नाम में क्या है?
परमेश्वर के समय में, हमारे बेटे कोफ़ी का जन्म शुक्रवार को हुआ था, जो कि वास्तव में उसके नाम का अर्थ है – शुक्रवार को जन्मा लड़का l हमने उसका नाम घाना के एक मित्र, एक पास्टर के नाम पर रखा था, जिनके एकलौते बेटे की मृत्यु हो गयी थी l वह हमारे कोफ़ी के लिए लगातार प्रार्थना करते हैं l हम अत्यंत सम्मानित हैं l
किसी नाम का महत्व भूल जाना आसान है यदि आप उसके पीछे की कहानी नहीं जानते हैं l लूका 3 में, हम युसूफ के वंश में एक नाम के बारे में एक आकर्षक विवरण पाते हैं l यह वंशावली युसूफ के वंश को आदम और यहाँ तक कि परमेश्वर तक ले जाता है (पद.38) l पद 31 में हम पढ़ते हैं : “वह नातान का [पुत्र], और वह दाऊद का [पुत्र] l” यह दिलचस्प है l 1 इतिहास 3:5 में हम सीखते हैं कि नातान बतशेबा से पैदा हुआ था l
क्या यह संयोग है कि दाऊद ने बतशेबा के बच्चे का नाम नातान रखा था? पीछे की कहानी को याद करें l बतशेबा को कभी भी दाऊद की पत्नी नहीं बनना था l एक और नातान - नबी – ने बहादुरी से राजा का सामना किया जब उसने बतशेबा का शोषण किया और उसके पति की हत्या करके अपने अधिकार का दुरुपयोग किया (देखें 2 शमुएल 12) l
दाऊद ने नबी के स्पष्ट फटकार को स्वीकार किया और अपने भयानक अपराधों के लिए पश्चाताप किया l समय बीतने के साथ, वह अपने बेटे का नाम नातान रखने वाला था l कितना उपयुक्त कि यह बेतशेबा का बेटा था, और वह युसूफ, यीशु का सांसारिक पिता, के वंश में का एक था l
बाइबल में, हम परमेश्वर के अनुग्रह को हर चीज़ में बुना हुआ पाते हैं – यहाँ तक कि शायद ही कभी पढ़ी गयी वंशावली में एक अज्ञात नाम l परमेश्वर की कृपा हर जगह है l

मुझे एक कहानी सुनाइये
एक समय की बात है l ये पांच शब्द सम्पूर्ण संसार में शायद सबसे शक्तिशाली शब्दों में से हैं l एक लड़के के रूप में मेरी कुछ आरंभिक यादों में उस प्रबल वाक्यांश में भिन्नता है l मेरी माँ एक दिन बाइबल की कहानियों की एक बड़े, हार्ड कवर वाले सचित्र संस्करण [पुस्तक] के साथ आयी - माई गुड शेफर्ड बाइबल स्टोरी बुक l बत्तियाँ बुझने से पहले, प्रत्येक शाम के समय, मेरा भाई और मैं उम्मीद के साथ बैठते थे जब वह बहुत समय पहले के एक काल के विषय पढ़कर सुनाती थी जो रोचक लोगों और उनसे प्रेम करनेवाले परमेश्वर के विषय होता था l वे कहानियाँ एक लेंस बन गयीं कि हम इस बड़े महान संसार को कैसे देखते हैं l
निर्विवाद रूप से महानतम कथाकार? नासरत का यीशु l वह जानता था कि हममें से हर के भीतर कहानियों के प्रति एक गहरा लगाव है, इसलिए उसने लगातार अपने सुसमाचार को संप्रेषित करने के लिए उसको माध्यम के रूप में उपयोग किया : एक समय की बात है एक व्यक्ति था जो “भूमि पर बीज छींटे” (मरकुस 4:26) l एक समय की बात है “एक राई का दाना था” (पद.31), और एक के बाद एक कहानी l मरकुस का सुसमाचार स्पष्टता से संकेत करता है कि यीशु ने साधारण लोगों के साथ अपने संवाद में संसार को और स्पष्टता से देखने में और उनसे प्रेम करनेवाले परमेश्वर को अधिक गहराई से समझने के लिए उनकी मदद करने में कहानियों का उपयोग किया (पद.34) l
परमेश्वर की दया और कृपा का सुसमाचार दूसरों के साथ साझा करने की इच्छा रखने के लिए यह समझदारी है l कहानी के उपयोग का विरोध करना लगभग असंभव है l

