फूल की तरह प्रफुल्लता
मेरा सबसे छोटा पौत्र केवल दो महीने का है, फिर भी हर बार जब मैं उसे देखती हूँ मैं उसमें छोटे-छोटे बदलाव पाती हूँ l हाल ही में, जब मैं उसको दुलार रही थी, वह मेरी ओर देखकर मुस्कराया! और अचानक मैं रोने लगी l शायद वह आनन्द था जो मैं अपने बच्चों की पहली मुस्कराहट के साथ याद कर रही थी l कुछ क्षण ऐसे ही होते हैं – वर्णन से बाहर l
भजन 103 में दाऊद ने एक काव्यात्मक गीत लिखा जिससे परमेश्वर की प्रशंसा के साथ इस पर भी विचार किया गया है कि हमारे जीवनों के आनंदित क्षण कितनी जल्दी गुज़र जाते हैं : “मनुष्य की आयु घास के समान होती है, वह मैदान के फूल के समान फूलता है, जो पवन लगते ही ठहर नहीं सकता, और न वह अपने स्थान में फिर मलता है” (पद. 15-16) l
परन्तु जीवन की अल्पता को जानने के बावजूद, दाऊद फूल को फलता-फूलता या बढ़ता हुआ वर्णन करता है l यद्यपि हर एक फूल अकेले ही शीघ्रता से खिलता और फूलता है, उसकी खुशबु और रंग और सुन्दरता उस क्षण को बहुत ही आनंदित करती है l और यद्यपि एक अकेला फूल शीघ्र ही भुलाया जा सकता है – “न वह अपने स्थान में फिर मिलता है” (पद.16) – तुलनात्मक तौर पर हमें निश्चय है कि “यहोवा की करुणा उसके डरवैयों पर युग युग . . . प्रगट होता रहता है” (पद.17) l
हम भी फूलों की तरह, उस क्षण में आनंदित होते और फलते-फूलते है; किन्तु हम इस सत्य का भी उत्सव मना सकते हैं कि हमारे जीवन के क्षण वास्तव में कभी भूलाए नहीं जाएंगे l परमेश्वर हमारे जीवनों के हर एक अंश को संभाले रखता है, और उसका अनंत प्रेम सदैव उसके बच्चों के साथ है l

रचनात्मकता का उत्सव
कैलिफोर्निया के बाजा के निकट चार हज़ार फीट नीचे समुद्र की गहराई में, कभी-कभी दिखाई देनेवाली जेलिफ़िश(समुद्री जीव) जल-प्रवाह के साथ नाचती हुई दिखाई देती है l गहरे रंग के जल की पृष्ठभूमि में उसका शरीर नीला, बैगनी, और गुलाबी रंगों में प्रतिदीप्त हल्की छाया के साथ दिखाई दे रहा था l उसके घंटी नुमा सिर के हर इशारे से सुन्दर स्पर्शक खूबसूरती से तरंगित हो रहे थे l जब मैं नेशनल जियोग्राफिक पर इस विशेष जेलीफिश(Halitrephes maasi) का अद्भुत दृश्य देख रही थी, मैंने इस पर विचार किया कि परमेश्वर ने किस तरह इस सुन्दर जेलिटिन के प्रकार के जंतु को ख़ास रूप दिया l उसने अन्य 2,000 प्रकार के जेलिफिश को भी रूप दिया जिन्हें वैज्ञानिकों ने अक्टूबर 2017 तक पहचाना है l
यद्यपि हम परमेश्वर को सृष्टिकर्ता के रूप में जानते हैं, क्या हम बाइबल के पहले अध्याय में प्रगट अद्भुत सच्चाई को वास्तविक रूप से समझने में काफी शिथिल हो जाते हैं? हमारे अद्भुत परमेश्वर ने रचनात्मक विविध संसार को जिसे उसने अपने वचन की सामर्थ्य से रचा था प्रकाश और जीवन दिया l उसने “जाति जाति के बड़े बड़े जल-जंतुओं की . . . भी सृष्टि की . . . जिन से जल बहुत ही भर गया” (उत्पत्ति 1:21) l वैज्ञानिक परमेश्वर द्वारा आरम्भ में रचे गए अद्भुत प्राणियों का केवल एक अंश ही खोज पाए हैं l
