क्रोध का खतरा
पढ़ें: मत्ती 18:21-35
“परन्तु जब वह दास बाहर निकला, तो उसके संगी दासों में से एक उस को मिला जो उसके…

परमेश्वर के खुले द्वार
एक बड़े शहर के पास मेरे नए स्कूल में, मार्गदर्शन परामर्शदाता ने मुझ पर एक नज़र डाली और मुझे सबसे कम प्रदर्शन करने वाली अंग्रेजी लेखन कक्षा में रखा l मैं अपने पिछले स्कूल से उत्कृष्ट इम्तहान प्राप्तांक, उत्कृष्ट अंक और यहाँ तक कि अपने लेखन के लिए श्रेष्ठ पुरूस्कार के साथ पहुंची थी l मेरे नए स्कूल में “सर्वश्रेष्ठ” लेखन कक्षा का दरवाज़ा मेरे लिए बंद था, हालाँकि, जब परामर्शदाता ने निर्णय लिया कि मैं सही या तैयार नहीं हूँ l
प्राचीन फिलदिलफिया की कलीसिया को ऐसे मनमाने झटके समझ में आए होंगे l एक छोटा और साधारण कलीसिया, इसके शहर को हाल के वर्षों में भूकंप का सामना करना पड़ा जिससे स्थायी क्षति हुयी l इसके अतिरिक्त, उन्हें शैतानी विरोध का सामना करना पड़ा (प्रकाशितवाक्य 3:9) l इस तरह के उपेक्षित कलीसिया में “फिर भी थोड़ी ताकत थी,” जैसा कि पुनरुत्थित यीशु ने कहा, “तू ने मेरे वचन का पालन किया है और मेरे नाम का इनकार नहीं किया” (पद.8) l इसलिए, परमेश्वर ने उनके सामने “एक द्वार खोल रखा है, जिसे कोई बंद नहीं कर सकता” (पद.8) l वास्तव में, “[उसके] खोले हुए को कोई बंद नहीं कर सकता और बंद किये हुए को कोई खोल नहीं सकता” (पद.7) l
यह हमारी सेवा के प्रयासों के लिए सच है l कुछ दरवाजे नहीं खुलते l हालाँकि, ईश्वर के लिए मेरे लेखन के साथ, उसने वास्तव में दरवाजे खोले हैं, जिससे इसे एक परामर्शदाता के बंद रवैये की परवाह किये बिना वैश्विक दर्शकों तक पहुँचने की अनुमति मिली है l बंद दरवाजे आपके लिए भी बाधा नहीं बनेंगे l “द्वार मैं हूँ,” यीशु ने कहा (यूहन्ना 10:9) l आइए उसके द्वारा खोले गए द्वारों में प्रवेश करें और उसका अनुसरण करें l

परमेश्वर के बुद्धिमान उद्देश्य
भारत इतिहास से भरा पड़ा है l आप जहाँ भी जाते हैं, आप ऐतिहासिक शख्सियतों का सम्मान करने वाले स्मारक या उन स्मारक स्थलों को देखते हैं जहाँ महत्वपूर्ण घटनाएं घटी थीं l लेकिन इंग्लैंड के एक होटल में एक मजेदार सन्देश प्रदर्शित किया गया है l होटल के बाहर एक पुरानी पट्टिका पर एक सन्देश लिखा है, “इस स्थान पर, 5 सितम्बर, 1782 को, कुछ भी नहीं हुआ l”
कई बार हमें ऐसा लगता है कि हमारी प्रार्थनाओं को लेकर कुछ हो ही नहीं रहा है l हम प्रार्थना करते हैं और प्रार्थना करते हैं, अपनी याचिकाएं अपने पिता के पास इस उम्मीद से लाते हैं कि वह अभी जबाब देंगे l भजनकार दाऊद ने ऐसी निराशा व्यक्त की जब उसने प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, कब तक! क्या तू सदैव मुझे भूला रहेगा? तू कब तक अपना मुखड़ा मुझसे छिपाए रहेगा? (भजन 13:1) l हम उन विचारों को सरलता से दोहरा सकते हैं : हे प्रभु, आपके उत्तर देने में कितना समय लगेगा?
हालाँकि, हमारा परमेश्वर न केवल अपनी बुद्धि में बल्कि समय में भी परिपूर्ण है l दाऊद यह कहने में समर्थ हुआ, “मैंने तो तेरी करुणा पर भरोसा रखा है; मेरा हृदय तेरे उद्धार से मगन होगा” (पद.5) l सभोपदेशक 3:11 हमें याद दिलाता है, “[परमेश्वर ने] सब कुछ ऐसा बनाया कि अपने अपने समय पर वे सुन्दर होते हैं” सुन्दर शब्द का अर्थ है “उपयुक्त” या “प्रसन्नता का श्रोत l” परमेश्वर हमेशा हमारी प्रार्थनाओं का प्रत्युत्तर हमारी इच्छा अनुकूल नहीं देता, लेकिन वह हमेशा अपने बुद्धिमान उद्देश्यों को पूरा कर रहा है l हम इस बात पर विश्वास कर सकते हैं कि जब वह उत्तर देगा, तो वह सही, अच्छा और सुन्दर होगा l

