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Articles by शेरिडन योयता

बदला नहीं लेना

किसान अपने ट्रक में चढ़कर सुबह अपने फसल का निरीक्षण करने गया l जब वह अपनी सम्पत्ति के अंतिम छोर पर पहुँचा, उसका खून खौलने लगा l किसी ने उसके फार्म के एकान्तता का उपयोग──फिर से── अवैध रूप से अपना कूड़ा फेंकने के लिए किया था l 

जब वह अपने ट्रक में बचे हुए भोजन के बैग्स भर रहा था, किसान को एक लिफाफा मिला l उसके ऊपर दोषी का पता अंकित था l यहाँ एक अवसर था जिसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता था l उस रात वह दोषी के घर तक अपना ट्रक लेकर गया और केवल उसका नहीं अपना कूड़ा भी वहां फेंक कर आया!

कुछ लोगों का कहना है, बदला लेना मीठा होता है, लेकिन क्या यह सही है? 1 शमूएल 24 में, दाऊद और उसके लोग हत्यारा राजा शाऊल से बचने के लिए एक गुफा में छिपे हुए थे l जब शाऊल भी उसी गुफा में शौच करने गया, तो दाऊद के लोगों ने देखा कि यह अवसर बदला लेने के लिए इतना अच्छा था कि इसे जाने नहीं दिया जाना चाहिए (पद.3-4) l लेकिन दाऊद इस इच्छा के विरुद्ध बदला लेना न चाहा l वह . . . कहने लगा, “यहोवा न करे कि मैं अपने प्रभु से जो यहोवा का अभिषिक्त है, ऐसा काम करूँ” (पद.6) l जब शाऊल को पता चला कि दाऊद ने उसके जीवन को बक्श दिया है, वह शक्की हो गया l “तू मुझ से अधिक धर्मी है,” वह चिल्लाया (पद.17-18) l 

जब हम या हमारे प्रिय लोग अन्याय का सामना करते हैं, दोषी से बदला लेने के अवसर आ सकते हैं l क्या हम ऐसी इच्छा के सामने घुटने टेक देंगे, जैसा कि उस किसान ने किया या दाऊद की तरह उसके विरुद्ध जाएंगे? क्या हम बदला लेने के स्थान पर धार्मिकता का चुनाव करेंगे?

महानता

कथबर्ट उत्तरी इंग्लैंड में अति-प्रिय व्यक्तिव है l सातवीं शताब्दी में इस क्षेत्र के अधिकाँश हिस्से में सुसमाचार प्रचार के लिए जिम्मेदार, कथबर्ट ने सम्राटों को सलाह दिया और राज्य को प्रभावित किया; और उनकी मृत्यु के बाद, उनके आदर में डरहम शहर बनाया गया l लेकिन इन से अधिक तरीकों से कथबर्ट की विरासत महान है l 

एक महामारी(plague) द्वारा उस क्षेत्र को उजाड़ने के बाद, कथबर्ट ने एक बार प्रभावित इलाके का दौरा करते हुए दिलासा दी l एक गाँव को छोड़ते समय, उन्होंने पता लगाया कि क्या प्रार्थना करने के लिए कोई बचा है l हाँ एक बची थी──एक महिला, एक बच्चे को पकड़ी हुई l उसने पहले ही एक बेटे को खो दिया था, और जिस बच्चे को पकड़ी हुई थी वह भी मरने पर था l कथबर्ट ने बुखार से पीड़ित बच्चे को अपने बाहों में उठा लिया, उसके लिए प्रार्थना की, और उसके माथे को चूमा l उन्होंने उससे कहा, “डरो मत, क्योंकि तुम्हारे घर में और किसी की भी मृत्यु नही होगी l” बताते हैं कि बच्चा जीवित रहा l 

यीशु ने महानता का सबक देने के लिए एक छोटे बच्चे को गोद में लेकर, कहा, “जो कोई मेरे नाम से ऐसे बालकों में से किसी एक को भी ग्रहण करता है, वह मुझे ग्रहण करता है” (मरकुस 9:37) l यहूदी संस्कृत में किसी का “स्वागत” करने का अर्थ उसकी सेवा करना था, जिस प्रकार एक मेजबान एक अतिथि की करता है l चूकिं बच्चे वयस्कों की सेवा करते थे और उनकी सेवा नहीं की जाती थी, इसलिए यह विचार चौंकाने वाला था l यीशु के बोलने का मतलब? सबसे छोटे और निम्नतम की सेवा में ही सच्ची महानता निवास करती है l 

