत्व बुरे चरवाहे कर रहे थे l झुण्ड की देखभाल करने की बजाए, इस्राएल के अगुआ उनका शोषण कर रहे थे, उनसे लाभ उठा रहे थे (पद.3) और उनको जंगली पशुओं का आहार होने के लिए छोड़ दे रहे थे (पद.5) l
किन्तु वे आशा रहित नहीं थे l अच्छा चरवाहा, परमेश्वर ने, उनको शोषण करनेवाले अगुओं से छुड़ाने का वादा किया l वह उनको वापस घर लाने, हरा-भरा चारागाह, और विश्राम देने का वादा किया l वह घायलों को चंगा करेगा और खोए हुओं को खोजेगा (पद.11-16) l वह जंगली जानवरों को मिटा देगा, ताकि उसका झुण्ड सुरक्षित रहे (पद.28) l
परमेश्वर के झुण्ड के सदस्यों को कोमल देखभाल और मार्गदर्शन चाहिए l हम ऐसा चरवाहा पाकर कितने धन्य हैं जो हमें हरी चराइयों में ले चलता है! (पद.14) l

सैनिक दल के लिए गीत गाना

दोलोगों को नशीली वस्तुओं की तस्करी में दोषी पाए जाने पर एक दशक से मृत्यु पंक्ति में रखा गया था l जेल में रहते हुए उन्होंने यीशु में परमेश्वर के प्रेम को पहचान लिया, और उनका जीवन रूपांतरित हो गया l जब फायरिंग दल का सामना करने का वक्त आया, उन्होंने प्रभु की प्रार्थना बोलते हुए और “फज़ल अजीब क्या खुशलिहान” गीत गाते हुए   जल्लादों का सामना किया l उन्होंने परमेश्वर में विश्वास करने के कारण, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के द्वारा असाधारण साहस के साथ मृत्यु का सामना किया l
उन्होंने अपने उद्धारकर्ता द्वारा प्रदत्त विश्वास के नमूना का अनुसरण किया l जब यीशु को अपनी निकट मृत्यु का पता चला, उसने संध्या का कुछ समय अपने मित्रों के साथ गीत गाकर बिताया l यह अद्भुत है कि वह ऐसी स्थिति में गीत गा सकता था, किन्तु उसके द्वारा गाया गया गीत और भी अद्भुत है l उस रात, यीशु और उसके मित्रों ने फसह का भोज खाया, जिसका अंत भजन 113-118 तक की भजनों की श्रृखला से होता है और जिसे हल्लेल, कहा जाता है l उस रात मृत्यु का सामना करते हुए, यीशु ने “मृत्यु की रस्सियाँ” जो उसके चारों और थीं के विषय गाया (भजन 116:3) l फिर भी उसने परमेश्वर के विश्वासयोग्य प्रेम की प्रशंसा की(117:2) और उद्धार के लिए उसको धन्यवाद दिया (118:14) l निश्चित तौर पर उसके क्रुसीकरण से पहले इन भजनों ने उसको दिलासा दिया होगा l
परमेश्वर में उसका भरोसा इतना महान था कि अपनी मृत्यु का सामना करते हुए भी अर्थात् निर्दोष की मृत्यु!-उसने परमेश्वर का प्रेम गाने का चुनाव किया l यीशु के कारण, हम भी भरोसा कर सकते हैं कि जिसका भी हम सामना करते हैं, परमेश्वर हमारे साथ है l

एक आशा भरा विलाप

बहामास स्थित नासाऊ का क्लिफ्टन हेरिटेज नेशनल पार्क दुखद युग की याद दिलाता है। पत्थर की सीडियां तट से एक चट्टान पर जाती हैं। अठारहवीं शताब्दी में जहाज द्वारा बहामास लाए गए दास इन्हीं सीडियों से अमानवीय आचरण भरे जीवन में प्रवेश करते थे, यहाँ उनका स्मारक है। देवदार के पेड़ों पर गढ़ी स्त्रियों की मूर्तियाँ हैं जिनपर कोडों के निशान हैं, जो दासों की मातृभूमि और परिवरों की ओर मुंह किए समुद्र को निहार रही हैं।

ये मूर्तियां मुझे संसार में व्याप्त अन्याय और टूटी प्रणालियों का विलाप करने के महत्व की याद दिलाती हैं। विलाप का अर्थ यह नहीं कि हम आशाहीन हैं; परन्तु, यह परमेश्वर के साथ सच्चे होने का तरीका है। इसे मसीहियों की परिचित मुद्रा होना चाहिए; लगभग चालीस  प्रतिशत भजन विलाप के हैं, विलापगीत में परमेश्वर के लोग आक्रमणकारियों  द्वारा शहर के नाश किए जाने पर विलाप करते हैं (3:55)।

