प्रश्नों के साथ आराधना करना
यात्रियों के समूह में एक लम्बी (या छोटी) यात्रा पर जाते हुए किसी के द्वारा यह पूछना असामान्य नहीं है, “क्या हम पहुँच गए हैं?” किस ने बच्चों का बड़ों के ओंठो से आते हुए इन सार्वभौमिक प्रश्नों को नहीं सुना होगा, जो अपनी मंजिल पर पहुँचने के लिए उत्सुक हैं? परन्तु सभी आयु वर्ग के लोग यही प्रश्न पूछने की ओर प्रवृत होते हैं, जब वे जीवन की चुनौतियों से थक जाते हैं, जो कभी भी समाप्त होती प्रतीत नहीं होती।
भजन संहिता 13 में ऐसी ही परिस्थिति दाऊद के साथ भी है। दो पदों में चार बार (पद 1-2) दाऊद-जिसे भुला दिए जाने, छोड दिए जाने और परास्त हो जाने का अहसास हुआ-दुखित होता है “कब तक?” पद दो में वह पूछता है, “मैं कब तक अपने मन ही मन में युक्तियाँ करता रहूँ?” भजन संहिता, जैसे यह भजन, जिनमें विलाप सम्मिलित है, हमें प्रत्यक्ष रूप से आराधना के रूप में अपने प्रश्नों के साथ प्रभु के पास आने की अनुमति देता है। आखिरकार, तनाव और दुःख के लम्बे समय में बात करने के लिए परमेश्वर से अच्छा और कौन हो सकता है? हम बीमारी, दुःख और परिजनों से दूर होने और सम्बन्धों में आई कठिनाइयों और अपने संघर्षों को उसके समक्ष ला सकते हैं।
जब हमारे पास प्रश्न हों, तब भी आराधना रुकनी नहीं चाहिए। स्वर्ग का परमप्रधान परमेश्वर हमारा स्वागत करता है कि हम अपने चिंता-युक्त प्रश्नों को उसके पास लेकर आएँl और सम्भवतः, समय के दौरान हमारे प्रश्न विनतियों और प्रभु के लिए हमारे भरोसे और स्तवन के भावों में बदल जाएँ (पद 3-6)।

आप क्या त्याग सकते हैं?
“वह कौन सी एक चीज़ है जिसे आप नहीं त्याग सकते हैं?” रेडियो पर एक होस्ट ने पूछा। श्रोताओं ने बहुत ही रोचक जवाब दिए। कुछ ने अपने परिवार बताए, पतियों ने अपनी मृत पत्नी की यादों को बताया। कुछ ने बताया कि वे अपने सपनों, जैसे कि संगीत में प्रसिद्ध होना या माँ बनना, को नहीं छोड़ सकते हैं। हम सभी के पास कुछ न कुछ है जिसे हम प्रतिदिन संजोकर रखते हैं-कोई व्यक्ति, कोई उत्साह, कोई सम्पत्ति-कोई न कोई ऐसी बात जिसे हम त्याग नहीं सकते हैं।
होशे की पुस्तक में, परमेश्वर हमें बताता है कि वह अपने चुने हुए लोग, अपने निज भाग, इस्राएल को कभी नहीं त्यागेगा। इस्राएल के प्रेमी पति के रूप में परमेश्वर ने उसे सबकुछ उपलब्ध करवाया जिसकी उसे आवश्यकता थी: भूमि, भोजन, पानी, वस्त्र और सुरक्षा। फिर भी एक व्यभिचारी पत्नी के रूप में इस्राएल ने परमेश्वर को अस्वीकार किया