परमेश्वर पर्याप्त से कहीं अधिक है
एलेन का बजट बहुत सीमित था, इसलिए उसे क्रिसमस बोनस मिलने की खुशी थी। वह काफी होता, लेकिन जब उसने पैसे जमा किए, तो उसे एक और आश्चर्य मिला। टेलर (बैंक में रुपया लेने या देने वाला) ने कहा कि क्रिसमस के उपहार के रूप में बैंक ने उसके जनवरी के बंधक भुगतान को उसके
चालू खाते में जमा कर दिया था। अब वह और ट्रे अन्य बिलों का भुगतान कर सकते हैं और किसी और को क्रिसमस का उपहार दे सकते थे!
परमेश्वर के पास हमें हमारी उम्मीद से कहीं ज़्यादा आशीष देने का तरीका है। नाओमी अपने पति और बेटों की मौत से दुखी और टूट गई थी ( रूत 1:20–21)। उसकी निराशाजनक स्थिति से बोअज़ ने बचाया, जो एक रिश्तेदार था जिसने उसकी बहू रूत से शादी की और उसके और नाओमी के लिए एक घर प्रदान कराया (4:10)।
शायद नाओमी यही उम्मीद कर सकती थी। लेकिन फिर परमेश्वर ने रूत और बोअज़ को एक पुत्र का आशीर्वाद दिया। अब नाओमी के पास एक पोता था जो उसके “जी में जी ले आनेवाला और [उसके] बुढ़ापे में पालनेवाला हो” (पद.15) । इतना ही काफ़ी होता। जैसा कि बैतलहम की महिलाओं ने कहा, "नाओमी के एक बेटा उत्पन्न हुआ है” (पद.17) l फिर छोटा ओबेद बड़ा हुआ—और “यिशै का पिता और दाऊद का दादा हुआ” (पद.17)। नाओमी का परिवार इस्राएल के शाही वंश से था, जो इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण राजवंश था! इतना ही काफ़ी होता। परन्तु दाऊद, यीश का पूर्वज बना।
यदि हम मसीह में विश्वास करते हैं, तो हम नाओमी के समान स्थिति में हैं। जब तक उन्होंने हमें छुटकारा नहीं दिलाया हमारे पास कुछ नहीं था। अब हम अपने पिता द्वारा पूरी रीती से स्वीकार किए गये हैं, जो हमें दूसरों को आशीष देने के लिए आशीष देते हैं। यह पर्याप्त से कहीं अधिक है।
—माइक विटमर
एक साधारण अनुरोध
"सोने जाने से पहले कृपया सामने का कमरा साफ कर देना", मैंने अपनी एक बेटी से कहा। तुरंत उत्तर आया, "वह क्यों नहीं करती है?"
जब हमारी बेटियाँ छोटी थीं तब हमारे घर में ऐसा हल्का विरोध अक्सर होता था। मेरी प्रतिक्रिया हमेशा एक ही थी : "अपनी बहनों के बारे में चिंता मत करो; मैंने तुम से कहा है।"
यूहन्ना 21 में, हम शिष्यों के बीच इस मानवीय प्रवृत्ति को चित्रित होते हुए देखते हैं। पतरस द्वारा तीन बार उसका इन्कार किये जाने के बाद यीशु ने पतरस को बहाल कर दिया था (यूहन्ना 18:15-18, 25-27 देखें)। अब यीशु ने पतरस से कहा, मेरे पीछे हो ले! (21:19)—एक सरल लेकिन कठिन आदेश । यीशु ने समझाया कि पतरस मृत्यु तक उसका अनुसरण करेगा (पद.18-19)।
पतरस के पास यीशु के शब्दों को समझने का समय ही नहीं था, इससे पहले उसने उसके पीछे आते शिष्य के बारे में पूछा : "हे प्रभु, इस का क्या?" (पद.21) l यीशु ने उत्तर दिया, "यदि मैं चाहूँ कि वह मेरे आने तक ठहरा रहे, तो तुझे क्या?" फिर उसने कहा, "तू मेरे पीछे हो ले।" (पद.22)।
कितनी बार हम पतरस की तरह होते हैं! हम दूसरों की विश्वास यात्राओं के बारे में सोचते हैं न कि परमेश्वर हमारे साथ क्या कर रहा है उसके बारे में । अपने जीवन के अंत में, जब यूहन्ना 21 में यीशु की मृत्यु की भविष्यवाणी बहुत करीब थी, पतरस ने मसीह के सरल आदेश को विस्तार से बताया : "आज्ञाकारी बालकों के समान अपनी अज्ञानता के समय की पुरानी अभिलाषाओं के सदृश न बनो । पर जैसा तुम्हारा बुलानेवाला पवित्र है, वैसे ही तुम भी अपने सारे चाल चलन में पवित्र बनो।"(1 पतरस 1:14-15)। यह हममें से प्रत्येक को यीशु पर ध्यान केंद्रित रखने के लिए पर्याप्त है, न कि हमारे आस-पास के लोगों पर।
- मैट लूकस

परमेश्वर आपको नहीं भूलेगा
