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मोनस्ट्रो द गोल्डफिश

लेसी स्कॉट अपने स्थानीय पालतू जानवरों की दुकान पर थी जब टैंक के तल पर एक उदास मछली ने उसकी नज़र पकड़ी। उसकी शल्क काली पड़ गई थी और उसके शरीर पर घाव हो गए थे। लेसी ने दस साल की मछली को बचाया, उसका नाम "मॉन्स्ट्रो" रखा, और उसे एक "अस्पताल" टैंक में रखा, जहाँ हर दिन उसका पानी बदला जाता था। धीरे-धीरे, मॉन्स्ट्रो में सुधार आया, उसने तैरना शुरू किया, और आकार में बढ़ने लगा। उसके काले शल्क सुनहरे रंग में बदल गए। लेसी की प्रतिबद्ध देखभाल के कारण, मॉन्स्ट्रो नया बन गया !

लूका १० में, यीशु एक यात्री की कहानी बताता है जिसे पीटा गया, लूटा गया, और मृत अवस्था में छोड़ दिया गया। एक याजक और एक लेवी दोनों, उस आदमी की पीड़ा को नज़रअंदाज़ करते हुए वहाँ से गुज़र गए। परन्तु एक सामरी-एक तिरस्कृत लोगों के समूह का सदस्य-उसकी देखभाल करता है, यहाँ तक कि उसकी ज़रूरतों का भी पूरा दाम चुकाता है (लूका १०:३३-३५)। कहानी में सामरी को सच्चे "पड़ोसी" के रूप में घोषित करते हुए, यीशु ने अपने सुननेवालों को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किया।

लेसी ने एक मरती हुई सुनहरी मछली के लिए जो किया, वह हम अपने आसपास के जरूरतमंद लोगों के लिए कर सकते हैं। बेघर, बेरोजगार, विकलांग और एकाकी "पड़ोसी" जिन्हें हम अपनी राह में पाते हैं। हम होने दे की उनकी उदासी को हमारी आँखे पकड़ सके और एक मित्रतापूर्ण चिंता हमारा उनके प्रति प्रतिउत्तर हो। एक दया से भरा अभिवादन। एक साझा भोजन। हथेली से हथेली में कुछ पैसे पहुँचाना। दूसरों को अपना प्रेम प्रदान करने के लिए परमेश्वर हमारा उपयोग कैसे कर सकता है, एक ऐसा प्रेम जो सभी चीजों को नया बना सकता है?

आपदा द्वारा खींचा जाना

१७१७ में, एक विनाशकारी तूफान कई दिनों तक चला, जिससे उत्तरी यूरोप में व्यापक बाढ़ आ गई। नीदरलैंड, जर्मनी और डेनमार्क में हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई। इतिहास कम से कम एक स्थानीय सरकार द्वारा उस समय के लिए एक दिलचस्प और प्रथागत प्रतिक्रिया का खुलासा करता है। डच शहर ग्रोनिंगन के प्रांतीय अधिकारियों ने आपदा के जवाब में "प्रार्थना दिवस" ​​का आह्वान किया। एक इतिहासकार बताता है कि नागरिक चर्चों में इकट्ठा होते थे और “वचन सुनते थे, भजन गाते थे, और घंटों प्रार्थना करते थे।”

भविष्यवक्ता योएल यहूदा के लोगों द्वारा सामना की गई एक भारी आपदा का वर्णन करता है जो उन्हें प्रार्थना की ओर ले गयी। टिड्डियों के एक बड़े झुंड ने देश को ढँक दिया था और "[उसकी] दाखलताओं को उजाड़ दिया था और [उसके] अंजीर के पेड़ों को नष्ट कर दिया था" (योएल १:७)। जब वह और उसके लोग तबाही से घबराए हुए थे, योएल ने प्रार्थना की, “हे प्रभु, हमारी सहायता कर!” (१:१९)। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से, उत्तरी यूरोप और यहूदा दोनों के लोगों ने आपदाओं का अनुभव किया जो पाप और इस पतित संसार के प्रभाव से उत्पन्न हुई (उत्पत्ति ३:१७-१९; रोमियों ८:२०-२२)। परन्तु उन्होंने यह भी पाया कि इन समयों ने उन्हें परमेश्वर को पुकारने और प्रार्थना में उसकी खोज करने के लिए उन्हें प्रेरित किया (योएल १:१९)। और परमेश्वर ने कहा, “अब भी . . . पूरे मन से मेरी ओर फिरो" (२:१२)।

जब हम कठिनाइयों और विपत्ति का सामना करते हैं, तब हम परमेश्वर की ओर मुड़े —हो सकता है पीड़ा में, हो सकता है पश्चाताप में। "दयालु" और "प्रेम से भरपूर" (पद १३), वह हमें अपनी ओर खींचता है—वह आराम और सहायता प्रदान करता है जिसकी हमें आवश्यकता है।

अगम्य धन

मंगल और बृहस्पति के बीच के ग्रहपथ में खरबों और खरबों डॉलर का एक क्षुद्रग्रह तेज़ी से गुज़रता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि १६ साइके(क्षुद्रग्रह) में सोना, लोहा, निकल और प्लैटिनम जैसी धातुएं हैं, जिनकी कीमत अथाह है। अभी के लिए, पृथ्वीवासी इस समृद्ध संसाधन का खनन करने का प्रयास नहीं कर रहे हैं, लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका मूल्यवान चट्टान की छानबीन करने के लिए एक जांच भेजने की योजना बना रहा है।

