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मैं कोई नहीं हूँ! तुम कौन हो?

“मैं कोई नहीं हूँ! तुम कौन हो?” से आरम्भ होने वाली एक कविता में,?" एमिली डिकिंसन लोगों द्वारा "कोई" बनने के लिए किए जाने वाले सभी प्रयासों को चंचलतापूर्वक चुनौती देती है। वह आनंदमय गुमनामी की आनंदमय स्वतंत्रता का समर्थन करती है। “कितना नीरस है के लिये- कोई होना ! कितना सार्वजनिक - एक मेंढक की तरह - / किसी का नाम बताने के लिए - जीवंत जून / एक प्रशंसनीय बोग के लिए!”( For”How dreary-to be-Somebody! How public-like a Frog-/ To tell one’s name-the livelong June/To an admiring Bog!”)

कुछ मायनों में “कोई” होने की आवश्यकता को छोड़ देने में स्वतंत्रता खोज पाना प्रेरित पौलुस की गवाही को प्रतिध्वनित करता है। मसीह से आमना-सामना होने से पहले, पौलुस के पास प्रभावशाली धार्मिक प्रमाणों की एक लम्बी सूची थी, जो स्पष्ट रूप से “शरीर पर भरोसा रखने के विचार” थे (फिलिप्पियों 3:4)।

परन्तु यीशु से आमना-सामना होने से सब कुछ बदल गया। जब पौलुस ने देखा कि मसीह के बलिदानी प्रेम के आलोक में उसकी धार्मिक उपलब्धियाँ कितनी खोखली हैं, तो उसने इस बात का अंगीकार किया कि “मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूँ... और उन्हें कूड़ा समझता हूँ, ताकि मैं मसीह को प्राप्त करूँ” (पद 8)। “ताकि मैं उसको और उसके पुनरुत्थान की सामर्थ्य को, और उसके साथ दुःखों में सहभागी होने के मर्म को जानूँ, और उसकी मृत्यु की समानता को प्राप्त करूँ” उसकी एकमात्र शेष महत्वाकांक्षा यही थी (पद 10)।

वास्तव में, अपने दम पर “कोई” बनने का प्रयास करना नीरस होता है। परन्तु, यीशु को जानना और उसके आत्म-बलिदानी प्रेम और जीवन में अपने आप को खो देना ही, अंत में स्वतंत्र और सम्पूर्ण रूप से अपने आप को फिर से प्राप्त करना है (पद 9)।

ये सब विपत्तियाँ मेरे ऊपर आ पड़ी हैं

“आज सुबह मेरे मन में विचार आया कि मेरा मूल्य बहुत अधिक है; और इस समय मुझे नहीं पता कि मेरे पास एक डॉलर भी है।”” अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति यूलिसिस एस. ग्रांट ने ये शब्द उस दिन कहे थे, जब एक बिजनेस पार्टनर ने उनके जीवनभर की बचत को ठग लिया था। कई महीनों के बाद पता चला कि ग्रांट को लाइलाज कैंसर है। अपने परिवार के लिए प्रबंध करने के बारे में चिंतित होकर, उन्होंने अपने उन संस्मरणों को जिनको उन्होंने अपनी मृत्यु से एक सप्ताह पहले पूरा किया था,प्रकाशित करने के लिए लेखक मार्क ट्वेन की ओर से मिले एक प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

बाइबल हमें एक और व्यक्ति के बारे में बताती है जिसने गम्भीर कठिनाइयों का सामना किया था। याकूब ने विश्वास कर लिया था कि उसके पुत्र यूसुफ को किसी “जंगली पशु” के द्वारा “फाड़” डाला गया था (उत्पत्ति 37:33)। बाद में उसके पुत्र शिमोन को पराए देश में बंधुआ बना लिया गया, और याकूब को इस बात का डर था कि उसका पुत्र बिन्यामीन भी उससे ले लिया जाएगा। इनसे बहुत अधिक परेशान होकर ,वह चिल्ला उठा, “ये सब विपत्तियाँ मेरे ऊपर आ पड़ी हैं!” (42:36)।

परन्तु ऐसा नहीं था। याकूब को मालूम नहीं था कि उसका पुत्र यूसुफ अभी भी जीवित है और परमेश्वर उसके परिवार को बहाल करने के लिए “पर्दे के पीछे” से काम कर रहा है। उनकी कहानी उदाहरण के साथ इस बात की व्याख्या करती है कि भले ही हम अपनी परिस्थितियों में उसका हाथ न देख पाएँ, पर उस समय भी परमेश्वर पर भरोसा किया जा सकता है। 

ग्रांट के संस्मरण एक बड़ी सफलता साबित हुए और उनके परिवार की अच्छी देखभाल हुई। यद्यपि वह इसे देखने के लिए जीवित नहीं रहे, परन्तु उनकी पत्नी ने यह देखा। हमारी दृष्टि सीमित है, परन्तु परमेश्वर की नहीं। और हमारी आशा के रूप में यीशु के साथ, “यदि परमेश्‍वर हमारी ओर है, तो हमारा विरोधी कौन हो सकता है?” (रोमियों 8:31) आइए हम आज उस पर अपना भरोसा रखें।