सम्राटों का सलाहकार l इतिहास को प्रभावित करने वाला l उसके सम्मान में एक शहर का बनाया जाना l लेकिन शायद स्वर्ग कथबर्ट की विरासत को इस तरह अधिक लिपिबद्ध करता है : एक माँ पर ध्यान दिया गया l एक माथे को चूमा गया l एक नम्र जीवन अपने स्वामी को प्रतिबिंबित किया l 

ईर्ष्या पर काबू पाना

एक प्रसिद्ध अंग्रेजी फिल्म में, एक उम्रदराज संगीतकार मुलाकात करने आए एक पुराहित के लिए पियानो पर अपना कुछ संगीत बजाता है l लज्जित पुरोहित कबूल करता है कि वह धुन को नहीं पहचानता है l तुरंत ही एक परिचित धुन बजाते हुए संगीतकार कहता है, “और इसका क्या?” “मुझे नहीं पता था कि उसे आपने लिखा था,” वह पुरोहित कहता है l “मैंने नहीं” उसने जबाब दिया l “वह मोजार्ट था!” जब दर्शकों को पता चलता है, मोजार्ट की सफलता ने इस संगीतकार में एक गहरी ईर्ष्या उत्पन्न कर दी थी──यहाँ तक कि मोजार्ट की मृत्यु में एक भूमिका निभाने में अग्रणी l 

एक और ईर्ष्या की कहानी के केंद्र में एक गीत निहित है l गोलियत पर दाऊद की जीत के बाद, इस्राएलियों ने दिल से गाया “शाऊल ने तो हजारों को, परन्तु दाऊद ने लाखों को मारा है” (1 शमूएल 18:7) l यह तुलना राजा शाऊल के साथ अच्छी तरह नहीं बैठती l दाऊद की सफलता से डाह रखकर और अपना सिंहासन खोने के डर से (पद. 8-9), शाऊल दाऊद को मारने के लिए, लम्बे समय तक उसका पीछा करता है l 

संगीत के साथ इस संगीतकार या शक्ति के साथ शाऊल की तरह, हम आमतौर पर उन लोगों से ईर्ष्या करने के लिए ललचाते हैं जिनके पास हमारे पास समान लेकिन अधिक वरदान हैं l और चाहे उनके काम में गलती निकालनी हो या उनके काम को कम करना हो, हम भी अपने “प्रतिद्वंदियों” को नुक्सान पहुँचाने की कोशिश कर सकते हैं l 

शाऊल को दिव्य रूप से उसके कार्य के लिए चुना गया था (10:6-7,24), एक स्थिति जिसे  ईर्ष्या के बजाय उसके अंदर सुरक्षा को बढ़ावा देना चाहिए था l चूँकि हम में से प्रत्येक के पास भी अद्वितीय बुलाहट है (इफिसियों 2:10) ईर्ष्या पर विजय पाने का शायद सर्वोत्तम तरीका तुलना करना बंद करना है l इसके बदले आइये हम परस्पर सफलताओं का उत्सव मनाएँ l 

निश्चित प्रार्थना

एक बच्चे को पाने के लिए वर्षों कोशिश करने के बाद, जब रीता गर्भवती हुई तो विश्वास और रीता उत्तेजित हुए । लेकिन उसकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बच्चे के लिए जोखिम बन गया, इसलिये विश्वास हर रात अपनी पत्नी और बच्चे के लिए प्रार्थना करते हुए जागता था l एक रात, विश्वास ने महसूस किया कि उसे इतनी परिश्रमशीलता से प्रार्थना करने की जरूरत नहीं, क्योंकि परमेश्वर ने देखभाल करने का वायदा किया है । लेकिन एक सप्ताह बाद रीता का गर्भपात हो गया । विश्वास बर्बाद हो गया । वह सोचने लगा, क्या वे बच्चा इसलिये खो दिए क्योंकि उसने परिश्रमशीलता से प्रार्थना नहीं की थी? 