विलाप करना दुख की वास्तविकता पर एक उचित प्रतिक्रिया है, जो दुख और परेशानी में हमें परमेश्वर से जोड़ता है। अंततः जब हम अन्याय का विलाप, और स्वयं में और दूसरों में सक्रिय बदलाव की अपेक्षा करते हैं- तो विलाप आशावादी होता है।

नासाउ के मूर्ति-वृक्षों के पार्क का नाम "जेनेसिस" है-विलाप के स्थान को नए आरंभ के स्थान के रूप में जाना जाता है।

परदेशियों द्वारा दूसरे परदेशियों का स्वागत

 

जब हमदोनों पति-पत्नी मेरी ननद के निकट रहने के लिए सिएटल(अमरीकी शहर) गए, हम नहीं जानते थे  कि हम किस जगह रहेंगे या काम करेंगे l एक स्थानीय चर्च ने एक स्थान ढूंढने में हमारी सहायता की : एक किराये का घर जिसमें अनेक सोने के कमरे थे l हम एक सोने का कमरा अपने लिए रखते हुए, दूसरे कमरे अंतर्राष्ट्रीय विद्यार्थियों को दे सकते थे l अगले तीन वर्षों में, हम परदेशी होकर परदेशियों का स्वागत करते रहे : हमने समस्त संसार के लोगों के साथ अपने घर और भोजन को बाँटा l हम और हमारे साथ रहनेवालों ने दर्जनों अंतर्राष्ट्रीय विद्यार्थियों को प्रति शुक्रवार अपने घर में बाइबल अध्ययन के लिए आमंत्रित किया l

परमेश्वर के लोग घर से दूर रहने का अर्थ जानते हैं l सैंकड़ो वर्षों तक, इस्राएली पूरी तौर से  मिस्र में परदेशी और दास थे l लैव्यव्यवस्था 19 में, “अपने माता-पिता का आदर करो” और “चोरी मत करो” (पद.3,11), जैसे परिचित निर्देशों के साथ-साथ परमेश्वर ने प्रभावशाली तरीके से परदेशियों की देखभाल करना याद दिलाया, क्योंकि उन्हें मालुम था कि परदेशी और भयभीत रहने का क्या अर्थ होता है (पद.33-34) l

जबकि हम सब जो आज परमेश्वर के अनुयायी हैं, हमने वस्तुतः निर्वासित जीवन नहीं जीया है, फिर भी हम जानते हैं कि इस पृथ्वी पर “परदेशी” (1 पतरस 2:11) अर्थात् ऐसे लोग जिन्हें परदेशी होने का अनुभव मालूम है क्योंकि उनकी अंतिम निष्ठा एक स्वर्गिक राज्य की है l हमसे पहुनाई करनेवाले समुदाय का निर्माण करने को कहा गया है अर्थात् परदेशी जो परदेशियों को परमेश्वर के परिवार में आमंत्रित करते हैं l हम दोनों पति-पत्नी ने सिएटल में जिस सत्कार शील निमंत्रण का अनुभव किया, उसने हमें इसे दूसरों तक पहुँचाना सिखाया और यह परमेश्वर के परिवार का केंद्र बिंदु है (रोमियों 12:13) l

प्रेम की तस्वीर

हमारे बच्चे और मैंने एक नया दैनिक अभ्यास आरम्भ किया है l हर दिन सोते समय, हम रंगीन पेंसिल इकठ्ठा करते हैं और एक मोमबत्ती जलाते हैं l  परमेश्वर से हमारे मार्ग को प्रकाशित करने की प्रार्थना करते हुए, हम अपनी दैनिकी खोलकर दो प्रश्नों के उत्तर को चित्रित करते हैं या लिखते हैं : आज मैंने प्रेम कब प्रदर्शित किया? और आज मैंने प्रेम कब प्रगट नहीं किया?

“आरंभ से” ही पड़ोसी से प्रेम करना मसीही जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग रहा है (2 यूहन्ना 1:5) l  यूहन्ना अपनी दूसरी पत्री में अपनी मण्डली को यही लिखते हुए परमेश्वर की आज्ञाकारिता में एक दूसरे से प्रेम करने को कहता है (2 यूहन्ना 1:5-6) l यूहना की पत्री में प्रेम उसका एक पसंदीदा विषय है l उसका कहना है कि वास्तविक प्रेम का अभ्यास यह जानने का एक तरीका है कि हम “सत्य के है,” कि हम परमेश्वर की उपस्थिति में जीवन बिताते है (1 यूहन्ना 3:18-19) l जब मेरे बच्चे और मैं विचार करते हैं, हम महसूस करते हैं कि हमारे जीवनों में प्रेम साधारण कार्यों में दिखाई देता है : एक छाता को दूसरे के साथ बांटना, किसी दुखित को उत्साहित करना, या एक पसंदीदा भोजन बनाना l वे क्षण जब हम प्रेम को व्यवहारिक नहीं होने देते हैं : हम व्यर्थ बातें करते हैं, दूसरों के साथ कुछ भी नहीं बांटते हैं, या दूसरों की ज़रूरतों की अवहेलना करके अपनी खुद की इच्छा पूरी करते हैं l