और अपनी खुशी और सुरक्षा कहीं ओर खोजी। जितना परमेश्वर उसके पीछे-पीछे आया, वह उतनी ही भटकती चली गई (होशे 11:2)। परन्तु यद्यपि उसने उसे बुरी तरह से आहत किया था, फिर भी वह उसे कभी नहीं त्यागेगा (पद 8)। उसका छुटकारा करने के लिए वह उसे अनुशासित करेगा; उसकी इच्छा उसके साथ सम्बन्ध को फिर से स्थापित करने की थी (पद 11)।
आज, परमेश्वर की समस्त सन्तान उसी आश्वासन को प्राप्त कर सकती है: हमारे लिए उसका प्रेम ऐसा प्रेम है जो हमें कभी जाने नहीं देगा (रोमियों 8:37-39)। यदि हम भटक कर उससे दूर हो गये हैं, तो वह हमारे वापिस लौटने के लिए इच्छा रखता हैl जब परमेश्वर हमें अनुशासित करता है, तो हमे सांत्वना मिल सकती है कि यह उसके हमारे पीछे-पीछे आने का चिह्न है, न कि उसके त्याग दिए जाने का चिह्न। हम उसके निज भाग हैं; वह हमें कभी नहीं त्यागेगा।

सामान से कुछ और अधिक बाँटना
“परन्तु मैं बाँटना नहीं चाहता!” मेरा सबसे छोटा बच्चा टूटे दिल के साथ चिल्लाया कि उसे अपने लेगो के अनेक टुकड़ों में से कुछ को बाँटना होगा। मैंने उसकी अपरिपक्वता को देखा, परन्तु वास्तविक रूप से यह नज़रिया छोटे बच्चों तक ही सीमित नहीं है। मेरे जीवन और वास्तव में मानवीय अनुभवों का कितना बड़ा हिस्सा दूसरों को स्वेच्छा और उदारता से देने से रोकने की ढिठाई से भरा हुआ है?
यीशु पर विश्वास करने वालों के रूप में, हमें अपने जीवन एक दूसरे के साथ बाँटने के लिए बुलाया गया है। रूथ ने ठीक ऐसा ही अपनी सास नाओमी के साथ किया। एक गरीब विधवा के रूप में रूथ को देने के लिए नाओमी के पास बहुत कम था। परन्तु फिर भी रूथ ने अपना जीवन अपनी सास के जीवन के साथ इस प्रकार मिलाया और शपथ ली कि वे एकसाथ सामना करेंगे और यहाँ तक कि मृत्यु भी उन्हें अलग नहीं करेगी। उसने नाओमी से कहा, “तेरे लोग मेरे लोग होंगे, और तेरा परमेश्वर मेरा परमेश्वर होगा (रूथ 1:16)। उसने प्रेम और दया दिखाते हुए उस वृद्ध महिला को दे दिया।
इस रीति से अपने जीवनों को बाँटना कठिन हो सकता है, परन्तु हमें ऐसी उदारता के प्रतिफल को स्मरण रखना चाहिए। रूथ ने अपना जीवन नाओमी के साथ बांटा, परन्तु बाद में उसने एक पुत्र, राजा दाऊद के दादा, को जन्म दिया। यीशु ने हमारे साथ अपना जीवन बांटा, परन्तु फिर ऊँचा उठाया गया और अब स्वर्ग में पिता के दाहिने हाथ से राज्य करता है। जब हम उदारतापूर्वक एक दूसरे के साथ बाँटते हैं, तो हमें निश्चय कर लेना चाहिए कि हम अभी भी बहुत अच्छा जीवन जिएँगे!

