लम्बी छाया
कई वर्ष पूर्व, हमदोनों पति-पत्नी और अन्य चार ब्रिटेन वासी जोड़े इंग्लैंड के एकांतयॉर्कशायर डेल्स के एक ग्रामीण होटल में ठहरे थे l हम एक दूसरे से अपरिचित थे l रात्री भोजन पश्चात् बैठक में कॉफ़ी पीते समय, हमारी बातचीत एक प्रश्न के साथ व्यवसाय में बदल गई “आप क्या करते हैं?” उस समय मैं शिकागो में मूडी बाइबिल इंस्टीट्यूट का अध्यक्ष था l मेरा अनुमान था कि वहाँ पर सभी मूडी बाइबिल इंस्टीट्यूट या उसके संस्थापक डी.एल. मूडी से अपरिचित थे l इंस्टीट्यूट का नाम बताने पर उनका प्रतिउत्तर त्वरित और चौकाने वाला था l “मूडी और शैंकी ... वह मूडी?” एक अन्य अतिथि बोला, “हमारे पास शैंकी गीतावली है और हम पियानो के चारों ओर खड़े होकर उसमें से गाते हैं l” मैं चकित हुआ! डिवाईट मूडी और उसका संगीतकार आयरा शैंकी ने ब्रिटिश आइल्स में 120 वर्ष पूर्व सभाएं आयोजित की थी, और उनका प्रभाव वर्तमान में भी था l
मैं उस रात उस कमरे से जाते समय सोचता रहा कि किस तरह हमारे जीवन परमेश्वर के लिए प्रभाव की लम्बी छाया छोड़ते हैं-बच्चों पर प्रार्थना करनेवाली माँ का प्रभाव, एक सहकर्मी का उत्साहित करनेवाले शब्द, एक शिक्षक का सहयोग और चुनौती, मित्र के प्रेमी किन्तु उपचारात्मक शब्द l अदभुत प्रतिज्ञा में भूमिका निभाना उच्च सौभाग्य है कि “उसकी करुणा ... पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहती है” (भजन 100:5) l
जीवन पाना
रवि के पिता के शब्दों ने गहरी चोट दी l “तुम पूर्ण विफल और परिवार के लिए शर्मिन्दी हो l” उनके प्रतिभावान बच्चों की तुलना में, रवि कलंक के रूप में देखा जाता था l वह खेल में माहिर बनना चाहा, और बना भी, किन्तु पराजित महसूस किया l वह सोचने लगा, उसका क्या होगा? क्या मैं पूरी तौर से नाकामयाब हूँ? क्या बिना कठिनाई के अपने जीवन से बच सकता हूँ,? ऐसे विचार उसको कचोटते थे, किन्तु वह चुप रहा l उसकी संस्कृति ने उसे सिखाया था, “अपने व्यक्तिगत दर्द को व्यक्तिगत” रखना; “अपने टूटते संसार को संभालना l”
इसलिए रवि अकेले संघर्ष करता रहा l आत्म-हत्या के प्रयास के बाद हॉस्पिटल में स्वास्थ्य प्राप्त करते समय, एक मिलनेवाले ने उसे बाइबिल में यूहन्ना 14 खोलकर दी l उसकी माँ ने रवि को यीशु के शब्द पढ़कर सुनाए : “इसलिए कि मैं जीवित हूँ, तुम भी जीवित रहोगे” (पद.19) l उसने सोचा, “यह मेरी आख़िरी आशा होगी l जीवन का एक नया तरीका l जीवन के रचनाकार द्वारा परिभाषित जीवन l इसलिए उसने प्रार्थना किया, “यीशु, यदि आप वास्तविक जीवन देनेवाले हैं, मैं ठहरूँगा l”
जीवन निराशाजनक क्षण लाता है l किन्तु रवि की तरह, हम यीशु में आशा प्राप्त कर सकते हैं जो “मार्ग सत्य और जीवन हैं” (पद.6) l परमेश्वर हमें समृद्ध और संतुष्ट जीवन देना चाहता है l
आशीष की घाटी
फ़्रांसीसी कलाकार हेनरी मातिस्से के अनुसार उसके जीवन के अंतिम वर्षों के उसके कार्य उसका सही निरूपण थे l उन दिनों में उसने एक नयी शैली में रंग के स्थान पर कागज़ की सहायता से रंगीन, लम्बे तस्वीर बनाए l उसने इन तस्वीरों से अपने कमरे के दीवार सजाए l कैंसर से पीड़ित होने के कारण यह महत्वपूर्ण था क्योंकि वह ज्यादातर बिस्तर पर सीमित रहता था l
