मसीह के लिए हृदय
मैंने खुद से कहा, जब तक मैं अपना मुंह बंद रखूंगी, मैं कुछ भी गलत नहीं करूंगी। एक सहकर्मी द्वारा कही गई बातों की गलत व्याख्या करने के बाद मैं बाहरी तौर पर उसके प्रति अपना गुस्सा दबा रहा थी । चूँकि हमें हर दिन एक-दूसरे से मिलना होता था, इसलिए मैंने अपनी बातचीत को केवल उसी तक सीमित रखने का निर्णय लिया जो आवश्यक था (और अपने मौन व्यवहार से प्रतिशोध लेता थी)। शांत आचरण गलत कैसे हो सकता है?
यीशु ने कहा कि पाप हृदय से शुरू होता है (मत्ती 15:18−20)। मेरी चुप्पी ने लोगों को मूर्ख बनाया होगा कि सब कुछ ठीक है, परन्तु परमेश्वर मूर्ख नहीं बने। वह जानते थे । कि मैं क्रोध से भरा हृदय छिपा रही हूँ। मैं उन फरीसियों के समान थी जो होठों से तो परमेश्वर का आदर करते थे, परन्तु उनके हृदय परमेश्वर से दूर थे (पद 8)। भले ही मेरा बाहरी रूप मेरी सच्ची भावनाओं को नहीं दर्शाता था, लेकिन मेरे अंदर कड़वाहट पनप रही थी। अपने स्वर्गीय पिता के साथ जो आनंद और निकटता मुझे हमेशा महसूस होती थी, वह ख़त्म हो गई। पाप को पालना और छुपाना यही यह सब उत्पन्न करता है।
परमेश्वर की कृपा से, मैंने अपने सहकर्मी को बताया कि मैं कैसा महसूस कर रही हूं और माफी मांगी। उसने बड़ी दयालुता से मुझे माफ कर दिया और अंततः हम अच्छे मित्र बन गये। यीशु कहते हैं, "बुरे विचार मन से निकलते हैं" (पद 19)। हमारे हृदय की स्थिति मायने रखती है क्योंकि वहाँ रहने वाली बुराई हमारे जीवन में प्रवेश कर सकती है। हमारा बाहरी और आंतरिक दोनों ही मायने रखता है।

परमेश्वर के सहायता अनुसार बोलना
आम तौर पर कोई तितलियों को ज़ोर से बोलने वाला जीव नहीं समझेगा: आख़िरकार, एक राजा या रानी (मोनार्क) तितली के पंखों का फड़फड़ाना व्यावहारिक रूप से सुनाई नहीं पड़ता है। लेकिन मैक्सिकन वर्षावन में, जहां उनमें से कई अपना छोटा जीवन शुरू करते हैं, उनकी सामूहिक फड़फड़ाहट आश्चर्यजनक रूप से तेज़ होती है। जब लाखों राजा या रानी तितलियां एक ही समय में अपने पंख फड़फड़ाते हैं, तो यह एक तेज़ झरने की तरह लगता है।
यही वर्णन तब होता है जब चार बहुत अलग पंख वाले जीव यहेजकेल के दर्शन में दिखाई देते हैं। यद्यपि वे तितलियों की संख्या से कम थे, वह उनके फड़फड़ाते पंखों की ध्वनि की तुलना “बहुत से तेज जल की गर्जना" से करता है (यहेजकेल 1:24)। जब प्राणी शांत खड़े रहे और अपने पंख नीचे कर लिए, तो यहेजकेल ने परमेश्वर की आवाज़ सुनी जो उसे "[इस्राएलियों को] [परमेश्वर के] वचन सुनाने" के लिए बुला रही थी (2:7)।
पुराने नियम के अन्य भविष्यवक्ताओं की तरह, यहेजकेल को, परमेश्वर के लोगों से सच बोलने का कार्य सौंपा गया था। आज, परमेश्वर हम सभी से अपने जीवन में उसके अच्छे कार्यों की सच्चाई को उन लोगों के साथ साझा करने के लिए कहता है जिन्हें वह हमारे आस-पास रखता है (1 पतरस 3:15)। कभी-कभी हमसे एक सीधा सवाल पूछा जाएगा - साझा करने का निमंत्रण जो झरने की तरह “ऊँचे स्वर वाला” होता है। अन्य समय में, निमंत्रण मन्द आवाज़ की तरह हो सकता है, जैसे किसी अनकही आवश्यकता को देखना। चाहे परमेश्वर के प्रेम को साझा करने का निमंत्रण लाखों तितलियों जितना ज़ोरदार है या केवल एक तितली की तरह शांत, हमें यहेजकेल की तरह सुनना चाहिए, कानों को यह सुनने के लिए तैयार रखना चाहिए कि परमेश्वर हमसे क्या कहना चाहता है।

स्वामी या प्रबंधक (अधिकारी) ?