बचपन में, मैं डाक टिकटें इकट्ठा करता था। जब मेरे अंगकोंग (फुकिएनीज़ में "दादा" के लिए) ने मेरे शौक के बारे में सुना, तो उन्होंने हर दिन अपने कार्यालय के मेल से टिकटें सहेजना शुरू कर दिया। जब भी मैं अपने दादा-दादी से मिलने जाता, अंगकोंग मुझे कई तरह के खूबसूरत टिकटों से भरा एक लिफ़ाफ़ा देता। एक बार उसने मुझसे कहा, "भले ही मैं हमेशा व्यस्त रहता हूँ, लेकिन मैं तुम्हें नहीं भूलूँगा।"
अंगकोंग को खुलेआम स्नेह दिखाने की आदत नहीं थी, लेकिन मैंने उसके प्यार को गहराई से महसूस किया। असीम रूप से गहरे तरीके से, परमेश्वर ने इस्राएल के प्रति अपने प्यार का प्रदर्शन किया जब उसने घोषणा की, "मैं तुम्हें नहीं भूलूँगा!" (यशायाह 49:15)। बीते दिनों में मूर्तिपूजा और अवज्ञा के कारण बेबीलोन में पीड़ित, उसके लोगों ने विलाप किया, "प्रभु ने मुझे भूल गया है" ( पद 14)। लेकिन अपने लोगों के लिए परमेश्वर का प्यार नहीं बदला था। उसने उन्हें क्षमा और पुनर्स्थापना का वादा किया (पद 8-13)।
परमेश्वर ने इस्राएल से कहा, “मैंने तेरा चित्र अपनी हथेलियों पर खोदकर बनाया है” जैसा कि वह आज हमसे भी कहता है (पद.16)। जब मैं उसके आश्वासन के शब्दों पर विचार करता हूं, यह मुझे गहराई से यीशु के कीलों से दागे हाथों की याद दिलाता है—जो हमारे लिए और हमारे उद्धार के लिए प्रेम में फैला हुआ था (यूहन्ना 20:24-27)। यह मुझे यीशु के कीलों से जख्मी हाथों का बहुत गहराई से याद दिलाता है- जो हमारे लिए और हमारे उद्धार के लिए प्रेम में फैला हुआ है (यूहन्ना 20:24-27)। मेरे दादाजी के टिकटों और उनके स्नेहपूर्ण शब्दों के तरह, परमेश्वर अपने प्रेम के अनन्त प्रतीक के रूप में अपना क्षमाशील हाथ बढ़ाता है। आइए हम उसके प्रेम—एक अपरिवर्तनीय प्रेम के लिए उन्हें धन्यवाद दें। वह हमें कभी नहीं भूलेगा।
—केरेन हुआंग

कलीसिया (चर्च) बनो
कोविड-19 महामारी के दौरान, डेव और कार्ला ने एक घरेलू चर्च की तलाश में महीनों बिताए। उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन किया , जिसने विभिन्न व्यक्तिगत अनुभवों को सीमित कर दिया, और इसे और भी कठिन बना दिया। वे यीशु में विश्वासियों के एक समूह से जुड़ने के लिए तरस रहे थे। कार्ला ने मुझे ईमेल किया, "यह चर्च खोजने का कठिन समय है।" मेरे भीतर अपने चर्च परिवार के साथ फिर से जुड़ने की मेरी अपनी लालसा से एक अहसास उभरा। "यह चर्च बनने का कठिन समय है," मैंने जवाब दिया। उस समय में, हमारे चर्च ने आस-पास के इलाकों में भोजन दिया, ऑनलाइन सेवाएँ बनाईं और हर सदस्य को समर्थन और प्रार्थना के साथ फ़ोन किया। मेरे पति और मैंने भाग लिया और फिर भी सोचा कि हम अपनी बदली हुई दुनिया में "चर्च होने" के लिए और क्या कर सकते हैं।
इब्रानियों 10:25 में, लेखक पाठकों से “एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें” और ज्यों-ज्यों उस दिन को निकट आते देखो, त्यों-त्यों और भी अधिक यह किया करो” की उपेक्षा न करने का आग्रह करता है । संभवतः उत्पीड़न के कारण (पद. 32-34) या शायद केवल थके होने का परिणाम (12:3), संघर्षरत प्रारंभिक विश्वासियों को कलीसिया बने रहने के लिए एक प्रोत्साहन की आवश्यकता थी।
और आज, मुझे भी एक प्रोत्साहन की आवश्यकता है। क्या आपको भी जरूरत है ? जब परिस्थितियाँ बदल जाती हैं तो हम चर्च का अनुभव कैसे करते हैं, क्या हम चर्च बने रहेंगे? जैसे परमेश्वर हमारा मार्गदर्शन करता है आइए रचनात्मक रूप से एक दूसरे को प्रोत्साहित करें और एक-दूसरे का निर्माण करें। अपने संसाधनों को साझा करें। समर्थन का संदेश भेजें। इकट्ठा हों जिस तरह हम सक्षम हैं। एक दूसरे के लिए प्रार्थना करें। आइए चर्च बने रहें ।
—एलिसा मॉर्गन
