
आओ आराधना करें
जब उन्होंने बहु-पीढ़ी आराधना सभा में स्तुति के गीत गाए, कईयों ने आनंद और शांति का अनुभव किया। परंतु एक थकी हुए मां नहीं l जब वह अपने बच्चे को झुला रही थी, जो रोने पर था, उसने अपने पांच वर्ष के बच्चे के लिए गीत की पुस्तक पकड़ रखी थी और साथ ही साथ अपने छोटे बच्चे को दूर जाने से रोकने का प्रयास कर रही थी l तभी पीछे बैठे एक वरिष्ठ सज्जन ने उस स्त्री से कहा कि लाइए मैं आपके बच्चे को चर्च के आस-पास घुमा लाऊँ और एक युवा स्त्री ने इशारा किया कि वह उनके बड़े बच्चे के लिए गीत पुस्तक को पकड़ लेगी l 2 मिनट के अंदर उस मां का अनुभव बदल गया और वह साँस ले सकी, अपनी आखें बंद कर सकी, और परमेश्वर की आराधना कर सकी ।
परमेश्वर ने हमेशा से चाहा कि उसके लोग उसकी आराधना करें─पुरुष और स्त्री, वृद्ध और युवा, लम्बे समय से विश्वासी, और नवागंतुक l प्रतिज्ञात देश में पहुँचने से पहले जब मूसा ने इस्राएल के गोत्रों को आशीष दी, उसने उनसे एक साथ इकठ्ठा होने का आग्रह किया, “क्या पुरुष, क्या स्त्री, क्या बालक, क्या तुम्हारे फाटकों के भीतर के परदेशी,” कि वे “सुनकर सीखें, और तुम्हारे परमेश्वर यहोवा का भय मानकर” उसकी आज्ञाओं का पालन करें (व्यवस्थाविवरण 31:12)। यह परमेश्वर को आदर देता है जब हम उसके लोगों के लिए एक साथ उसकी आराधना करना संभव बनाते हैं, चाहे हमारे जीवन की कोई भी अवस्था हो l
चर्च में उस सुबह, वह माँ, वरिष्ठ सज्जन, और वह युवा स्त्री प्रत्येक ने देने और लेने के द्वारा परमेश्वर के प्रेम का अनुभव किया l शायद अगली बार जब आप चर्च में हैं, आप भी किसी की मदद करके परमेश्वर का प्रेम फैला सकते हैं या आप विनीत कार्य को स्वीकारने वाले बन सकते हैं l

कार्यस्थल पर गवाही
“क्या तुम मुझसे अब भी नाराज हो कि मैं तुम्हारे मनपसंद विभाग को छोटा करने जा रहा हूं?” इवलिन के प्रबंधक ने उससे पूछा। “नहीं।“ कहते हुए उसने अपने जबड़ों को भींचा। वह इस बात से और भी परेशान थी कि वह अधिकारी उसको इसके विषय परेशान कर रहा था। वह विभिन्न रूचि समूहों को आकर्षित करने के तरीके ढूंढ़कर कम्पनी की सहायता करने का प्रयास कर रही थी, लेकिन सिमित स्थान ने इसे लगभग असंभव बना दिया l इवलिन अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश की, लेकिन निर्णय लिया कि जो उसका अधिकारी कहेगा वह वही करेगी। हो सकता है कि वह उन परिवर्तनों को न ला सकी जिन्हें वो आशा करती थी, परंतु वह अब भी अपना काम अपनी क्षमता के अनुसार कर सकती थी l
प्रेरित पतरस की पहली पत्री में, उसने पहली सदी के विश्वासियों से “मनुष्यों के ठहराए हुए हर एक प्रबंध के अधीन” रहने के लिए आग्रह किया (1 पतरस 2:13)। एक कठिन कार्य-स्थल में ईमानदारी बनाए रखना सरल नहीं है l परंतु पतरस हमें निरंतर अच्छा करने के लिए एक कारण को देता है : “अन्यजातियों में तुम्हारा चालचलन भला हो; ताकि जिन-जिन बातों में वे तुम्हें कुकर्मी जानकार बदनाम करते हैं, वे तुम्हारे भले कामों को देखकर उन्हीं के कारण कृपा-दृष्टि के परमेश्वर की महिमा करें (पद.12)। इसके अलावा, यह ध्यान देनेवाले अन्य विश्वासियों के लिए धर्मनिष्ठ उदाहरण प्रस्तुत करने में हमारी सहायता करेगा l
यदि हम वास्तव में एक अपमानजनक कार्य स्थिति में हैं, यदि संभव हो तो उसे त्यागना ही सर्वोत्तम होगा (1 कुरिन्थियों 7:21)। परंतु सुरक्षित वातावरण में, आत्मा की सहायता से हम हमारे कार्य में अच्छा कर सकते हैं याद रखते हुए कि “यह परमेश्वर को भाता है” (पद.20) l जब हम अधिकारियों के आधीन होते हैं, तो हम दूसरों को परमेश्वर का अनुसरण करने और महिमा देने का कारण देते हैं l

