Month: मार्च 2021

लिखने का उद्देश्य

“प्रभु मेरा ऊँचा गढ़ है . . . . हम शिविर छोड़ते समय गा रहे थे l” 7 सितंबर, 1943 को, एट्टी हिल्सम ने पोस्टकार्ड पर इन शब्दों को लिखकर ट्रेन से फेंक दिया l वे अंतिम रिकॉर्ड किए गए शब्द थे जो हम उनसे सुन सकते थे l 30 नवंबर, 1943 को ऑउशवेट्ज़ में उनकी हत्या कर दी गई थी l बाद में, (द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान) एक नज़रबंदी-शिविर(concentration camp) में हिल्सम के अनुभवों की डायरी का अनुवाद और प्रकाशन किया गया l उन्होंने परमेश्वर के संसार की सुंदरता के साथ नाज़ी(Nazi/नात्सी/फासिस्ट) कब्जे की भयावहता के बारे में उसके दृष्टिकोण को लेखबद्ध किया l उसकी डायरी का अनुवाद सरसठ भाषाओं में किया गया है - सभी के लिए एक उपहार जो अच्छा और बुरा दोनों को पढ़ेंगे और विश्वास करेंगे l
प्रेरित यूहन्ना ने पृथ्वी पर यीशु के जीवन की कठोर वास्तविकताओं को रद्द नहीं किया; उसने दोनों ही को लिखा, भलाई जो यीशु ने किया और चुनौतियाँ जिनका उसने सामना किया l उसके सुसमाचार के अंतिम शब्द उस पुस्तक के पीछे के उद्देश्य का बोध कराते हैं जो उसके नाम है l यीशु ने “बहुत से चिन्ह . . . दिखाए,” ((20:30) जो यूहन्ना द्वारा लिखे नहीं गए l लेकिन ये शब्द, उसका कहना है, “इसलिए लिखे गए हैं कि तुम विश्वास करो” (पद.31) l यूहन्ना की “डायरी” विजय के स्वर पर समाप्त होती है : “यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है l” सुसमाचार के इन शब्दों का उपहार हमें विश्वास करने और “उसके नाम से जीवन” पाने का अवसर देता है l
सुसमाचार हमारे लिए परमेश्वर के प्रेम का डायरी खाता है l वे शब्द पढ़ने और विश्वास करने और साझा करने के लिए हैं, क्योंकि वे हमें जीवन की ओर ले जाते हैं l वे हमें मसीह की ओर ले जाते हैं l

परमेश्वर से गिड़गिड़ाना

एक सुबह एक परिवार की प्रार्थना का समय एक आश्चर्यजनक घोषणा के साथ समाप्त हुआ l जैसे ही पिताजी ने कहा, “आमीन,” पाँच वर्षीय कवि ने प्रगट की, “और मैंने जॉन के लिए प्रार्थना की, क्योंकि प्रार्थना के दौरान उसकी आँखें खुली थीं l”
मुझे पूरा यकीन है कि आपके दस वर्षीय भाई के प्रार्थना औचित्य(protocol) के लिए प्रार्थना करना हमारे लिए पवित्रशास्त्र का लक्ष्य नहीं है, जब यह हमें परहित प्रार्थना करने के लिए कहता है, लेकिन कम से कम कवि को एहसास हुआ कि हम दूसरों के लिए प्रार्थना कर सकते हैं l
बाइबल शिक्षक ऑसवॉलल्ड चेम्बर्स ने किसी और के लिए प्रार्थना करने के महत्व पर जोर दिया l उन्होंने कहा कि “मध्यस्थता की प्रार्थना अपने आप को परमेश्वर के स्थान पर रखना है; यह आपके भीतर उसका मन और दृष्टिकोण का होना है l” यह उस प्रकाश में दूसरों के लिए प्रार्थना करना है कि हम परमेश्वर के विषय और हमारे लिए उसके प्रेम के बारे में क्या जानते हैं l
हम दानिय्येल 9 में मध्यस्थता की प्रार्थना का एक बड़ा उदाहरण पाते हैं l नबी ने परमेश्वर के परेशान करने वाले वादे को समझ लिया कि यहूदी बेबीलोन में सत्तर साल के दासत्व में रहेंगे (यिर्मयाह 25:11-12) l यह महसूस करते हुए कि वे वर्ष पूरा होने के करीब थे, दानिय्येल प्रार्थना के भाव में चला गया l उसने परमेश्वर की आज्ञाओं का हवाला दिया (दानिय्येल 9:4-6), खुद को दीन किया (पद.8), परमेश्वर के चरित्र को आदर दिया (पद.9), पाप स्वीकार किया (पद.15), और उसकी दया पर निर्भर हुआ जब वह अपने लोगों के लिए प्रार्थना करता था (पद.18) l और उसे परमेश्वर का तत्काल उत्तर मिला (पद.21) l
इस तरह की नाटकीय प्रतिक्रिया के साथ सभी प्रार्थनाएं समाप्त नहीं होती हैं, लेकिन हम इस बात के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं कि हम दूसरों के लिए परमेश्वर पर विश्वास और निर्भरता के साथ जा सकते हैं l