कलीसिया (चर्च) बनो
कोविड-19 महामारी के दौरान, डेव और कार्ला ने एक घरेलू चर्च की तलाश में महीनों बिताए। उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन किया , जिसने विभिन्न व्यक्तिगत अनुभवों को सीमित कर दिया, और इसे और भी कठिन बना दिया। वे यीशु में विश्वासियों के एक समूह से जुड़ने के लिए तरस रहे थे। कार्ला ने मुझे ईमेल किया, "यह चर्च खोजने का कठिन समय है।" मेरे भीतर अपने चर्च परिवार के साथ फिर से जुड़ने की मेरी अपनी लालसा से एक अहसास उभरा। "यह चर्च बनने का कठिन समय है," मैंने जवाब दिया। उस समय में, हमारे चर्च ने आस-पास के इलाकों में भोजन दिया, ऑनलाइन सेवाएँ बनाईं और हर सदस्य को समर्थन और प्रार्थना के साथ फ़ोन किया। मेरे पति और मैंने भाग लिया और फिर भी सोचा कि हम अपनी बदली हुई दुनिया में "चर्च होने" के लिए और क्या कर सकते हैं।
इब्रानियों 10:25 में, लेखक पाठकों से “एक दूसरे के साथ इकट्ठा होना न छोड़ें जैसे कि कितनों की रीति है, पर एक दूसरे को समझाते रहें” और ज्यों-ज्यों उस दिन को निकट आते देखो, त्यों-त्यों और भी अधिक यह किया करो” की उपेक्षा न करने का आग्रह करता है । संभवतः उत्पीड़न के कारण (पद. 32-34) या शायद केवल थके होने का परिणाम (12:3), संघर्षरत प्रारंभिक विश्वासियों को कलीसिया बने रहने के लिए एक प्रोत्साहन की आवश्यकता थी।
और आज, मुझे भी एक प्रोत्साहन की आवश्यकता है। क्या आपको भी जरूरत है ? जब परिस्थितियाँ बदल जाती हैं तो हम चर्च का अनुभव कैसे करते हैं, क्या हम चर्च बने रहेंगे? जैसे परमेश्वर हमारा मार्गदर्शन करता है आइए रचनात्मक रूप से एक दूसरे को प्रोत्साहित करें और एक-दूसरे का निर्माण करें। अपने संसाधनों को साझा करें। समर्थन का संदेश भेजें। इकट्ठा हों जिस तरह हम सक्षम हैं। एक दूसरे के लिए प्रार्थना करें। आइए चर्च बने रहें ।
—एलिसा मॉर्गन

अनुचित धारणा और परमेश्वर का प्रेम
“तुम वो नहीं हो जिसकी मुझे उम्मीद थी। मुझे लगा कि मैं तुमसे नफरत करूंगा, लेकिन मैं नहीं करता।” युवक के शब्द कठोर लग रहे थे, लेकिन वे वास्तव में दयालु होने का प्रयास थे। मैं उसके देश में विदेश में पढ़ रहा था, एक ऐसा देश जो दशकों पहले मेरे देश के साथ युद्ध में था। हम कक्षा में एक साथ एक सामूहिक चर्चा में भाग ले रहे थे, और मैंने देखा कि वह अलग लग रहा था। जब मैंने पूछा कि क्या मैंने उसे किसी तरह से नाराज किया है, तो उसने जवाब दिया, “बिल्कुल नहीं . . . . और यही बात है। मेरे दादा उस युद्ध में मारे गए थे, और मैं इसके लिए आपके लोगों और आपके देश से नफरत करता था। लेकिन अब मैं देखता हूं कि हम दोनों में कितनी समानताएं हैं, और यह मुझे आश्चर्यचकित करता है। मुझे नहीं लगता कि हम दोस्त क्यों नहीं हो सकते।”
अनुचित धारणा मानव जाति जैसा ही पुराना है । दो हज़ार साल पहले, जब नतनएल ने पहली बार यीशु के नासरत में रहने के बारे में सुना, तो उसकी अनुचित धारणा स्पष्ट हो गयी : उसने पूछा, “क्या कोई अच्छी वस्तु भी नासरत से निकल सकती है?” (यूहन्ना 1:46) । नतनएल यीशु की तरह गलील के क्षेत्र में रहता था। संभवतः उसने सोचा था कि परमेश्वर का मसीहा किसी अन्य स्थान से आएगा; यहाँ तक कि अन्य गलीली लोगों ने भी नासरत को नीची दृष्टि से देखा क्योंकि यह एक साधारण छोटा सा गाँव लग रहा था।
इतना तो स्पष्ट है, नतनएल के प्रतिक्रिया ने यीशु को उससे प्रेम करने से नहीं रोका, और जब वह यीशु का शिष्य बना, वह बदल गया। नतनएल ने बाद में घोषणा किया “तू परमेश्वर का पुत्र हे;” (पद.49)। ऐसी कोई अनुचित धारणा नहीं है जो परमेश्वर के परिवर्तनकारी प्रेम के विरुद्ध खड़ी हो सके।
—जेम्स बैंक्स