यह सब कुछ बदल देता है
येल विश्वविद्यालय के लम्बे समय तक रहे प्रोफेसर, यारोस्लाव पेलिकन, को “मसीही इतिहास में उनकी पीढ़ी का श्रेष्ठ विशेषाधिकार” माना जाता था, अपने व्यापक अकादमिक करियर के लिए सुप्रसिद्ध थे l उन्होंने 30 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित की और अपने विशालकाय लेखन के लिए जीवन-काल पुरस्कार के रूप में माननीय क्लूज प्राइज(Kluge Prize) जीता l उनके एक छात्र ने, हालाँकि, अपने शिक्षक के सर्वश्रेष्ठ शब्दों का वर्णन किया, जो उन्होंने अपने मृत्यु शय्या पर कहे थे : यदि मसीह जी उठा है, तो और किसी बात का कोई मूल्य नहीं है l और यदि मसीह नहीं जी उठा─तो और किसी बात का कोई मूल्य नहीं है।“
पेलिकन पौलुस के दृढ़ मत को प्रतिध्वनित करते हैं : “यदि मसीह नहीं जी उठा, तो हमारा प्रचार करना भी व्यर्थ है, और तुम्हारा विश्वास भी व्यर्थ है” (1 कुरिन्थियों 15:14)। प्रेरित बहुत साहसिक कथन कहता है क्योंकि वह जानता था कि पुनरुत्थान मात्र एक बार होने वाला आश्चर्यकर्म नहीं है लेकिन निःसंदेह ही मानव इतिहास में परमेश्वर के उद्धारक काम का परमोत्कर्ष l पुनरुत्थान का वायदा केवल उसका निश्चय नहीं था कि यीशु मृतकों में से जी उठेगा परंतु उसकी निर्भीक अभिपुष्टि कि दूसरे मृत एवं तबाह चीजें (जीवन, पड़ोस, सम्बन्ध) एक दिन मसीह के द्वारा पुनः जीवित कर दिए जाएंगे। हालाँकि, यदि पुनरुत्थान नहीं होता, पौलुस जानता था कि हम गंभीर समस्या में होते l यदि पुनरुत्थान नहीं है, तब मृत्यु और विनाश की जीत होती है l
परंतु, निस्संदेह, “मसीह मुर्दों में से जी उठा है” (पद. 20) l विजेता द्वारा विध्वस्त, मृत्यु हार गयी l और यीशु सब पीछे आनेवाले जीवन में “पहला फल” हुआ l उसने बुराई और मृत्यु को पराजित किया ताकि हम निर्भीक और स्वतंत्र जीवन जी सकें l यह सब कुछ बदल देता है l

ऐसा नहीं
“मैं किसी भी प्रकार से नहीं चाहता था कि ऐसा हो,” एक व्यक्ति ने, अपने मित्र की सराहना करते हुए कहा जिसकी मृत्यु युवावस्था में हो गयी थी l उसके शब्दों ने मानवता के हृदय की स्थायी पुकार को मार्मिकता दी l मृत्यु हममें से हर एक को चौंकती है और आघात पहुंचती है l जो हो नहीं सकता हम उसे ज्यों का त्यों करने को तरसते हैं l
यीशु की मृत्यु के बाद “ऐसा न हो” की चाहत उसके अनुयायियों की भावनाओं को अच्छी तरह दर्शाती है l सुसमाचार उन डरावने घंटों के विषय बहुत कम बताते हैं, लेकिन वे कुछ विश्वासयोग्य मित्रों की क्रियाओं का वर्णन ज़रूर करते हैं l
एक धार्मिक अगुवा, युसूफ ने, जो गुप्त विश्वासी था (यूहन्ना19:38 को देखें), अचानक से हिम्मत जुटाकर पिलातूस से यीशु की देह मांग लिया(लूका 23:52)। क्षण भर के लिए सोच कर देखिए कि भयानक क्रुसीकरण से किसी मृत व्यक्ति को उतारकर दफ़नाने के लिए तैयार करना कितना कठिन रहा होगा (पद.53) l उन महिलाओं की भक्ति और दिलेरी देखिए जो यीशु मसीह के साथ उसके हर कदम पर यहां तक कि कब्र तक उसके साथ रहीं ( पद 55)। मृत्यु के सामने, कभी न मरनेवाला प्रेम!
ये अनुयायी पुनरुत्थान की अपेक्षा नहीं कर रहे थे; वे तो बहुत उदास थे। इस अध्याय का अंत बिना किसी आशा के साथ होता है, मात्र एक निराशा, “तब उन्होंने लौटकर [यीशु की देह पर लेप लगाने के लिए] सुगन्धित वस्तुएं और इत्र तैयार किया; और सब्त के दिन उन्होंने आज्ञा के अनुसार विश्राम किया” (पद.56) l
वे कम ही जानते थे कि सब्त के बाद का विराम इतिहास के सबसे नाटकीय दृश्य का मंच तैयार कर रहा था l यीशु कल्पना से परे करने जा रहे थे l वह मृत्यु को ही “ऐसा नहीं है” करने जा रहे थे।