"क्या मैं स्वामी हूं या प्रबंधक?" एक अरबों डॉलर की कंपनी के सी.ई.ओ ने स्वयं से यह सवाल पूछा क्योंकि उन्होंने सोचा कि उनके परिवार के लिए सबसे बेहतर क्या है। बहुत अधिक धन के साथ आने वाले प्रलोभनों के बारे में चिंतित होकर, वह अपने उत्तराधिकारियों पर उस चुनौती का बोझ नहीं डालना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपनी कंपनी का स्वामित्व(मालिकाना हक़) छोड़ दिया और 100 प्रतिशत वोटिंग स्टॉक (मताधिकार वाले शेयर) एक ट्रस्ट (किसी अन्य व्यक्ति की संपति की देखभाल के लिए, की गई वैधानिक व्यवस्था) में रख दिया। यह मानते हुए कि उनके पास जो कुछ भी है वह परमेश्वर का है, जिन्होंने उनको यह निर्णय लेने में मदद की है, कि उनका परिवार वहाँ काम करके अपनी जीविका कमा सकें और साथ ही भविष्य में मिले मुनाफ़े द्वारा मसीही सेवकाई में भी मदद कर सकें।
भजन संहिता 50:10 में, परमेश्वर अपने लोगों से कहते हैं “वन के सारे जीव-जन्तु और हज़ारों पहाड़ों के जानवर मेरे ही हैI” सभी चीज़ों के सृष्टिकर्ता के रूप में, परमेश्वर को हमसे कुछ भी नहीं चाहिए और न ही उन्हें कोई ज़रुरत ही है। वह कहते हैं। “मैं न तो तेरे घर से बैल न तेरे पशुशाला से बकरे लूँगा” (पद 9)। वे उदारतापूर्वक वह सब कुछ प्रदान करते है जो हमारे पास है और उनका उपयोग भी करते है, साथ ही जीविका कमाने के लिए शक्ति और क्षमता भी प्रदान करते है। क्योंकि वह करता है, जैसा कि भजन हमें दिखाता है, वह हमारी हार्दिक आराधना के योग्य है। परमेश्वर सभी चीज़ों के स्वामी है लेकिन अपनी भलाई के कारण जब भी कोई उनके पास आता है तब उसके साथ रिश्ते में जुड़ने के लिए परमेश्वर स्वयं को भी समर्पित करने का निर्णय लेते है । “क्योंकि मनुष्य का पुत्र इसलिये नहीं आया, कि उस की सेवा टहल की जाए, पर इसलिये आया, कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिये अपना प्राण दे।" (मरकुस 10:45) जब हम उपहारों से अधिक महत्व उपहार देने वाले को देते हैं और उन उपहारों से उसकी सेवा करते हैं, तो हम उसमें सदैव आनंदित रह कर धन्य हो जाते हैं।

लैव्यव्यवस्था भी
विषय लैव्यव्यवस्था था, और मुझे एक स्वीकारोक्ति करनी थी l मैंने अपने बाइबल अध्ययन समूह को बताया, “मैंने बहुत से हिस्सों को छोड़ दी l” “मैं त्वचा रोगों के बारे में दुबारा नहीं पढ़ रहा हूँ l”
तभी मेरे मित्र डेव ने बात की l उन्होंने कहा, “मैं एक ऐसे व्यक्ति को जनता हूँ जो उस परिच्छेद के कारण यीशु में विश्वास किया l” डेव ने बताया कि उसका डॉक्टर दोस्त नास्तिक था l उसने निर्णय लिया कि बाइबल को पूरी तरह से अस्वीकार करने से पहले, वह उसे पढ़ेगा l लैव्यव्यवस्था में त्वचा रोगों वाला भाग उन्हें आकर्षित किया l इसमें संक्रामक और गैर-संक्रामक घावों (13:1-46) और उनके इलाज के तरीके (14:8-9) के विषय में आश्चर्यजनक विवरण शामिल थे l वह जानता था कि यह तत्कालीन चिकित्सा ज्ञान से कहीं अधिक था—फिर भी यह लैव्यव्यवस्था में था l उसने सोचा, ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे मूसा यह सब जान सका l डॉक्टर ने विचार किया कि मूसा को वास्तव में उसकी जानकारी परमेश्वर से प्राप्त हुयी थी l आखिरकार उसने यीशु पर विश्वास किया l
