
वास्तव में दीन, वास्तव में महान
जैसे ही अमेरिकी क्रांति ने इंग्लैंड के असंभव समर्पण के साथ समाप्त हुआ, कई नेताओं और सेना के नेताओं ने जनरल जॉर्ज वाशिंगटन को एक नया शासक बनाने का प्रयास किया l दुनिया देखती रही, और सोचती रही कि क्या वाशिंगटन स्वतंत्रता और छुटकारे के अपने आदर्श से चिपका रहेगा जब सम्पूर्ण शक्ति उसकी मुट्ठी में थी l इंग्लैंड के किंग जॉर्ज ने हालाँकि एक और वास्तविकता देखी l वह आश्वस्त था कि यदि वाशिंगटन ने शक्ति खींचाव का विरोध करेगा और अपने वर्जिनिया फार्म(राष्ट्रपतियों का निवास) में लौट जाएगा, तो वह “संसार का सबसे बड़ा आदमी” होगा l राजा यह जानता था कि सत्ता के प्रति आकर्षण के विरोध की महानता का सबूत सच्ची श्रेष्ठता और गौरव का प्रतिक है l
पौलुस इस सच्चाई को जानता था और हमें मसीह के विनम्रता के तरीके का दीनता से अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित किया l यीशु “परमेश्वर के स्वरुप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा” (फिलिप्पियों 2:6) l इसके बदले, उसने अपनी सामर्थ्य को समर्पित किया, एक “दास” बन गया और “यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु . . . भी सह ली” (पद.7-8) l जिसके पास समस्त सामर्थ्य थी उसने प्रेम की खातिर उसके हर एक अंश को समर्पित कर दिया l
और फिर भी, अंतिम परिवर्तन में, परमेश्वर ने मसीह को एक अपराधी के क्रूस से आगे “अति महान भी किया” (पद.9) l यीशु, जो हमारी प्रशंसा की मांग कर सकता था या हमें आज्ञाकारी होने को विवश कर सकता था, ने एक विस्मयकारी कार्य में होकर हमारी आराधना और भक्ति को लिया l परम विनम्रता के द्वारा, यीशु ने सच्ची महानता का प्रदर्शन करके, संसार को उलट दिया l

बचाव की आवश्यकता में
इंडोनेशिया के सुलावेसी द्वीप से करीब 125 किलोमीटर (लगभग 78 मील) की दूरी पर मछली पकड़ने वाली एक झोपड़ी(fishing hut) में एलडी नाम का एक किशोर अकेले काम कर रहा था जब तेज़ हवाओं ने उसकी झोपड़ी को नाव बाँधने की जगह से उठाकर उसे समुद्र में फेंक दिया l उनतालीस दिनों तक, एलडी समुद्र में बहता रहा l हर बार जब उसने एक जहाज़ देखा, तो उसने नाविकों का ध्यान आकर्षित करने के लिए कोशिश करने के लिए अपने दीपक को चालू कर दिया, पर केवल निराशा मिली l इससे पहले कि वह कुपोषित किशोर बचाया गया लगभग दस जहाज़ उस के पास से निकल गए l
यीशु ने “एक व्यस्थापक” (लूका 10:25) से किसी के विषय जिसे बचाया जाना ज़रूरी था एक दृष्टान्त कहा l दो व्यक्ति – एक पुरोहित(याजक) और एक लेवी(याजकीय गोत्र) ने – अपनी यात्रा के दौरान एक घायल आदमी को देखा l लेकिन उसकी मदद करने की बजाए, दोनों “कतरा कर [चले गए]” (पद.31-32) l हमें इसका कारण नहीं बताया गया है l दोनों ही धार्मिक व्यक्ति थे और अपने पड़ोसी से प्रेम करने के परमेश्वर के नियम से अवश्य ही परिचित थे (लैव्यव्यवस्था 19:17-18) l शायद उन्होंने सोचा होगा कि यह कुछ अधिक खतरनाक है या शायद वे मृत शरीरों को स्पर्श करने के विषय यहूदी व्यवस्था नहीं तोड़ना चाहते थे, जिससे वे अनुष्ठानिक तौर से अशुद्ध हो जाएँ और मंदिर में सेवा न कर सकें l तुलनात्मक तौर पर, एक सामरी व्यक्ति जो यहूदियों द्वारा तुच्छ समझा जाता था – ने भलमनसी की तरह कार्य किया l उसने उस व्यक्ति को ज़रूरत में देखा और निस्वार्थ भाव से उसकी देखभाल की l
यीशु ने इस आज्ञा के साथ अपने उपदेश को समाप्त किया कि उनके शिष्यों को “भी ऐसा ही” करना है (लूका 10:37) l परमेश्वर हमें दूसरों की मदद करने के लिए प्रेम में जोखिम लेने की इच्छा दे l