बीमारी, नौकरी खो देना, या कोई बड़ी मुसीबत कुछ उदहारण हैं जिसे कुछ लोग “घाटी में रहना,” कहते हैं, जहाँ खौफ की छाया रहती है l यहूदा के लोग आक्रामक सेना को आते देख ऐसा ही अनुभव किया (2 इतिहास 20:2-3) l उनके राजा ने प्रार्थना की, “यदि ... विपत्ति हम पर पड़े, तौभी हम ... तेरी दोहाई देंगे, और तू सुनकर बचाएगा” (पद.9) l परमेश्वर ने उत्तर दिया, “कल [अपने शत्रुओं का] सामना करने को चलना और यहोवा तुम्हारे साथ रहेगा” (पद.17) l
यहूदा की सेना के युद्धभूमि में आने से पूर्व, उनके शत्रु अपना नाश कर डाले l परमेश्वर के लोगों ने तीन दिनों तक परित्यक्त सामग्री, कपड़े और महत्वपूर्ण वस्तुएँ इकट्ठे किये l उस स्थान को छोड़ने से पूर्व वे मिलकर परमेश्वर की प्रशंसा की और उस स्थान का नाम “बराका की तराई,” अर्थात् “आशीष” रखा l
परमेश्वर हमारे जीवनों के निम्नतम बिंदु में भी साथ रहता है l वह इन घाटियों में आशीष देता है l
पाने के लिए खोना
जब मैं अपने अंग्रेज मंगेतर से विवाह करके ग्रेट ब्रिटन में रहने लगी, मैंने सोचा यह विदेश में पंच-वर्षीय रोमांच होगा l मैंने कभी नहीं सोचा कि मैं लगभग बीस वर्षों से यहाँ लगातार रहूँगी, या कभी-कभी इस अहसास के साथ कि मैंने अपने परिवार और मित्र, कार्य, और समस्त परिचित बातों को अलविदा कही थी l किन्तु जीवन के पुराने तरीके छोड़कर, मैंने एक बेहतर जीवन पाया है l
यीशु ने अपने शिष्यों से प्रतिज्ञा की कि जीवन पाने का उल्टा उपहार है, जब हम खोकर पाते हैं l जब उसने बारह शिष्यों को सुसमाचार सुनाने हेतु भेजा, उसने उनसे उसे अपने माता या पिता, बेटा या बेटी से अधिक प्रेम करने को कहा (मत्ती 10:37) l उसके शब्द एक ऐसी संस्कृति में कही गई जहाँ परिवार समाज की आधारशिला थी और अत्यधिक महत्वपूर्ण l किन्तु उसकी प्रतिज्ञा थी कि वे उसके लिए अपना जीवन खोकर, उसे प्राप्त करेंगे (पद.39) l
मसीह में खुद को पाने के लिए हमें विदेश नहीं जाना पड़ेगा l सेवा और समर्पण द्वारा-जैसे शिष्य परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाने हेतु तैयार थे-हम प्रभु को देने से अधिक प्रभु के उदार प्रेम के कारण अधिक प्राप्त करते हैं l अवश्य ही वह हमसे प्रेम करता है चाहे हम जितनी भी उसकी सेवा करें, किन्तु दूसरों के लिए अपने को समर्पित करके हम संतोष, अर्थ, और तृप्ति पातें हैं l
आंधी में बढ़ना
हवा के बगैर संसार में, झील शांत रहते l पेड़ों के गिरते पत्ते सड़कों पर नहीं फैलते l किन्तु शांत हवा में, क्या कोई पेड़ गिरता? एरिज़ोना के मरुस्थल में बायोस्फीयर 2 नामक एक हवा रहित कांच के तीन एकड़ बड़े बुलबुले में ऐसा ही हुआ l उसमें लगे पेड़ स्वाभाविक से अधिक तेज बढ़कर अचानक अपने ही बोझ से गिर गए l प्रोजेक्ट शोधकर्ताओं के अनुसार इन पेड़ों को मजबूती हेतु हवा का दबाव चाहिए था l
यीशु ने अपने शिष्यों का विश्वास मजबूत करने हेतु उनको तूफ़ान का अनुभव करने दिया (मरकुस 4:36-41) l एक रात परिचित झील में, अचानक आया तूफ़ान अनुभवी मछुआरों पर भारी पड़ा l आंधी और पानी से नाव भारी संकट में थी, जबकि थकित यीशु पिछले भाग में सो रहा था l उन्होंने घबराकर उसे जगाया l क्या उनके गुरु को उनकी चिंता नहीं थी? वह क्या सोच रहा था? तब उन्होंने जानना चाहा l यीशु ने आंधी और पानी को शांत करके मित्रों से पुछा कि उनको अब तक विश्वास क्यों नहीं था l
यदि आंधी चली नहीं होती, शिष्य कभी नहीं पूछे होते, “यह कौन है कि आंधी और पानी भी उसकी आज्ञा मानते हैं?” (मरकुस 4:41) l
आज, जीवन का एक सुरक्षित बुलबुले में होना अच्छा लग सकता है l किन्तु परिस्थिति की आंधी की चीख में उसके “शांत रह” का खुद अनुभव किये बगैर हमारा विश्वास कितना मजबूत होगा?