पहले पठन में हम सोच सकते हैं कि आज का दृष्टान्त यही सिखाता है । इस कहानी में, एक पड़ोसी (कभी कहा जाता है कि यह परमेश्वर को दर्शाता है) अपने मित्र के कष्टकर जिद्द करने के कारण ही उसकी मदद करने बिस्तर से बाहर आता है (लुका 11:5-8) । इसे इस तरीके से पढें, यह दृष्टान्त सुझाता है कि हमें जो चाहिए परमेश्वर हमें तभी देगा जब हम उसे परेशान करेंगे l और यदि हम काफी गंभीरता से प्रार्थना नहीं करेंगे, शायद परमेश्वर हमारी मदद नहीं करेगा l  

परन्तु बाइबल के प्रसिद्ध टिप्पणीकार मानते हैं कि यह दृष्टान्त को गलत समझना है——इसका मुख्य बिंदु यह है कि यदि पड़ोसी अपने स्वार्थी कारणों से हमारी मदद कर सकते हैं,  तो हमारा निस्वार्थी पिता और कितना अधिक करेगा l तो हम पूरे आत्मविश्वास से मांग सकते हैं (पद.9-10), यह जानते हुए कि परमेश्वर दोषपूर्ण इंसानों से महान है (पद.11-13) । वह दृष्टान्त में पड़ोसी नहीं है, लेकिन उसके विपरीत है l 

“मुझे नहीं पता तुमने अपना बच्चा क्यों खोया,” मैंने विश्वास से कहा, “लेकिन मैं जनता हूँ यह इसलिये नहीं हुआ क्योंकि तुमने काफी ‘परिश्रमशीलता’ से प्रार्थना नहीं की थी l प्रभु वैसा नहीं है ।”

परमेश्वर की सन्तान

मैंने एक बार निःसंतान दंपतियों के लिए सामयिक सम्मेलन में बोला । अपने बांझपन से दुखी, कई उपस्थित लोग अपने भविष्य को लेकर निराश थे । खुद संतानहीनता के मार्ग पर चलते हुए भी, मैंने उन्हें प्रोत्साहित करने की कोशिश की l “माता-पिता बने बिना आपकी एक सार्थक पहचान हो सकती है,” मैंने कहा l “मेरा मानना है कि आप भयानक और अद्भुत रीति से रचे गए हैं, और आपके लिए खोजने के लिए एक नया उद्देश्य है l”  

बाद में एक महिला रोती हुयी मुझसे मिली l उसने कहा, धन्यवाद l मैंने निःसंतान होने के कारण व्यर्थ महसूस किया है और यह सुनने की ज़रूरत है कि मैं भयभीत और आश्चर्यजनक रूप से बनी हूँ l” मैंने उस महिला से पूछा कि क्या वह यीशु में विश्वास रखती है l “मैं वर्षों पहले ईश्वर से दूर चली गयी,” उसने कहा l “लेकिन फिर से मुझे उसके साथ रिश्ता चाहिए l”

“इस तरह के समय मुझे याद दिलाते हैं कि सुसमाचार कितना अथाह है । कुछ पहचान, जैसे “माता” और “पिता,” कुछ के लिए प्राप्त करना कठिन होता है l अन्य, जैसे जो आजीविका पर आधारित होते हैं, बेरोजगारी के द्वारा गवां सकते हैं l परन्तु यीशु के द्वारा हम परमेश्वर के “प्रिय [बालक] बन जाते हैं──एक ऐसी पहचान जिसे कोई चुरा नहीं सकता (इफिसियों 5:1) । और तब हम “प्रेम में” चल सकते है──एक जीवन उद्देश्य जो किसी भी भूमिका या रोजगार की स्थिति से बढ़कर है (पद.2) l 

सब मनुष्य “भयानक और अद्भुत रीति से रचे गए हैं” (भजन 139:14), और जो यीशु के पीछे हो लेते हैं वह परमेश्वर की सन्तान बन जाते है (यूहन्ना 1:12-13) l एक बार निराशा में, वह महिला आशा में छोड़ दी गयी थी──इस संसार की तुलना में अब उससे बड़ी पहचान और उदेश्य पाने के निकट है l  

हमारा सच्चा व्यक्तित्व

मेरे माता-पिता के पुराने फोटो एल्बम में एक युवा लड़के की तस्वीर है । उसका चेहरा गोल है, चेहरे पर दाने और सीधे बाल । उसे कार्टून पसंद है, कुछ फल नापसंद है, और कुछ अजीब संगीत पसंद है । उसी एल्बम के अंदर एक किशोर की कई तस्वीरें हैं । उसका चेहरा लम्बा है, गोल नहीं; उसके बाल लहरदार है, सीधे नहीं हैं, उसके चेहरे पर दाने नहीं हैं, कुछ फल पसंद है, कार्टून की जगह फिल्में देखता है, और वह कुछ अजीब संगीत सुनना कभी स्वीकार नहीं करेगा । वह लड़का और किशोर थोड़े एक जैसे है । विज्ञान के अनुसार उनकी अलग त्वचा, दांत, खून, और हड्डियाँ हैं । फिर भी वह दोनों मैं ही हूँ । यह मिथ्याभास दार्शनिकों को अचम्भित कर रखा हैं । इसलिए कि हम जीवन भर बदलते है, हमारा सच्चा व्यक्तित्व क्या है?