परमेश्वर ने संसार में प्रत्येक व्यक्ति को साभिप्राय बनाया है, हमारी पहली श्वास लेने से पूर्व हमारे जीवन के हर दिन में उद्देश्य डाला है (भजन 139:13-16) l जब हम प्रभु की रचनात्मकता का उत्सव मनाते हैं, हम उन अनेक तरीकों के विषय भी आनंदित हों जो वह हमें उसके साथ और उसकी महिमा के लिए कल्पित करने और रचने में सहायता करता है l

मित्रता के चिन्ह
घाना में बढ़ते हुए एक छोटे लड़के के रूप में, मुझे अपने पिता का हाथ पकड़कर उनके साथ भीड़-भाड़ वाले स्थानों में घूमना पसंद था l वह मेरे पिता और मेरे मित्र दोनों ही थे, क्योंकि मेरी संस्कृति में हाथ पकड़ना सच्ची मित्रता की निशानी है l एक साथ चलते हुए, हम अनेक विषयों पर बातचीत करते थे l जब मैं अकेला महसूस करता था, मैं अपने पिता के साथ तसल्ली पाता था l हमदोनों की संगति को मैं कितना अधिक महत्त्व देता था!
प्रभु यीशु ने अपने अनुयायियों को मित्र कहा, और उनको सच्ची मित्रता के चिन्ह दिखाए l उसने कहा “जैसे पिता ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही मैं ने तुम से प्रेम रखा [है]” (यूहन्ना 15:9), और उनके लिए अपना प्राण भी दिया (पद.13) l उसने उनको अपने राज्य का अर्थ बताया (पद.15) l उसने उनको सभी बातें सिखायी जो परमेश्वर ने उसे दी थी (पद.15) l और वह उन्हें उसके मिशन में साझेदारी करने का मौका दिया (पद.16) l
जीवन का सहचर होकर, यीशु हमारे साथ चलता है l वह हमारी व्यथा और हमारी इच्छा सुनता है l जब हम अकेले और निराश होते हैं, हमारा मित्र यीशु हमारे साथ संगति रखता है l
और यीशु के साथ हमारी सहचारिता और भी मजबूत होती है जब हम परस्पर प्रेम करते और उसकी आज्ञाओं को मानते हैं (पद.10, 17) l जब हम उसकी आज्ञाओं को मानते हैं, हमारा फल “बना [रहेगा] (पद.16) l
अपने संसार की भीड़ भाड़ वाली गलियों और खतरनाक मार्गों में चलते हुए, हम प्रभु के साहचर्य पर भरोसा कर सकते हैं l यह उसकी मित्रता के चिह्न हैं l

आशा पुनःस्थापित
क्या सूर्य पूरब में उदय होता है? क्या आकाश नीला है? क्या समुद्र नमकीन है? क्या कोबाल्ट(धातु) का एटॉमिक वजन 58.9 है? वाकई, उस अंतिम प्रश्न का उत्तर आप तभी जानेंगे यदि आप विज्ञान में दिलचस्पी लेते हैं या ऊपरी तौर से विवरण में दिलचस्पी लेते हैं, किन्तु उन दूसरे प्रश्नों के उत्तर स्वाभाविक हैं : वाकई l वास्तव में, इस प्रकार के प्रश्नों में आमतौर पर कटाक्ष की झलक मिली होती है l