स्मरण रखें कब
हमारा बेटा नशीली दवाओं की लत से सात वर्षों तक संघर्ष करता रहा, और उन दिनों में मेरी पत्नी और मैं अनेक कठिन दिनों का अनुभव किये l जब हम उसकी आरोग्यता के लिए प्रार्थना करके ठहरे रहे, हमने छोटी-छोटी जीत का उत्सव मनाना सीखा l चौबीस घंटे में कुछ बुरा नहीं होने पर, हम एक दूसरे से बोलते, “आज का दिन अच्छा था l” यह छोटा वाक्य परमेश्वर की छोटी-से-छोटी सहायता के लिए धन्यवादी बनने की ताकीद बन गयी l
भजन 126:3 में परमेश्वर की कोमल करुणा की और बेहतर ताकीद है और वे हमारे लिए आख़िरकार क्या अर्थ रखते हैं : यहोवा ने हमारे साथ बड़े बड़े काम किये हैं; और इससे हम आनंदित हैं l” क्रूस पर यीशु की करुणा को स्मरण करते हुए यह पद हमारे लिए कितनी बड़ी ताकीद है! किसी भी प्राप्त दिन की कठिनाइयाँ इस सच्चाई को बदल नहीं सकती कि जो भी आए, हमारे प्रभु ने हमें अगम दयालुता दिखाई है, और “उसकी करुणा सदा की है” (भजन 136:1) l
कठिन परिस्थिति से निकलकर परमेश्वर की विश्वासयोग्यता अनुभव करने के बाद, हमें जीवन में आनेवाली कठिनाई में बहुत अधिक सहायता मिलती है l हमें यह ज्ञात नहीं परमेश्वर हमारी परिस्थिति में हमें कैसे ले चलेगा, किन्तु अतीत में उसकी करुणा हमें उसकी सहायता का भरोसा देता है l
कुछ छिपा नहीं
2015 में एक अंतर्राष्ट्रीय शोध कंपनी का कथन था कि पूरे विश्व में दो करोड़ पैंतालिस लाख निगरानी कैमरे लगे हुए हैं, और इनकी संख्या प्रतिवर्ष 15 फीसदी की दर से बढ़ रहा है l इसके अलावा, करोड़ों लोग अपने स्मार्टफोन से हर दिन, जन्मदिन उत्सव से लेकर बैंक डकैती तक की तस्वीर खींचते हैं l चाहे हम बढ़ी हुई सुरक्षा की सराहना करें या क्षीण एकान्तता की निंदा करें, हम वैश्विक, कैमरा-सर्वत्र समाज में रहते हैं l
नये नियम की पुस्तक इब्रानियों के अनुसार परमेश्वर के साथ हमारे सम्बन्ध में, हम कैमरे की आँख की चौकसी की तुलना में खुलासा और जबाबदेही का बृहद स्तर अनुभव करते हैं l दो धारी तलवार की तरह, उसका वचन, हमारे व्यक्तित्व के गहराई को बेधता है जहाँ वह “मन की भावनाओं और विचारों को जाँचता है l सृष्टि की कोई वस्तु उससे छिपी नहीं है वरन् जिस से हमें काम है, उसकी आँखों के सामने सब वस्तुएँ खुली और प्रगट हैं” (इब्रा. 4:12-13) l
क्योंकि हमारा उद्धारकर्ता यीशु बिना पाप किये हमारी निर्बलताओं और परीक्षाओं का अनुभव किया, हम “अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बांधकर चलें कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएँ जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे” (पद. 15-16) l हमें उससे डरने की ज़रूरत नहीं किन्तु उसके निकट आने पर अनुग्रह हेतु आश्वस्त रहें l
