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बद को बदतर करना

रेडियो के स्वर्ण युग के दौरान, फ्रेड ऐलन (1894-1956) ने हास्यप्रद निराशा का उपयोग आर्थिक मंदी के साए में रहनेवाली पीढ़ी और युद्ध में संलग्न संसार में मुस्कराहट लाने के लिए किया । उनके हास्यभाव व्यक्तिगत दर्द से जन्मा था । तीन साल का होने से पहले अपनी माँ को खोने के बाद, उन्हें अपने पिता से अलग कर दिया गया जो नशे की लत से संघर्ष कर रहे थे । उन्होंने न्यूयॉर्क सिटी के एक व्यस्त सड़क से एक किशोर लड़के को एक यादगार के साथ बचाया, “ऐ लड़के तुम्हारे साथ क्या बात है? क्या तुम बड़े नहीं होना चाहते हो और परेशान होना नहीं चाहते हो?

अय्यूब का जीवन ऐसे परेशान यथार्थ में खुलता है । जब उसके विश्वास का आरंभिक प्रगटीकरण अंततः निराशा के सामने हार मान लेता है, उसके मित्रों ने उसके दर्द को बदतर करके उसे गुणित किया । अच्छे लगनेवाले तर्कों के साथ उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि वह अपनी गलतियों को स्वीकार कर सकता है (4:7-8) और ईश्वर के सुधार से सीख सकता है, तो वह  अपनी समस्याओं के सामने हँसने की शक्ति पाएगा (5:22) ।  

अय्यूब के “दिलासा देनेवाले” भलाई चाहते थे जबकि इतने गलत थे (1:6-12) । वे कभी भी कल्पना नहीं कर सकते थे कि एक दिन वे “ऐसे मित्रों के साथ, किसे दुश्मन की ज़रूरत हो सकती है? के उदाहरण के रूप में उपयोग किए  जाएंगे । कभी भी उन्होंने अपके लिए अय्यूब की राहत की प्रार्थना की कल्पना  नहीं की होगी, या फिर उन्हें प्रार्थना की ज़रूरत किसी भी तरह से क्यों होगी (42:7-9) । कभी भी उन्होंने कल्पना नहीं की होगी कि किस तरह वे उसका जिसने हमारे महानतम आनंद का श्रोत बनने के लिए अत्यधिक गलतफहमियों को झेला के आरोपियों का पूर्वाभास दे रहे थे । 

दृढ़ विश्वास

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान प्रेम प्रधाम (1924-1998) के विमान को मार गिराए जाने के बाद,  सुरक्षा के लिए पैराशूट से उतरते समय वह घायल हो गया । परिणामस्वरूप, वह जीवन भर लंगड़ाकर चला । उसने एक बार ध्यान दिया, “मैं लंगड़ा हूँ । क्या यह परमेश्वर के लिए विचित्र नहीं कि उसने [मुझे] हिमालय के पहाड़ों में सुसमाचार प्रचार करने के लिए बुलाया?” और उसने नेपाल में ज़रूर प्रचार किया──लेकिन बिना विरोध के नहीं जिसमें “मौत की काल कोठरी” में कैद शामिल था जहाँ कैदी कठोर स्थितियों का सामना करते थे । पंद्रह वर्षों के अंतराल में, प्रेम चौदह अलग-अलग जेलों में दस साल बिताए । उसकी दृढ़ गवाही, हालाँकि, मसीह के लिए बदले जीवन के रूप में फल उत्पन्न किये जिसमें सुरक्षाकर्मी और कैदी सम्मिलित थे जिन्होंने यीशु के सन्देश को अपने लोगों तक पहुँचाए । 

प्रेरित पतरस को यीशु में अपने विश्वास के कारण और परमेश्वर द्वारा एक “दुर्बल मनुष्य के साथ जो भलाई की गयी” (प्रेरितों 4:9) में उपयोग किये जाने के कारण विरोध सहना पड़ा । लेकिन उसने उस सुअवसर का उपयोग मसीह के लिए दृढ़ता से बोलने के लिए किया (पद.8-13) । 

आज, पतरस की तरह, हम भी विरोध का सामना कर सकते हैं (पद.10-11), फिर भी हमारे पास परिजन, सहयोगी, साथी विद्यार्थी, और दूसरे हैं जिनको हम जानते हैं जिन्हें उस व्यक्ति के विषय जानना अविलम्ब ज़रूरी है जिसमें “उद्धार [मिलता है] (पद.12), जो हमारे पापों की कीमत के रूप में मृत्यु सही और क्षमा देने की उसकी सामर्थ्य के साबुत  के रूप में मृतकों में से जी उठा (पद.10) । वे सुनेंगे जब हम प्रार्थनापूर्वक और दृढ़ता से उद्धार के सुसमाचार की घोषणा करते हैं जो यीशु में पाया जाता है । 

