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कोई मूल्य टैग नहीं

मेरे शहर में एक छोटे से पारिवारिक सुपरमार्केट ने नए साल के दौरान गरीब लोगों को उपहार देने का फैसला किया। मार्ट ने सामान की कीमत चुकायी, और कर्मचारियों ने स्टोर को कुछ आवश्यक वस्तुओं, कपड़े और भोजन से भर दिया। जैसे ही आमंत्रित गरीब लोग मार्ट में दाखिल हुए, उन्होंने एक आवाज़ सुनी, जो कह रही थी, "कोई मूल्य टैग नहीं है, जो भी आपको चाहिए ले लीजिए। यह आज आपके लिए मुफ़्त है!" चूँकि उन्होंने कभी नए कपड़े, ताज़ा भोजन और आवश्यक वस्तुओं को मुफ़्त में दिए जाते नहीं देखा था, इसलिए उनकी कृतज्ञता वास्तव में दिल को छू लेने वाली थी।

प्रेरित पौलुस हमें बताता है कि परमेश्वर ने हमें अपने पुत्र, यीशु के द्वारा एक उपहार दिया है जो पूरी तरह से मुफ़्त है। परमेश्वर ने इस उपहार के लिए यीशु के द्वारा भुगतान किया जिसने हमें पाप और मृत्यु की शक्ति से बचाया ताकि हम हमेशा के लिए उसके साथ रह सकें (रोमियों 6:23)। परमेश्वर ने स्वयं इसकी कीमत पहले से चुकाकर हमारे लिए उद्धार को मुफ़्त कर दिया। कीमत मसीह का लहू था। क्योंकि उसने हमें छुड़ाया है और हमें अपना बना लिया है, हम अब अपने नहीं हैं, हम उसके हैं (1 कुरिन्थियों 6:20)। हमारे प्रयासों से यह मूल्यवान संभावना नहीं खरीदी जा सकती थी (इफिसियों 2:8-9)। यह पूरी तरह से उसके महान प्रेम के कारण है कि हमें और उन सभी को जो विश्वास में उसकी ओर मुड़ते हैं, उद्धार मुफ्त में दी जाती है।

जैसे सुपरमार्केट के मालिकों ने दिए गए सामान के लिए भुगतान किया, वैसे ही यीशु ने क्रूस पर हमारी जगह लेकर हमारे उद्धार की कीमत चुकाई। क्योंकि उसने ऐसा किया, हम बिना कीमत चुकाए उद्धार का उपहार प्राप्त कर सकते हैं, जैसे बिना किसी कीमत के गरीब लोगों को वह मिला जिसकी उन्हें ज़रूरत थी। जितने वे आभारी थे, आइए हम भी, उसके प्यार भरे फैसले के लिए उतने ही आभारी हों, जिसने हमें मुफ्त में अपना उद्धार प्रदान किया। —रवि एस. रात्रे

पुत्र भी उदित होता है

अर्नेस्ट हेमिंग्वे के पहले समपूर्ण उपन्यास में अत्यधिक शराब पीने वाले दोस्तों को दिखाया गया है, जिन्होंने हाल ही में प्रथम विश्व युद्ध को झेला है। उनमें युद्ध की तबाही के शाब्दिक और लाक्षणिक रूप से घावों के निशान हैं जिसे वे सहन करते हैं और पार्टियों, भव्य साहसिक कार्यों और आसपास सोने के द्वारा इसका सामना करने की कोशिश करते हैं। दर्द के असर को कम करने के लिए हमेशा शराब होती है। कोई भी खुश नहीं है।

हेमिंग्वे की पुस्तक द सन आल्सो राइजेज का शीर्षक सीधे सभोपदेशक 1:5 से आता है। सभोपदेशक में, राजा सुलैमान स्वयं को "शिक्षक" (पद.1) के रूप में संदर्भित करता है। वह देखता है, "सब कुछ व्यर्थ है" (पद. 2) और पूछता है, "उन सब परिशम से जिसे मनुष्य धरती पर करता है, उसको क्या लाभ प्राप्त होता है?” (पद.3) l सुलैमान ने देखा कि सूर्य कैसे उगता और डूबता है, हवा इधर-उधर बहती है, नदियाँ कभी संतुष्ट न होने वाले समुद्र में बहती रहती हैं (पद.5-7)। अंततः, सब कुछ भुला दिया जाता है (पद.11)।