रोज़ रात के समय परस्पर एक दूसरे पर ध्यान देने के द्वारा हम और भी सतर्क रहते हैं, और अपने दैनिक जीवन में पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन की ओर और भी उन्मुख होते हैं l आत्मा की सहायता से, हम प्रेम में चलना सीख रहे हैं (2 यूहन्ना 1:6) l

परमेश्वर के समान

मेरे पति के एक माह के लम्बे दौरे पर चले जाने के तुरन्त बाद मैं अपनी नौकरी, अपना घर, और अपने बच्चों की ज़रूरतों के कारण परेशान हो गयी l लिखने के एक काम की निर्धारित तिथि आ चुकी थी l घास काटने की मशीन ख़राब हो गयी थी l मेरे बच्चों के स्कूल की छुट्टी थी और वे ऊब रहे थे l मैं अकेले इतने सारे काम कैसे कर पाऊँगी?

शीघ्र ही मैंने महसूस किया कि मैं अकेले नहीं हूँ l चर्च से मित्रगण सहायता करने पहुँच गए l जोश घास काटने की मशीन को ठीक करने आ गया l जॉन दिन का भोजन लेकर आया l कैसिडी कपड़े धोने में मेरी मदद कर दी l एबी ने मेरे बच्चों को अपने बच्चों के संग खेलने के लिए बुला ले गयी ताकि मैं काम पूरा कर सकूँ l परमेश्वर ने इन मित्रों द्वारा मेरा प्रबंध कर दिया l ये लोग पौलुस द्वारा रोमियों 12 में वर्णित समुदाय के जीवित रूप थे l उनका प्रेम निष्कपट था (पद.9) l वे अपनी ज़रूरतों से अधिक दूसरों की ज़रूरतों का ध्यान रखते थे(पद.10) l उन्होंने मेरी ज़रूरतों में मेरी मदद करके आतिथ्य किया (पद.13) l

उस प्रेम के कारण जो मेरे मित्रों ने मुझसे किया, मैं “आशा में आनंदित” और “क्लेश में स्थिर”(पद.12) रह सकी, चाहे मुझे थोड़ी परेशानी सहकर एक महीने तक अकेले ही बच्चों की देखभाल करनी पड़ी l मसीह में मेरे भाई और बहन मेरे लिए “परमेश्वर के समान” बन गए l उन्होंने मुझसे निष्कपट प्रेम किया जो हमें सभी से करना चाहिए, विशेषकर विश्वासियों के साथ (गलातियों 6:10) l मैं उनकी तरह बनना चाहती हूँ l 

आरम्भ से पहले

“किन्तु यदि परमेश्वर का कोई आरंभ और अंत नहीं है, और वह हमेशा से है, तो वह हमें बनाने से पूर्व क्या कर रहा था? वह अपना समय किस तरह व्यतीत कर रहा था?” जब हम परमेश्वर के अनंत स्वभाव के विषय बात करते हैं, कुछ अपरिपक्व सन्डे स्कूल विद्यार्थी उपरोक्त प्रश्न ज़रूर पूछते हैं l मेरा उत्तर होता था कि यह थोड़ा रहस्यमय है l किन्तु हाल ही में मैंने सीखा कि बाइबल हमें इस प्रश्न का उत्तर देती है l

यूहन्ना 17 में जब यीशु अपने पिता से प्रार्थना करता है, वह कहता है “हे पिता, . . . तू ने जगत की उत्पत्ति से पहले मुझ से प्रेम रखा”(पद.24) l यह वह परमेश्वर है जिसे यीशु ने हम पर प्रगट किया : इससे पूर्व कि वह सृष्टि की रचना करता अथवा उस पर राज्य करता, परमेश्वर एक पिता होकर पवित्र आत्मा के द्वारा अपने पुत्र से प्रेम करता था l जब यीशु का बप्तिस्मा हुआ, परमेश्वर ने अपनी आत्मा को एक कबूतर के रूप में भेजा और बोला, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ”(मत्ती 3:17) l परमेश्वर के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी मूल सच्चाई ही यह अप्रत्याशित, जीवनदायी प्रेम है l

यह हमारे परमेश्वर के विषय कितनी खुबसूरत और उत्साहवर्धक सच्चाई है! यह त्रिएक परमेश्वर अर्थात् पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा द्वारा आपस का, स्वेच्छाचारी प्रेम है जो परमेश्वर के स्वभाव को समझने की कुंजी है l समय के आरम्भ से पूर्व परमेश्वर पिता क्या कर रहा था? अपनी आत्मा द्वारा अपने पुत्र से प्रेम कर रहा था l परमेश्वर प्रेम है (1 यूहन्ना 4:8), और यह तस्वीर हमें इसका अर्थ समझने में सहायता करती है l