बाइबल इसका उत्तर देती है । जिस पल से परमेश्वर ने हमें गर्भ में रचना शुरू किया (भजन 139:13-14), हम अपने अद्वितीय रचना में बढ़ते गये । जबकि हम यह कल्पना नहीं कर सकते, कि हम आखिरकार क्या बनेंगे, हम जानते हैं कि यदि हम परमेश्वर की सन्तान है तो अंत में हम यीशु की तरह बनेंगे (1 यूहन्ना 3:2)──हमारा शरीर उसके स्वभाव के साथ, हमारा व्यक्तित्व लेकिन उसका चरित्र, हमारे सभी उपहार चमकते हुए, हमारे सभी पाप मिटे हुए l 

उस दिन तक जब यीशु वापस नहीं आ जाता, हम इस भावी व्यक्तित्व की ओर आकर्षित  किए जा रहे हैं l उसके कार्यों के द्वारा, क्रमिक रूप से, हम उसकी छवि को और अधिक स्पष्ट रूप से प्रतिबिम्बित कर सकते है (2 कुरिन्थियों 3:18) । हम अभी तक जो हमें होना चाहिए नहीं हैं, लेकिन जैसे-जैसे हम उसके सामान होते जाते है, हम अपने सच्चे व्यक्तित्व में ढलते जाते हैं l

दोष और क्षमा

अपनी पुस्तक ह्यूमन यूनिवर्सल्स में, मानवविज्ञानी डोनाल्ड ब्राउन ने चार सौ से अधिक व्यवहारों को सूचीबद्ध किया है जिन्हें वह मानवता के बीच आम मानते हैं l वह खिलौने, चुटकुले, नृत्य, और कहावत,  सांपों की सतर्कता और डंक वाली चीजों को बांधने जैसी चीजें शामिल करता है! इसी तरह,  उनका मानना ​​है कि सभी संस्कृतियों में सही और गलत की अवधारणाएं हैं,  जहाँ उदारता की प्रशंसा की जाती है,  वादों को महत्व दिया जाता है और नीचता और हत्या जैसी चीजों को गलत समझा जाता है l हम जहाँ से भी हैं,  हम सभी में विवेक की भावना है l

प्रेरित पौलुस ने कई शताब्दी पहले एक ऐसा ही बिंदु बताया था l जबकि ईश्वर ने यहूदी लोगों को गलत और सही के बीच स्पष्टीकरण के लिए दस आज्ञाएँ दीं,  पौलुस ने उल्लेख किया कि चूंकि गैरयहूदी लोग अपने विवेक का पालन करके सही कर सकते थे,  इसलिए परमेश्वर के कानून निसंदेश उनके दिलों पर लिखे गए थे (रोमियों 2:14-15) l लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि लोगों ने हमेशा वही किया जो सही था l अन्यजातियों ने अपने विवेक (1:32) के खिलाफ विद्रोह किया,  यहूदियों ने व्यवस्था तोड़ी (2:17–24), जिससे  दोनों दोषी ठहरे l लेकिन यीशु में विश्वास के द्वारा, परमेश्वर मृत्युदंड को हटा देता है जो हमारे सभी नियम-तोड़ने का परिणाम था (3:23-26; 6:23) l

चूंकि परमेश्वर ने सभी मनुष्यों को सही और गलत की भावना के साथ बनाया है,  इसलिए हममें से प्रत्येक को एक बुरी चीज पर कुछ अपराधबोध महसूस होगा जो हमने किया है या एक अच्छी चीज जो हम करने में विफल रहे हैं l जब हम उन पापों को स्वीकार करते हैं,  तो परमेश्वर अपराधबोध मिटा देता है जैसे कि एक सफेद बोर्ड साफ़ कर दिया गया हो l बस इतना करना है कि हम उससे बोलें─चाहे हम जो भी हों, जहाँ से भी हों l

प्रकृति पर ध्यान देना

एक दोस्त और मैंने हाल ही में मेरा एक पसंदीदा घूमने का स्थान गए l  तेज हवा वाली पहाड़ी पर चढ़कर,  हमने जंगली फूलों वाले एक मैदान को पार करके ऊंची चीड़ के पेड वाले जंगल में प्रवेश किए, उसके बाद एक घाटी में उतरकर हम थोड़ा समय के लिए ठहर गए l बादल हमारे ऊपर धीरे-धीरे उड़ रहे थे l पास में एक धारा बह रही थी l ध्वनियाँ केवल पक्षियों की थीं l मैं और मेरा दोस्त पंद्रह मिनट तक चुपचाप खड़े रहकर यह सब गौर से देखते रहे l