आत्मा के लय में
जब मैंने पियानो ट्यूनर को उस सुन्दर भव्य पियानो को ट्यून(सुर मिलाना) करते देखा, तो मैं उस समय के विषय सोचा जब मैंने इसी पियानो को “प्रभु महान विचारूं कार्य तेरे,” गीत को अविश्वसनीय, समृद्ध माधुर्य में बजते सुना था। लेकिन अब इस वाद्य को ट्यून करने की ज़रूरत थी। जबकि कुछ एक सुर आवाज़ में सही थे, अन्य तेज़ या सपाट थे, जिससे एक अप्रिय ध्वनि पैदा हो रही थी। पियानो ट्यूनर का काम सभी कुंजियों को समान ध्वनि बजाने की नहीं थी, लेकिन यह सुनिश्चित करने के लिए कि प्रत्येक सुर की अद्वितीय ध्वनि दूसरों के साथ मिलकर एक मनभावन सामंजस्यपूर्ण सम्पूर्णता बनाने की थी।
चर्च में भी हम विसंगति के सुर देख सस्कते हैं। अद्वितीय महत्वकांक्षा या प्रतिभा वाले लोग जब एक साथ मिलते हैं, तो एक विचित असंगति पैदा कर सकते हैं। गलातियों 5 में, पौलुस ने विश्वासियों से “झगड़ा, ईर्ष्या, क्रोध, विरोध, फूट [और] डाह,” जो परमेश्वर और दूसरों के साथ संगति को नाश कर सकती है दूर करने का आग्रह किया। आगे पौलुस हमें आत्मा के फल को अपनाने के लिए उत्साहित करता है : “प्रेम, आनंद, शांति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम” (पद.22-23) l
जब हम आत्मा में जीवन जीते हैं, तब हम अनावश्यक मामलों में व्यर्थ झगड़ों को आसानी से दूर रख सकेंगे। हमारे उद्देश्य की साझा भावना हमारे मतभेदों से अधिक हो सकती है। और परमेश्वर की मदद से, हम में से प्रत्येक अनुग्रह और एकता में बढ़ सकता है क्योंकि हम अपने दिलों को उसके साथ सुर में कर सकते हैं।

निर्माणाधीन
उन्होंने अभी-अभी सड़क को फिर से बनाया है, मैंने मन में सोचा जब यातायात धीमी हो गयी अब वे उसे फिर से उखाड़ रहे हैं! तब मैंने सोचा, सड़क निर्माण कभी भी पूरा क्यों नहीं होता है? मेरा मतलब है, मैंने कभी भी ऐसा संकेत नहीं देखा, “सड़क निर्माण कंपनी ने काम पूरा कर दिया है l कृपया इस पूर्ण सड़क का आनंद लें ।”
लेकिन मेरे आध्यात्मिक जीवन में भी कुछ ऐसा ही है। मेरे आरंभिक विश्वास में, मैंने परिपक्वता के एक क्षण तक पहुँचने की कल्पना की जब मुझे यह सब पता चल जाता, कि कब मैं “आसानी से बन गया हूँ।” तीस साल बाद, मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं अभी भी “निर्माणाधीन हूँ।” हमेशा की तरह गड्ढों वाली सड़कों पर मैं ड्राइव करता हूँ, मुझे कभी भी “पूर्ण” महसूस नहीं करता हूँ। कभी-कभी यह समान रूप से निराशाजनक महसूस हो सकता है।
परन्तु इब्रानियों 10 में एक अद्भुत प्रतिज्ञा है। पद 14 कहता है, “क्योंकि उसने एक ही चढ़ावे के द्वारा उन्हें जो पवित्र किये जाते हैं, सर्वदा के लिए सिद्ध कर दिया है” (पद.14) l क्रूस पर यीशु का कार्य हमें पहले से ही बचा लिया है पूरी तरह सिद्धता से परमेश्वर की नज़रों में, हम पूर्ण और सम्पूर्ण हैं। परन्तु विरोधाभासी रूप से, वह प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई हैल हम अभी भी उसकी समानता में आकार ले रहे हैं, अभी भी “पवित्र बनाए जा रहे हैं l”
एक दिन, हम उसे आमने-सामने देखेंगे, और उसके समान होंगे (1 यूहन्ना 3:2)। परन्तु तब तक, हम अभी भी “निर्माणाधीन” हैं, लोग जो उत्सुकता से उस महिमामय दिन का इंतज़ार करते हैं जब हम में वास्तव में काम पूरा होगा।

हटना
जब मेरे पास्टर ने हमारी कक्षा से यीशु के जीवन के बारे में एक कठिन सवाल पुछा, तो मेरे हाथ खड़े हो गए। मैंने उस कहानी को हाल ही में पढ़ी थी, इसलिए मैं इसे जानता था, और मेरी इच्छा थी कि कमरे में और भी जो लोग हैं उनको भी यह मालूम हो जाए कि मैं भी जानता था। आखिरकार, मैं एक बाइबल शिक्षक हूँ। उन सब के सामने असफल होना कितना लज्जाजनक होता! अब मैं शर्मिन्दिगी के भय से लज्जा महसूस की इसलिए मैंने अपना हाथ नीचे कर लिया। क्या मैं इतना असुरक्षित हूँ?
यूहन्ना बप्तिस्मा देनेवाला हमें और बेहतर मार्ग दिखाता है। जब उसके शिष्य शिकायत करने लगे कि लोग उसे छोड़कर यीशु का अनुसरण करने लगे हैं, यूहन्ना ने कहा कि वह यह सुनकर आनंदित है। वह केवल संदेशवाहक था। “मैं मसीह नहीं, परन्तु उसके आगे भेजा गया हूँ . . . कि वह बढ़े और मैं घटू” (3:28-30)। युहन्ना ने समझ लिया था कि उसके अस्तित्व का आशय यीशु था। वह ही है “जो ऊपर से आता है” और “सर्वोत्तम है” (पद.31)। – वह दिव्य पुत्र जिसने हम सब के लिए अपने आप को दे दिया और सम्पूर्ण महिमा और प्रसिद्धि उसे प्राप्त हो।
खुद की ओर किसी भी प्रकार का ध्यानाकर्षण हमें हमारे प्रभु से ध्यान भटकाता है और चूँकि वह हमारा एकमात्र उद्धारकर्ता है और संसार के लिए एकमात्र आशा है, जो भी श्रेय हम उससे चुराते हैं वह हमें नुक्सान पहुंचाता है।