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हितकर सुधार

गर्मी का शुरूआती मौसम तरोताजगी वाला था, और यात्रा में मेरी पत्नी से बेहतर सहयोगी और कोई नहीं हो सकता था l लेकिन उन क्षणों की मनोहरता जल्द ही त्रासदी में बदल सकती थी यदि वह लाल और सफ़ेद चेतवानी संकेत नहीं होता जिसने मुझे सूचित किया कि मैं गलत दिशा में आगे बढ़ रहा था l क्योंकि मैंने अपनी गाड़ी पूरी रीति से मोड़ी नही थी, मैंने तुरंत “प्रवेश निषेध” का संकेत देखा जो मानों मुझे घूर रहा था l मैंने जल्दी से सुनियोजित कर लिया, परन्तु हानि के विषय सोच कर डरता हूँ जो मेरे कारण मेरी पत्नी की, मुझे, और दूसरों को होती यदि मैं उस संकेत को नज़रंदाज़ कर देता जिसने मुझे याद दिलाया कि मैं गलत मार्ग पर जा रहा था l

याकूब के समापन शब्द सुधार के महत्व पर जोर देते हैं l हममें से किसको हमारी चिंता करने वाले उन लोगों के द्वारा हमें उन पथों या कार्यों से, उन निर्णयों या इच्छाओं से “फेर लाने” की ज़रूरत नहीं पड़ी होगी जो हमें हानि पहुंचा सकती थीं? कौन जानता है कि खुद को या मित्रों को क्या नुक्सान हो सकता था, यदि किसी ने सही समय पर हिम्मत नहीं की होती l

याकूब इन शब्दों के साथ हितकर सुधार के मूल्य पर जोर देता हैं “जो कोई किसी भटके हुए पापी को फेर लाएगा, वह एक प्राण को मृत्यु से बचाएगा” (5:20) l सुधार ईश्वर की दया की अभिव्यक्ति है l दूसरों के कल्याण के लिए हमारा प्यार और चिंता हमें उन तरीकों से बात करने और कार्य करने के लिए मजबूर करे जो वह “उस (व्यक्ति) को फेर [लाने]” (पद.19) में उपयोग कर सकता है l

एक दिव्य युगल गीत

बच्चों के एक संगीत प्रस्तुति पर, मैंने एक शिक्षक और एक छात्र को एक पियानों के सामने बैठते देखा l उनका युगल गीत शुरू होने से पहले, शिक्षक झुक कर कुछ अंतिम मिनटों के निर्देशों को फुसफुसाया l जैसे ही संगीत वाद्ययंत्र से प्रवाहित हुआ, मैंने देखा कि छात्र ने एक सरल धुन बजाया, जबकि शिक्षक की संगत ने गीत में गहराई और अतिशोभा जोड़ दी l रचना के अंत के निकट, शिक्षक ने अपनी सहमति का इशारा किया l

यीशु में हमारा जीवन एक एकल प्रदर्शन की तुलना में ज़्यादातर युगल गीत की तरह है l कभी-कभी, हालाँकि, मैं भूल जाता हूँ कि वह “मेरे बगल में बैठा है,” और यह केवल उसकी सामर्थ्य और मार्गदर्शन से है कि मैं “बजा सकता हूँ l मैं अपने दम पर सभी सही तानों’ को बजाने की कोशिश करता हूँ – अपनी ताकत में परमेश्वर की आज्ञापालन करना चाहता हूँ, लेकिन इसका अंत आमतौर पर नकली और खोखला लगता है l मैं अपनी सीमित क्षमता के साथ समस्याओं को सँभालने की कोशिश करता हूँ लेकिन इसका परिणाम अक्सर दूसरों के साथ मतभेद होता है l

मेरे शिक्षक की उपस्स्थिति सम्पूर्ण फर्क डालती है l जब मैं अपनी सहायता के लिए यीशु पर भरोसा करता हूँ, तो मैं अपने जीवन को ईश्वर के प्रति अधिक सम्मानजनक पाता हूँ l मैं ख़ुशी से सेवा करता हूँ, स्वतंत्र रूप से प्यार करता हूँ, और आश्चर्यचकित हूँ जब परमेश्वर मेरे रिश्तों को आशीष देता हैं l यह उसी प्रकार है जैसे यीशु ने अपने पहले शिष्यों से कहा था, “जो मुझ में बना रहता है और मैं उसमें, वह बहुत फल फलता है” (यूहन्ना 15:5) l

हर दिन हम अपने अच्छे शिक्षक के साथ एक युगल गीत गाते हैं – यह उसकी कृपा और सामर्थ्य है जो हमारे आध्यात्मिक जीवन का माधुर्य है l