हेमिंग्वे और सभोपदेशक दोनों ही हमें केवल इस जीवन के लिए जीने की व्यर्थता से सामना कराते हैं। हालाँकि, सुलैमान ने अपनी पुस्तक में दिव्य के उज्ज्वल संकेत बुने हैं। वहाँ स्थिरता है—और वास्तविक आशा है। सभोपदेशक हमें वैसे ही दिखाता है जैसे हम वास्तव में हैं, लेकिन यह परमेश्व को भी वैसा ही दिखाता है जैसा वह है। सुलैमान ने कहा, "जो कुछ परमेश्वर करता है वह सदा स्थिर रहेगा" (3:14) और इसमें हमारी बड़ी आशा है। क्योंकि परमेश्वर ने हमें अपने पुत्र, यीशु का उपहार दिया है।

परमेश्वर के बिना, हम एक अंतहीन, कभी संतुष्ट न होने वाले समुद्र में बह रहे हैं। उसके उदित पुत्र, यीशु के द्वारा, हमारा उसके साथ मेल हो गया है, और हमें अपना अर्थ, मूल्य और उद्देश्य पता चलता है।

टिम गुस्ताफसन

वह धार्मिक शहर

नए साल 2000 के पूर्वसंध्या पर, डेट्रॉइट में अधिकारियों ने सावधानीपूर्वक एक सौ साल पुराना टाइम कैप्सूल(Time Capsule-ऐतिहासिक रिकॉर्ड सुरक्षित रखनेवाला एक पात्र जो भविष्य में कभी खोला जा सकेगा) खोला। तांबे के बक्से के अंदर शहर के कुछ नेताओं की उम्मीद भरी भविष्यवाणियाँ थीं, जिन्होंने समृद्धि के सपने व्यक्त किए थे। हालाँकि, मेयर के संदेश ने एक अलग दृष्टिकोण पेश किया। उन्होंने लिखा, "हमें एक ऐसी आशा व्यक्त करने की अनुमति दी जाए जो बाकी सभी से बेहतर हो... [ताकि] आप महसूस कर सकें कि एक राष्ट्र, लोगों और शहर के रूप में आप धार्मिकता में बढ़े हैं, क्योंकि यही वह है जो एक राष्ट्र को ऊंचा उठाता है।"

 सफलता, खुशी या शांति से अधिक, मेयर की इच्छा थी कि भावी नागरिक वास्तव में न्यायपूर्ण और ईमानदार होने के अर्थ में विकसित हों। शायद उसने अपना संकेत यीशु से लिया, जिन्होंने उन लोगों को आशीषित किया जो उसकी धार्मिकता के प्यासे हैं (मत्ती 5:6)। लेकिन जब हम परमेश्वर के आदर्श मानक पर विचार करते हैं तो निराश होना आसान होता है।

परमेश्वर की प्रशंसा हो कि हमें बढ़ने के लिए स्वयं के प्रयास पर निर्भर होना नहीं पड़ता। इब्रानियों के लेखक ने इसे इस प्रकार कहा : “अब शान्तिदाता परमेश्‍वर . . . हर एक भली बात में सिद्ध करे, जिससे तुम उसकी इच्छा पूरी करो, और जो कुछ उसको भाता है, उसे यीशु मसीह के द्वारा हम में पूरा करे” (इब्रानियों 13:20-21)। हम जो मसीह में हैं, उसी क्षण उसके लहू से पवित्र हो जाते हैं जिस क्षण हम उस पर विश्वास करते हैं (पद.12), लेकिन वह जीवन भर हमारे दिलों में धार्मिकता का फल सक्रिय रूप से उगाता है। हम यात्रा में अक्सर लड़खड़ाते है फिर भी हम “आनेवाले नगर” की प्रतीक्षा कर रहे हैं जहाँ परमेश्वर की धार्मिकता राज करेगी (पद.14)।

—करेन पिम्पो                                               

 