जैसा कि पता चला,  उस दिन हमारे कार्य बेहद उपचारात्मक थे l एक अमेरिकी विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार,  जो लोग ठहरकर प्रकृति पर चिंतन करते हैं वे उच्च स्तर की खुशी,  चिंता के नीचा स्तर और पृथ्वी की देखभाल की अधिक इच्छा का अनुभव करते हैं l हालांकि,  जंगल से गुजरना पर्याप्त नहीं है l आपको बादलों को देखना होगा,  पक्षियों को सुनना होगा l कुंजी प्रकृति में रहना नहीं है,  लेकिन इसे ध्यान से देखना है l

क्या प्रकृति के फायदों का आध्यात्मिक कारण हो सकता है?  पौलुस ने कहा कि सृष्टि परमेश्वर की सामर्थ्य और प्रकृति को प्रगट करती है (रोमियों 1:20) l परमेश्वर ने अय्यूब से कहा कि वह उसकी उपस्थिति के प्रमाण के लिए समुद्र,  आकाश और तारों को देखे (अय्यूब 38-39) l यीशु ने कहा कि “आकाश के पक्षी” और “जंगली सोसनों” पर ध्यान करना परमेश्वर की देखभाल प्रगट कर सकता है और चिंता कम कर सकता है (मत्ती 6:25-30) l बाइबल में, प्रकृति पर ध्यान देना एक आत्मिक अभ्यास है l

वैज्ञानिक सोचते हैं कि प्रकृति हमें सकारात्मक रूप से क्यों प्रभावित करती है? शायद एक कारण यह है कि प्रकृति पर ध्यान करने से हम परमेश्वर की एक झलक प्राप्त कर सकते हैं जिसने इसे बनाया और जो हमें ध्यान से देखता है l

पहले दूध

सातवीं शताब्दी में, जिसे अब यूनाइटेड किंगडम कहा जाता है, अक्सर कई राज्य युद्ध में संलग्न होते थे l जब एक राजा, नॉर्थम्ब्रिया का ऑस्वाल्ड, यीशु में विश्वास करने वाला बन गया, तो उसने अपने क्षेत्र में सुसमाचार लाने के लिए एक मिशनरी को बुलाया l कॉर्मन नाम का एक आदमी भेजा गया, लेकिन बात नहीं बनी l अंग्रेजों को अपने उपदेश में “जिद्दी,” “बर्बर,” और अरुचिकर पाकर वह निराश होकर घर लौट आया l

“मेरी यह राय है,” एडन नाम के एक भिक्षु ने कॉर्मन से कहा, “ जितना आपको अपने अनजान श्रोताओं के लिए गंभीर होना था आप उससे अधिक गंभीर थे l” नॉर्थम्ब्रिया के लोगों को “अधिक आसान सिद्धांत का दूध” देने के बजाय, कॉर्मैन ने उन्हें शिक्षण दिया जिन्हें वे अभी समझ नहीं सकते थे l एडन नॉर्थम्ब्रिया गया, लोगों के समझ के अनुसार अपने उपदेश को अनुकूलित किया, और हजारों यीशु में विश्वास करने वाले बन गए l

एडन को मिशन के लिए यह संवेदनशील दृष्टिकोण पवित्र शास्त्र से मिला l पौलुस ने कुरिन्थियों से कहा, “मैंने तुम्हें दूध पिलाया, अन्न न खिलाया; क्योंकि तुम उसको नहीं खा सकते थे” (1 कुरिन्थियों 3:2) l लोगों से सही जीवनयापन की उम्मीद करने से पूर्व, इब्रानियों का कहना है, यीशु के बारे में बुनियादी शिक्षा, पश्चाताप और बपतिस्मा को समझ लेना चाहिए (इब्रानियों 5:13-6:2) l जबकि उसके बाद परिपक्वता का पालन जरूरी है (5:14), क्रम को न भूलें l ठोस भोजन से पहले दूध आता है l लोग उस शिक्षा को नहीं मान सकते हैं जिन्हें वे नहीं समझते हैं l

नॉर्थम्ब्रिया के लोगों का विश्वास आखिरकार देश के बाकी हिस्सों और उससे बाहर तक फैल गया l एडन की तरह, दूसरों के साथ सुसमाचार को साझा करते समय, हम उन लोगों से वहां मिलते हैं जहां वे हैं l