अपने काम पर ध्यान देना

वर्षों पहले, मेरे बेटे जोश और मैं एक पहाड़ी रास्ते पर जा रहे थे जब हमने हवा में उठते धूल का एक बादल देखा l हम आगे बढ़े और एक जानवर को मिटटी के एक ढेर में एक बिल बनाने में व्यस्त देखा l उसके सिर और कंधे बिल में थे और वह अपने सामने के पंजे से जोर से खुदाई कर रहा था और अपने पिछले पैरों से बिल में से मिटटी बाहर निकाल रहा था l वह अपने काम में इतना मग्न था कि उसने हमें सुना नहीं l
मैं रुक नहीं सकता था और पास में पड़ी एक लंबी छड़ी से उसे उकसाया l मैंने जानवर को चोट नहीं पहुंचाई, लेकिन उसने सीधे हवा में छलांग लगा दी और हमारी ओर बढ़ा l जोश और मैंने सौ-गज दौड़ के लिए नए विश्व रिकॉर्ड बनाए l
मैंने अपनी दुस्साहस से कुछ सीखा : कभी-कभी अन्य लोगों के काम में न झाँकना ही सबसे उत्तम होता है l यीशु में सहविश्वासियों के साथ संबंधों में यह विशेष रूप से सच है l प्रेरित पौलुस ने थिस्सलुनीकियों को “चुपचाप रहने और अपना-अपना काम काज करने और अपने अपने हाथों से कमाने का प्रयत्न” करने हेतु प्रोत्साहित किया (1 थिस्सलुनीकियों 4:11) l हमें दूसरों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर के अनुग्रह से वचन साझा करने की कोशिश करनी चाहिए और कभी-कभी हमें सुधार के एक कोमल शब्द की पेशकश करने के लिए कहा जा सकता है l लेकिन एक शांत जीवन जीना सीखना और दूसरों के जीवन में दखल न देना महत्वपूर्ण है l यह उन लोगों के लिए एक उदाहरण बन जाता है जो अभी परमेश्वर के परिवार में नहीं हैं (पद.12) l हमारी बुलाहट “आपस में प्रेम रखना [है]” (पद.9) l

कौन जानता है?

चीनी दंतकथा के अनुसार, एक व्यक्ति ने एक बार अपने बेशकीमती घोड़ों में से एक को खो दिया, उसके पड़ोसी ने उसके नुकसान के लिए दुख व्यक्त किया l लेकिन यह आदमी बेपरवाह था l उसने कहा, “कौन जानता है कि यह मेरे लिए अच्छी बात हो सकती है?” आश्चर्यजनक रूप से, खोया हुआ घोड़ा दूसरे घोड़े के साथ घर लौट आया l जब पड़ोसी ने उसे बधाई दी, उसने कहा, “कौन जानता है कि यह मेरे लिए एक बुरी बात हो सकती है?” जैसा कि पता चला, उसके बेटे ने नए घोड़े पर सवार होकर अपना पैर तोड़ लिया l यह एक दुर्भाग्य की तरह लग रहा था, जब तक कि सेना युद्ध में लड़ने के लिए सभी सक्षम पुरुषों की भर्ती करने के लिए गांव में नहीं पहुंची l बेटे की चोट के कारण, वह भर्ती नहीं हो सका, जो अंततः उसे मौत से बचा सकता था l
यह चीनी कहावत के पीछे की कहानी है जो सिखाती है कि एक कठिनाई भेष में एक आशीष हो सकती है और इसके विपरीत भी l इस प्राचीन ज्ञान का सभोपदेशक 6:12 में एक करीबी समानांतर है, जहाँ लेखक ध्यान देता है : “कौन जानता है कि उसके लिए(किसी व्यक्ति के लिए) क्या अच्छा है?” वास्तव में, हममें से कोई भी नहीं जानता कि भविष्य क्या है l प्रतिकूलता के सकारात्मक लाभ हो सकते हैं और समृद्धि के दुष्प्रभाव हो सकते हैं l
प्रत्येक दिन नए अवसर, खुशियाँ, संघर्ष और दुख प्रदान करता है l परमेश्वर के प्यारे बच्चों के रूप में, हम उसकी संप्रभुता में आराम कर सकते हैं और अच्छे और बुरे समय के बीच उस पर विश्वास कर सकते हैं l “परमेश्वर ने दोनों को एक ही संग रखा है” (7:14) l वह हमारे जीवन की सभी घटनाओं में हमारे साथ है और अपनी प्रेमपूर्ण देखभाल का वादा करता है l