यदि हम सावधान नहीं हैं, हमारे आधुनिक – कभी-कभी कलांत – कान उस अशक्त व्यक्ति के प्रति यीशु के प्रश्न में कटाक्ष का अंश सुन सकते हैं : “क्या तू चंगा होना चाहता है?” (यूहन्ना 5:6) l स्वाभाविक उत्तर प्रतीत हो सकता है, “क्या आप मेरे साथ मज़ाक कर रहे हैं?! मैं अड़तीस वर्षों से सहायता का इंतज़ार कर रहा हूँ!” किन्तु यहाँ पर कटाक्ष उपस्थित नहीं है, यह सच्चाई से सबसे दूर की बात है l यीशु के शब्द सदैव करुणा से भरे होते हैं, और उसके प्रश्न हमेशा हमारी भलाई के लिए होते हैं l
यीशु जानता था कि वह व्यक्ति चंगा होना चाहता था l उसे यह भी ज्ञात था कि संभवत: एक लम्बा अरसा बीतने के बाद भी किसी ने देखभाल की पेशकश नहीं की थी l दिव्य आश्चर्यक्रम के पहले, यीशु की इच्छा उसमें आशा को पुनःस्थापित करनी थी जो ठण्डी हो चुकी थी l उसने ऐसा अपेक्षाकृत प्रश्न पूछने के द्वारा किया, और उसके बाद उसे प्रतिउत्तर देने के तरीके बताकर : “उठ, अपनी खाट उठा, और चल फिर” (पद.8) l हम उस अशक्त व्यक्ति की तरह हैं, हममे से हर एक अपने जीवनों में ऐसे स्थानों पर हैं जहां आशा मुर्झा चुकी है l वह हमें देखता है और करुणा के साथ उस आशा में पुनः विश्वास करने और उसमें विश्वास करने के लिए नेवता देता है l

क्या आप वहाँ हैं?
जब माइकल की पत्नी को मरणान्तक बीमारी(Terminal illness) हो गयी, उसकी इच्छा हुयी कि वह भी उस शांति का अनुभव करे जो परमेश्वर के साथ सम्बन्ध रखने के द्वारा उसके पास थी l उसने उसके साथ अपना विश्वास साझा किया था, किन्तु उसमें रूचि नहीं थी l एक दिन, जब वह स्थानीय बुकस्टोर में गया, एक पुस्तक ने उसे अपनी ओर आकर्षित की, परमेश्वर, क्या आप वहाँ हैं? अनिश्चित कि इस पुस्तक के प्रति उसकी पत्नी का रवैया क्या रहेगा, पुस्तक खरीदने से पहले कई बार उसने दूकान के अन्दर बाहर आना जाना किया l वह चकित हुआ, उसकी पत्नी ने पुस्तक स्वीकार कर लिया l
उस पुस्तक ने उसे स्पर्श किया, और वह बाइबल भी पढ़ने लगी l दो सप्ताह बाद, माइकल की पत्नी गुज़र गयी – परमेश्वर के साथ शांति में और इस निश्चयता में कि वह उसे कभी नहीं त्यागेगा या छोड़ेगा l
जब परमेश्वर ने मूसा से अपने लोगों को मिस्र से निकलने के लिए बुलाया, उसने अपनी सामर्थ्य की प्रतिज्ञा नहीं दी l इसके बदले, उसने अपनी उपस्थिति की प्रतिज्ञा दी : “मैं तेरे संग रहूँगा” (निर्गमन 3:12) l अपने क्रूसीकरण से पूर्व यीशु ने अपने शिष्यों से परमेश्वर की अनंत ऊपस्थिति की प्रतिज्ञा की, जो वे पवित्र आत्मा द्वारा प्राप्त करेंगे (यूहन्ना 15:26) l
अनेक चीजें हैं जो परमेश्वर जीवन की चुनौतियों में हमें मदद के लिए दे सकता था, जैसे भौतिक आराम, चंगाई, या हमारी समस्याओं का त्वरित हल l कभी-कभी वह करता भी है l किन्तु खुद को देकर वह हमें सर्वोत्तम उपहार देता है l यह हमारे लिए महानतम सुख है : जीवन में जो भी हो, वह हमारे साथ रहेगा; वह हमें न छोड़ेगा और न त्यागेगा l