किनारों पर
एक मोटरसाइकिल प्रदर्शन में जहाँ मोटरसाइकिल चलानेवालों ने असाधारण करतब दिखाए, तो देखने के लिए मुझे अपने पंजों के बल खड़ा होना पड़ा l चचारों ओर घूमकर, मैंने देखा कि तीन बच्चे पास के पेड़ पर बैठे थे, जाहिर है क्योंकि वे भी करतब को देखने के लिए भीड़ के सामने नहीं आ सकते थे l
बच्चों को अपने ऊंचे स्थान से ताकते हुए देखकर, मैं जक्कई के विषय सोचने को मजबूर हुआ, जिसे लूका एक धनी चुंगी लेनेवाले के रूप में बताता है (लूका 19:2) l यहूदी अक्सर चुंगी लेनेवालों को देशद्रोही के रूप में देखते थे क्योंकि वे रोमी सरकार के लिए साथी इस्राएलियों से कर वसूलने, के साथ अपने व्यक्तिगत बैंक खातों को भरने के लिए अक्सर अतिरिक्त धन की मांग करते थे l इसलिए शायद जक्कई को उसके समुदाय से निकाल दिया गया था l
जब यीशु यरीहो से गुज़रा, जक्कई उसे देखना चाहता था परन्तु भीड़ के कारण उसे देखने में असफल था l इसलिए, शायद निराश और अकेला महसूस करते हुए, गूलर के पेड़ पर चढ़कर उसने उसकी एक झलक पाने की कोशिश की (पद.3-4) l और वहां पर, भीड़ के किनारे, यीशु ने उसे खोज निकाला और उसके घर पर एक अतिथि होने की घोषणा की (पद.5) l
जक्कई की कहानी हमें स्मरण दिलाती है कि यीशु अपनी मित्रता और उद्धार का उपहार पेश करते हुए “खोए हुओं को ढूँढने और उनका उद्धार करने आया” (पद.9-10) l यहाँ तक कि यदि हम अपने को अपने समुदायों के किनारों पर महसूस करते हैं, “भीड़ के पीछे धकेल दिए जाते हैं,” हम आश्वस्त रहें कि, वहां भी, यीशु हमें खोज लेता है l

लाभदायक परीक्षाएँ
पन्द्रवीं सदी के मठवासी थॉमस ए. केम्पिस, अतिप्रिय उत्कृष्ट साहित्य द इमिटेशन ऑफ़ क्राइस्ट(The Imitation of Christ) में, परीक्षा(tempatation) पर एक परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हैं जो थोड़ा आश्चर्यचकित कर सकता है l दर्द और कठिनाईयों पर ध्यान केन्द्रित करने के बजाय जहाँ परीक्षा ले जा सकती है, वह लिखते हैं, “[परीक्षाएँ] लाभदायक हैं क्योंकि वे हमें नम्र बनाती हैं, वे हमें साफ़ कर सकती हैं, और वे हमें सिखा सकती हैं l” वह समझाते हैं, “जीत की कुंजी सच्ची विनम्रता और धैर्य है; उनमें होकर हम दुश्मन को मात देते हैं l”
नम्रता और धैर्य l यदि में स्वाभाविक रूप से परीक्षा का प्रत्युत्तर देता तो मसीह के साथ मेरा चलना कितना अलग होता! ज्यादातर, मैं शर्म, निराशा, और अधीर प्रयास की प्रतिक्रिया के साथ संघर्ष से बाहर आने का प्रयास करता हूँ l
परन्तु, जैसे कि हम याकूब 1 से सीखते हैं, हम जिन परीक्षाओं और आजमाईशों का सामना करते हैं, वे उद्देश्य के बिना या केवल एक खतरे के रूप में नहीं होते हैं l यद्यपि परीक्षा में हार मानने से दिल टूट सकता है तबाही हो सकती है (पद.13-15), जब हम विनम्र हृदयों से परमेश्वर की ओर मुड़कर उसकी बुद्धिमत्ता और अनुग्रह को खोजते हैं, हम पाते हैं कि वह “बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है” (पद.5) l हममें उसकी सामर्थ्य के द्वारा, हमारी परीक्षाएँ और पाप का सामना करने का संघर्ष धैर्य उत्पन्न करता है, “कि [हम] पूरे और सिद्ध हो जाएँ, और [हम] में किसी बात की घटी न रहे” (पद.4) l
जब हम यीशु में भरोसा करते हैं, भय में जीने का कोई कारण नहीं है l परमेश्वर के प्रिय बच्चों के रूप में, हम शांति पा सकते हैं जब हम उसके प्रेमी बाहों में विश्राम करते हैं, तब भी जब हम परीक्षा का सामना करते हैं l