असीम करुणा

फास्ट-फूड रेस्तराँ में काम करने वाले केविन फोर्ड ने सत्ताईस वर्षों की अपनी नौकरी में एक भी छुट्टी नहीं की थी। उसकी दशकों की सेवा के उपलक्ष्य में उसे मिले एक मामूली उपहार के लिए उसकी विनम्र कृतज्ञता का प्रदर्शन करने वाले एक वीडियो के सामने आने के बाद, हजारों लोगों ने उसके प्रति करुणा दिखाने के लिए एकजुट होकर रैली की। और जब एक धन उगाहने (जुटाने) के प्रयास में 2,50,000 डॉलर केवल एक ही सप्ताह में जमा हो गए तो उसने कहा कि “यह उस सपने की तरह है, जो सच हो गया है।”

बंधुआई में गया यहूदा का राजा यहोयाकीन भी अत्यधिक करुणा का पात्र था। बेबीलोन के राजा की उदारता के परिणामस्वरूप उसकी स्वतंत्रता से पहले उसे सैंतीस वर्षों तक बंदीगृह में रखा गया था। “[राजा ने] यहोयाकीन कोबंदीगृह से निकालकर...और उससे मधुर-मधुर वचन कहकर, जो राजा उसके साथ बाबुल में बंधुए थे, उनके सिंहासनों से उसके सिंहासन को अधिक ऊँचा किया” (यिर्मयाह 52:31-32)। यहोयाकीन को नया पद, नए वस्त्र और नया निवास दिया गया था। और प्रति दिन के खर्च के लिये बाबुल के राजा के यहां से उसको नित्य कुछ मिलने का प्रबन्ध हुआ” 

यह कहानी चित्रित करती है कि आत्मिक रूप से क्या होता है, जब स्वयं या दूसरों के योगदान के बिना, यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान में विश्वास करने वाले लोगों को ईश्वर से अलगाव से बचाया जाता है। उन्हें अंधकार और मृत्यु से प्रकाश और जीवन में लाया गया है; परमेश्वर की अत्यधिक दयालुता के कारण उन्हें परमेश्वर के परिवार में लाया गया है।

आशीषित मास्क

महामारी के दौरान जैसे-जैसे मास्क की अनिवार्यता कमजोर पड़ती गई, वैसे-वैसे जहाँ कहीं भी मास्क रखने की आवश्यकता पड़ती थी, जैसे कि मेरी बेटी का स्कूल, वहाँ मास्क रखने की बात को याद रखना मेरे लिए मुश्किल होता गया। एक दिन जब मुझे एक मास्क की आवश्यकता पड़ी, तो मुझे अपनी कार में केवल एक ही मास्क मिला, जिसे मैंने इसलिए नहीं पहनना चाहा क्योंकि उस पर आगे की तरफ आशीषित लिखा हुआ था। 

मैं बिना संदेशों वाले मास्क पहनना पसंद करता हूँ, और मुझे विश्वास है कि जो मास्क मुझे मिला था उस पर लिखे उस शब्द का बहुत अधिक उपयोग किया गया है। परन्तु मेरे पास कोई विकल्प नहीं था, इसलिए मैंने न चाहते हुए भी वह मास्क लगा लिया। और जब मैं स्कूल में एक नई रिसेप्शनिस्ट के साथ अपनी झुंझलाहट को प्रकट करने ही वाला था, तो मैंने मेरे मास्क पर लिखे हुए शब्द के कारण अपने आप को थोड़ा सम्भाल लिया। मैं एक पाखंडी की तरह नहीं दिखना चाहता था, जो एक जटिल प्रणाली को समझने की कोशिश करते हुए एक दूसरे व्यक्ति के प्रति अधीरता दिखाते हुए अपने मुंह पर “आशीर्वाद” लिख कर घूम रहा था।

यद्यपि मेरे मास्क पर लगे अक्षरों ने मुझे मसीह के निमित्त मेरी गवाही की याद दिला दी, परन्तु मेरे हृदय में पवित्रशास्त्र के वचन दूसरों के साथ धीरज धरने के लिए एक सच्चा अनुस्मारक होने चाहिए। जैसे पौलुस ने कुरिन्थियों को लिखा कि “तुम मसीह की पत्री हो, ...जो स्याही से नहीं, परन्तु जीविते परमेश्‍वर के आत्मा से पत्थर की पटियों पर नहीं, परन्तु हृदय की माँसरूपी पटियों पर लिखी है” (2 कुरिन्थियों 3:3), वैसे ही“जीवन देने वाला”पवित्र आत्मा (पद 6), “प्रेम, आनन्द, शांति” और हाँ, “धीरज” के साथ जीवन व्यतीत करने में हमारी सहायता कर सकता है (गलातियों 5:22)। हम अपने भीतर उसकी उपस्थिति से वास्तव में आशीषित हैं!