यदि बाइबल के कुछ भाग आपको उबा देते हैं, तो ठीक है, मैं आपके साथ हूँ l लेकिन इसमें जो कुछ भी कहा गया है वह किसी कारण से हैं l लैव्यव्यवस्था इसलिए लिखी गयी थी ताकि इस्राएल जान सके कि परमेश्वर के लिए और उसके साथ कैसे रहना है l जैसे-जैसे हम परमेश्वर और उसके लोगों के बीच इस रिश्ते के बारे में और अधिक सीखते हैं, हम स्वयं परमेश्वर के बारे में सीखते हैं l
प्रेरित पौलुस (2 तीमुथियुस 3:16)) ने लिखा, “सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है और उपदेश, और समझाने, और सुधारने, और धर्म की शिक्षा के लिए लाभदायक है l” आइए आगे पढ़ें l यहाँ तक कि लैव्यव्यवस्था भी l

“मेरे अविश्वास का उपाए कर!”
“मेरा विश्वास कहाँ है?—यहाँ गहराई में भी खालीपन और अँधेरे के सिवा कुछ भी नहीं है . . . यदि ईश्वर है तो कृपया मुझे क्षमा करें l”
उन शब्दों की लेखिका आपको आश्चर्यचकित कर सकती है : मदर टेरेसा l भारत के कलकत्ता में गरीबों की एक अथक सेविका के रूप में प्रिय और प्रसिद्ध, मदर टेरेसा ने पांच दशकों तक चुपचाप अपने विश्वास के लिए एक हताश युद्ध छेड़ा l 1997 में उनकी मृत्यु के बाद, वह संघर्ष तब सामने आया जब उनकी पत्रिका के अंश कम बी माई लाईट(Come Be My Light) पुस्तक में प्रकाशित हुए l
हम ईश्वर की अनुपस्थिति के अपने संदेहों या भावनाओं के साथ क्या करते हैं? वे क्षण कुछ विश्वासियों को दूसरों की तुलना में अधिक परेशान कर सकते हैं l लेकिन यीशु में कई वफादार विश्वासियों को, अपने जीवन में किसी बिंदु पर, ऐसे संदेह के क्षणों या अवसरों का अनुभव हो सकता है l
मैं आभारी हूँ कि पवित्रशास्त्र ने हमें एक सुन्दर, असंगत/दोअर्थी प्रार्थना दी है जो विश्वास और उसकी कमी दोनों को बताती है l मरकुस 9 में, यीशु का सामना एक ऐसे पिता से होता है जिसका बेटा बचपन से ही दुष्टात्मा पीड़ित था (पद.21) l जब यीशु ने कहा कि मनुष्य में विश्वास होना चाहिए (“विश्वास करनेवाले के लिए सब कुछ हो सकता है,” पद.23), तो उस व्यक्ति ने जवाब दिया, “मैं विश्वास करता हूँ, मेरे अविश्वास का उपाय कर” (पद.24) l
वह ईमानदार, स्नेहपूर्ण विनती उनको आमंत्रित करती है जो संदेह के साथ संघर्ष करते हुए इसे ईश्वर को सौंपते हैं, विश्वास के साथ कि वह हमारे विश्वास को मजबूत कर सकता है और उन सबसे गहरी, अँधेरी घाटियों में भी हमें मजबूती से थामे रख सकता है, जिनसे हम कभी गुजरे होंगे l