चमकनेवाली ज्योति

पाँच सप्ताह की बाइबल कक्षा के बारे में मुझे घबराहट हुई जिसे मैं स्थानीय चर्च में सिखाने के लिए तैयार हुआ था l क्या विद्यार्थी इसे पसंद करेंगे? क्या वे मुझे पसंद करेंगे? मेरी चिंता गलत ढंग से केन्द्रित थी, जिसने मुझे पाठ योजनाओं, प्रस्तुति स्लाइड्स(Slides), और क्लास विज्ञप्ति पत्रक(Handouts) को आवश्यकता से अधिक तैयार करने के लिए प्रेरित किया l फिर भी एक सप्ताह पहले तक, मैंने अभी भी कई लोगों को भाग लेने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया था l

प्रार्थना में, हालाँकि, मुझे याद दिलाया गया कि कक्षा एक ऐसी सेवा थी जो परमेश्वर पर प्रकाश डालती थी l क्योंकि पवित्र आत्मा लोगों को हमारे स्वर्गीय पिता को इंगित करने के लिए कक्षा का उपयोग करेगा, मैं सार्वजनिक बोलने के बारे में अपनी घबराहट को अलग कर सकता था l जब यीशु ने अपने चेलों को अपना पहाड़ी उपदेश में सिखाया, तो उसने उनसे कहा, “तुम जगत की क्योंति हो l जो नगर पहाड़ पर बसा हुआ है वह छिप नहीं सकता l और लोग दीया जलाकर पैमाने के नीचे नहीं परन्तु दीवट पर रखते हैं, तब उस से घर के सब लोगों को प्रकाश पहुँचता है” (मत्ती 5:14-15) l

उन शब्दों को पढ़ते हुए, मैंने आखिरकार सोशल मिडिया पर एक कक्षा की घोषणा की l लगभग तुरंत, लोगों ने पंजीकरण शुरू किया – आभार और उत्साह व्यक्त किया l उनकी प्रतिक्रियाओं को देखकर, मैंने यीशु की शिक्षा पर और अधिक विचार किया : “उसी प्रकार तुम्हारा उजियाला मनुष्यों के सामने चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में है, बडाई करें l

उस परीप्रेक्ष्य के साथ, मैंने कक्षा को आनंद के साथ पढ़ाया l मैं प्रार्थना करता हूँ कि मेरा सरल काम एक प्रकाशस्तंभ बन जाए और दूसरों को भी परमेश्वर के लिए अपना प्रकाश चमकाने के लिए प्रोत्साहित करे l

ज़रुरतमंदों को स्पर्श करें

जब मदर टेरेसा को शान्ति नोबेल पुरस्कार मिला तो यह आश्चर्य की बात नहीं थी l जैसे अपेक्षित था, उन्होंने “भूखों के नाम पर, वंचित, बेघर, दृष्टिहीन, कुष्ठ रोगियों, और जो अनचाहा महसूस करते हैं, जिनसे कोई प्यार नहीं करता, समस्त समाज में जिनकी कोई देखभाल नहीं करता” के नाम पर यह पुरस्कार प्राप्त किया l अपने जवानी के अधिकाँश समय में उन्होंने ऐसे ही लोगों की सेवा की l

परिस्थितियों की परवाह किये बिना, यीशु ने हाशिए पर जीनेवालों की देखभाल करने और उससे प्यार करने का नमूना दर्शाया l आराधनालय के अगुओं के विपरीत, जो बीमारों से अधिक सब्त के दिन के नियम का आदर करते थे (लूका 13:14), जब यीशु ने मंदिर में एक बीमार महिला को देखा, तो वह दया से द्रवित हो गया l उसने शारीरिक कमजोरी से परे परमेश्वर की सुन्दर रचना देखी जो बंधन में थी l उसने उसे अपने पास बुलाया और कहा कि वह ठीक हो गयी है l तब उसने “उस पर हाथ रखे, और वह तुरंत सीधी हो गयी और परमेश्वर की बड़ाई करने लगी” (पद.13) l उसे छूकर, उसने आराधनालय के अगुओं को परेशान किया क्योंकि वह सब्त था l सब्त के प्रभु, यीशु ने, (लूका 6:5) दया करके उस महिला को ठीक करने के लिए चुना – एक ऐसी महिला जिसने लगभग दो दशकों तक कष्ट और अपमान का सामना किया l

मुझे आश्चर्य है कि हम कितनी बार किसी को अपनी अनुकम्पा के योग्य नहीं देखते हैं l या शायद हमने अस्वीकृति का अनुभव किया है क्योंकि शायद हमने किसी और के मानक को पूरा नहीं किया हो l हम उस धार्मिक कुलीन वर्ग की तरह नहीं हो सकते जो साथी मनुष्यों की तुलना में नियमों की अधिक परवाह करते थे l इसके बजाय, यीशु के उदाहरण का अनुसरण करें और दूसरों के साथ दया प्रेम और सम्मान के साथ व्यवहार करें l