प्रार्थना हेतु प्रेरित किया गया
एक सहकर्मी ने मुझसे कहा कि हमारे मेनेजर की वजह से उसका प्रार्थना जीवन बेहतर हुआ है l मैं यह सोचकर प्रभावित हुयी कि हमारे कठिन अगुआ ने उसके साथ कुछ आध्यात्मिक बातें साझा की थीं और उसके प्रार्थना करने के तरीके को प्रभावित किया था l मैं गलत थी—कुछ इस तरह l मेरे सहकर्मी और सहेली ने समझाया : “हर बार जब मैं उसे आते हुए देखती हूँ, तो प्रार्थना करना शुरू कर देती हूँ l” उसके प्रार्थना करने के समय में सुधार हुआ था क्योंकि वह उसके साथ प्रत्येक बातचीत से पहले अधिक प्रार्थना करती थी l वह जानती थी कि उसके अपने प्रबंधक के साथ चुनौतीपूर्ण कार्य संबंधों में ईश्वर की मदद चाहिए और इसलिए उसने उसे अधिक पुकारा l
कठिन समय और बातचीत के दौरान प्रार्थना करने की मेरी सहकर्मी की प्रथा कुछ ऐसी है जिसे मैंने अपनाया है l यह 1 थिस्सलुनीकियों में पायी जाने वाली एक बाइबल प्रथा भी है जब पौलुस यीशु में विश्वासियों को “निरंतर प्रार्थना करने” और “हर बात में धन्यवाद” करने की याद दिलाता है (1 थिस्सलुनीकियों 5:13) l चाहे हम किसी भी परिस्थिति का सामना करें, प्रार्थना हमेशा सर्वोत्तम अभ्यास है l यह हमें ईश्वर से जोड़े रखता है और उसकी आत्मा को हमें निर्देशित करने के लिए आमंत्रित करता है (गलातियों 5:16) बजाय इसके कि हम अपनी मानवीय प्रवृत्तियों पर निर्भर रहें l यह हमें संघर्षों का सामना करने पर भी “आपस मैं मेलमिलाप से [रहने]” में मदद करता है (1 थिस्सलुनीकियों 5:13) l
जब ईश्वर हमारी सहायता करता है, हम उसमें आनंदित हो सकते हैं, हर चीज़ के लिए प्रार्थना कर सकते हैं और अक्सर धन्वाद दे सकते हैं l और वे चीज़ें और भाइयों और बहनों के साथ और भी अधिक सद्भाव में रहने में मदर करेंगी l

परमेश्वर के प्रेमी हाथों में
स्वास्थ्य सम्बन्धी एक और झटके के बाद, मुझे अज्ञात और बेकाबू होने का डर था l एक दिन, फोर्ब्स पत्रिका का लेख पढ़ते समय, मुझे पता चला कि वैज्ञानिकों ने “पृथ्वी के चक्कर वेग” के बढ़ने का अध्ययन किया और घोषणा की कि पृथ्वी “डगमगा रही है” और “तेजी से घूम रही है l” उन्होंने कहा कि हमें “पहली बार “ड्राप सेकंड(drop second)—वैश्विक समय से एक सेकंड का आधिकारिक निष्कासन—की आवश्यकता हो सकती है l हालांकि एक सेकंड बहुत बड़ी हानि नहीं लगती, लेकिन यह जानना कि पृथ्वी का चक्कर बदल सकता है, मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी l थोड़ी सी भी अस्थिरता मेरे विश्वास को डगमगा सकती है l हालाँकि, यह जानने से कि ईश्वर नियंत्रण रखता है, मुझे उस पर भरोसा करने में मदद मिलती है, चाहे हमारे अज्ञात कितने भी डरावने हों या हमारी परिस्थितियाँ कितनी भी अस्थिर क्यों न हों l
भजन 90 में, मूसा ने कहा, “इससे पहले कि पहाड़ उत्पन्न हुए, या तू ने पृथ्वी और जगत की रचना की, वरन् अनादिकाल से अनंतकाल तक तू ही परमेश्वर है” (पद.2) l समस्त सृष्टि पर ईश्वर की असीमित शक्ति, नियंत्रण और अधिकार को स्वीकार करते हुए, मूसा ने घोषणा की कि समय ईश्वर को रोक नहीं सकता (पद.3-6) l
जैसे-जैसे हम ईश्वर और उसके द्वारा रचित अद्भुत संसार के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं, हमें पता चलेगा कि वह कैसे समय और अपनी बनायी गयी सभी चीज़ों का पूरी तरह से प्रबंधन करता है l हमारे जीवन में हर अज्ञात और नयी खोजी गयी चीज़ के लिए भी ईश्वर पर भरोसा किया जा सकता है l सारी सृष्टि ईश्वर के प्रेमपूर्ण हाथों में सुरक्षित रहती है l