महान योद्धा

डाएट इमन नेदरलैंड्स की एक साधारण, शर्मीली युवती थी──प्यार में, काम करने में, और परिवार और दोस्तों के साथ समय का आनंद लेने वाली──जब 1940 में जर्मनी ने आक्रमण किया । जैसा कि डाएट (उच्चारित डीफ) ने बाद में लिखा, “जब आपके दरवाजे पर खतरा है, आप लगभग शुतुरमुर्ग की तरह रेत में अपना सर छिपाना चाहते हैं ।” फिर डाएट ने महसूस किया कि ईश्वर ने उसे जर्मन उत्पीड़कों का विरोध करने के लिए बुलाया है, जिसमें यहूदियों और अन्य लोगों के लिए छिपने के स्थानों को खोजने के लिए अपने जीवन को जोखिम में डालना शामिल है । यह बेबस युवती ईश्वर के लिए योद्धा बन गयी । 

हमें डाएट के समान बाइबल में कई कहानियाँ मिलती हैं, कहानियाँ जिसमें हम परमेश्वर को अविश्वसनीय प्रतीत होने वाले चरित्रों को अपनी सेवा में उपयोग करते हुए देखते हैं । उदहारण के लिए, जब प्रभु के दूत ने गिदोन से संपर्क किया, तो उसने घोषणा की, “हे शूरवीर सूरमा, यहोवा तेरे संग है” (न्यायियों 6:12) । फिर भी गिदोन शूरवीर के सिवा कुछ और प्रतीत हो रहा था । वह गुप्त रूप से मिद्यानियों की भेद लेनेवाली आँखों से दूर गेहूं झाड़ रहा था जिन्होंने दमनात्मक ढंग से इस्राएल को नियंत्रित कर रखा था (पद. 1-6, 11) । वह इस्राएल(मनश्शे) के सबसे कमज़ोर कुल और उसके घराने में “सबसे छोटा” (पद.15) था । उसने परमेश्वर के आह्वान को महसूस नहीं किया और कई संकेतों का अनुरोध भी किया । फिर भी परमेश्वर ने उसे क्रूर मिद्यानियों को पराजित करने के लिए इस्तमाल किया (देखें अध्याय 7) । 

परमेश्वर ने गिदोन को “शूरवीर” के रूप में देखा । और जिस तरह परमेश्वर गिदोन के साथ था और उसे सज्जित किया, उसी तरह ईश्वर हमारे──“उसके प्रिय बालकों”──साथ भी है, (इफिसियों 5:1)──हमारे जीने के लिए उसकी सेवा छोटे या बड़े तरीकों से करने के लिए हमारी समस्त आवश्यकताओं को पूरा कर रहा है । 

एक धन्यवाद हृदय

प्राचीन रोम(ई.पू.4 - ई.सन् 65) का महान दर्शनशास्त्री, सेनेका पर एक बार महारानी मेसालिना द्वारा व्यभिचार का आरोप लगाया गया । राज्यसभा द्वारा सेनेका को मृत्यु दंड देने के बाद, सम्राट क्लौदिउस ने उसे इसके बदले कोर्सिका(एक द्वीप) में निर्वासित कर दिया, शायद इसलिए कि उसने अनुमान लगाया कि आरोप झूठा था । प्राणदंड के इस स्थगन ने शायद कृतज्ञता के उसके दृष्टिकोण को आकार दिया होगा जब उसने लिखा : मानववध, तानाशाह, चोर, व्यभिचारी, डकैत, पवित्र वस्तु दूषक, और देशद्रोही हमेशा रहेंगे, लेकिन इन सभी से बदतर कृतघ्नता का आपराध है । 

सेनेका का समकालीन, प्रेरित पौलुस शायद सहमत होता । रोमियों 1:21 में, उसने लिखा कि मानव जाति के पतन का कारण यह था कि उन्होंने परमेश्वर को धन्यवाद देने से इनकार किया । कुलुस्से की कलीसिया को लिखते हुए, पौलुस ने मसीह में साथी विश्वासियों को कृतज्ञता के प्रति चुनौती दी । उसने कहा कि हमें अधिकाधिक धन्यवाद करते” रहना है (कुलुस्सियों 2:7) । जब हम परमेश्वर की शांति को “अपने हृदय में अधिकाई से बसने” देते हैं, हम धन्यवाद के साथ प्रत्युत्तर देते हैं (3:15) । वास्तव में, धन्यवाद हमारी प्रार्थनाओं को चरितार्थ करे (4:2) । 

हमारे प्रति परमेश्वर की महान भलाइयाँ हमें जीवन की महान वास्तविकताओं में से एक की याद दिलाती है । वह न केवल हमारे प्रेम और आराधना के योग्य है, वह हमारे धन्यवादी हृदय के योग्य भी है । सब कुछ जो जीवन में अच्छा है उसी की ओर से आता है (याकूब 1:17) । 

सब कुछ के साथ जो हम मसीह में हैं, कृतज्ञता को साँस लेने के समान स्वभाविक होना चाहिए । हम उसके प्रति अपना धन्यवाद प्रगट करते हुए परमेश्वर के उदार दानों का प्रत्युत्तर दें ।