लेकिन उस धन की संभावना के बारे में क्या जो हमारी पहुँच के भीतर है? क्या हर कोई इसके लिए नहीं जाएगा? रोम की पहली सदी की कलीसिया को लिखते हुए, प्रेरित पौलुस ने प्राप्य धन के बारे में बात की—जो हम परमेश्वर के साथ अपने संबंध में पाते हैं। उन्होंने लिखा, "ओह, परमेश्वर का धन और बुद्धि और ज्ञान क्या ही गंभीर है!" (रोमियों ११:३३)।बाइबल विद्वान जेम्स डेनी  इस धन को इस तरह वर्णित करते है कि “प्रेम का अगम्य धन जो परमेश्वर को सक्षम करता है . . . दुनिया की [बड़ी ज़रूरतों] को पूरा करने से भी कहीं अधिक।”

क्या हमें इसकी आवश्यकता नहीं है - कुछ दूर के क्षुद्रग्रह से सोने की डली से भी ज्यादा? पवित्र आत्मा की सहायता द्वारा हम परमेश्वर के ज्ञान और बुद्धि के धन को प्राप्त कर सकते हैं जो पवित्रशास्त्र में मिलते है । परमेश्वर हमें इस धन को खोदने और उसे और अधिक जानने और संजोने के लिए अगुवाई करे।

साहसपूर्वक खड़े रहना

भारत का इतिहास महिलाओं के खिलाफ कई अपराधों को दर्ज करता है। महिलाओं और हाशिए पर पड़े लोगों के अधिकारों को अनदेखा किया गया था। लेकिन पंडिता रमाबाई, १९ वीं शताब्दी के अंत में एक नई विश्वासी, इन समस्याओं से दूर हटने के बजाय अपने विश्वास का प्रयोग करने और आर्य महिला समाज शुरू करके इस मुद्दे को साहसपूर्वक संबोधित करने का चुनाव करती है। उन्होंने कई बाधाओं और खतरों के बावजूद महिलाओं की शिक्षा और मुक्ति के लिए अथक प्रयास किये। जैसा कि उन्होंने एक बार कहा था, "परमेश्वर के लिए पूरी तरह से समर्पित जीवन में कोई भी डर नहीं होता, खोने के लिए कुछ  भी  नहीं होता और पछतावा करने के लिए कुछ भी नहीं है।"

जब एस्तेर, फारस की रानी, एक कानून के खिलाफ बोलने से हिचकिचा रही थी जो उसके लोगों के नरसंहार को अधिकृत करता था, तो उसे उसके चाचा ने चेतावनी दी थी कि अगर वह चुप रही, तो वह और उसका परिवार बच नहीं पाएगा, लेकिन नष्ट हो जाएगा (एस्तेर ४:१३-१४)। यह जानते हुए कि यह साहसी होने और कुछ करने का समय था, मोर्दकै ने कहा, " क्या जाने तुझे ऐसे ही कठिन समय के लिये राजपद मिल गया हो?" (पद १४) । चाहे हमें अन्याय के खिलाफ बोलने के लिए या किसी ऐसे व्यक्ति को क्षमा करने के लिए बुलाया जाए जिसने हमें संकट में डाला हो, बाइबल हमें आश्वासन देती है कि चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में, परमेश्वर हमें कभी नहीं छोड़ेगा और न ही त्यागेगा (इब्रानियों १३:५-६)। जब हम उन क्षणों में सहायता के लिए परमेश्वर की ओर देखते हैं जहाँ हम भयभीत महसूस करते हैं, तो वह हमें हमारे कार्य को अंत तक देखने के लिए "शक्ति, प्रेम और आत्म-अनुशासन" देगा (२ तीमुथियुस १:७)।

नम्रता सत्यता है

एक दिन इस बात पर विचार करते हुए कि परमेश्वर नम्रता को इतना अधिक महत्व क्यों देता है, सोलहवीं शताब्दी की अविला की टेरेसा नामक एक विश्वासी ने अचानक इसके उत्तर को महसूस किया: "ऐसा इसलिए है क्योंकि ईश्वर सर्वोच्च सत्यता है, और नम्रता सत्यता है। . . .हममें कुछ भी भला हमारे कारण से नहीं उत्पन होता। बल्कि, यह अनुग्रह के जल से आता है, जिसके समीप आत्मा रहती है, जैसे नदी के किनारे लगाए गए पेड़, और उस सूर्य से जो हमारे कार्यों को जीवन देता है।” टेरेसा ने निष्कर्ष निकाला कि यह प्रार्थना के द्वारा है कि हम स्वयं को उस वास्तविकता में स्थिर करते हैं, क्योंकि "प्रार्थना की संपूर्ण नींव नम्रता है। जितना अधिक हम प्रार्थना में स्वयं को नम्र करेंगे, उतना ही अधिक परमेश्वर हमें ऊपर उठायेगा।”

नम्रता के बारे में टेरेसा के शब्द याकूब ४ में पवित्रशास्त्र की भाषा को प्रतिध्वनित करते हैं, जहां याकूब ने घमड़ और स्वार्थी महत्वाकांक्षा के आत्म-विनाशकारी स्वभाव के बारे में चेतावनी दी थी, जो परमेश्वर की दया पर निर्भर होकर जीने वाले जीवन के विपरीत है (पद १-६)। उसने जोर देकर कहा कि लालच, निराशा और निरंतर संघर्ष के जीवन का एकमात्र समाधान परमेश्वर की दया के बदले अपने घमड़ से पश्चाताप करना है। या, दूसरे शब्दों में, "अपने आप को प्रभु के सामने दीन" करने के लिए, इस आश्वासन के साथ कि "वह तुम्हें शिरोमणि बनाएगा" (पद १०)।

केवल जब हम अनुग्रह के जल में निहित होते हैं तो हम स्वयं को "स्वर्ग से आने वाले ज्ञान" से पोषित पाते हैं (३:१७)। केवल उसी में हम स्वयं को सत्य के द्वारा ऊपर उठा पाते हैं।