रात्रिकाल में एक गीत
मेरे पिता का जीवन लालसा रखने का जीवन था, उन्होंने सम्पूर्णता की लालसा रखी, जब पार्किन्सन की बीमारी ने उनके मस्तिष्क और शरीर को धीरे धीरे और अधिक अपंग बना दियाl उन्होंने शान्ति की लालसा की, परन्तु वह गहन उदासी की पीड़ा से पीड़ित रहेl उन्होंने प्रेम और दुलार की लालसा की, परन्तु प्राय: अकेला ही महसूस कियाl
उन्होंने अपने आप को कम अकेला महसूस किया जब उन्होंने भजन संहिता 42, उनके पसन्दीदा भजन को पढ़ा, भजनकार एक गहन लालसा और चंगाई के लिए एक अनबुझी प्यास को जानता था (पद 1-2)l उनके समान भजनकार एक उदासी को जानता था, जिसका ऐसा अहसास होता था कि वह कभी गई ही नहीं (पद 3), जिसने भरपूर आनन्द के समय को एक बहुत दूर की याद बना दिया था (पद 6)l मेरे पिता के समान, जब गड़बड़ी और पीड़ा की लहरों ने उन्हें डूबा दिया (पद 7), भजनकार ने अपने आप को परमेश्वर के द्वारा छोड़ दिया गया महसूस किया और पूछा “क्यों?” (पद 9)l
और जब भजन संहिता के शब्दों ने उन्हें प्रेरित किया और आश्वासन दिलाया कि वह अकेले नहीं थे, तब मेरे पिता ने अपनी पीड़ा में एक शान्ति के आरम्भ का अहसास कियाl उन्होंने अपने आस-पास एक मध्यम आवाज़ को सुना, एक आवाज़ जो उन्हें आश्वासन दिला रही थी कि यद्यपि उनके पास जवाब नहीं थे, यद्यपि लहरें उन्हें अभी भी डुबा रही थीं, फिर भी उन्हें स्नेह के साथ दुलारा जा रहा था (पद 8)l
और एक तरह से रात में उस मध्यम गीत को सुनना पर्याप्त थाl मेरे पिता के लिए चुपचाप आशा, प्रेम, और आनन्द की किरणों से जुड़े रहने के लिएl और यह उनके लिए उस दिन की प्रतीक्षा करने के लिए पर्याप्त था जब एक दिन उनकी अभी लालसाएँ पूरी कर दी जाएँगी (पद 5,11)l

आशा की निश्चित बुनियाद
विश्वास के सबक अनापेक्षित स्थानों से भी मिल सकते हैं-जैसे मैंने एक सबक अपने 110 पाउन्ड के लेब्राडोर रिट्रीवर “बेयर” से सीखाl बेयर का पानी का कटोरा रसोई के एक कोने में रखा हुआ थाl जब कभी यह खाली होता था, तो वह भौंकता या अपने पंजे से इसकी ओर इशारा करता थाl या वह इसके पास चुपचाप लेट जाता और इन्तजार करता थाl कई बार तो उसे अनेक मिनटों तक इन्तजार करना पड़ता था, परन्तु बेयर ने भरोसा करना सीख लिया था कि आखिरकार मैं कमरे में आऊँगा, उसे वहाँ देखूँगा, और जो कुछ उसे चाहिए वह उसे उपलब्ध करवाऊंगाl उसके साधारण से विश्वास ने मुझे परमेश्वर पर भरोसा रखने की जरूरत को याद दिलायाl
बाइबल बताती है कि “विश्वास आशा की गई वस्तुओं का निश्चय और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है” (इब्रानियों 11:1)l इस निश्चय और आश्वासन की बुनियाद स्वयं परमेश्वर है, जो “अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है” (पद 6)l उन सभी के लिए अपने वायदों को पूरा करने में परमेश्वर वफादार है जो विश्वास करते और यीशु के द्वारा उसके पास आते हैंl
कई बार “अनदेखी” वस्तुओं पर विश्वास करना आसान नहीं होता हैl परन्तु हम परमेश्वर की भलाई और उसके प्रेमी स्वभाव पर यह भरोसा करते हुए निर्भर हो सकते हैं कि उसकी बुद्धी सब बातों में सिद्ध है—तब भी जब हमें इन्जार करना पड़ता हैl जो वह कहता है उसे पूरा करने में वह वफादार है: हमारी अनन्त आत्माओं को बचाने और हमारी गम्भीर जरूरतों को पूरा करने में, इसी समय और सर्वदा के लिएl