मिलकर कार्य करें
मेरी पत्नी शकरकंद, अजवाइन के पत्ते, मशरूम, गाजर, और प्याज को मिलाकर, धीमी आंच पर दम किया हुआ बेहतरीन माँसाहारी भोजन बनाती है l छः या साथ घंटे बाद घर खुशबु से भर जाता है, और पहला स्वाद बेहतरीन होता है l मेरे लिए यह फाएदेमंद है जब धीमी आंच पर समस्त सामग्री से ऐसा लाभ मिलता है जो अकेले प्राप्त नहीं किया जा सकता था l
जब पौलुस ने दुःख के सन्दर्भ में “सब ... मिलकर” वाक्यांश उपयोग किया, उसने उस शब्द का उपयोग किया जिससे शब्द सहक्रियता मिलता है l उसने लिखा, “हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं : अर्थात् उन्हीं के लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं” (रोमियों 8:28) l वह रोमियों को जताना चाहता था कि परमेश्वर उनके दुःख का कारण नहीं है, वह उनकी सर्वश्रेष्ठ भलाई के लिए, उनकी हर परिस्थिति को अपने दिव्य योजना के साथ सहयोग करने देगा l पौलुस द्वारा बताई गई भलाई स्वास्थ्य, धन, प्रसस्ती, या सफलता के अस्थायी आशीष नहीं थे, किन्तु “उसके पुत्र के स्वरुप में” में बनना था (पद.29) l
हम धीरज धरें और भरोसा रखें क्योंकि हमारा स्वर्गिक पिता सब दुःख, बिमारी, बुराई को अपनी महिमा और हमारे आत्मिक भलाई के लिए उपयोग करेगा l वह हमें यीशु के समान बनाना चाहता है l
यों ही दयालुता के कार्य
कुछ लोगों के अनुसार अमरीकी लेखिका ऐन हर्बर्ट ने 1982 में एक रेस्टोरेंट में मेजपोश पर यों ही यह वाक्यांश लिख दी “यों ही भलाई और खूबसूरती के अर्थहीन काम करें l” उस समय से यह मनोभाव फिल्म और साहित्य द्वारा लोकप्रिय बनाया गया है और हमारे शब्दावली का हिस्सा बन गया है l
प्रश्न उठता है “क्यों?” हम दया क्यों दिखाएं? यीशु के अनुयायियों के लिए, उत्तर स्पष्ट है : परमेश्वर की करुणा और दयालुता प्रकट करने हेतु l
यह सिद्धांत पुराने नियम की मोआब की एक प्रवासिन, रूत, की कहानी में है l वह विदेशी एक अपरिचित देश में रहती थी जिसकी भाषा और संस्कृति उस से परे थी l इसके अतिरिक्त, वह बहुत निर्धन थी, लोगों के दान पर निर्भर जो उसकी सुधि कम ही लेते थे l
हालाँकि, एक इस्राएली ने रूत पर अनुग्रह करके उसके हृदय को छुआ (रूत 2:13) l वह उसे अपने खेत में अनाज बीनने दिया, किन्तु सरल उपकार से बढ़कर, उसने अपनी सहानुभूति द्वारा परमेश्वर की कोमल करुणा प्रकट की, जिसकी छाया में वह आश्रय पा सकती थी l वह बोअज की दुल्हन बनी, परमेश्वर के परिवार का हिस्सा, और उस वंसज का एक भाग जिससे यीशु था, जो संसार के लिए उद्धार लेकर आया (देखें मत्ती 1:1-16) l
हमें नहीं मालुम कि यीशु के नाम में दया के एक कार्य का क्या परिणाम हो सकता है l