व्याकुल आत्माएं, सत्य प्रार्थनाएं

जनवरी 1957 में उनके घर पर बम विस्फोट होने से तीन दिन पहले, डॉ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर के साथ एक ऐसी घटना हुई जिसने उनके जीवन को हमेशा के लिए यादगार बना दिया। एक धमकी भरा फ़ोन कॉल आने के बाद, किंग ने खुद को नागरिक अधिकार आंदोलन से बाहर निकलने की रणनीति पर विचार करते हुए पाया। फिर उन्होंने अपनी आत्मा से प्रार्थना करना शुरू कर दिया —  "मैं यहाँ उस बात के लिए खड़ा हूँ जो मुझे सही लगता है। लेकिन अब मुझे डर लग रहा है। मेरे पास कुछ भी नहीं बचा है। मैं उस बिंदु पर आ गया हूँ जहाँ मैं इसका सामना अकेले नहीं कर सकता।" उनकी प्रार्थना के बाद, एक शांत आश्वासन मिला । किंग ने कहा, "लगभग तुरंत ही मेरा डर दूर होने लगा। मेरी अनिश्चितता गायब हो गई। मैं किसी भी चीज़ का सामना करने के लिए तैयार था।"

यूहन्ना 12 में, यीशु ने कहा, "अब मेरा जी व्याकुल है" (पद.27)। वह अपने आंतरिक स्वभाव के प्रति पारदर्शी रूप से ईमानदार था; फिर भी वह अपनी प्रार्थना में परमेश्वर-केंद्रित था। “हे पिता, अपने नाम की महिमा कर” (पद.28)। यीशु की प्रार्थना परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पण था।

जब हम अपने सामने परमेश्वर का सम्मान करने या न करने का विकल्प पाते हैं तो भय और असुविधा का पीड़ा महसूस करना हमारे लिए कितना मानवीय है; जब बुद्धि के लिए रिश्तों, आदतों या अन्य पैटर्न/स्वरूप (अच्छे या बुरे) के बारे में कठोर निर्णय लेने की आवश्यकता होती है। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि हमें किस चीज़ का सामना करना पड़ा है, जब हम साहसपूर्वक परमेश्वर से प्रार्थना करते है, वह हमें हमारे और डर और असहजता पर काबू पाने और वह करने के लिए सामर्थ्य देगा जो उसको महिमा देता है—हमारी भलाई और दूसरों की भलाई के लिए।

—आर्थर जैक्सन

जीवन का मुकुट

बारह वर्षीय लीएडियानेज़ रोड्रिग्ज-एस्पाडा चिंतित थी कि उसे 5 किमी (3 मील से थोड़ा अधिक) दौड़ में देर हो जाएगी। उसकी उत्सुकता ने उसे अपने प्रारंभ समय से पंद्रह मिनट पहले हाफ-मैराथन (13 मील से अधिक!) के प्रतिभागियों के धावकों के साथ दौड़ शुरू करने को प्रेरित किया । लीएडियानेज़ अन्य धावकों की गति में गई और एक पैर दूसरे के सामने रखते गई। चार मील पर, जब समापन रेखा कहीं दिखाई नहीं दी, तब उसे एहसास हुआ कि वह एक लंबी और अधिक कठिन दौड़ में थी। बाहर निकलने के बजाय, वह बस दौड़ती रही। आकस्मिक हाफ मैराथन धावक ने अपने 13.1 मील का दौड़ पूरा किया और 2,111 धावको में से 1,885वें स्थान पर रही। अब यह है अटलता (कठिनाइयों के बावजूद कुछ करने का निरंतर प्रयास)!

यीशु में पहली सदी के कई विश्वासी सताव सहते हुए, मसीह की दौड़ से बाहर होना चाहते थे, लेकिन याकूब ने उन्हें दौड़ते रहने के लिए प्रोत्साहित किया। यदि उन्होंने धैर्य पूर्वक परीक्षा सहा, तो परमेश्वर उन्हें दोगुना इनाम देने का वादा किया (याकूब 1:4, 12)। पहला, “धीरज को अपना पूरा काम करने दो, कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ और तुम में किसी बात की घटी न रहे” (पद.4)। दूसरा, परमेश्वर उन्हें  "जीवन का वह मुकुट" देगा—पृथ्वी पर यीशु में जीवन और आने वाले जीवन में उसकी उपस्थिति में रहने का वादा (पद.12) ।

कभी-कभी ऐसा लगता है कि मसीही दौड़ वह नहीं है जिसके लिए हमने साइन अप  (शामिल होने के लिए सहमत होना) किया था - यह हमारी अपेक्षा से अधिक लंबी और कठिन है। लेकिन जब परमेश्वर हमें वह प्रदान करता है जिसकी हमें आवश्यकता है, तो हम अटल रह सकते हैं और दौड़ते रह सकते हैं।

—मार्विन विलियम्स